जो हृदय का गीत था, वह अश्रु-कम्पन बन गया। पुष्प से उल्लसित बसंत, उजाड मिहिर निर्भव हुआ।। | |
| कामना में जो अनन्त था, अब शून्य सा संकुचित है । दृष्टि का उत्कर्ष था जो, अब अदृश्य और अगम्य है।। |
जो साज था, आवाज था, वह विमुख और विमौन है। जो शब्द था ,अभिव्यक्ति था, वह अपरिचितो सा कौन है? | |
| जो प्राण था,संज्ञान था, अब निष्पंद व निर्जीव है। जो मान था , अभिमान था, अवहेलना का प्रतिजीव है।। |
जो ज्ञान था, समाधान था, अब अज्ञानता व निराधान है। जो विश्वास और विवेक था, अब संदेहप्रद व अपजान है।। | |
| जो भरत था, जो राम था, वह बालि और सुग्रीव है। जो कृष्ण था, बलराम था, कुरु- पांडु बैर अतीव है।। |
जो हृदय सत्संग था ,वह अब नयन-कंटक-शूल है। जो शक्ति था,था द्विभुजबल , अब निश्तेज निबल निमूल है।। | |
| जो प्रेम था, सद्भाव था, अब द्वेष और विद्वेष है। जो नेह था ,जो सनेह था, अब कलुषता व कुनेह है।।
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Wednesday, April 20, 2011
जो हृदय का गीत था, वह........
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