Thursday, March 11, 2021

बहुरूपिया शब्द

बहुरूपिया शब्द

कभी अल्हड़, अलल-बछेरा,
कुलेलें करने वाला,
नाकंद घोड़े के बच्चे जैसा,
जिसे ना कोई क़रार ,
फक्त कर्राह,
खिलंदड़ एवं बेपरवाह

कभी डरा सहमा
घबराये गाय जैसा
जिसे अपना बछरू
बहुत समय से
न दिखता हो न आहट हो
आशंका और आकुलता में
व्याकुल आंखें उसकी

कभी लार टपकाते
श्वान के सदृश
इधर उधर सिर हिलाते
मतलब बेमतलब तलवे चाटते
स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते
इशारे पर
बेवजह भौंकते गुर्राते

Sunday, January 17, 2021

बिडंबना : अपनी जूती अपने ही सर।

विडंबना यह है कि प्रायः हम खुद को ज्यादा इंटेलेक्चुअल दिखाने के लिए अपने देश, इसकी सामाजिक व्यवस्था, इसके रीति-रिवाज संस्कृति परंपरा, इसकी राजनीतिक तंत्र और सरकारी तंत्र एवं व्यवस्था, का हर छोटी-बड़ी बात पर मजाक और उपहास करते हैं।हममें अपने इस इस गहरी हीनभावना की वजह  हमारे देश की शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था, संस्थानों में बामपंथी विचारधारा की गहरी पैठ एवं इस पूरे सिस्टम पर उनके मजबूत चंगुल की वजह से रहा है। और दुर्भाग्य से यही हीनभावना का संस्कार हम अपने बच्चों में भी जाने-अनजाने में पालते-बढ़ाते हैं।  हमें इस सच्चाई का अहसास किसी वक्त यदि हो भी जाता है तो तबतक बहुत देर हो चुकी होती है, बच्चों को उनकी सोच की गलती को बताया भी तो वह उल्टा पड़ता है और वह विद्रोह करते हैं। इसलिए समय पर ही हमें स्वयं के संस्कार, एवं अपने बच्चों के संस्कार में इस नकली और दिखावटी इंटेलेक्चुअलपने से विलग, अपने देश, समाज, भाषा, संस्कृति, आचार-विचार, राजनीतिक एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति जागरूक, सम्मानजनक एवं जिम्मेदारीपूर्ण बनाना सुनिश्चित करना चाहिए।

ना खुदा के रहे ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे.....

बरखा दत्त, निधि राजदान, सोनिया (वर्मा) सिंह सिर्फ व्यक्ति नहीं हैं, यह एक मानसिकता हैं जो भारतीय परिवारों में जन्म लेने के बावजूद, हर भारतीय चीज - भारतीय लोग, भारतीय सोच, भारतीय दृष्टिकोण को वाहियात और हीन समझते हैं। यह तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवी परिवारों के उस क्लास का प्रतिनिधित्व करते हैं जो यह कहने में अपनी शान और खुद को ' डिफरेंट फ्रॉम कॉमन लॉट, इलीट एंड स्पेशल' समझते हैं कि उन्हें हिन्दी ठीक से बोलना नहीं आता। ऐसी मानसिकता के लोग और परिवार हमें भारतीय शहरों, विशेषकर उत्तर भारत, में अक्सर मिलते हैं। यह और बात है कि ऐसे लोग खुद को कितना भी बड़ा अंग्रेजीदां समझते हों, परंतु यह अंदर से ओछे के ओछे ही रह जाते हैं, जो अपनी मातृभाषा, अपने खुद के परंपरागत संस्कारों तौर-तरीकों को ठीक से नहीं जाना, समझा और उसके हृदय में इनके प्रति कोई आदर और सम्मान दूर की बात, हेयदृष्टि और उपेक्षा है, भला वह किसी गैर की भाषा, रीति-रिवाज, तौर-तरीकों में कोई वास्तविक योग्यता कहां से डेवलप कर पाएगा। अंततः ऐसे लोग 'गंदे नाले में गिरे बेल' की तरह होते हैं, न खुद के ही बन पाते हैं और न ही खुदा के। यह परमसिद्धसत्य है कि उत्कृष्टता की उपलब्धता अपनी मौलिकता अपने रूट्स के आधार पर संभव होती है।

Saturday, January 16, 2021

कांटो को कांटा कहने की साफगोई जरूरी है...

जैसे जैसे कोई समाज या देश आर्थिक एवं जीवन संबंधी अन्य सुख-सुविधाओं से संपन्न होता जाता है वैसे वैसे स्वयं को तथाकथित सभ्य, सुसंस्कृत एवं इलीट होने और दिखने के लिए एक प्रकार का बनावटीपन (शोअॉफ), फेक और हिपोक्रेटिक आचरण, संस्कार व व्यवहार अपनाने लगता है। यूरोपीयन समाज और देश, विशेषकर पश्चिमी यूरोप, में इस तरह की हिप्पोक्रेसी डेढ़ दो सौ सालों में, उनके औद्योगीकरण आर्थिक उन्नति और  हाई स्टैंडर्ड अॉफ लिविंग के समानांतर, खूब पल्लवित पुष्पित हुई। इन्हें खुद को तो गुलाब की खूबसूरती के मजे  लेने थे, यह तो वह अपना नैसर्गिक अधिकार समझते रहे, मगर अपनी हमदर्दी, ज्ञान और बखान कांटो की ही करते , खासकर यदि वह कांटे दूसरे की बागवानी में पनप और विकसित हो रहे हों, इन कांटों से तबाह और त्रस्त कोई इन्हें नष्ट करने जलाने साफ करने की कोशिश भी करता तो यही पश्चिमी यूरोप का इलीट इंटेलेक्चुअल तबका अपने कलम और जुबान के तलवार से बेचारे कांटों के सफाई करने वाले के खिलाफ ही जंग में उतर आते रहे और इन जहरीले खतरनाक कांटो के तरफदारी में उनके रक्षक बने खड़े होते रहे। चूंकि अमरीका का डीएनए भी कमोबेश पश्चिमी यूरोप की ही संरचना रहा है, वहां भी यही इलिट और इंटेलेक्चुअल क्लास जनित हिप्पोक्रेसी निरंतर विकसित और पल्लवित होती रही। अब यही कांटे जब पश्चिमी यूरोप के देशों और शहरों, क्या लंदन और क्या पेरिस, और काफी हद तक अमरीका भी, में फैल बिखर और दिन दूने रात चौगुने बढ़ने और मजबूत होने लगे हैं, और इनके खुद के पैरों में चुभने और लहूलुहान करने लगे हैं तो अब इन्हें धीरे धीरे समझ में आने लगा है कि फूल फूल होते हैं और कांटे कांटे, कांटों से आप फूल की नरमी और सलीके की उम्मीद नहीं कर सकते, कांटो का चरित्र और ईमान ही होता है दूसरों के पैर में अकारण चुभना, दूसरों को लहूलुहान करना, दर्द देना। लहू बहाना और दूसरों को दर्द  देना कांटों का मुख्य इंटरटेनमेंट होता है।

चूंकि भारत का बैकग्राउंड पश्चिमी देशों की लम्बी अवधि तक कॉलोनी होने और उनकी गुलामी करने का रहा, देश के तथाकथित आजाद होने के बाद भी सत्ता ऐसे ही लोगों के हाथों में आयी जिनकी सारी शिक्षा दिक्षा और समझ यूरोप से ही उधार में मिली हुई थी, अतः स्वाभाविक रूप से यहां भी वही हिप्पोक्रेसी की मानसिकता पूरी तरह से, गहराई से, समाहित रही। जेएनयू, जामिया और जाधवपुर इसी हिप्पोक्रेसी के जीतेजागते उदाहरण व प्रयोगशालाएं रही हैं।

ट्रंप या उनके विचारधारा जैसे नेताओं के फूहड़ बात और व्यवहार की चाहे जितनी भी आलोचना की जाय मगर एक बात तो अकाट्य सत्य है कि ट्रंप जैसे  नेता कम से कम इस घिनौने हिप्पोक्रेसी से मुक्त रहे हैं, वे बेबाकी से और बिना किसी लाग-लपेट के इन कांटों को कांटा कहने की साफगोई रखते हैं।

हमारे देश के लिए भी इस गहरे पैठी हिप्पोक्रेसी से निजात पाने और कांटों को कांटा कहने की बेबाकी और साफगोई की नितांत आवश्यक है, कम से कम इधर पांच छः सालों से तो थोड़ी बहुत बेबाकी साफगोई प्रवेश करती दिखाई देने लगी है, इसके सुरक्षित भविष्य के लिए अपरिहार्य है अन्यथा  हिप्पोक्रेसी में जीने  वाले देश और समाज का हस्र और नियति प्रायः 'टाइटैनिक' जैसा ही होता है।

Friday, January 15, 2021

दि कॉमन सेंस...

सर्वप्रथम सबको मकरसंक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं, प्रत्यक्ष एवं आदिदेव भगवान सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि का मंगल कल्याण एवं रक्षा करें यही सर्वमंगलकामना 🙏

यह तो नितांत साधारण सी बात है जो हम सभी को भलीभांति पता है कि जो अप्रिय बात व्यवहार हमारे खुद के साथ  होने से हमें बुरा तकलीफ और पीड़ा होती है वह दूसरे के साथ करने से हमें परहेज करना चाहिए, मगर जाती जिंदगी में सबसे ज्यादा उपेक्षा हम इसी साधारण समझ की ही करते रहते हैं। जिस रास्ते, सड़क, ट्रैक पर हम रोज चलते टहलते हैं स्वाभाविक है हमें उसका साफ-सुथरा रहना अच्छा लगता और शकून देता है, मगर हम अपने पालतू कुत्ते को टहलाते उसके बीच रास्ते सड़क पर मल-मूत्र त्याग कराने, अच्छे खासे साफ-सुथरा पब्लिक स्थान को गंदा करने में हमें कोई संकोच कोई गुरेज नहीं होता।

हमें अच्छे से अनुभव रहता है कि हम अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों, सफलताओं, हमने जिंदगी में क्या तीर मारा, हमारे पास कितनी ऊंची-ऊंची डिग्रियाँ हैं, हम कितने ऊंचे ओहदेवाले और रसूखदार हैं, हमारे कितने शानदार फ्लैट बंगले हैं, हम कितना देश विदेश घूमे हैं, हम अपने क्रेडिट कॉर्ड कितने लाख शॉपिंग करने में खर्च करते हैं, अपने बारे में हम जो भी गाना गाते रहें, अपनी बखान करते रहें, किसी और को घंटा फर्क नहीं पड़ता, अलबत्ता हर शख्स खुद की गदह-पचीसी में इतना व्यस्त खोया रहता है कि उसने आपकी बात सुनी भी या नहीं इसमें भी संदेह ही है।

हमें अच्छे से समझ में आता है कि हमारी बेस्ट काबिलियत, हमारा बेस्ट टैलेंट और हमारी बेस्ट परफॉर्मेंस हमारी स्वाभाविकता और ओरिजिनलटी में होती है, मगर हम दूसरे की नकल और डुप्लीकेट बनने के चक्कर में खुद का लबड़धोधो बना डालते हैं, न ऊधौ के रहते हैं न माधव के। खुद को सही अंग्रेजी बोलने आती नहीं, बोलते भी हों फूहड़, गलत-सलत, मगर अपने बच्चे से अंग्रेजी में ही बात करेंगे, नतीजतन बच्चा अपनी मातृभाषा को ठीक से सीखने से वंचित रह ही जाता है, और मां-बाप के इस दिखावटीपने से बेचारा अंग्रेजी भी गलत-सलत और फूहड़ बोलता सीखता है। और फिर अपनी भाषा और संस्कार में अधकचरे और अनभिज्ञ  हीनभावनाग्रस्त हम खुद और हमारे बच्चे कपिल शर्मा के कॉमेडी शो अथवा फूहड़ जोक्स के द्वारा अपनी भाषा के थोड़े क्लिष्ट या परिस्कृत शब्दों के भद्दे उपपटांग उच्चारण से मजाक लेते और उनपर ठहाके लगाते अपना मनोरंजन करते हैं।

वैसे यह सारी बातें भी बेमतलब की ही चकल्लस हैं, स्कूल और कॉलेज में ही यह जुमला हम सभी जानते सीख गये ही थे कि 'कॉमन सेंस इज दि मोस्ट अनकॉमन इन दि ह्यूमन्स'।

Sunday, December 16, 2018

मन के अंदर चल रहा निरंतर संघर्ष कठिन यह मानव के ...

इच्छाओं के चक्रवात से निरंतर जूझ रहा यह मानव मन
उड़ जाता है अशक्त आत्मबलरहित तिनके के माफिक।
इधर उधर बेचैन कहीं भी, बिना छोर और बिना ठिकाना
दरबदर भटकता व्यग्र बावला भटका राह हो राही एक।

मगर बंधा यह संस्कारों से, अंतर्चेतन के कुछ धागों से,
जुड़ा हुआ यह इनसे जितना जाने या अनजाने में ही,
चेताते यह इसको जब भी यह उड़ता, मनमानी करता
समझाते हैं बतलाते हैं इसे सही क्या और गलत क्या।

राह कौन सी इसकी जाती सुख को और खुशहाली को,
शांति और उन्नति का जो पथ सहज सुरक्षित हो सकता है
और कौन सी राह इसे खड्डे में अवनति में ले जाएगी,
कल बन सकती काल, विनाश और अनहोनी का कारण।

मन की मनमानी और अंतर्चेतन के बीच यह संघर्ष निरंतर जारी रहता है मानव मन के अंदर प्रतिपल प्रतिक्षण
मानव का अंतर्चेतन है जब तक विजयी,है लगाम हाथ
तब तक जीवन में सब शुभ होता सुख फलदायी होता है।

वरना मन जो है प्रचंड और चलती उसकी ही मनमानी
अपने अंतर्चेतन ध्वनि की करते हुए अवहेलना उपेक्षा
संतापों का होआमंत्रण अवसादों का होना अपरिहार्य
फिर है विनाश का आमंत्रण, निश्चित अनिष्ट संभावित है।
#देवेंद्र

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Sunday, July 2, 2017

कौन कर रहा है जीएसटी का विरोध?

जीएसटी का अधिकांश विरोध वही तबका कर रहा है जो टैक्स इवैडर है और टैक्स इवैसन को भारत में जन्म लेने के नाते इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है।
(मैं यहाँ उन लोगों के विरोध की उपेक्षा कर रहा हूं  जो मात्र राजनीतिक कारण या अपने बौद्धिक पूर्वाग्रहवश चूंकि मोदी से नफरत और विरोध करते हैं इसलिए जीएसटी का भी विरोध कर रहे हैं।)

जीएसटी भले ही सीधे तौर पर व्यक्ति के व्यवसाय और आमदनी पर ज्यादा फर्क नहीं डाले, मगर इसका सबसे तगड़ा फालआउट यह है कि सबको अपने व्यवसाय के पूरे आगत और निर्गत का डिटेल सबमिट करना होगा, और सारे डिटेल पैनकार्ड से लिंक्ड हैं. तो स्वाभाविक है कि किसी भी बिजनेस की पूरी इंकम भी अब सरकार और इंकम टैक्स विभाग की जानकारी में रहेगी, जो अब तक लोग चंटबुद्धि से छिपा लिया करते थे। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि इससे सारी चोरी, सारा टैक्स इवैसन ओवरनाइट बंद हो जाएगा, बड़े बड़े इन्नोवेटिव लोग हैं कुछ न कुछ तिकड़म तो भिड़ायेंगे ही, लोग मगर सतर्क होंगे, काफी हद तक ट्रांसपेरेंसी अवश्य आयेगी।

कल रात मैं भारत के वित्त मंत्री, श्री अरुण जेटली का एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू सुना जो काफी स्पष्ट और बेबाक लगा | उनके अनुसार आज देश में औसतन सिर्फ 80 लाख लोग अपना टैक्स रिटर्न भरते हैं | मैं कहीं पढ़ रहा था, हो सकता है मेरी याददाश्त पूरी तरह से सही नहीं भी हो, कि देश में मात्र 16 लाख लोग अपनी आमदनी 10 लाख से ऊपर  शो करते हैं | अब प्रश्न उठता है कि इस तरह के आंकड़े देश की क्या तस्वीर और लोगों का क्या चरित्र दिखाते हैं? जिस देश में पढ़ेलिखे लोग,  डाक्टर, वकील, सीए, बिजनेस से बड़ी आमदनी बनाने वाले लोग भी नियमों का मैनिपुलेसन करके टैक्स इवेसन करते हो, और इस टैक्स की चोरी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हों, वहां सरकार कड़े निर्णय लेकर यदि इन सभी टैक्स इवैडर्स को टैक्स नेट में लाना चाहती है तो कुछ लोगों को इतना बुरा क्यों लग रहा है, इतनी मिर्ची क्यों लग रही है, मेरी समझ में तो सरकार के यह कड़े निर्णय ईमानदार तबके के पक्ष में है |