Sunday, March 27, 2011

उच्च तकनीकि मसीनी उपकरणों की सहायता से प्रकृति विध्वंस


दो दिनों पूर्व मुझे किसी उच्च तकनीकि मसीनी उपकरण बनाने वाली कम्पनी ने अपने विभिन्न आधुनिक उपकरणों के डेमो की वीडियो फिल्म्स की सीडी भेजा। शक्तिशाली पेट्रोल इंजिन से लैस, ये पोर्टेबल आधुनिक उपकरण बडे ही हैंडी, फुर्तीले व दक्ष हैं। इनमें ग्रास व बुश कटिंग मसीन है जिसकी मदद से अकेला आदमी एक घंटे में ही एक एकड खेत में घास और झाडी का सफाया कर सकता है, ऑगर मसीन है जिसकी मदद से अकेला आदमी चटपट मिनटों में ही दो फीट से ज्यादा व्यास और छः फीट गहरा गड्ढा खोद सकता है, ट्री-ब्रांच-ट्रिमिंग मसीन है जिसके द्वारा एक अकेला ही व्यक्ति पन्द्रह-बीस फीट ऊँची टहनी-डाली को सेकेन्डों में काट और साफ कर सकता है।

पर सबसे दिल दहलाने वाला पोर्टेबल आधुनिक उपकरण है ट्री-कटिंग-सॉ मसीन, जिसकी मदद से अकेला ही व्यक्ति दो-तीन फीट से भी ज्यादा व्यास के तने वाले सीधे खडे पेड़ को कुछ सेकेन्डों में ही जमींदोज कर देता है । जो वृक्ष भयंकर आँधी-तूफान में भी  मदमस्त लहराते हुए शान से खड़ा रह जाता है, उसी अति बलशाली और भीमकाय वृक्ष  को ये अदना सी दिखने वाली मसीन कुछ ही पल में गाजर-मूली की तरह काट कर गिरा देती है।यह विडियो एक पल के लिए तो आपको बेचैन ही कर देता है। मेरी बेटी इस विडियो को देख इतनी अपसेट हुई कि उसने अपनी बाल-सुलभ नाराजगी जताते हुए मुझसे पूछा कि सरकार ऐसी मसीन बनाने वालों को जेल में क्यों नहीं डाल देती।मैं उसके इस अजीब से प्रश्न का कोई संतोष-जनक उत्तर नहीं दे पाया।

कुछ वर्षों पूर्व , कुछ सरकारी काम के ही सिलसिले में मुझे छत्तीसगढ राज्य में एक ओपेन कोल माइन का साइट देखने का मौका मिला। वह दृश्य तो और स्तम्भकारी था। बडे-बडे भीमकाय अर्थ-मूवर मसीनें हरे-भरे पहाड़ को ऐसे द्रुति व तत्परता से काट रही थीं, मानो कोई बडी उत्फुल्लता व चाव से अपने जन्म-दिन की केक काट रहा हो ।

आज मानव ने ऐसे ही न जाने कितने आयुध और आधुनिक उपकरणों की ईजाद कर ली है और वह बडे ही गर्व व अहंकार पूर्वक प्रकृति पर अपनी धाक जमाने व अपने शक्ति प्रदर्शन में मशगूल है । किन्तु मानव अपने अंतर्हृदय और अंतर्मन में स्थित कोमल भाव की एक दृष्टि-मात्र ही इस प्रकृति की सुन्दर, सुकोमल व सुव्यवस्थित रचना पर डाले तो सहज ही यह अनुभूति अवश्य जगती है कि प्रकृति की सुन्दर चित्रकला को नष्ट कर हम अपनी पृथ्वी के आँचल को उजाड और इस जगत को कितना कुरूप कर रहे हैं।

धरती के कैनवॉस पर इन हरे भरे वृक्षों से सजे वन और पहाड़, इनके बीच प्रवाहित मीठे जल वाली हमारी जीवन-आधार नदियों का अद्भुत व रंगरचित चित्र,  प्रकृति ने अपनी समय-तूलिका से लाखों करोडो वर्षों के अथक श्रम व साधना से निरंतर रंगा व सजाया है। किन्तु हम अपने जाने-अनजाने में किये जा रहे प्रकृति विरोधी कृत्यों व उस पर अपने शक्ति प्रदर्शन से प्रकृति के अथक प्रयास से बनी इन सुन्दर पेंटिंग्स को हम कुरूप और नष्ट कर रहे हैं।

Monday, March 21, 2011

जापानी जीवन संस्कृति में शालीनता व अनुशासनप्रियता का महत्त्व

आज टाइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र में श्री अमृत ढिल्लन , जो दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं और हाल ही में ही भूकम्प की दैवीय आपदा से जूझ रहे जापान से वापस लौटे हैं, का लेख “ Japan take a bow for grace under fire”  पढ़ने को मिला। यह लेख जापानी लोगों का जीवन के कठिन क्षणों में भी उनकी शालीनता,अनुशासनप्रियता , समय की पाबंदी सार्वजनिक जीवन में सदाचार के पालन का बड़ा ही भावपूर्ण व प्रभावी विवरण देता है ।

लेख पढ़कर मुझे अपने एक पूर्व जापनी सहकर्मी श्री सैतो , जो बंगलौर मेट्रो रेल प्रोजेक्ट में मेरे कार्यकाल की अवधि में एक जापानी कम्पनी की और से मुख्य संविदा एवं करार विशेषज्ञ के रूप में काम करते थे, का स्मरण हो आया। श्री सैतो की उम्र तो सरसठ वर्ष से ज्यादा थी , किन्तु उनकी कार्य की फुर्ती, तत्परता, तल्लीनता एवं उत्साह किसी भी युवा से कम नहीं था । शांत मुखमंडल, उद्वेगरहित नपी-तुली संतुलित भाषा, एवं सधी हुई चाल-ढाल में उनका व्यक्तित्व अति गरिमापूर्ण लगता था । श्री सैतो प्रोजेक्ट में अति महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी , लगभग पचास से अधिक संविदाओं और करारों का डाकुमेंटेसन, उनकी लीगल और स्टैचुअरी प्रोविजन्स की स्ट्रक्चरिंग, और उनका तयसुदा समय में फाइनलाइजेसन और इम्प्लीमेंटेसन ,में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्बहन करते थे , किन्तु स्वयं उनके कार्य अथवा उनके केबिन में रंचमात्र भी कोई अव्यवस्था कभी भी  दिखाई नहीं पड़ती थी । उनके चैम्बर में सभी पत्र, कागजाद्, फाइलें उनकी मेज और आलमारी में करीने से एवं सटीक मार्किंग के साथ सुव्यवस्थित रखे रहते थे, और किसी भी चर्चा के दौरान आवश्यक कागजाद या फाइल वे चटपट बिना कोई वक्त गँवाये और बिना किसी सहाय़क की सहायता के वे तुरत व चमत्कारिक रूप से उपलब्ध कर लेते थे । वे चर्चा के दौरान, दूसरों की बात ध्यान से सुनते, खुद बस जरूरत के मुताबिक और बिलकुल नपा-तुला ही बोलते, और जितना भी बोलते वह सटीक व तथ्यों-जानकारियों पर पूरी तरह आधारित होता ।

मीटिंग्स के प्रति वे बड़े ही समय-पाबन्द थे, खुद ठीक समय से उपस्थित होते, और किसी भी कारण से यदि बड़ा से बड़ा अधिकारी भी, चाहे प्रबंध निदेशक ही क्यों न हों, बिलम्ब से आता, वे मीटिंग में दो मिनट से ज्यादा प्रतीक्षा कतई नहीं करते थे और बिना वक्त जाया किये वापस अपने केबिन में आकर अपने काम में व्यस्त हो जाते ।वे मीटिंग में वापस उस अधिकारी के व्यक्तिगत खेद प्रकट करने और अनुरोध करने पर ही आते। इस तरह वे बडे ही विनम्र और दृढ तरीके से अपनी समय की पाबंदी और अनुशासनप्रियता का संदेश दे देते थे ।

श्री सैतो सचमुच ही शालीनता, अनुशासन-प्रियता,समय की पाबंदी, और सार्वजनिक जीवन में सदाचरण और गरिमामय व्यवहार के प्रतिमूर्ति थे। श्री सैतो के अलावा भी कुछ अन्य जापानी सहकर्मियों के साथ मुझे दिल्ली मेट्रो प्रोजेक्ट में काम करने का अवसर मिला, और उन सज्जनों में भी मुझे ये सद्गुण कमोवेश दिखाई पड़ता था । इसलिये यह कहना सर्वथा उचित ही है, और जैसा श्री अमृत ढिल्लन जी ने भी अपने लेख में बताया है, कि जापानी संस्कृति व जीवन-शैली में शालीनता, अनुशासन-प्रियता, समय की पाबंदी, और सार्वजनिक जीवन में सदाचरण और गरिमामय व्यवहार की स्पष्ट झलक मिलती है ।

दस दिन पूर्व जापान में आये भारी भूकम्प और सुनामी के भयंकर प्राकृतिक आपदा और उससे हुई भयंकर तबाही ने जापानियों के प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान के स्वभाव व मूल्यों, उनकी स्वच्छता, शुचिता, सुकोमलता और शालीनतापूर्ण जीवन-पद्दति के साथ क्रूर मजाक किया है । प्रकृति के प्रति प्रेम जापानियों का मौलिक स्वभाव है । सकूरा आगमन पर जापानी चेरी वृक्ष के साथ उनका उत्सव समारोह, उनके चरम प्रकृति प्रेम को ही दर्शाता है । उनके लकड़ी के हल्के , सुन्दर-सुगढ़ मकान व उनकी दीवारों पर उकेरे गये सादगी भरे प्राकृतिक दृश्यों की पेंटिंग्स,इन घरों को प्रकृति से अलग-थलग किसी किले का रूप देने के बजाय, इन्हें प्रकृति और परिवेश की हरियाली से आत्मसात सी कर देती हैं । जापानी जीवन-शैली प्रकृति के ऊपर आधिपत्य ज़माने के विपरीत उसके साथ समाचरण व साहचर्य की है ।उनकी स्याही व वाटर कलर  पेंटिंग्स में भी इसी प्रकृति-प्रेम व इसकी प्रधानता की गहरी छाप दिखाई पड़ती है ।

श्री ढिल्लन ने अपने लेख में जापानियों की अनुशासन प्रियता,कर्तव्यपरायणता और सार्वजनिक जीवन में सदाचरण व गरिमामय व्यवहार की कुछ रोचक और प्रभावशाली घटनाओं की चर्चा की है । सार्वजनिक जीवन में शायद ही कोई चीखते, चिल्लाते, थूकते, जम्भाई लेते,अस्तव्यस्त दिखते, भीड़ में धक्का-मुक्की करते, कुहनी मारते,( जो कि हमारे देश में तो आम रूप से दिखायी पड़ जाता है ।) दिखायी पडे । जापानी अपने सार्वजनिक जीवन में सदा ही शान्त, सुव्यवस्थित,सहिष्णु और सदा नियमानुकूल व्यवहार करते हैं। भीड़भाड़ की जगहों में वे बडी ही नम्रता व सावधानी के साथ, दूसरों को बिना अवरोध और असुविधा दिये चलने का प्रयास करते हैं । उनका आम जीवन में नियमानुकूल व संयमित आचरण निश्चय ही अनुकरणीय है ।विश्व के सबसे घनी आबादी में से एक देश होने के बावजूद भी उनके सार्वजनिक स्थान हमेशा शान्तिपूर्ण, बिना किसी हंगामा या झगडा-फसाद से रहित होते हैं। औद्योगिक देशों में जापान न्यूनतम् अपराध दर वाला देश है ।

इस प्राकृतिक आपदा के विषम समय में भी , जबकि बहुत से लोग भोजन-पानी जैसी मूल-भूत सुविधाओं और अपने रहने के ठौर-ठिकानों से भी वंचित हो गये हैं, शायद ही कोई लूट-पाट, वेंडिंग मसीनों की तोड़फोड़ की घटना ( जो कि अमरीका में भी पिछले वर्ष कैटरीना चक्रवाती तूफान के दौरान अनेकों की संख्या में हुईं।) हुई हो ।जबकि देश में अधिकांश सब्जी फल-फूल, दूध व अन्य खाद्य व पेय पदार्थ रैडियेसन प्रभावित हैं, और जापान सरकार सावधानी के तौर पर नागरिकों से केवल विशेष सरकारी दुकानों पर उपलब्ध पूरे जाँचे-परखे सब्जी फल-फूल, दूध व अन्य खाद्य व पेय पदार्थ ही उपयोग में लाने को लगातार अनुरोध कर रही है, लोग कई दिनों से भूखे-प्यासे रहकर भी अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों को साथ लिए, अनुशासन से कतार में लगकर पूरे संयम और शांति से पूरा सहयोग कर रहे हैं।

सामान्यतया भी जापानी सार्वजनिक स्थानों पर पूरा ध्यान रखने और उनको स्वच्छ व व्यवस्थित रखने में पूरा सहयोग करते हैं।सड़क पर चलते राहगीर एक कागज का टुकड़ा भी इधर-उधर भी फिंका देखते हैं, तो चुपचाप उठाकर उसे पास के कूडेदान में डाल देते हैं।यदि आपने टैक्सीवाले को गलती से ज्यादा रकम दे दी, तो वे उल्टा आपसे क्षमा माँगते हुए, ज्यादा राशि आपको वापस कर देंगे।ट्रेनों, बसों एवं अन्य सार्वजनिक वाहनों में लोग अनुशासन के साथ पंक्तिबद्ध चढते उतरते हैं व पूरी शान्ति से यात्रा करते हैं। इन सार्वजनिक परिवहनों के कर्मचारी भी यात्रियों के साथ पूर्ण शालीनता और विनम्रता से पेश आते हैं।

जापानियों का सार्वजनिक स्थानों में सदाचरण का एक अच्छा उदाहरण श्री ढिल्लन ने भूकम्प वाले दिन हुई एक रोचक घटना से दिया है। उस दिन टोक्यो के एक भीड-भाड वाले रेस्तरॉ में काफी लोग अच्छे भोजन का आनन्द ले रहे थे जब अचानक भूकम्प आया। सभी लोग सुरक्षा के लिए बाहर सड़क पर निकल आये। किन्तु जैसे ही भूकम्प शान्त हुआ सभी लोग शान्तिपूर्वक रेस्तरॉ में वापस आ गये और वाकायदा लाइन में लगकर अपने भोजन की बिल का भुगतान करने लगे । भला ऐसा सदाचरण कहाँ देखने को मिलेगा ?

इतने कठिन और आपदा के क्षणों में भी जापानी लोगों द्वारा किसी भी प्रकार की दीनता अथवा लाचारी दिखाये बिना , पूरी बहादुरी और धीरज से परिस्थितियों का मुकाबला कर रहे हैं। न दैन्यम् न पलायनम् की इससे अच्छी मिसाल क्या हो सकती है ?

बौद्ध दर्शन के मतानुरूप ही , जापानी जीवन संस्कृति व परम्परा भी, जीवन व सभी पदार्थों की नश्वरता को स्वीकार करते हुए, साक्षी भाव से पूर्ण सहनशीलता व धैर्य के साथ सदाचरण व सहिष्णुतापूर्ण जीवन जीने की कला पर आधारित है । दुर्भाग्य से इस प्राकृतिक प्रकोप ने उनके इस जीवन दर्शन को सर्वथा सत्य ही सिद्ध किया है ।सच कहें तो आधुनिक सभ्यताओं में, जहाँ जीवन नये-नये उपकरणों, मसीनी यंत्रों,और आधुनिक सुविधाओं पर केन्द्रित व निर्भर है, जापानी जीवन दर्शन सबसे उत्कृष्ट है ।

हम सब यही प्रार्थना ईश्वर से करें कि जापानी लोगों की यह विनम्रता,सहिष्णुता,सज्जनता,शांतिप्रियता,सार्वजनिक जीवन में अनुशासन व सदाचरण एवम् उनका धीरज व संयम उन्हे इस आपदापूर्ण प्राकृतिक प्रकोप के विषम काल से गरिमापूर्ण ढंग से सामना करने हेतु शक्ति व आत्मबल प्रदान करे।

Sunday, March 13, 2011

शिवमेवम सकलम् जगत: ………नारी तुम केवल श्रद्धा हो ?

शिवमेवम सकलम् जगत: ………नारी तुम केवल श्रद्धा हो ?: "विगत सप्ताह, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में कुछ आयोजनों व संगोष्ठियों में उपस्थित होने और वहा..."

………नारी तुम केवल श्रद्धा हो ?



विगत सप्ताह, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में कुछ आयोजनों व संगोष्ठियों में उपस्थित होने और वहाँ विदुषी ( एवं कुछ विद्वान भी ) वक्ताओं को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ । इस दिवस को मनाने की पृष्ठभूमि , इसकी वर्तमान समय में मनाने, विशेष तौर से भारत जैसे देश आर्थिक रूप से उभरते विकासशील देश में,की प्रासंगिकता के परिपेक्ष्य में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलीं । 

यह जानकारी अवश्य ही एक सुखद अनुभूति देती है कि अब भारत जैसे देश में भी, जहाँ अबतक सामान्यतया सामान्य-वर्गीय सोच के अनुरूप ही महिलाओं की कमोवेश भूमिका मात्र पारिवारिक जिम्मेदारी- कुशल गृहिणी, समर्पित पत्नी और माँ तक सीमित रही है, वहाँ पर अब शिक्षा के विस्तार , उदार आर्थिक-व्यवस्था में नये-नये रोजगार के अवसरों  के फलस्वरूप, महिलाओं की देश की सामाजिक व साथ ही साथ आर्थिक व्यवस्था में बहु-आयामी भूमिका को बल व प्रोत्साहन मिल रहा है ।बैंकिंग सेक्टर,हॉस्पिटैलिटी सेक्टर, शिक्षा क्षेत्र, मानव विकाश व प्रबंधन, एवं अन्य सेवा क्षेत्रों में आज महिलाएँ यहाँ अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। साथ ही साथ उद्योग व कारपोरेट क्षेत्र , मेडिकल और यहाँ तक कि प्रतिरक्षा क्षेत्र में भी महिलाएँ अग्रणी भूमिका की दिशा में अग्रसित हो रही हैं। पंचायतराज और इसके अंतर्गत महिलाओं को मिले स्थान आरक्षण से स्थानिक प्रशासन इकाइयों में भी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी बढी है । यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सुखद अनुभूति, और साथ ही साथ देश की द्रुत आर्थिक उन्नति हेतु बडा ही शुभ संकेत है ।

किन्तु पूरे परिदृश्य का आकलन  एवं महिला पारिस्थितिक मूल्यांकन आँकडों जैसे महिला शिक्षा दर, महिला-पुरुष जनसंख्या अनुपात, मातृ मृत्यु दर, बालिका शिशु मृत्यु दर, महिला पर कैपिटा इंकम , इत्यादि आँकडे न सिर्फ महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक निराशाजनक तस्वीर देते हैं , बल्कि एक चिन्ताजनक स्थिति की ओर संकेत करते हैं । वैसे तो आज से पैंतालीस वर्ष पूर्व ही इस देश का मुख्य प्रशासनिक पद – प्रधानमंत्री को एक महिला ने सुशोभित किया, और अन्य महत्त्वपूर्ण पदों को भी महिलाओं ने सुशोभित किया है और कर रही हैं, किन्तु सामान्यतौर पर तो उनकी भागीदारी व हिस्सेदारी सोचनीय व चिंताजनक ही है । 

विगत वर्ष IIM Bangalore में मेरी प्रबंधन की पढाई के सिलसिले में मेरे कुछ माह के संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में प्रवास के दौरान,  मुझे वहाँ के सामाजिक व आर्थिक ढाँचे को नजदीक से देखने व इसपर कुछ महत्त्वपूर्ण अध्ययन का अवसर मिला । इसमें सबसे सुखद , व विश्मयकारी भी,अनुभव व जानकारी यह रही कि वहाँ के दैनन्दिन के अधिकांश कार्यकलाप, जैसे स्कूल बस के ड्राइवर,रेस्तरा के कर्मचारी, ट्रैफिक पोलिस, हाईवे की नाइट पोलिस पैट्रोलिंग, हाईवे के रिमोट वे-साइड रेस्ट सेंटर्स के कर्मचारी व केयर-टेकर्स , गैस स्टेशन के नाइट सिफ्ट स्टाफ , जोकि हमारे देश में अधिकांशतः पुरुषों द्वारा ही सँभाला जाता है, वहाँपर अधिकांशतः या सच पूछिये तो कहीं कहीं तो केवल महिलाएँ ही सँभालती नजर आयीं। वहाँ पर कमोवेस हर कार्यक्षेत्र- परिवेश में ही महिलाएँ अग्रणी भूमिका में नजर आयीं। यह बात महिलाओं की समाज में वास्तविक अर्थों में पुरुषों के बराबर की भागीदारी को दर्शाता है।मेरे विचार से, हमारे देश में भी जब तक महिलाओं की हर पक्ष- सामाजिक,आर्थिक व राजनीतिक , में इस तरह की वास्तविक अर्थों में बराबर की भागीदारी की स्थिति नहीं बन जाती, महिलाओं के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की बात अधूरी ही लगती है ।

वर्तमान स्थिति के संदर्भ में तो मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि मैं उसी दिन और स्थिति में यह मानने को तैयार हूँ कि हमारे देश में महिलाएँ वास्तविक अर्थों में सशक्त व आत्मनिर्भर हैं जबकि मैं एक पिता के रूप में अपनी बेटी को अकेले ( बिना किसी इस्कोर्ट के ) उसके ट्यूसन जाने,कॉलेज जाने ,शॉपिंग जाने,अपनी शिक्षा या कार्य के सम्बंध में किसी दूसरे शहर या स्थान बस या ट्रेन से जाने या देर रात में उसे अपने ऑफिस से वापस घर लौटने के प्रति निश्चिंत और बेफिक्र रह सकूँ । जब तक ये बातें मुझे,एक पिता को, रंचमात्र भी किसी फिक्र में डालती हैं, मुझे तो यह तसल्ली नहीं हो पाती कि अभी भी हमारा देश व समाज महिला सशक्तिकरण और आत्म-निर्भरता की सही दिशा में अग्रसर है ।  

Thursday, March 10, 2011

...लोग यूँ ही हैं झिझकते सोचते



बचपन में पढी अयोध्या सिंह उपाध्याय की ‘बूँद पर लिखी एक हिन्दी-कविता मुझे बरबस याद आती रहती है, खास तौर जब भी कोई भी अनिश्चितता से भरे स्थान-परिवेश बदलाव से साबका पडता है। शायद इसलिये हो कि बचपन में भी यह कविता मुझे अति प्रिय थी ।

ज्यों निकलकर बादलों की गोद से,
थी अभी इक बूँद कुछ आगे बढी ।
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह घर मैं छोड कर क्यों यूँ चली ।।

दैव मेरे भाग्य में है क्या बदा,
मैं बचूँगी, या मिलूँगी धूलमें।
या जलूँगी मैं कहीं,
गिर अंगारे पर किसी ।





 
बह चली उस काल कुछ ऐसी हवा,
वह समुन्दर ओर आयी अनमनी।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला,
वह उसी में जा पडी मोती बनी ।।



लोग यूँ ही हैं झिझकते सोचते,
जबकि उनको छोडना पडता है घर।
किन्तु घर का छोडना अक्सर उन्हें,
बूँद ल्यों कुछ और ही देता है कर ।।

जीहाँ, इस जीवन यात्रा में जब-जब इसी बूँद की तरह किसी अनिश्चित मंजिल की ओर पयान की चुनौती सामने आयी, इसी तरह की अनिश्चितता , संशय और भय के आशंका रूपी बादल मन के आकाश में घुमडने लगते थे, जैसे- स्कूल की पढाई के उपरान्त पहली बार माँ-बाप की छत्र-छाया से दूर दूसरे शहर में कालेज में दाखिला लेना, कालेज की पढाई पूरा करने के बाद नौकरी हेतु कम्पीटीसन-परीक्षाओं और उनके परिणाम की अनिश्चितता, नौकरी ज्वाइन करने के पश्चात नये स्थान व परिवेश की अनिश्चितता,नौकरी के दौरान हुए स्थानान्तरणों के कारण नये स्थान, नये बास, नये कार्य-परिवेश व बच्चों के नये स्कूल में दाखिले की अनिश्चितता ।

इन अनिश्चितताओं की स्थिति अक्सर मन में भारी डर व संशय लाती थीं, कल के प्रति मन में घबराहट पैदा करती थीं, और वर्तमान परिस्थिति व स्थान के प्रति रचित कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने से झुँझलाहट पैदा करती थीं । पर फिर नये स्थान पर कुछ दिन या महीनों में यह डर जाता रहता, और यह नया स्थान व परिवेश भी पुराने की तरह अपना हो जाता ।बच्चे भी इस नये परिवेश को पूरी सरगोसी से अपना लेते । पर इससे भी इतर , नये स्थान व परिवेश की सबसे अनूठी देन रही है : नये-नये व अलग-अलग कार्य-अनुभवों से साक्षात्कार व सीख, नये-नये कोलीग्स व मित्रों का संसर्ग व साहचर्य । सचमुच अद्भुत उपलब्धियों का कारण रही हैं ये जीवन की अनिश्चतताएँ भरी विभिन्न कारण-अकारण य़ात्राएँ ।

इसीलिये कविता का अंतिम पद मुझे अति प्रिय व प्रेरणाप्रद लगता है-

लोग यूँ ही हैं झिझकते सोचते,
जबकि उनको छोडना पडता है घर।
किन्तु घर का छोडना अक्सर उन्हें,
बूँद ल्यों कुछ और ही देता है कर ।।

Wednesday, March 2, 2011

विचार शून्यता व अवचेतन मन की सूक्ष्म दृष्टि



विचारों की प्रबलता व उनके निरंतर अंधण व शोर के कारण हमारे अवचेतन मन की सूक्ष्म दृष्टि क्षमता जाया जाती है । प्रभात बेला में पक्षियों का कलरव, चलती हवा में पत्तों की सरसराहट, सूर्य की बालकिरणों में चमकती ओस की बूँदें,बगीचे में कलियों से खिलते पुष्प, य़ा  अलसाये से व अर्धनिदृत से स्कूल के लिये प्रस्थान करते मासूम बच्चे , इन मनोहरतम् व अद्भुत ध्वनियों व दृश्यों पर तो हमारा ध्यान भी नही पहुँच पाता ।

हमारे अवचेतन की सूक्ष्म दृष्टि जो मात्र ही इन मनोहरतम् व अद्भुत ध्वनियों को सुनने व देखने में सक्षम है,वह हमारे अन्दर चल रहे विचारों के अंधण में इस तरह फँसी और दबी रहती है, कि उसे तो रंचमात्र यह आभाष भी नही मिल पाता कि हमारे चारों ओर निरंतर कितनी सुन्दर व शुभ ध्वनियाँ, दृष्य़ व घटनायें निरंतर घट रही हैं ।वस्तुतः इन सुन्दर व शुभ ध्वनियाँ और दृष्य़ों को बिना अवचेतन की सूक्ष्म दृष्टि की शक्ति व जाग्रत अवस्था के देखना व सुनना सम्भव ही नही है ।

विगत कुछ दिनों से एक छोटी सी पर बडी रोचक सी घटना मेरे स्वयं के साथ घटित हुई है।पाँच-छः दिन पहले ,शाम को ऑफिस से घर लौटते वक्त, घर के रास्ते से थोडा सा पहले एकाएक ध्यान कोयल की मीठी कूक की ओर गया । जब पलट कर निगाह उस मधुर आवाज की दिशा में गयी, तो इस शाम के धुँधलके में भी ,सडक के किनारे के बगीचे में , पास के छोटे पेड पर एक साधारण सी टहनी पर पत्तों के आधे  झुरमुट में सहजता से बैठी इस कोयल की एक झलक सी मिली । सडक पर सरकती गाडी में बैठा मैं तो आगे बढ गया, किन्तु मन तो पलट-पलट कर उतावले बच्चे सा उसी मीठी ध्वनि की ओर भागा जा रहा था । वहाँ से दूर तलक, घर के बिल्कुल पास भी वह मिठास भरी, हालाँकि बहुत धीमी ही, आवाज अब भी आ रही थी । घर के अन्दर आ गया , तो यहाँ आवाज का आभाष तो अनुपस्थित था, किन्तु उस आवाज के प्रति मन की उत्सुकता व उतावलापन अब भी वैसा ही था । और मन की यही  उत्सुकता मुझे घर के पीछे वाली बालकनी तक ले गयी, और सामने की झील के उसपार, सडक के नजदीक के उसी बगीचे से अब भी वह धीमी और मीठी आवाज कुछ-कुछ अंतराल पर आती सुनाई पड रही थी। और मन भी अब अपनी चंचलता व उतावलापन छोड बडे ध्यान व शान्त भाव से उस आवाज को सुनने में विभोर था । ऐसा महसूस हो रहा था जैसे यह आवाज कहीं बाहर से न आकर, कहीं अपने अंतर्मन की प्रतिध्वनि से ही आ रही हो ।अब तो हर रोज ही ,शाम को उस स्थान से गुजरते , मन उसी मीठी आवाज की तलाश में पीछे छूट जाता है । कुछ ऐसा ही होता है जब मन की सूक्ष्म दृष्टि किसी चीज के प्रति जागृत हो जाती है ।

पिछले वर्ष, प्रबंधन की पढाई हेतु, जब मैं IIMB परिसर में रह रहा था, तो वहाँ भी प्रायः इसी तरह की अनुभूति होती थी । उस हरे-भरे , विभिन्न प्रकार के व सुरुचिपूर्ण रूप से स्थापित पेडपौधों और सुन्दर पुष्पों से सज्जित  परिसर में प्रभात और संध्या सैर के दौरान जब कभी अचानक ध्यान पक्षी-कलरव, या पेडों-झुरमुटों के बीच बैठे गुनगुनाते, चीं-चूँ करते कीडों-मकोडों की ओर ध्यान चला जाता, तो उस समय जरूर मन की इस सूक्ष्मता का रंच आभाष मिलता था ।वरना तो इस इर्द-गिर्द फैले, आंतरिक व वाह्य, दोनों ओर के शोर के बीच यह मन की इस सूक्ष्मता इतनी दबी सी रहती है कि हमें रंच अनुभूति भी नही हो पाती कि हमारे आस-पास परिवेश में कितनी ही अद्भुत ध्वनियाँ व दृश्य निरंतर प्रगट हो रहे हैं। हमारे मन की सजगता यदा-कदा यदि जाग्रत हुई भी तो कुछ पल के लिये इस सुन्दरता की झलक मिलती तो है, किन्तु फिर वही निरंतर चल रहे विचारों के वेग व धारा में सब तिरोहित हो जाता है।

हमें मन की इस सजगता को विचार-शून्यता के प्रयाश से जगाना चाहिये ।  मन की सजगता की अवस्था में इसकी सूक्ष्म दृष्टि अवचेतन मन की ऊपरी सतह पर आकर इन अनोखे व अद्भुत ध्वनियों व अपने परिवेश में घटित हो रहे सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों , जैसे प्रभात की सूर्य-किरणें व उनसे चमकती ओस की बूँदें, बाग में खिलते फूल, तितलियों का उडता झुंड, उडते पंक्षी, पेड पर बैठे उनका कलरव, या शाम की झुलफुलाहट में घासों के बीच बैठे टिड्डे की गुर्राहट, कीडे-मकोडों का टें-टें, या कहें तो बरसात के दिनों में यदा-कदा दिख जाने वाला इंद्रधनुष का सप्त-रंगी दृश्य, को अनुभव कर पाती है ।

मेरी आध्यात्म क्षेत्र की जानकारी तो बहुत सीमित है किन्तु जो भी किंचित आत्मिक अनुभूति है, उस आधार पर मेरा मत है कि यह सूक्ष्म दृष्टि की जागृत स्थिति हमें स्वयं के शारीरिक व मानसिक धरातलों में निरंतर परिवर्तनशीलता की संवेदनाओं, हमारे परिवेश में घटित हो रहे परिवर्तन चक्र के चलचित्र का सहज आभाष दिलाने लगती हैं । और इस तरह हमारा द्रष्टाभाव , स्वयं के प्रति,अपने परिवेश के प्रति, और ईश्वर की इस अद्भुत रचना जगत के प्रति,स्थापित होने लगता है । और यही द्रष्टा भाव ही हमारे अंदर योगत्व लाता है । कृष्ण ने गीता में यही तो कहा हैः
यो मां पश्यति सर्वत्र , सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणयस्यामि, स च मे न प्रणस्यति ।।  

.....आओ मेरे राम बसो.


आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

चरणरजों से तारी अहिल्या,
केवट को गले लगाया,
पितावचन पालने हेतु,
त्यागा मुकुट एक पल में।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।


निश्छल प्रेम भरत भाई से,
विह्वल गले लगाया,
चरणपादुका दे दी अपनी,
भाई के मान मनौव्वल में ।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

निर्भय किया दारुकारण्य को,
षर-दूषण का नाश किया,
अभय किये यती सन्यासी,
लेकर बाण-धनुष भुजदंडो में ।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

पर्णकुटी और कुश की शैय्या ,
भोजन कन्दमूल फल पाया,
शबरी के जूठे फल खाये,
प्रेम भक्ति वत्सलता में ।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

रावण ने माया मृग छल से,
सीता का अपहरण किया,
नदी, नार, वन कहाँ न ढूढा,
प्रेम-विरह व्याकुलता में ।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

भक्त प्रवर हनुमत से मिलकर,
सुग्रीव को गले लगाया,
पत्थर भी पानी पर तैरा,
रामनाम की शक्ति में ।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

वानरसेना संग करी चढाई,
महायुद्ध का शंखनाद किया,
अंत किया रावण सेना का,
अभिषेक मित्र का लंका में।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।

लखन सहित, संग में सीता,
निज घर को प्रस्थान किया,
गदगद हुए अयोद्ध्यावासी,
रामराज की बधाई में।
आओ मेरे राम बसो,
मेरे इस हृदयाँगन में ।