सनातन संस्कृति एवं परंपरा में प्रकृति और शक्ति की उपासना का एक अत्यंत गहरा और पूरक संबंध रहा है। आज जब यह संपूर्ण पृथ्वी कठिन पर्यावरण संकट और हमारी पूरी मानवता बहु-आयामी (युद्ध, हिंसा, महामारी, मानसिक बिमारी व अवसाद इत्यादि) अशांति से जूझ रही है, तब हमारी प्राचीन सनातन आध्यात्मिक मान्यताओं व परंपराओं का महत्व और भी बढ़ जाता है।
हमारे महान पूर्वज, ऋषियों और मनीषियों ने सहस्राब्दियों पूर्व ही यह अनुभव एवं आत्मसात कर लिया था कि प्रकृति और कुछ नहीं, बल्कि ईश्वर की ही एक दृश्यमान ऊर्जा (शक्ति) है।इस प्रकार, प्रकृति और शक्ति वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
1. प्रकृति और शक्ति: एक ही चेतना के दो रूप
भारतीय दर्शन में जिसे हम प्रकृति कहते हैं, वही आध्यात्मिक धरातल पर 'आदि-शक्ति' या 'दुर्गा' का स्वरूप है।
शक्ति का अर्थ: ऊर्जा (Energy)
प्रकृति का अर्थ: भौतिक जगत (Matter)
हमारा आधुनिक भौतिक विज्ञान भी यही मानता है कि ऊर्जा अक्षुण व अक्षय होती है, इसको न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट; इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित किया जा सकता है। हमारे प्राचीन वांग्मय में इसी सत्य को रेखांकित किया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ (गीता 7.4)
अर्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह आठ प्रकार से विभक्त मेरी ही अपरा प्रकृति (Apara Prakriti) है। हमारे चारों ओर जो कुछ भी विद्यमान है, वह वस्तुतः परब्रह्म की ऊर्जा का ही विस्तार है।
2. वैदिक दृष्टिकोण: प्रकृति का मातृत्व भाव
वैदिक काल से ही हमारे पूर्वज प्रकृति के प्रत्येक घटक में चेतना और दिव्यता का वास देखते आए हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद की ऋचाएं नदियों, पर्वतों, वृक्षों और वायु की स्तुति से युक्त हैं। ऋषियों की दृष्टि में प्रकृति कोई निर्जीव संसाधन नहीं, बल्कि एक जाग्रत 'माता' है।
अथर्ववेद का भूमि सूक्त पर्यावरण के महत्व एवं संरक्षण का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक वैश्विक घोषणापत्र है:
माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। (अथर्ववेद 12.1.12)
अर्थ: भूमि मेरी माता है और मैं इस धरा का पुत्र हूँ। जब मानव प्रकृति को अपनी माता के रूप में अंगीकार करता है, तब उसके द्वारा इसका अंधाधुंध दोहन और शोषण स्रुवाभाविक रूप से रुक सकता है तथा इसी भावना से ही हमारे प्रकृति एवं पर्यावरण की रक्षा व सम्मान का भाव जाग्रत हो सकता है। यही दृष्टिकोण प्रकृति अर्थात् शक्ति की वास्तविक उपासना है।
3. शाक्त परंपरा एवं मातृत्व शक्ति का विस्तार
सनातन परंपरा में ऊर्जा (शक्ति) की आराधना को शाक्त परंपरा कहा गया है, जहाँ सर्वोच्च परम चेतना की उपासना 'माता' के रूप में की जाती है। जिस प्रकार एक माँ अपनी संतान का संवर्धन करती है, उसी प्रकार प्रकृति रूपी आदि-शक्ति भी संपूर्ण चराचर जगत का भरण-पोषण एवं संरक्षण करती है।
दुर्गा सप्तशती में मातृशक्ति की वंदना करते हुए कहा गया है:
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ: जो भगवती समस्त प्राणियों में 'शक्ति' (ऊर्जा और सामर्थ्य) के रूप में प्रतिष्ठित हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है। यहाँ शक्ति का तात्पर्य केवल स्थूल शारीरिक बल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रज्ञा, करुणा, क्षमा और जीवन जीने की अदम्य इच्छाशक्ति का द्योतक है।
4. भारतीय पर्व: प्रकृति और संस्कृति का शुभ व सुंदर समन्वय
भारत का कोई भी प्रमुख पर्व प्रकृति और शक्ति की अर्चना के बिना पूर्ण नहीं होता:
नवरात्रि: शक्ति के नौ स्वरूपों की आराधना का महापर्व। इस अनुष्ठान में होने वाली 'घटस्थापना' (मिट्टी के कलश में जौ बोना) सीधे तौर पर कृषि, धरती की उर्वरता और नवसृजन का उत्सव है।
नदी एवं वनस्पति पूजन: छठ महापर्व पर प्रत्यक्ष देवता सूर्य और जीवनदायिनी नदियों की पूजा की जाती है। वहीं तुलसी विवाह, वट सावित्री (बरगद पूजन) और आंवला नवमी जैसे व्रत-त्योहार वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के प्रत्यक्ष माध्यम हैं।
नदी एवं हमारे पवित्र तीर्थ : गंगा, यमुना , सरस्वती पवित्र नदियों के त्रिवेणी संगम का तीर्थराज प्रयाग, गंगा-सागर , इसी प्रकार हमारे सभी पवित्र तीर्थों का हमारे पवित्र नदियों से सीधा संबंध हमारी सनातन परंपरा में प्रकृति की महत्ता का व्यापक प्रमाण है ।
5. समकालीन युग में शक्ति उपासना की प्रासंगिकता
समकालीन युग में मनुष्य ने तकनीकी विकास की आड़ में प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करने का अवश्य प्रयास किया है, परंतु इसके विभिन्न दुष्परिणाम भी जैसे ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और असंतुलित प्राकृतिक आपदाओं के रूप में हमारे सामने नयी चुनौतियों, यहां तक की मानवता के अस्तित्व पर गंभीर संकट के रूप में उभर रहे है। ऐसी गंभीर और चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में हमारा प्रकृति के साथ सामंजस्य एवं संतुलन बनाये रखना आज सबसे अधिक महत्वपूर्ण एवं चिंतनीय पहलू और विषय बन जाता है ।
ऐसे में 'प्रकृति और शक्ति की उपासना' का वास्तविक मर्म हमारा प्रकृति के साथ समरसता और संतुलन बनाकर जीवनयापन करना है। जब हम नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेते हैं, वनों के संरक्षण के लिए खड़े होते हैं, और योग व ध्यान के माध्यम से अपनी आंतरिक ऊर्जा को जाग्रत करते हैं, तब वह अनुष्ठान सच्ची उपासना बनता है।
इस प्रकार, आज प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा ही हमारी आदि-शक्ति के प्रति हमारी सबसे सच्ची एवं प्रामाणिक वंदना व आराधना है।

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