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Sunday, November 1, 2015

जनाब मुनव्वर राणा साहब! अफसोस आप भी बेगाने, दोहरे मापदंडों वाले ही निकले....

कल शाम एबीपी न्यूज चैनल पर जनाब मुनव्वर राणा जी की उनके द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाये जाने के बाबत प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित थी जिसकी एंकरिंग देवांग कर रहे थे।

आजकल चूंकि अधिकांश टीवी चैनल खुले तौर पर मोदी सरकार के विरुद्ध अभियान चलाये हुए हैं इसलिए यह कहना कठिन है कि टीवी चैनल की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस पुरस्कार लौटाने के बाद मुनव्वर राणा की बिगड़ती छवि को वापस सुधारने, उनको हीरो शायर के रूप में वापस स्थापित करने हेतु प्रायोजित थी अथवा यह एक सामान्य समीक्षा हेतु मात्र प्रेस कॉन्फ्रेंस ही थी, क्योंकि मुनव्वर राणा जी ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा भी बड़े प्रायोजित तरीके से ही कुछ दिन पहले इसी चैनल पर ही की थी।

पिछले हफ्ते भी इसी चैनल पर लेखक साहित्यकारों की एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हुई थी जिसमें आर यस यस चिंतक राकेश सिन्हा जी सरकार और आर यस यस की ओर से पक्ष रख रहे थे जहां बामपंथी विचारधारा के साहित्यकारों का समूह उनको और सरकार /आर यस यस को घेरने और पिनडाउन करने की बराबर कोशिश कर रहा था।

कई बार ऐसा अनुभव होता है कि हमारे देश में बुद्धिजीवी वर्ग, विशेषकर बामपंथी विचारधारा के चिंतक, साहित्यकार, राजनेता इतना बौद्धिक अहंकार में रहते हैं कि उन्हें बाकी सभी अन्य विचारधाराएं नीच, गौड़ और अछूत लगती हैं, अपने अलावा उन्हें बाकी अन्य सभी विचारधारायें, विशेषकर राष्ट्रीयता और हिन्दुत्व की बात करने वाले अन्य बुद्धिजीवी और साहित्यकार या आरएसएस से सहमत लोग, बौद्धिक रूप से दरिद्र,अयोग्य, तर्कहीन और तुच्छ लगते हैं और अपने इस बौद्धिक अहंकार में उन्हें राष्ट्रहित की जुड़ी बातें भी कूड़ेदान में फेंकने में कोई गुरेज नहीं रहता।

कह सकते हैं कि देश की आजादी के बाद बामपंथी विचारधारा के बुद्धिजीवी, साहित्यकार व राजनेता इस देश के नये ब्राह्मण बन गये जिनकी हर सोच हर विचारधारा उन्हें सर्वोपरि, यहां तक कि राष्ट्र हित से भी ऊपर लगती है । तभी तो कम्युनिस्ट पार्टी के अहंकारी नेताओं ने आजादी से पूर्व में ही कांग्रेस पार्टी से अपने मतभेद और असहमति के कारण भारत के बंटवारे और मुस्लिमवर्ग के लिए अलग देश पाकिस्तान बनाने के लीगी प्रस्ताव को अपना पूरा, नैतिक और सक्रिय, समर्थन दिया। और आजादी के बाद भी सन् 1962 में जब चीन भारत का मानमर्दन कर रहा था, उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक चिंतक ' दिल्ली दूर, पेकिंग नजदीक ' का जुमला उछाल रहे थे। इस प्रकार कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए देश हित सदा गौण रहा है, उन्हें तो मात्र देश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा पर वर्चस्व और नियंत्रण से ताल्लुक रहा है, भले ही उसके लिए देश में उन्हें कितनी अशांति पैदा करनी पड़े, मारकाट मचानी पड़े, देश अस्थिर हो, विखंडित हो। चूँकि कांग्रेस पार्टी जो सदैव सत्ता और इसकी दलाली के कार्य में ही लिप्त रही, उनका अपना कोई बौद्धिक चिंतन था ही नहीं और न ही कभी यह उनके प्राथमिकता में ही रहा, और आर यस यस से दूरी बनाकर रखना अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने की राजनीतिक विवशता और मजबूरी रही, अतः अपने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विचारधारा और चिंतन हेतु वे पूर्णरूपेण बामपंथियों की भिक्षा और बैसाखी पर निर्भर रहे।

जब हम इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढ़ने आये तो हमारे कुछ नजदीकी सीनियर जो वामपंथी विचार धारा की छात्रयूनियन से जुड़े थे, उनसे प्रेरित होकर उनकी गतिविधियों में घूमते, पोस्टर चिपकाते, सेमिनार भाषणों में भाग लेते,वहां आजाद, बिस्मिल, भगत सिंह की जोश भरी बातें कोट की जाती थीं, मजदूरों, गरीबों, कमजोर लोगों की तकलीफ की बात की जाती, सिस्टम बदलने की बात की जाती, दुष्यंत कुमार, मुनव्वर राणा और तमाम अक्लियत की बात करने वाले शायरों लेखकों के जोश दिलाने वाले कथन, शेर, नज्म दोहराये जाते, सब कुछ बड़ा जज्बा बडा़ जोश देता, उस समय हमें यही लगता कि हमारे ताकतवर भारत, हमारे खुशहाल भारत की यही सोच होनी चाहिए, इसके लिए सड़े हुए और भ्रष्ट वर्तमान सिस्टम को पहले बदलना होगा जिसमें कोई मजहब नहीं, कोई जाति नहीं, केवल भारतीय होंगे, कोई गरीब नहीं होगा, कोई भूखा नहीं सोयेगा , सबके पास रोजगार होगा, काम होगा,उन्नत और गौरव मयी भारत, स्वाभिमान युक्त हमारी अपनी सोच वाला भारत होगा!

इन्हीं युवा सपनों को लेकर आगे इंजिनियरिंग कालेज गये, फिर सरकारी नौकरी में आये परंतु युनिवर्सिटी के शुरुआती दिनों में मन में पड़े भारतीयता के बीज सदा पोषित और समृद्ध होते रहे, हालांकि 1990 के मंडल आंदोलन, बनारस के सांप्रदायिक दंगों में कुछ अभिन्न मित्रों के वास्तविक सोच और स्वरूप को देखकर अपने जाति और धर्म से परे भारतीयता की व्यापक सोच और दृष्टिकोण रखने वाले मन को ठेस भी पहुंची, मन को नये सत्य, नयी वास्तविकताओं, नये आयामों से साक्षात्कार और परिचय हुआ परंतु व्यापक भारतीयता की यह सोच मन में कमोबेश स्थायित्व के साथ सदैव बनी रही, और आज भी उसी तरह कायम है ।

मन के इसी व्यापक भारतीयता के स्थायित्व के हिस्से मुनव्वर राणा साहब भी बने रहे। इसीलिए इलाहाबाद में मेरी पोस्टिंग के दौरान राजभाषा दिवस पर आयोजित कवि-सम्मेलन में जब मुनव्वर राणा साहब का व्यक्तिगत रूप से दर्शन का सौभाग्य मिला, उनको अपने सामने खुद उनके द्वारा ही वह शेर , जिन्हें कालेज में हम दुहराया करते थे, पढ़ते पाया, उन्हें सम्मान प्राप्त करते देखा तो खुशी का ठिकाना नहीं था। जिसे आप मन से सम्मान देते हों उसे सामने सम्मानित होते देखकर मन में वैसी ही अंतरंग खुशी अनुभव होती है जैसे स्वयं को ही पुरस्कार मिला हो! मुनव्वर राणा मन में उस शायर की छवि लेकर सदैव बने रहे जो मजहब से ऊपर उठकर एक मुसल्लम भारतीय है!

हमारे कई यार दोस्त जो आज देश विदेश में रहते हैं वे भी मेरी तरह मुनव्वर राणा जी के जबर्दस्त चाहने वाले रहे हैं, हम सब मुनव्वर राणा जी की तमाम नज्में, शेर अक्सर एक दूसरे से अपने व्हाट्सअप ग्रुप में साझा करते रहे हैं। शायद मुनव्वर राणा साहब को अहसास भी होगा कि नहीं कि उनके चाहने वालों की अधिकांश जमात उनके अपने मजहब से बाहर के, हम जैसे लोगों की ही होगी न कि सिर्फ उनके अपने मजहब से ताल्लुक रखने वाले लोगों की!
एक राजनीतिक सोचे समझे एजेंडा के तहत कुछ साहित्यकारों, लेखकों, जिनकी आस्था और स्वामिभक्ति कुछ राजनीतिक दलों से जुड़ी हुई हैं, द्वारा शुरू किए गए मोदी और वर्तमान केंद्र सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार और शुरु हुये प्रोपोगंडा के अंतर्गत शुरू किए गए पुरस्कार लौटाने के तमाशे में जब मुनव्वर राणा साहब भी शामिल हो गए, वह भी एक टीवी चैनल के प्रायोजित प्रचार प्रसार के साथ तो अपने मन में उनके प्रति कायम आस्था को बड़ा झटका लगा, और मन में यही निराशा हुई कि अफसोस! यह जनाब भी औरों की ही तरह असल में दोहरे चेहरे, मापदंड और आवरण ओढ़े ही निकले, जिनकी शायरी में हमें सच्चाई, मुफलिसों की तकलीफ,जिसकी बातों और शायरी में अक्लियत की हलकानी शिद्दत से अनुभव होती थी, वह बस एक खाली डिब्बा मात्र निकला, जो उसे बजाने वाले उंगलियों के थाप के इशारे के मुताबिक बस बजता, आवाज करता है, उसकी निजी सोच, निजी अनुभूति कुछ भी नहीं है , वह तो बस औरों की ही तरह ही किसी मदारी के इशारे पर नाचने वाला मात्र जमूरा भर है! अभी तक जो व्यक्ति हमारे हृदय में दुष्यंत कुमार के साथ बैठा हुआ था, शिद्दत के सम्मान के सम्मान के साथ आसीन था, उसके वास्तविक चरित्र और रूप को आज अनुभव करके वह आज अपने हृदय और आस्था से कोसों दूर दिखता है, जिस व्यक्ति की आंखों में पंद्रह साल पहले सामने देखते भाईचारे, दोस्ताने और एक  निर्भीक शेर कहने वाले शायर और सच्चे भारतीय की चमक दिखी थी, कल टीवी चैनल पर उसके द्वारा बोलते हुए, लोगों के सवालों के जवाब  देते मीचमिचाती, लोगों की निगाहों से नजर चुराती, धूमिल, किसी एजेंडे, गुपचुप मकसद से भरी नजर आ रही थीं।

मुनव्वर राणा साहब! आपको शायद आभास भी नहीं होगा कि मेरे जैसे तमाम आपके चाहने वालों के विश्वास और उनकी आपके प्रति भारतीयता की आस्था को आपने किस तरह की चोट पहुंचाई है! आपके टीवी पर आयोजित बड़े प्रचार प्रसार के साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने के किये गये तमाशे  का मकसद,एजेंडा क्या है,और यह किसके इशारे पर आपने किया है, यह आप स्वयं ही बेहतर जानते और समझते होंगे परंतु इतना अवश्य कहना चाहता हूं कि मैं भी इस देश का ही नागरिक हूँ, इसी देश में ही रहता हूँ, मुझे तो ऐसा कहीं कोई अप्रत्याशित वातावरण नजर नहीं आता कि जिससे देश का अमन चैन धार्मिक सद्भावना बिगड़ रहा हो, या इस तरह के किसी खराब माहौल बनाने में केंद्र सरकार और मोदी जी का कोई योगदान हो रहा है। मन में विचार तो आ रहा है कि आपको ध्यान दिलाऊं कि हाल में जो देश में एक दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें हुई  है, जिनमें दादरी में अख्लाक की घटना सबसे संगीन और दुर्भाग्यपूर्ण है, उनके लिए स्थानीय प्रशासन और संबंधित राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं, जिनसे आप खुद बहुत नजदीकी ताल्लुकात रखते हैं , उनसे गाहे बगाहे सम्मान पुरस्कार लेते रहते हैं,उनके हाथों सम्मानित होते रहते हैं, न कि इन घटनाओं हेतु जिम्मेदार केंद्र सरकार और मोदी जी हैं !

जनाब मुनव्वर राणा साहब! आपने अपनी शायरी में भारतीयता, धार्मिक सद्भावना की बात हमेशा की है और इसीलिए आप हमारे चहेते शायर रहे हैं, मगर दादरी के मसले पर आप जिस तरह अपना पुरस्कार लौटाकर टीवी पर प्रायोजित कार्यक्रमों में भावनात्मक प्रतिक्रिया भारत सरकार के विरुद्ध अभिव्यक्त कर रहे हैं, उसका एक अंश भी अगर आप 84 के सिख जिनोसाइड की जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी और उसके मुखिया राजीव गांधी और उनके परिवार के खिलाफ व्यक्त किये होते, 93 के आतंकवादियों के मुंबई ब्लास्ट में मारे गए निर्दोष नागरिकों की हत्या के लिए जिम्मेदार विदेश में बैठे डॉन महोदय, जिनके मजहब, नाम और काम से आप सर्वथा सुपरिचित हैं, के खिलाफ कभी कहे होते , या कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पंडित भाइयों की पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा जघन्य हत्याओं के खिलाफ अभिव्यक्त किये होते , उनके बहू बेटियों के सरेआम अगवा और बलात्कार के खिलाफ अपनी जुबान खोलते, इसी तरह की पीड़ा और दुख जताते तो मैं निश्चय ही मान लेता कि आप एक सच्चे इंसान, सच्चे शायर जो तकलीफजदा इंसानों के दर्द को समझते हैं और वही अपनी शायरी में सच्चाई से, बिना लागलपेट के कहते हैं, मैं आपके इस दुख और अभिव्यक्ति के क्षणों में साथ खड़ा होता, आपके इस पुरस्कार लौटाने के कदम की खुली प्रशंसा करता, बंगलौर से लखनऊ आकर आपको सादर प्रणाम करता, वरना तो हुजूर आपकी सारी शायरी, उसका सारा बयान फक्त एक लफ्फाजी मात्र लगती है।

जनाब! मैं जानता हूँ कि आपसे कोई सत्य, कोई तथ्य कहना सर्वथा निरर्थक है क्योंकि जिसे सच्चाई और परिस्थिति की जानकारी नहीं हो उसको कुछ कहा बताया जा सकता है, परंतु जो एक महान शायर हो, जो हर पहलू को गहराई से, शिद्दत से समझता हो परंतु सब कुछ जानते हुए भी सच्चाई की अनदेखी कर रहा हो, जिसके मन में किसी राजनीतिक पार्टी और विचारधारा से असहमति मात्र होने के कारण अपने मन के अहंकारवश उनके प्रति व्यक्तिगत दुराव  हो , जिसकी अपने देश और समाज के प्रति भावना और जिम्मेदारी की प्राथमिकता के बनिस्बत उसकी व्यक्तिगत राजनीतिक और मजहबी पसंद नापसंद ज्यादा महत्व और मायने रखती हो, जो  किसी और के राजनीतिक स्वार्थ और एजेंडे पर काम कर रहा हो,इस्तेमाल किया जा रहा हो, उससे कुछ कहना सुनना निष्प्रयोजन ही है, सिर्फ बेमानी ही है ।