प्रतिवर्ष आने वाले यह नौ दिनों के नवरात्रि पर्व का वास्तविक अर्थ व महत्व मात्र नौ दिनों के पूजा-व्रत करने, घंटा-शंख बजाने और गरबा-डांडिया उत्सव मनाने तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसका गहरा आध्यात्मिक संबंध हमारे शरीर व चेतना की जागृति से है.
जैसा कि हम अपने पुराणों-धर्मशास्त्रों में पढ़ते हैं कि माँ दुर्गा ने महिषासुर नाम के एक भयंकर राक्षस का वध किया था और उसके भय व आतंक से देव और मनुज की रक्षा की थी, अगर हम इस पौराणिक कथा की गहराई में उतरें, तो समझ में आता है कि महिषासुर कोई बाहरी राक्षस नहीं, अपितु यह हमारे स्वयं के अंदर ही गहरी छुपी बैठी आसुरी प्रवृत्तियां- अज्ञान, अहंकार, वासना और आलस्य, ही है। वहीं, माँ दुर्गा के नौ रूप हमारी चेतना (Consciousness) के नौ चरण हैं, जो क्रमशः जागृत होकर हमारे इस आंतरिक अंधकार का नाश करते हैं।
इसीलिये मारकंडेय पुराण में हमारे विभिन्न चेतना शक्तियों की जागृति हेतु देवी का आह्वान निम्न प्रकार से उनके विभिन्न दैवीय शक्तियों की आराधना व प्रार्थना के माध्यम से किया गया है-
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें मेरा बारंबार प्रणाम है।
इस प्रकार, नवरात्रि के पर्व में नवदुर्गा की यह आराधना-उत्सव-यात्रा हमें अपने ही भीतर के विकारों से लड़कर एक जागृत चेतना युक्त मानव बनने का मार्ग प्रशस्त करती है।
मानव मन एक रणक्षेत्र की ही तरह है, जहाँ नित्य विभिन्न शुभ व अशुभ विचारों का संग्राम चल रहा होता है। नवदुर्गा के नौ स्वरूप हमारे मानव-मन के इस आंतरिक युद्ध में हमारी मानसिक और आत्मिक शक्ति को बढ़ाने के नौ चरण हैं:
1. आलस्य और भटकाव से मुक्ति (माँ शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी):
विकार और समाधान: हमारे भीतर का हमारा सबसे बड़ा शत्रु है आलस्य (Procrastination) और मानसिक अस्थिरता। माँ शैलपुत्री (स्थिरता की देवी) हमें जीवन में और अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग होने की शक्ति व शिक्षा देती हैं। जब हमारा मन स्थिर होता है, तब माँ ब्रह्मचारिणी की ऊर्जा हमें अनुशासन, संयम और तप की शक्ति देती है, जिससे हम आलस्य को भस्म करके कर्मयोगी बनने में सक्षम हो पाते हैं।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
अर्थ: अपने कर-कमलों में जपमाला और कमंडल धारण करने वाली परम उत्तम माँ ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों (और मुझे आंतरिक तप व अनुशासन दें)।
2. मानसिक तनाव और अतिविचार (overthinking) पर विजय (माँ चंद्रघंटा और कूष्मांडा):
विकार और समाधान:
आज के दौर में तनाव और अतिविचार(अत्यधिक सोचना, overthinking) एक मानसिक महामारी बन चुका है। माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर स्थित घंटे की ध्वनि हमारे भटकते हुए मन को खींचकर 'वर्तमान क्षण' (Present Moment) में ले आती है, जिससे हमारे अंदर की चिंताएं शांत होती हैं। पुनः, माँ कूष्मांडा की स्मित मुस्कान हमारे भीतर की शून्यता और निराशा को दूर कर जीवन में नई रचनात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
अर्थ: श्रेष्ठ सिंह पर सवार, भयानक क्रोध वाले अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली और 'चंद्रघंटा' नाम से विख्यात देवी मुझ पर अपनी कृपा बरसाएं (और मेरे मन के कोलाहल को शांत करें)।
3. स्वार्थ और भीरुता (कायरता) का नाश (माँ स्कंदमाता और कात्यायनी)
विकार और समाधान: जब हम अपने अहं-भाव, मात्र 'मैं और मेरा' की भावना में डूबे हुये हैं, तब माँ स्कंदमाता हमारे भीतर करुणा, वात्सल्य और समाज-मानवता के प्रति हमारे कर्तव्य-दायित्व के बोध को जागृत कर, हमारे अंदर गहरी पैठी स्वार्थ-प्रवृत्ति को समूल विनष्ट करती हैं। साथ ही साथ, जब जीवनपथ में आने वाली कठिन परिस्थितियों के सामने हम विचलित व भयभीत हो जाते हैं, तब कात्यायनी (योद्धा चेतना) हमारे भीतर की भीरुता(कायरता) और दुविधा को नष्ट कर सही निर्णय लेने का साहस और हौसला देती है।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
अर्थ: चंद्रहास तलवार की तरह चमकते हाथों वाली, श्रेष्ठ सिंह पर सवार दानवों का नाश करने वाली माँ कात्यायनी मेरा कल्याण करें (और मुझे कायरता से मुक्ति दें)।
4. अहंकार और अज्ञान की पूर्ण आहुति (माँ कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री)
विकार और समाधान: यह जीवन-साधना का सबसे कठिन और अंतिम चरण है। माँ कालरात्रि हमारे अंदर के गहनतम भय व संशय, मोह और अज्ञान को जड़ से उखाड़ फेंकती हैं। जब हमारे अंदर का यह अंधकार मिटता है, तब माँ महागौरी हमारी चेतना को पूर्णरूपेण निर्मल, पवित्र और शांत बना देती हैं। अंततः, हमारे अहंभाव के पूरी तरह विगलित हो जाने पर माँ सिद्धिदात्री हमें परम ज्ञान, संतुष्टि और जीवन की पूर्णता (सिद्धियों) से नवाजती (पुरस्कृत करती) हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
अर्थ: सफेद वृषभ पर सवार, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, परम पवित्र और महादेव को आनंद देने वाली माँ महागौरी मेरा कल्याण करें (और मेरी चेतना को पूर्ण निर्मलता दें)।
दैनिक जीवन में नवदुर्गा की ऊर्जा के अवतरण के सामान्य उपाय :
अपने इस आंतरिक शुद्धि और अंतर्चेतना की जागृति-यात्रा को अपने सामान्य जीवन, दिनचर्या का अविभाज्य अंग बनाने हेतु हमें किसी अत्यंत कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है , अपितु हम अपने इन 3 सरल उपायों को अपनी दैनिक दिनचर्या में ही सहजता से अपना कर भी हम अपना यह जीवन-लक्ष्य सिद्ध कर सकते हैं:
1. सजगता (Awareness): जब भी हमें क्रोध, आलस्य या तनाव घेरे, तो हम तुरंत ठहरें, इन्हें पहचानें कि हमारे भीतर की कौन सी 'आसुरी प्रवृत्ति' इस समय प्रभावी(हावी) हो रही है।
2. संकल्प और ध्यान (Meditation): मात्र 5 से 10 मिनट सीधे बैठकर गहरी सांसें लें। यदि मन बहुत अशांत हो, तो माँ चंद्रघंटा का स्मरण करें; यदि आलस्य आ रहा हो, तो माँ ब्रह्मचारिणी के अनुशासित स्वरूप का ध्यान करें।
3. सकारात्मक बदलाव: नवरात्रि को केवल कैलेंडर के नौ दिनों तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि इसे हम अपने भीतर के विकारों को धीरे-धीरे कम करने का एक नियमित, सालोंसाल, अपने आत्मावलोकन (self-reflection)का उपकरण(tool) बनाएं।
निष्कर्ष
महिषासुर मर्दिनी की कथा हमें सिखाती है कि हमारे अंदर की आसुरी प्रवृत्तियां, बुरी लतें कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अगर हम अपनी आंतरिक शक्तियों (नवदुर्गा) को जगा लें, तो इनपर हमारी विजय सुनिश्चित है। हमें यह संकल्प लेने की आवश्सयकता है कि यह नवरात्रि का पूजा-पाठ, उत्सव मनाने, मां दुर्गा के सामने अखंड दीप जलाने के साथ-साथ ही हम अपने भीतर भी सजगता, अपनी चेतना की जागृति का एक अखंड दीपक अवश्य जलायें। हम अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को पहचानें, उन्हें यथावत स्वीकार करते हुये, स्थिर व शांत चित्त से माँ भगवती की सच्ची आराधना व भक्ति की शक्ति से इन्हें अपनी जागृत चेतना में रूपांतरित करें।
असतो मा सद्गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय !

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