Sunday, June 16, 2013

अलविदा टेलीग्राम

अलविदा टेलीग्राम

दो दिन पहले खबर पढ़ा कि भारतीय पोष्ट विभाग ने अपनी 163 वर्ष पुरानी टेलाग्राम सेवा को हमेशा के लिये बंद करने का निर्णय लिया है।इस समाचार को पढ़कर एक अजीबोगरीब उदासी के अतिरिक्त मन में कितनी ही पुरानी यादों दृश्यों की श्रृंखला चलचित्र की भाँति गतिमान हो गयी।

बचपन की स्मृतियाँ ताजा हो गयीं कि  गाँव  में देखता था कि किसी के घर  टेलीग्राम का आना किसी जलजले  के आने से कम नहीं होता था, विशेषकर उनके लिये जिनके घर के सदस्य नौकरी अथवा पढ़ाई के सिलसिले में कहीं दूरदराज शहर में निवास करते थे अथवा किसी  घर  का  सदस्य अरसे से गुमशुदा हो या कोई बुजुर्ग सदस्य तिर्थाटन हेतु निकला हो।मेरा अनुभव है किगाँववालों हेतु टेलीग्राम  के आने का बस दो ही अर्थ होता था या तो कोई दुर्घटना हादसा अथवा कोई सरकारी -पुलिसिया झंझट।जिसके घर टेलीग्राम आता उस घर मानों सबको बिजली का झटका लग जाता और सारे गाँव में टेलीग्राम के आने की खबर सनसनी की तरह फैल जाती ।सब सभी यही चर्चा करते होते कि लाँ के घर तो टेलीग्राम आ गया है व अपने अनुमान व जानकारी के हिसाब से खबर बनाते व दूसरों से चर्चा करते टेलीग्राम द्वारा यदा कदा कोई अच्छा समाचार भी जाता जैसे किसी की सरकारी सेवा में नियुक्ति अथवा किसी के प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने का नतीजा व नौकरी हेतु ईंटरव्यू काल,तो यह उस घर में खुशी व उत्साह व पड़ोसी के घर में ईर्ष्या व उदासी का कारण बन जाता

मेरे गाँव के पड़ोस के गाँव में जहाँ हमारा स्कूल स्थित था , वहाँ एक छोटे बाज़ार जैसी मौलिक मामूली सुविधा उपलब्ध  थी, वही एक पोष्ट ऑफिस भी था जो कि पोष्ट मास्टर के कच्चे मकान से ही संचालित होता था ।चूँकि गाँव में तब टेलीफोन बिजली की सुविधा  नही थी. अत:टेलीग्राम की सीधी सुविधा संभव नहीं थी, अपितु किसी का टेलीग्रा शहर के मुख्य डाकघर में ही आता जहां से सामान्य डेली डाक से गाँव के डाकघर पहुँचता ,फिर स्थानीय  डाकिया महोदय उसे प्रापक के घर पहुँचाते।

चूँकि पड़ोस के गाँव थोड़े दूदराज पर स्थित थे डाकिया महोदय को प्रत्येक गाँव में स्वयं जाकर डाक सुपुर्द करने में कठिनाई होती अत: वे प्राय:हमारे स्कूल आकर संबंधित गाँव के किसी  बच्चे को उस गाँव की डाक सुपुर्द कर देते बच्चे की जिम्मेदारी होती कि वह पत्र संबंधित घर जाकर सुपुर्द करे । इस प्रकार हमारा स्कूल व इसके छात्र भारतीय डाकविभाग की निःशुल्क किंतु महत्वपूर्ण सेवा करते थे जिसकी शायद ही भारतीय डाक विभाग प्रशासन को कोई इल्म व अहमियत रही होगी ।

परंतु रजिस्ट्री अथवा टेलीग्राफ आने पर डाकिया महोदय स्वयं ही प्रापक के घर जाते उससे प्राप्ति का हस्ताक्षर लेते ।टेलीग्रा लाने पर उनके चेहरे की मुद्रा  खास गंभीर होती गाँव में घुसने पर हर मिलने वाले को इस बात का आभास हो जाता कि कोई गंभीर बात है,व डाकिया महोदय यह खबर देते कि  फलाँ का टेलीग्रा आया है जल्दी कदमों से अपने लक्ष्य पते  की ओर बढ़ जाते ।जब तक वे प्रापक तक टेलीग्रा की प्रति सुपुर्द करते , तबतक लगभग पूरे गांव में यह समाचार सनसनी की तरह फैल चुका होता कि फलों का टेलीग्रा आया है और उस व्यक्ति के खास शुभचिंतक,साथ ही साथ डाह रखने वाले भी,उसके घर नये समाचार की तहकीकात में मँडराने लगते

गाँव में अमूनन लोगों की अंग्रेजी भाषा की अनभिज्ञता डाकिया महोदय का भी अंग्रेजी भाषा के अति अल्प समझ के कारण टेलीग्रा के संदेश को सही सही समझने हेतु गाँव के कुछ शिक्षित व्यक्ति के पास दौड़े घबराये से जाते संदेश की गंभीरता के समझते ।मैं अपने पिताजी को प्रायः यह जिम्मेदारी गंभीर मुद्रा में निभाते देखता ।किसी के घर का कोई सदस्य जो कई वर्ष पूर्व नाराजगी वश अथवा बेरोजगारी की निराशा वश या तीर्थाटन या यायावरी हेतु घरबार छोड़ लापता होता उसके कहीं दूर दराज के शहर में बीमारी अथवा किसी हादसा का समाचार टेलीग्रा द्वारा आता  तो उस परिवार में दुख वेदना छा जाती।इसी प्रकार जिनके घर के सदस्य रोजगार वश कहीं दूर शहर  कलकत्ता या. मुंबई में अस्थाई रूप से निवास करते रहते तो उनकी बीमारी अथवा किसी दुर्घटना के समाचार के टेलीग्रा से सिर्फ उस घर में बल्कि पास पड़ोस के घर भी जिनके भी सदस्य दूर शहर में गुजरवसर हेतु सालों से घरवालों  से बिछड़े रह रहे होते उनके समाचार का माध्यम मात्र पत्र होता ,वे भी अति उदास घबरा जाते जब यदाकदा टेलीग्रा किसी की नौकरी लगने अथवा किसी परीक्षा के नतीजा में पास होने इंटरव्यू की काल का समाचार लाता तो उस घर के लोग बड़े प्रफुल्लित हो उठते उस घर के लोग उत्साहित होकर गाँवभर में टेलीग्रा का कागज दिखाते, इस खुशी में गाँव के मंदिर में पूजा किर्तन करते

पिछले बाईस सालों से रेलवे की नौकरी के सिलसिले में दूर शहरों में निवास इधर-उधर स्थानांतरण के क्रम में गाँव से मेरा संपर्क वहाँ  आना-जाना लगभग के बराबर रह गया अत: वहाँ के अपने परिजनों ,गाँववालों के सुख दुःख की सजीवता से बचपन की भाँति साक्षात्कार तो  अब नहीं रहा।किंतु विगत दो दसकों में सूचना क्रांति  ने हमारे परिवेश व जीवनशैली में बहुत कुछ बदलाव लाया है जिससे मात्र शहर ही नहीं अपितु गाँव भी बराबर तौर पर बदले प्रभावित हुये हैं ।गाँव में भी अब घर-घर में मोबाइल फोन की सुविधा दूर दराज शहरों में रहने वाले परिजनों से सुगम संवाद की सुविधा से इस दिशा में उल्लेखनीय राहत सहूलियत आयी है ।नतीजतन पुराने तौरतरीकों में बदलाव उनकी विदाई अपरिहार्य ही है



किंतु विगत की विशिष्टता सदैव जीवन में विशेष अहमियत रखती है ।टेलीग्राम को अलविदा कहने का समय तो आ गया है  परंतु इसकी विशिष्टता हमारे विगत की स्मृतियों में विशेष व महत्वपूर्ण स्थान सदैव रखेगी।

Sunday, June 9, 2013

भाग्य,अवसर व प्रतिभा......



कोई पकडा कोई छूटा

विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री व अमरीकी फेडरल रिजर्व बैंक के चेयरमैन श्री बेन बर्नांके अपने अल्मामीटर प्रिंस्टेन युनिवरसीटी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में दीक्षित छात्रों  को  दिये अपने भाषण में बड़ी ही लीक से हटकर व गहरी सच्चाईपूर्ण बात कही जिसकी आजकल काफी चर्चा,प्रशंसको व आलोचकों दोनों के द्वारा, है।

प्रतिभा को सफलता की कुंजी समझने की हमारी पुरानी आस्था व धारणा,जिसमें अंतर्निहित कमियाँ हैं व जो कतई अन्यायपूर्ण है, पर कड़ी किंतु बड़ी सटीक टिप्पड़ी करते हुये बेन का कहना है- यह अति विचारणीय व चिंतनीय बात है।प्रतिभाशीलता वह पद्धति है जिसमें अनेकों प्रकार से भाग्यशाली मात्र कुछ लोग - जैसे स्वास्थ्य अथवा आनुवंशिक रूप से विशेष शारीरिक योग्यता रखने वाले कुछ विशेष भाग्यशाली, अथवा पारिवारिक संबल,प्रोत्साहन अथवा आर्थिक सहयोग में  विशेष भाग्यशाली अथवा शिक्षा व रोजगार के अतिरिक्त अवसर प्राप्त होने में विशेष भाग्यशाली,कुछ लोग जो जीवन में प्राप्त विशेष अवसरों के कारण अपने जीवन के सामान्य प्रयासों के एवज में अपनी योग्यता से ज्यादा व अप्रत्यासित रूप सेे पुरस्कृत व सम्मानित हो पाते हैं, जीवन मेंं मिले अतिरिक्त अवसरों व स् ंरक्षणों के एवज में कुछ लोग प्रतिभाशील होने का तमगा हासिल कर लेते हैं। इस प्रकार दीक्षित छात्रों को संबोधन में उन्हे एक प्रकार  की हिदायत व सच का आईना दिखाते हुये बेन का कहना है कि प्रतिभा का सफलता व हासिल सामाजिक स्तर से कोई खास लेनादेना नहीं है।

बर्नांके का यह भी कथन था कि गरीब व्यक्ति धनी व्यक्ति की बनिस्बत ज्यादा योग्य व सम्माननीय है। उनका कहना है-मेरी समझ में जो व्यक्ति बहुत ही कम औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त कर पाये किंतु अपने व अपने परिवार के जीविकोपार्जन व परवरिस हेतु पूरी ईमानदारी , लगन व उत्साह से अथक श्रम करते हैं , वे एक अति धनी , उच्च सामाजिक स्तर व सफल समझे जाने व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा सम्मानयोग्य है।उनके साथ वक्त गुजारना,बीयर पीना ,भोजन करना एक धनी व्यक्ति की तुलना में ज्यादा आनंददायी व संतुष्टिदायक होगा।

आम आदमी की क्षमता से बाहर होती अति महँगीस्कूली व उच्च औपचारिक शिक्षा व इसकी उद्देश्यहीनता व खोखलेपन पर टिप्पड़ी करते हुये उन्होंने कहा- आर्थिक दृष्टिकोण से हमारे कालेज व युनिवरसीटी की शिक्षा का अनुभव इसी प्रकार का है जैसे हर वर्ष एक नयी कैडिलक कार खरीदें फिर उसे किसी  पहाड़की चोटी से गहरी खाईं में ड्राइव करके गिरने व तहस-नहस होने दें।


बेन बर्नांके के उपरोक्त कथन न सिर्फ अमरीका परंतु संपूर्ण विश्व,विशेषकर हमारे देश भारत के संदर्भ में अति सटीक बैठते है।हमारे देश में कई करोड़ों की तादाद उपयुक्त साधन , अवसर व प्रोत्साहन की अनुपलब्धता के कारण न सिर्फ अपनी नैसर्गिक प्रतिभा व योग्यता से देश व समाज को योगदान देने व इसकी सफलता में भागीदार बनने से वंचित रह जाती है, अपितु स्वयं का जीवन भी अति कठिनाई,गरीबी,संघर्ष व कुंठा युक्त हासिये पर जीती है।इससे बडा दुर्भाग्य व बदनसीबी किसी देश के लिये भला क्या हो सकता है।

इस संदर्भ में मेरे निजी अनुभव भी बेन के कथन की शतप्रतिशत पुष्टि करते हैं।मेरी स्कूली शिक्षा गाँव में हुई।मेरे पिता एक मामूली किसान हैं,अपने सात बच्चों की शिक्षा-दीक्षा उनके लिये जीवन की सबसे बड़ी व कठिनतम चुनौती थी।मेरी बड़ी बहन स्कूल में मेरे साथ पढ़ती थीं,और वे पढ़ाई में मुझसे ज्यादा प्रतिभावान व योग्य थीं,किंतु गाँव में ऊँची कक्षा की शिक्षा की अनुपलब्धता के कारण उनकी छोटी कक्षा में ही शिक्षा रुक गई,उनके जीवन में निजी सफलता के सपने समय के आकाश में कहीं गुम हो गये,वे एक साधारण गृहिणी का गुमनाम ग्रामीण जीवन बिता रही हैं।यदि मेरे माता पिता मेरी व मेरे भाई की शिक्षा हेतु अपनी क्षमता से बाहर जाकर विशेष प्रयास व प्रोत्साहन न देते तो संभवतया हम दोनों भाई भी अपने गाँव में ही एक गुमनाम कृषक का जीवन जीता होते।मैं जहाँ हूँ उसके पीछे निजी प्रतिभा का मात्र आंशिक योगदान ही है,इसमें मुख्य योगदान तो  मेरे माता-पिता द्वारा मुझे शिक्षा के लिये प्रदान किये गये विशेष अवसर का है।

अपनी बहन की ही तरह, मैं अनेकों व्यक्तियों से निजी तौर पर अवगत हूँ जो नैसर्गिक रूप से प्रतिभावान होते हुये भी जीवन में अवसर व प्रोत्साहन की अनुपलब्धता मे गुमनामी में  कहीं पीछे छूट गये। जब मैं गाँव में अपने पिताजी की पीढ़ी,जैसे मेरे ताऊ,ताई,माँ अन्य रिश्तेदार जिन्हें स्कूली व औपचारिक शिक्षा का जीवन में अवसर नहीं प्राप्त हुआ, परंतु उनका आध्यात्मिक,सामाजिक,जीवनदर्शन का न सिर्फ अनौपचारिक बल्कि औपचारिक ज्ञान उच्च स्तर का है।मेरे दोनों ताऊजी किसी स्कूल व औपचारिक शिक्षा से कतई वंचित रहै, किंतु उनका भाषाई ज्ञान (उनका, हिंदी,संस्कृत व अंग्रेजी भाषा का ज्ञान उच्चकोटि का है ), किसी विद्वान से कतई कम नहीं, उन्हें संस्कृत की मुख्य आध्यात्मिक पुस्तकें जैसे बाल्मीकि रामायण,गीता,भागवत पुराण लगभग कंठस्थ हैं,और बातचीत में वे इनके श्लोकों का सटीक उद्धरण इतनी सहजता से देते हैं, जो कि युनिवरसीटी में प्रशिक्षित किसी कुशल विद्वान प्रोेफेसर हेतु भी सहजता से संभव नहीं हो सकता।इसी प्रकार दर्शन शास्त्र की अंग्रेजी भाषा में प्रसिद्ध पुस्तकें पढने,उनके गूढ़ अर्थों को समक्षने व उन पर विद्वतापूर्ण चर्चा करते हुये  उन्हे सुनना अचंभित करता है।इसी प्रकार मेरी माँ, जिनकी स्कूली व औपचारिक शिक्षा शून्य है, उन्होंने कभी स्कूल का मुँह तक नहीं देखा,उनकी जीवनदर्शन ,सामाजिकता, व आध्यामिकता की समझ अद्भुत व आश्चर्यचकित करती है।उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को देखकर मन यह सोचने को विवश हो जाता है कि यदि इन्हें जीवन में शिक्षा का कोई अवसर व प्रोत्साहन मिला होता तो वे अवश्य ही विशेष उपलब्धियों के स्वाभाविक हकदार थ् े।

इसी प्रकार गाँव में जब किसी बुजुर्ग किसान जो सर्वथा अशिक्षित हैं व गाँव का साधारण जीवन जी रहे हैे, उनसे बातचीत व चर्चा करने पर उनकी जीवनदर्शन,दुनियादारी व अपने खेतीबारी की व्यावसायिक व तकनीकी समझ अद्भुत व अति प्रभावित करती है।


इस प्रकार बेन बर्नांके का यह कथन गौर करने व चिंतन का विषय है कि प्रतिभा का आकलन मात्र सफलता की कसौटी पर नहीं आँका जा सकता,सफलता हेतु प्रतिभा के आंशिक योगदान के साथ मुख्य योगदान तो प्राप्त अवसरों,प्रोत्साहनों व समुचित संसाधनों का होता है,प्रतिभा का वास्तविक आकलन तो जीवन के संघर्ष में भी सोने व हीरे की तरह अपनी चमक व चरित्र की उत्कृष्टता बनाये रखने ,ईमानदारी,सत्यनिष्ठा,जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में भी ॆस्वाभाविक आनंदित हो सकने की स्वाभाविक क्षमता से है।


प्रतिभा की अंतिम कसौटी है सहज विनोदमयता व स्वयं की कमियोें पर ही सहज रूप से हँस सकने की क्षमता।बेन बर्नांके जो स्वयं विश्व के महानतम अर्थशाल्ियों में एक हैं किंतु वे अपने विशिष्ट ज्ञानक्षेत्र अर्थशास्त्र की भी चुटकी लेने व इसपर परिहास करने से नहीं चूकते- अर्थशास्त्र एक अति उत्कृष्ट ज्ञान व चिंतनक्षेत्र है जो निति निर्धारकों को यह समझने में तो सहायता करता है कि भूतकाल में अपनायी गयी नीतियों में क्या अनुचित था व क्यों असफल रहे, किंतु वर्तमान व भविष्य हेतु इससे कोई सार्थक दिशा-निर्देश नहीं मिलता।


स्वयं की उत्कृष्टता व योग्यता पर किसी प्रकार की श्लाघा व अहंकार करने के बजाय उसकी छोटी-मोटी कमियों पर स्वयं परिहास कर सकने व सहज मनोविनोद की स्वाभाविक क्षमता प्रतिभा की सबसे  अनूठी कसौटी व पहचान है।

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Monday, December 31, 2012

दामिनी की अमर-ज्योति नभ से भूतल तक....


आशा की अक्षुण ज्योति
( चित्र- टाइम्स ऑफ इंडिया के सौजन्य से)


मेरी एक परिचित, शिखा जी , जो दिल्ली में रहती हैं उनसे दो दिन पहले फेसबुक पर मेरी बातचीत हुई तो हम सभी की तरह वे भी दामिनी की मृत्यु से अति दुःखी व सदमें में थी। हमारी बातचीत का सारांश इस प्रकार है-

शिखाः सर मैं दामिनी के बारे में पढ़ रही हूँ जो लोगों ने फेसबुक पर कमेंट व शेयर किया है।बहुत सोचती हूँ सर और आँसू भी नहीं रुकते...क्या करूँ समझ नहीं  आ रहा है। सर सही में अब दिल्ली में डर लगने लगा है।पता नहीं लोग उसकी फोटों क्यों डाल रहे हैं।सर उसकी रुह परेशान है और हम सभी के अंदर तक समा चुकी है।

मैः .... किंतु जो दामिनी के साथ हादसा हुआ है, वह हमारे देश, खास तौर पर देश की राजधानी दिल्ली,की अराजक स्थिति का एक पहलू मात्र है,सच पूछिये तो इसी प्रकार की अराजकता,अन्याय, व अपराधप्रवृत्ति हमारे समाज के लगभग अधिकांश पक्षों में वर्तमान हैं, प्रायः हमारे जीवन क अधिकाँश पक्ष इसी प्रकार की अराजकता से घिरे हुये हैं। सरकार व पुलिस के नाकारेपन को जाने भी दें तो, समाज व व्यक्ति के स्तर पर भी क्या कम अराजकता है , खास तौर पर महिलाओं के साथ हिंसा व शोषण, जैसे दहेज , कन्या भ्रूण हत्या की अपराध-घटनाओं को  क्या दामिनी की जघन्य हत्या से किसी भी प्रकार से कम ठहराया जा सकता है।आखिर जो हम बोयेंगे, वहीं तो काटेंगे।

शिखाः सर आप विश्वास नहीं करेंगे, कल रात मैं और मेरी दोस्त अपने जीवन के पुराने स्मृतियों को स्मरण कर रहे तो यह अनुभव हुआ कि जिस प्रकार की छेड़खानियों से मैं कानपुर में गुजरी हूँ , ठीक उसी प्रकार का त्रासद अनुभव मेरी मित्र का गया में भी हुआ था।यह सब सोचकर ही जी सिहर उठता है कि हमारे देश के हर हिस्से में ही हम महिलायें असुरक्षित हैं व अपमानित होने को बाध्य है।पूरी रात उस लड़की (दामिनी) का चेहरा हमारी जेहन में सामने आता रहा।कभी आरुषी की नृशंश हत्या की याद ताजा हो जाती तो कभी निठारी में छोटी मासूम बच्चियों की जघन्य हत्या का स्मरण हो जाता व आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं लेते। क्या ऐसे ही होता रहेगा हमारे देश में। क्या नारी का जन्म लेना गुनाह है इस देश में।

मैः जिस देश में अराजकता, भ्रष्टाचार, अन्याय व पाखंड का चारों और बोल-बाला हो वहाँ भला इन तरह के हादसों के अलावा क्या घटित होने की अपेक्षा कर सकते हैं। जहाँ गुंडे,कत्ली,अपहरणकर्ता, आतंकी कानून के शिंकजे से दूर खुलेआम निर्भय घूमते हों और हद तब हो जाती है कि सारे अपराधों व अभियोगों के बावजूद वेही एक दिन हमारे जनप्रतिनिधि बन देश की उच्च विधायी संस्थाओं संसद व विधानसभा में माननीय सदस्य के रूप में बैठते हों और हमारे संविधान के रक्षा करने की झूठी कसम खाते हों और उसी संविधान का स्वयं बलात्कार करते हों,वहाँ इस तरह के हादसों के अलावा क्या घटित होने की आशा कर सकते हैं।इसके अलावा आम आदमी का व्यक्तिगत जीवन व आचरण क्या कम पाखंड पूर्ण है ।

हमें समझना चाहिये कि न्याय निरपेक्ष होता है,न्याय व पाखंड में जमीन-आसमान का फर्क होता है, न्याय की परिभाषा स्थाई होती है, इसे सुविधा अनुसार व व्यक्ति-व्यक्ति में फर्क करके बदला नहीं जाता,जैसा की हमारे देश व समाज में प्रायः होता है।प्रथम तो हम सभी को अपने गिरेबान में झाँककर , आत्मनिरीक्षण करना होगा, हमें व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी, विधिसंगत व पाखंडरहित बनना पड़ेगा तभी हम किसी बदलाव की काबिलियत व आशा रख सकते हैं।

दामिनी की हत्या अपराधियों द्वारा किया एक जघन्य अपराध है, पर उस जघन्य अपराध का क्या जो हमारे सभ्य घरों में सोच-समझ कर व पूरी तैयारी के साथ रोज किया जाता है, व लाखों कन्याशिशुओं को जन्म के पहले माँ के गर्भ में ही उनके ही माता-पिता रिश्तेदारों द्वारा ही मार दिया जाता है, क्या यह किसी जघन्य हत्या व अपराध से किसी प्रकार कम है।क्या दहेज के नाम पर जिस युवती को अपने ही लोग उसे जलाकर मार डालते है, क्या यह दामिनी की जघन्य बलात्कार व हत्या से कम जघन्य अपराध है।वास्तविकता तो यह है कि हम और हमारा समाज एक पाखंडी व अपराधी समाज है, जो एक तरफ तो यत्र नार्यस्त पूज्यंते, रमंते तत्र देवता का मिथ्याभाषण देता है, तो दूसरी और स्त्री की मर्यादा व उसके अस्तित्व को गाजर-मूली समझकर काटता व कुचलता व दमन करता रहता है।

शिखाः जी.....पता नहीं कभी हालात बदलेंगे भी या नहीं, हमें तो बड़ी निराशा सी हो रही है।

मैः मैं समझता व विश्वास करता हूँ कि हालात बदलेंगे, जैसे जैसे नारी ज्यादा सशक्त होगी,शिक्षा,कार्य-रोजगार,नौकरी में उसकी ज्यादा से ज्यादा भागीदारी व उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता व आजादी बढ़ेगी , उससे हालात जरूर बदलेगे, बेहतर होंगे।मेरी समझ में महिलाओं की आर्थिक व व्यवसायिक आजादी व आत्मनिर्भरता निश्चय ही एक प्रभावी बदलाव लायेगी।

शिखाः सर मुझे तो लगता है कि सरकार को स्कूलों में कक्षा 1 से ही लडकियों हेतु आत्म-रक्षा की ट्रेनिंग अनिवार्य कर देनी चाहिये , क्योंकि अगर फिर से कभी कोई किसी और दामिनी की जान व आबरू पर हाथ उठाये तो वह अपनी आत्मरक्षा में कुछ-न-कुछ तो कर सके।

मैः ( हँसते हुये) सरकार की जो प्राथमिक जिम्मेदारी व कर्तव्य है, नियम व कानून का पालन सुनिश्चित करना ,सभी को प्राथमिक शिक्षा मुहैया करना, वह तक तो कर नहीं पाती, तो भला सरकार से सबकुछ अपेक्षा करने का क्या औचित्य है।सरकार के पास कोई अलादीन का चिराग थोड़े ही है, कि वह सब कुछ कर देगी।सरकार को भी तो हमारे पाखंडी व लाचार समाज के व्यक्ति ही चलाते हैं।

शिखाः तो सर हमें ही अपने-अपने घरों में इसकी शुरुआत करनी होगी।

मैः आत्मरक्षा की बात तो ठीक है परंतु हम किन-किन मुद्दों व मसलों के लिये व किससे-किससे शारीरिक लड़ाई लड़ सकते हैं व क्या यह प्रायोगिक रूप से संभव भी है।अकेला आदमी हो अथवा औरत, वह कितने गुंडों,अपराधियों या मवालियों का अकेलेदम सामना कर सकता है।कोई भी व्यक्ति, आदमी हो या औरत, सुरक्षित तो तभी है न जब पूरा परिवेश सुरक्षित है। यदि हम समाज में महिलाओं  की सुरक्षा के प्रति वास्तव में गंभीर हैं तो हमें पूरे परिवेश व समाज को ही सुरक्षित बनाना होगा। मेरी समझ में तो यदि लड़कियाँ अपने घर में सशक्त व सुरक्षित हैं, तो स्वाभाविक रूप में समाज में भी सशक्त व सुरक्षित होंगी।

शिखाः सर हमें कहीं न कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी न.....अपनी लड़कियों को जूडो,तायकंडो सिखाकर हम कुछ हद तो उन्हे सुरक्षित कर सकते हैं न...

मैः पता नहीं, मेरी समझ से क्रूर अपराधियों से सीधे तौर पर हाथापाई व सीधी लड़ाई करके अकेला व्यक्ति नहीं निपट सकता है। अपराधियों व बलात्कार जैसे अपराध करने वाले अराजक व हिंसक राक्षसों से निपटने के लिये तो विधिसंगत प्रशासन व द्रुत न्याय निस्तारण अनिवार्य ही है। यह कार्य तो सरकार द्वारा ही सुनिश्चित किया जा सकता है, यही सरकार का मुख्य कार्य भी है।

हाँ अलबत्ता व्यक्तिगत व समाज के स्तर पर लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा शिक्षित करने,उन्हें समाज व जीवन के हर सामान्य कार्यक्षेत्र में बराबर की हिस्सेदारी हासिल करने हेतु प्रोत्साहित करने जैसे कदम उठाकर हम इस दिशा में अति प्रधान व महत्वपूर्ण भूमिका  निभा सकते हैं।ज्यादा से ज्यादा लड़कियां नौकरी पर जायें,पुलिस फोर्स,जनयातायात सेवाओं,ट्रैफिक पुलिस,न्याय व कानूनसेवा,राजनीति व विधायिका, जनसेवा संबंधित कार्यस्थलों,कार्यालयों इत्यादि में ज्यादा से ज्यादा महिला शक्ति शामिल हो तो स्वाभाविक रूप से महिलायों पर होने वाले इस तरह के पाशविक हमले व अनाचार कमतर होंगे,उन्हे न्याय मिल सकेगा व वे अधिकांशतः निर्भय व सुरक्षित होंगी।

शिखाः जी...

मैः मैं आपको बताऊँ कि अमरीका में एक आश्यर्यजनक बात देखता था कि वहाँ जन-यातायात बसों, स्कूल-बसों की चालक अधिकांशतः महिलायें हैं।इसी प्रकार किसी भी जन सेवा कार्यालय व स्थान,यहाँ तक कि पुलिस में भी महिलाओं की भारी तादाद दिखती है, अतः स्वाभाविक रूप से महिलाओं के विरुद्ध लिंग- आपराधिक घटनायें,जैसे बलात्कार इत्यादि, न्यूनतम होते हैं। कल्पना करें कि यदि दिल्ली में भी अमरीका की ही तरह आधे से ज्यादा बस कंडक्टर व चालक महिलायें हों तो क्या दामिनी जैसे हादसे, जो कि यहाँ आम बात है, संभव होंगे।

शिखाः जी .... । सुना है कि हमारे देश के दक्षिणी राज्यों जैसे आंध्रप्रदेश में भी काफी महिलायें बस कंडक्टर हैं।

मैः बगलौर में भी जनपरिवहन बसों में मैं  इक्का-दुक्का महिला कंडक्टर देखता हूँ। इसी प्रकार ट्रैफिक पुलिस में भी इक्का-दुक्का महिलायें नजर आ जाती हैं। किंतु समाधान व बदलाव की स्थिति तो तब होगी जब उनकी तादाद बहुतायत में हो, जैसा कि अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों में दिखता है।

इस प्रकार हमारी हो रही वार्ता नेट के व्यवधान वश बीच में ही समाप्त हो गयी।किंतु इस वार्ता से जहाँ मन में दामिनी के प्रति हुये दुराचार,पाशविक हिंसा व अंततः उसकी मृत्यु का अपार दुःख व क्षोभ हो रहा था वहीं यह विश्वास भी उत्पन्न हो रहा था कि अवश्य ही दामिनी के बलिदान से हम कुछ सबक लेंगे व वर्तमान विभत्स हालात में एक सार्थक बदलाव की पहल करेंगे।

आशा कर सकते हैं कि दामिनी की ज्योति यूँ ही जाया विलीन नहीं होगी, बल्कि नभमंडल से भूतल तक चिर  ज्योतिपुंज बनकर  वह निरंतर हमारी अंतर्चेतना को जागृत व प्रकाशित करती रहेगी।