खींचता
प्रस्तर-पटल पर अमिट रेखा,
समय
की वह धार हूँ मैं।
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मन
जलधि को मथ रहा ज्ञान वासुकी से
मस्तिष्क
का चिंतन-विचार हूँ मैं।
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वेदना
के बादलों की कोख में घनीभूत हो,
नयन
से छलकी हुई अश्रु-बूँद हूँ मैं।
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वादियों
के शोर और तूफान से निरा अपरिचित,
खामोश
सी कोमल तरंगित शीतल वात हूँ मैं।
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युग-युगों
की वेदना से मनुजता जो चित्कार करती,
अनसुनी,दिल में दबी वह आह हूँ मैं।
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चल
रहा कृत्य-अपकृत्य का संघर्ष निरंतर
मनुजता
को खे रहा पतवार हूँ मैं।
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Sunday, October 23, 2011
समय की वह धार हूँ मैं.......
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