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Saturday, January 16, 2021

कांटो को कांटा कहने की साफगोई जरूरी है...

जैसे जैसे कोई समाज या देश आर्थिक एवं जीवन संबंधी अन्य सुख-सुविधाओं से संपन्न होता जाता है वैसे वैसे स्वयं को तथाकथित सभ्य, सुसंस्कृत एवं इलीट होने और दिखने के लिए एक प्रकार का बनावटीपन (शोअॉफ), फेक और हिपोक्रेटिक आचरण, संस्कार व व्यवहार अपनाने लगता है। यूरोपीयन समाज और देश, विशेषकर पश्चिमी यूरोप, में इस तरह की हिप्पोक्रेसी डेढ़ दो सौ सालों में, उनके औद्योगीकरण आर्थिक उन्नति और  हाई स्टैंडर्ड अॉफ लिविंग के समानांतर, खूब पल्लवित पुष्पित हुई। इन्हें खुद को तो गुलाब की खूबसूरती के मजे  लेने थे, यह तो वह अपना नैसर्गिक अधिकार समझते रहे, मगर अपनी हमदर्दी, ज्ञान और बखान कांटो की ही करते , खासकर यदि वह कांटे दूसरे की बागवानी में पनप और विकसित हो रहे हों, इन कांटों से तबाह और त्रस्त कोई इन्हें नष्ट करने जलाने साफ करने की कोशिश भी करता तो यही पश्चिमी यूरोप का इलीट इंटेलेक्चुअल तबका अपने कलम और जुबान के तलवार से बेचारे कांटों के सफाई करने वाले के खिलाफ ही जंग में उतर आते रहे और इन जहरीले खतरनाक कांटो के तरफदारी में उनके रक्षक बने खड़े होते रहे। चूंकि अमरीका का डीएनए भी कमोबेश पश्चिमी यूरोप की ही संरचना रहा है, वहां भी यही इलिट और इंटेलेक्चुअल क्लास जनित हिप्पोक्रेसी निरंतर विकसित और पल्लवित होती रही। अब यही कांटे जब पश्चिमी यूरोप के देशों और शहरों, क्या लंदन और क्या पेरिस, और काफी हद तक अमरीका भी, में फैल बिखर और दिन दूने रात चौगुने बढ़ने और मजबूत होने लगे हैं, और इनके खुद के पैरों में चुभने और लहूलुहान करने लगे हैं तो अब इन्हें धीरे धीरे समझ में आने लगा है कि फूल फूल होते हैं और कांटे कांटे, कांटों से आप फूल की नरमी और सलीके की उम्मीद नहीं कर सकते, कांटो का चरित्र और ईमान ही होता है दूसरों के पैर में अकारण चुभना, दूसरों को लहूलुहान करना, दर्द देना। लहू बहाना और दूसरों को दर्द  देना कांटों का मुख्य इंटरटेनमेंट होता है।

चूंकि भारत का बैकग्राउंड पश्चिमी देशों की लम्बी अवधि तक कॉलोनी होने और उनकी गुलामी करने का रहा, देश के तथाकथित आजाद होने के बाद भी सत्ता ऐसे ही लोगों के हाथों में आयी जिनकी सारी शिक्षा दिक्षा और समझ यूरोप से ही उधार में मिली हुई थी, अतः स्वाभाविक रूप से यहां भी वही हिप्पोक्रेसी की मानसिकता पूरी तरह से, गहराई से, समाहित रही। जेएनयू, जामिया और जाधवपुर इसी हिप्पोक्रेसी के जीतेजागते उदाहरण व प्रयोगशालाएं रही हैं।

ट्रंप या उनके विचारधारा जैसे नेताओं के फूहड़ बात और व्यवहार की चाहे जितनी भी आलोचना की जाय मगर एक बात तो अकाट्य सत्य है कि ट्रंप जैसे  नेता कम से कम इस घिनौने हिप्पोक्रेसी से मुक्त रहे हैं, वे बेबाकी से और बिना किसी लाग-लपेट के इन कांटों को कांटा कहने की साफगोई रखते हैं।

हमारे देश के लिए भी इस गहरे पैठी हिप्पोक्रेसी से निजात पाने और कांटों को कांटा कहने की बेबाकी और साफगोई की नितांत आवश्यक है, कम से कम इधर पांच छः सालों से तो थोड़ी बहुत बेबाकी साफगोई प्रवेश करती दिखाई देने लगी है, इसके सुरक्षित भविष्य के लिए अपरिहार्य है अन्यथा  हिप्पोक्रेसी में जीने  वाले देश और समाज का हस्र और नियति प्रायः 'टाइटैनिक' जैसा ही होता है।

Sunday, July 2, 2017

कौन कर रहा है जीएसटी का विरोध?

जीएसटी का अधिकांश विरोध वही तबका कर रहा है जो टैक्स इवैडर है और टैक्स इवैसन को भारत में जन्म लेने के नाते इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है।
(मैं यहाँ उन लोगों के विरोध की उपेक्षा कर रहा हूं  जो मात्र राजनीतिक कारण या अपने बौद्धिक पूर्वाग्रहवश चूंकि मोदी से नफरत और विरोध करते हैं इसलिए जीएसटी का भी विरोध कर रहे हैं।)

जीएसटी भले ही सीधे तौर पर व्यक्ति के व्यवसाय और आमदनी पर ज्यादा फर्क नहीं डाले, मगर इसका सबसे तगड़ा फालआउट यह है कि सबको अपने व्यवसाय के पूरे आगत और निर्गत का डिटेल सबमिट करना होगा, और सारे डिटेल पैनकार्ड से लिंक्ड हैं. तो स्वाभाविक है कि किसी भी बिजनेस की पूरी इंकम भी अब सरकार और इंकम टैक्स विभाग की जानकारी में रहेगी, जो अब तक लोग चंटबुद्धि से छिपा लिया करते थे। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि इससे सारी चोरी, सारा टैक्स इवैसन ओवरनाइट बंद हो जाएगा, बड़े बड़े इन्नोवेटिव लोग हैं कुछ न कुछ तिकड़म तो भिड़ायेंगे ही, लोग मगर सतर्क होंगे, काफी हद तक ट्रांसपेरेंसी अवश्य आयेगी।

कल रात मैं भारत के वित्त मंत्री, श्री अरुण जेटली का एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू सुना जो काफी स्पष्ट और बेबाक लगा | उनके अनुसार आज देश में औसतन सिर्फ 80 लाख लोग अपना टैक्स रिटर्न भरते हैं | मैं कहीं पढ़ रहा था, हो सकता है मेरी याददाश्त पूरी तरह से सही नहीं भी हो, कि देश में मात्र 16 लाख लोग अपनी आमदनी 10 लाख से ऊपर  शो करते हैं | अब प्रश्न उठता है कि इस तरह के आंकड़े देश की क्या तस्वीर और लोगों का क्या चरित्र दिखाते हैं? जिस देश में पढ़ेलिखे लोग,  डाक्टर, वकील, सीए, बिजनेस से बड़ी आमदनी बनाने वाले लोग भी नियमों का मैनिपुलेसन करके टैक्स इवेसन करते हो, और इस टैक्स की चोरी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हों, वहां सरकार कड़े निर्णय लेकर यदि इन सभी टैक्स इवैडर्स को टैक्स नेट में लाना चाहती है तो कुछ लोगों को इतना बुरा क्यों लग रहा है, इतनी मिर्ची क्यों लग रही है, मेरी समझ में तो सरकार के यह कड़े निर्णय ईमानदार तबके के पक्ष में है |

Sunday, November 1, 2015

जनाब मुनव्वर राणा साहब! अफसोस आप भी बेगाने, दोहरे मापदंडों वाले ही निकले....

कल शाम एबीपी न्यूज चैनल पर जनाब मुनव्वर राणा जी की उनके द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाये जाने के बाबत प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित थी जिसकी एंकरिंग देवांग कर रहे थे।

आजकल चूंकि अधिकांश टीवी चैनल खुले तौर पर मोदी सरकार के विरुद्ध अभियान चलाये हुए हैं इसलिए यह कहना कठिन है कि टीवी चैनल की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस पुरस्कार लौटाने के बाद मुनव्वर राणा की बिगड़ती छवि को वापस सुधारने, उनको हीरो शायर के रूप में वापस स्थापित करने हेतु प्रायोजित थी अथवा यह एक सामान्य समीक्षा हेतु मात्र प्रेस कॉन्फ्रेंस ही थी, क्योंकि मुनव्वर राणा जी ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा भी बड़े प्रायोजित तरीके से ही कुछ दिन पहले इसी चैनल पर ही की थी।

पिछले हफ्ते भी इसी चैनल पर लेखक साहित्यकारों की एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हुई थी जिसमें आर यस यस चिंतक राकेश सिन्हा जी सरकार और आर यस यस की ओर से पक्ष रख रहे थे जहां बामपंथी विचारधारा के साहित्यकारों का समूह उनको और सरकार /आर यस यस को घेरने और पिनडाउन करने की बराबर कोशिश कर रहा था।

कई बार ऐसा अनुभव होता है कि हमारे देश में बुद्धिजीवी वर्ग, विशेषकर बामपंथी विचारधारा के चिंतक, साहित्यकार, राजनेता इतना बौद्धिक अहंकार में रहते हैं कि उन्हें बाकी सभी अन्य विचारधाराएं नीच, गौड़ और अछूत लगती हैं, अपने अलावा उन्हें बाकी अन्य सभी विचारधारायें, विशेषकर राष्ट्रीयता और हिन्दुत्व की बात करने वाले अन्य बुद्धिजीवी और साहित्यकार या आरएसएस से सहमत लोग, बौद्धिक रूप से दरिद्र,अयोग्य, तर्कहीन और तुच्छ लगते हैं और अपने इस बौद्धिक अहंकार में उन्हें राष्ट्रहित की जुड़ी बातें भी कूड़ेदान में फेंकने में कोई गुरेज नहीं रहता।

कह सकते हैं कि देश की आजादी के बाद बामपंथी विचारधारा के बुद्धिजीवी, साहित्यकार व राजनेता इस देश के नये ब्राह्मण बन गये जिनकी हर सोच हर विचारधारा उन्हें सर्वोपरि, यहां तक कि राष्ट्र हित से भी ऊपर लगती है । तभी तो कम्युनिस्ट पार्टी के अहंकारी नेताओं ने आजादी से पूर्व में ही कांग्रेस पार्टी से अपने मतभेद और असहमति के कारण भारत के बंटवारे और मुस्लिमवर्ग के लिए अलग देश पाकिस्तान बनाने के लीगी प्रस्ताव को अपना पूरा, नैतिक और सक्रिय, समर्थन दिया। और आजादी के बाद भी सन् 1962 में जब चीन भारत का मानमर्दन कर रहा था, उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक चिंतक ' दिल्ली दूर, पेकिंग नजदीक ' का जुमला उछाल रहे थे। इस प्रकार कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए देश हित सदा गौण रहा है, उन्हें तो मात्र देश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा पर वर्चस्व और नियंत्रण से ताल्लुक रहा है, भले ही उसके लिए देश में उन्हें कितनी अशांति पैदा करनी पड़े, मारकाट मचानी पड़े, देश अस्थिर हो, विखंडित हो। चूँकि कांग्रेस पार्टी जो सदैव सत्ता और इसकी दलाली के कार्य में ही लिप्त रही, उनका अपना कोई बौद्धिक चिंतन था ही नहीं और न ही कभी यह उनके प्राथमिकता में ही रहा, और आर यस यस से दूरी बनाकर रखना अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने की राजनीतिक विवशता और मजबूरी रही, अतः अपने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विचारधारा और चिंतन हेतु वे पूर्णरूपेण बामपंथियों की भिक्षा और बैसाखी पर निर्भर रहे।

जब हम इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढ़ने आये तो हमारे कुछ नजदीकी सीनियर जो वामपंथी विचार धारा की छात्रयूनियन से जुड़े थे, उनसे प्रेरित होकर उनकी गतिविधियों में घूमते, पोस्टर चिपकाते, सेमिनार भाषणों में भाग लेते,वहां आजाद, बिस्मिल, भगत सिंह की जोश भरी बातें कोट की जाती थीं, मजदूरों, गरीबों, कमजोर लोगों की तकलीफ की बात की जाती, सिस्टम बदलने की बात की जाती, दुष्यंत कुमार, मुनव्वर राणा और तमाम अक्लियत की बात करने वाले शायरों लेखकों के जोश दिलाने वाले कथन, शेर, नज्म दोहराये जाते, सब कुछ बड़ा जज्बा बडा़ जोश देता, उस समय हमें यही लगता कि हमारे ताकतवर भारत, हमारे खुशहाल भारत की यही सोच होनी चाहिए, इसके लिए सड़े हुए और भ्रष्ट वर्तमान सिस्टम को पहले बदलना होगा जिसमें कोई मजहब नहीं, कोई जाति नहीं, केवल भारतीय होंगे, कोई गरीब नहीं होगा, कोई भूखा नहीं सोयेगा , सबके पास रोजगार होगा, काम होगा,उन्नत और गौरव मयी भारत, स्वाभिमान युक्त हमारी अपनी सोच वाला भारत होगा!

इन्हीं युवा सपनों को लेकर आगे इंजिनियरिंग कालेज गये, फिर सरकारी नौकरी में आये परंतु युनिवर्सिटी के शुरुआती दिनों में मन में पड़े भारतीयता के बीज सदा पोषित और समृद्ध होते रहे, हालांकि 1990 के मंडल आंदोलन, बनारस के सांप्रदायिक दंगों में कुछ अभिन्न मित्रों के वास्तविक सोच और स्वरूप को देखकर अपने जाति और धर्म से परे भारतीयता की व्यापक सोच और दृष्टिकोण रखने वाले मन को ठेस भी पहुंची, मन को नये सत्य, नयी वास्तविकताओं, नये आयामों से साक्षात्कार और परिचय हुआ परंतु व्यापक भारतीयता की यह सोच मन में कमोबेश स्थायित्व के साथ सदैव बनी रही, और आज भी उसी तरह कायम है ।

मन के इसी व्यापक भारतीयता के स्थायित्व के हिस्से मुनव्वर राणा साहब भी बने रहे। इसीलिए इलाहाबाद में मेरी पोस्टिंग के दौरान राजभाषा दिवस पर आयोजित कवि-सम्मेलन में जब मुनव्वर राणा साहब का व्यक्तिगत रूप से दर्शन का सौभाग्य मिला, उनको अपने सामने खुद उनके द्वारा ही वह शेर , जिन्हें कालेज में हम दुहराया करते थे, पढ़ते पाया, उन्हें सम्मान प्राप्त करते देखा तो खुशी का ठिकाना नहीं था। जिसे आप मन से सम्मान देते हों उसे सामने सम्मानित होते देखकर मन में वैसी ही अंतरंग खुशी अनुभव होती है जैसे स्वयं को ही पुरस्कार मिला हो! मुनव्वर राणा मन में उस शायर की छवि लेकर सदैव बने रहे जो मजहब से ऊपर उठकर एक मुसल्लम भारतीय है!

हमारे कई यार दोस्त जो आज देश विदेश में रहते हैं वे भी मेरी तरह मुनव्वर राणा जी के जबर्दस्त चाहने वाले रहे हैं, हम सब मुनव्वर राणा जी की तमाम नज्में, शेर अक्सर एक दूसरे से अपने व्हाट्सअप ग्रुप में साझा करते रहे हैं। शायद मुनव्वर राणा साहब को अहसास भी होगा कि नहीं कि उनके चाहने वालों की अधिकांश जमात उनके अपने मजहब से बाहर के, हम जैसे लोगों की ही होगी न कि सिर्फ उनके अपने मजहब से ताल्लुक रखने वाले लोगों की!
एक राजनीतिक सोचे समझे एजेंडा के तहत कुछ साहित्यकारों, लेखकों, जिनकी आस्था और स्वामिभक्ति कुछ राजनीतिक दलों से जुड़ी हुई हैं, द्वारा शुरू किए गए मोदी और वर्तमान केंद्र सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार और शुरु हुये प्रोपोगंडा के अंतर्गत शुरू किए गए पुरस्कार लौटाने के तमाशे में जब मुनव्वर राणा साहब भी शामिल हो गए, वह भी एक टीवी चैनल के प्रायोजित प्रचार प्रसार के साथ तो अपने मन में उनके प्रति कायम आस्था को बड़ा झटका लगा, और मन में यही निराशा हुई कि अफसोस! यह जनाब भी औरों की ही तरह असल में दोहरे चेहरे, मापदंड और आवरण ओढ़े ही निकले, जिनकी शायरी में हमें सच्चाई, मुफलिसों की तकलीफ,जिसकी बातों और शायरी में अक्लियत की हलकानी शिद्दत से अनुभव होती थी, वह बस एक खाली डिब्बा मात्र निकला, जो उसे बजाने वाले उंगलियों के थाप के इशारे के मुताबिक बस बजता, आवाज करता है, उसकी निजी सोच, निजी अनुभूति कुछ भी नहीं है , वह तो बस औरों की ही तरह ही किसी मदारी के इशारे पर नाचने वाला मात्र जमूरा भर है! अभी तक जो व्यक्ति हमारे हृदय में दुष्यंत कुमार के साथ बैठा हुआ था, शिद्दत के सम्मान के सम्मान के साथ आसीन था, उसके वास्तविक चरित्र और रूप को आज अनुभव करके वह आज अपने हृदय और आस्था से कोसों दूर दिखता है, जिस व्यक्ति की आंखों में पंद्रह साल पहले सामने देखते भाईचारे, दोस्ताने और एक  निर्भीक शेर कहने वाले शायर और सच्चे भारतीय की चमक दिखी थी, कल टीवी चैनल पर उसके द्वारा बोलते हुए, लोगों के सवालों के जवाब  देते मीचमिचाती, लोगों की निगाहों से नजर चुराती, धूमिल, किसी एजेंडे, गुपचुप मकसद से भरी नजर आ रही थीं।

मुनव्वर राणा साहब! आपको शायद आभास भी नहीं होगा कि मेरे जैसे तमाम आपके चाहने वालों के विश्वास और उनकी आपके प्रति भारतीयता की आस्था को आपने किस तरह की चोट पहुंचाई है! आपके टीवी पर आयोजित बड़े प्रचार प्रसार के साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने के किये गये तमाशे  का मकसद,एजेंडा क्या है,और यह किसके इशारे पर आपने किया है, यह आप स्वयं ही बेहतर जानते और समझते होंगे परंतु इतना अवश्य कहना चाहता हूं कि मैं भी इस देश का ही नागरिक हूँ, इसी देश में ही रहता हूँ, मुझे तो ऐसा कहीं कोई अप्रत्याशित वातावरण नजर नहीं आता कि जिससे देश का अमन चैन धार्मिक सद्भावना बिगड़ रहा हो, या इस तरह के किसी खराब माहौल बनाने में केंद्र सरकार और मोदी जी का कोई योगदान हो रहा है। मन में विचार तो आ रहा है कि आपको ध्यान दिलाऊं कि हाल में जो देश में एक दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें हुई  है, जिनमें दादरी में अख्लाक की घटना सबसे संगीन और दुर्भाग्यपूर्ण है, उनके लिए स्थानीय प्रशासन और संबंधित राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं, जिनसे आप खुद बहुत नजदीकी ताल्लुकात रखते हैं , उनसे गाहे बगाहे सम्मान पुरस्कार लेते रहते हैं,उनके हाथों सम्मानित होते रहते हैं, न कि इन घटनाओं हेतु जिम्मेदार केंद्र सरकार और मोदी जी हैं !

जनाब मुनव्वर राणा साहब! आपने अपनी शायरी में भारतीयता, धार्मिक सद्भावना की बात हमेशा की है और इसीलिए आप हमारे चहेते शायर रहे हैं, मगर दादरी के मसले पर आप जिस तरह अपना पुरस्कार लौटाकर टीवी पर प्रायोजित कार्यक्रमों में भावनात्मक प्रतिक्रिया भारत सरकार के विरुद्ध अभिव्यक्त कर रहे हैं, उसका एक अंश भी अगर आप 84 के सिख जिनोसाइड की जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी और उसके मुखिया राजीव गांधी और उनके परिवार के खिलाफ व्यक्त किये होते, 93 के आतंकवादियों के मुंबई ब्लास्ट में मारे गए निर्दोष नागरिकों की हत्या के लिए जिम्मेदार विदेश में बैठे डॉन महोदय, जिनके मजहब, नाम और काम से आप सर्वथा सुपरिचित हैं, के खिलाफ कभी कहे होते , या कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पंडित भाइयों की पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा जघन्य हत्याओं के खिलाफ अभिव्यक्त किये होते , उनके बहू बेटियों के सरेआम अगवा और बलात्कार के खिलाफ अपनी जुबान खोलते, इसी तरह की पीड़ा और दुख जताते तो मैं निश्चय ही मान लेता कि आप एक सच्चे इंसान, सच्चे शायर जो तकलीफजदा इंसानों के दर्द को समझते हैं और वही अपनी शायरी में सच्चाई से, बिना लागलपेट के कहते हैं, मैं आपके इस दुख और अभिव्यक्ति के क्षणों में साथ खड़ा होता, आपके इस पुरस्कार लौटाने के कदम की खुली प्रशंसा करता, बंगलौर से लखनऊ आकर आपको सादर प्रणाम करता, वरना तो हुजूर आपकी सारी शायरी, उसका सारा बयान फक्त एक लफ्फाजी मात्र लगती है।

जनाब! मैं जानता हूँ कि आपसे कोई सत्य, कोई तथ्य कहना सर्वथा निरर्थक है क्योंकि जिसे सच्चाई और परिस्थिति की जानकारी नहीं हो उसको कुछ कहा बताया जा सकता है, परंतु जो एक महान शायर हो, जो हर पहलू को गहराई से, शिद्दत से समझता हो परंतु सब कुछ जानते हुए भी सच्चाई की अनदेखी कर रहा हो, जिसके मन में किसी राजनीतिक पार्टी और विचारधारा से असहमति मात्र होने के कारण अपने मन के अहंकारवश उनके प्रति व्यक्तिगत दुराव  हो , जिसकी अपने देश और समाज के प्रति भावना और जिम्मेदारी की प्राथमिकता के बनिस्बत उसकी व्यक्तिगत राजनीतिक और मजहबी पसंद नापसंद ज्यादा महत्व और मायने रखती हो, जो  किसी और के राजनीतिक स्वार्थ और एजेंडे पर काम कर रहा हो,इस्तेमाल किया जा रहा हो, उससे कुछ कहना सुनना निष्प्रयोजन ही है, सिर्फ बेमानी ही है ।

Saturday, August 8, 2015

कब तक मृत्यु सहोगे बापू !

बापू !
तुम जीते जी वही किये
जिन बातों और मूल्यों में
तुम सचमुच में विश्वास किया करते थे ,
जो पथ तुमको उचित लगा और न्यायपरक
भले अकेले हो परंतु तुम उसपर ही चलते रहते थे ।
थे तुम पिता राष्ट्र के जिस वह
जिसकी रग में तुम बहते थे जीवन बनते
रगों में जिनके रुधिर बने तुम थे बहते
उसी पुत्र ने तुमको बदले में
चिरनिद्रा में सो जाने का बस प्रतिकार किया ,
चले गये थे तुम एक अचानक ,
दूर कहीं , और मौन कहीं ,
कलतक जो तेरे पीछे चलते
जो थे तेरे अनुयायायी बनते ,
तुमको लेकर बड़ी बड़ी बातें थे करते
हर बात तुम्हारी सिर आँखों पर,
कहते कितने भाषण थे देते
और कोसते पीट पीट कर छाती अपनी
उनको जिसने की हत्या तेरी , तुमको थी गोली मारी
मगर वही तेरे तथाकथित अनुयायी भी
तेरे ही नाम की टोपी पहने,
कुछ चौरस्तों , गलियों में तेरी मूर्ति खड़ी कर
नाम की तेरे बड़ी दुहाई देते,
करते जोर जोर की भाषणबाजी
बातें करते दीनदलित की ,
सत्य अहिंसा और न्याय की
नाम पर तेरे वोट खरीदें ,
करते रहे निरंतर हत्या , बलात्कार
प्रति-पल , प्रतिदिन , और निरंतर
तेरे सिद्धांतों की , तेरे सदाचरणों को
सौदाई बन करके , लोभी भ्रष्टाचारी बन करके ।
सात दसक होने को आये तेरे महाप्रयाण के बापू
मगर तुम्हारे सिद्धांतो ,मूल्यों , आचरणों का
जारी है हत्या , मर्दन
तेरे ही संतानों के हाथों
रोज तुम्हारी आत्मा का गला दबाया जाता है
तेरी ही पूजा के मिथ्या आडंबर में !
देख आज यह मन रोता है
कि कितने मेघनाद और रावण जश्न मनाते , उत्सव करते
वहीं रोज तुम प्रतिपल मरते ,
कितनी मृत्यु मरे हो बापू !
कब तक मृत्यु सहोगे बापू !
- देवेंद्र

Tuesday, March 10, 2015

हे हरि ! संहारो शीघ्र मुफ्ती भष्मासुर को ....

मुफ्ती जैसे भष्मासुर का किसी भगवान विष्णु के कुशल कूटनीति से शीघ्र संहार देशहित में अत्यंत आवश्यक है ।

बेहतर तो नामो और अमित शाह को अपने पार्टी के राजनीतिक विस्तार की अति-महात्वाकांक्षा को तरजीह देने की जल्दबाजी करने के बजाय वह अपने व अपनी पार्टी के राष्ट्रीयता के  सिद्धांत , व जेएण्डके व भारत देश की अखंडता को तरजीह देते , और उन्हें मुफ्ती जैसे पूर्वसिद्ध शातिर, चालबाज , पाकिस्तान-परस्त व अलगाववादी समर्थक नेता व उसकी पीडीपी पार्टी से किसी प्रकार के राजनीतिक गठजोड़ से बचना चाहिये था । वह बीजेपी की ही सहायता से मुख्यमंत्री बनकर अब अपने पाकिस्तानपरस्ती व अलगाववादी समर्थक होने का एजेंडा साध रहा है और नामो और भाजपा के लिये भष्मासुर सिद्ध हो रहा है ।

अब नामो और भाजपा को भी मुफ्ती से पार पाने के लिये किसी विष्णुभगवान की चतुराई व कूटनीति की आवश्यकता है , जो मुफ्ती नामक इस राक्षस का शीघ्रनाश कर सके और जम्मूकश्मीर राज्य व भारत देश को उससे छुटकारा दिला सके ।

Tuesday, July 30, 2013

बेचारी गरीबी की जान के कितने दुश्मन !

उपेक्षित भारतीय दूतावास मास्को - भारतीय गरीबी या हमारी सब चलता है की प्रवृत्ति

म्रेरे एक मित्र हैं जो एक आधिकारिक दौरे पर हाल ही में मास्को की यात्रा पर गये थे। उनकी यात्रा बड़ी सुखद व सुंदर रही, उन्होंने वहाँ से कई सुंदर तस्वीरे भी साझा की जिन्हे देखकर मन आनंदित हुआ। परंतु मेरे मित्र को इस बात का बड़ा मलाल है कि मास्को में भारतीय दूतावास का रखरखाव कतई अच्छा नहीं है,लॉन में तितर बितर बढ़ी घास,चमकहीन व कहीं कहीं टूटी फर्सें, दूतावास का भवन बिना ठीक रखरखाव के बिल्कुल उजाड़ व उपेक्षित लगता है।उनको इस बात का बहुत दुःख लगा कि जहाँ विजया लक्ष्मी पंडित, धर , कौल जैसी महान व परम सत्ता परिवार के सदस्य व अति नजदीकी विभूतियाँ राजदूत पद को शुशोभित किया,उस भवन व गरिमामय केंद्र की ऐसी उपेक्षा की जा रही है। उनका यह दुख यह देखकर और भी  गहरा हो गया था कि वहीं पड़ोस के भवन, जिनमें फ्रांसीसी ,ईरानी दूतावास अवस्थित हैं, बड़े ही सलीके,शानदार , सुंदर व स्वच्छ रूप में मैंटेन हैं।

उनसे बातचीत में मैने अपना आश्चर्य व्यक्त करते उनसे कहा कि भला इसमें इतना दुख होने की क्या बात है,हम भारतीय तो अव्यस्था व अस्तव्यस्तता के लिये नामधारी हैं, इससे तो हमारी भारतीयता की पहचान ही विदेशों में अक्ष्क्षुण रही है, और इसमें हर्ज ही क्या है। किंतु मेरी बात पर उन्हें कोई संतोष  नहीं हुआ व उनका दुख कतई कम नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने और दुखी होते कहा कि सर, यही तो चुभता है कि आज भी, आजादी के 66 वर्षों के बाद भी , हमारा देश संसार में गरीब देश के रूप में जाना जाता है। मैंने उनको फिर आश्वस्त करना चाहा कि भला आप भारत और गरीबी की पहचान को क्यों खामखाह कोसते हो भाई। आखिर गरीबी तो भारत की विशिष्टता व खास पहचान पिछले सत्तर पचहत्तर साल की रही है। आखिर इसी गरीबी ने हमारे कितने ही महान भारतीयों के यशोगान व कीर्ति में कितना योगदान किया है, भला इसे आप कैसे नदरअंदाज कर सकते हैं।अरे गौर तो फरमाइये भाई साहब, अमार्त्य सेन नोबल पुरस्कार पा गये, सत्य जीत रे अपनी भारतीय गरीबी चित्रण करती फिल्मों से कितना नाम कमाये, अरुंधती रॉय इसी भारतीय गरीबी का वर्णन करते करते विश्वप्रसिद्थ लेखक व वक्ता बन गयीं, स्लमडॉग मिलिनेयर सुपर हिट रही , उसे ऑस्कर तक मिला, आखिर भारत विश्व भर में गरीब प्रोजेक्ट न होता तो इतना कुछ ये महोदय लोग हासिल कैसे कर पाते ।

मैंने उन्हे उलाहना देते कहा कि भाईसाहब अब क्या लीजिएगा,  इस बेचारी गरीबी की जान? वैसे भी हमारे नीति निर्धारक व हमारा योजना आयोग बेचारी गरीबी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं, उन्होंने एक कलम घुमाई और १० करोड़ गरीब छलांग लगाकर रातों रात अमीर बन गए ।अब तो कई सांसद भी इस गरीबी के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं ।अब १२ रुपये थाली भोजन उपलब्ध कराइयेगा तो गरीबी बेचारी कहाँ से जिंदा रहेगी ।ऊपर से सरकार फुड सिक्योरिटी बिल भी जल्द से जल्द लाने के फिराक में है, फिर तो रही सही गरीबी भी गायब।इस गरीब व लाचार गरीबी के पीछे सब हाथ धोकर पड़ गये हैं, और अब आप भी ।


अंत में मैं उनको सांत्वना व उलाहना सा देते यह भी कहा कि भला हमारी भारत सरकार ने भी इन महान विभूतियों द्वारा भारत की गरीबी के प्रचार प्रसार के महान कार्य के लिये एक बाबू मोसाय को राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार भारतरत्न से नवाजा,और एक आप हैं इस गरीबी से भारत की इमेज को धक्का लगने की बात करते हैं।मैं तो उनको राय दिया कि इस बात पर दुखी मत होइये बल्कि गर्व कीजिए कि आप इतने महान व गौरवशाली गरीब देश के हँसते-मुस्कराते जिंदा नागरिक हैं।

Friday, July 12, 2013

ठंडे व शांत मष्तिक का कौशल व विजय- पराक्रम.....

शांत व संयत मष्तिस्क मगर हौंसला और हिम्मत जबरदस्त

रात के तकरीबन दो अथवा सवा दो बज रहे होंगे जब पत्नी जी ,जो अपनी अस्वस्थता व इसकी पीड़ा के कारण ठीक से सो भी नहीं पातीं,की कराह वह आहट से नींद खुली ।उनकी पीड़ा से मेरा भी मन व हृदय भारी व विचलित  सा हो जाता है परंतु स्वयं को अपनी जिम्मेदारी व कठिन परिस्थिति में अपना  धीरज रखने के विवेक के संग्यान से सहजता व शांति रखते उनको आश्वस्त करने व उनका मनोबल बढ़ाने का प्रयास करता हूँ ताकि उन्हें कुछ नींद व आराम मिले ।

इसी बीच वेस्ट इंडीज़ में चल रहे ट्राई-सीरीज क्रिकेट प्रतियोगिता  के फाइनल मैच, जो भारत व श्रीलंका के बीच चल रहा था, उसके परिणाम को जानने की उत्सुकता हुई।करीब रात ग्यारह बजे मेरे सोने जाने  के पूर्व श्री लंका की पारी 201 पर सिमट चुकी थी और तब यह पूरी तरह से आश्वस्त लग रहा था कि भारत तो यह फाइनल निश्चित ही व आसानी से  जीत लेगा ।

किंतु इस समय जब  मोबाइल फोन में मैच का लेटेस्ट स्कोर जाँच किया तो यह  चौंकाने वाला व अति निराशाजनक था ।पारी के अढ़तालीसवें ओवर में भारत का स्कोर 9 विकेट खोकर 183 पर अटक रहा था जबकि धोनी बैटिंग छोर पर संघर्ष करते मलिंगा की खतरनाक व तेज  स्लिंगर्स गेंदबाजी का सामना कर रहे थे। दूसरे नानबैटिंग छोर पर थे इशांत शर्मा ।यह हाल जानकर निराशा व झुँझलाहट दोनों साथ साथ अनुभव हुई कि इतना आसान व हाथ में आता दिखता मैच  अब भारत के हाथ से फिसल सा गया है  व अब तो इसमें  निश्चित हार दिख रही है ।

फिर भी एक शुद्ध भारतीय की तरह किसी चमत्कार की उम्मीद में मैं मोबाइल पर अपडेटेड स्कोर देखना जारी रखा।उनचासवें ओवर के शुरू में  जीत के लिए 17 रन चाहिए थे और  बैटिंग छोर पर इशांत शर्मा थे,और तब सब समाप्त प्राय ही दिख रहा था कि  कोई भी अगली गेंद इस खेल की  समाप्ति व भारत के लिए हार ला सकती है ।इस ओवर में किसी प्रकार से दो रन बन सके पर शुक्र यह कि इशांत शर्मा बालबाल बचे रह गए ।

इस प्रकार अब था बचा मात्र एक  अंतिम ओवर, जीत के लिए चाहिए था 15 रन और अब बैटिंग की बारी थी भारतीय कप्तान धोनी की।वैसे जब धोनी बैटिंग छोर  पर  हों तो कोई भी चमत्कार संभव सा लगता है परंतु फिर  भी अंतिम ओवर में जीत का यह अति कठिन समीकरण मन में भारी असमंजस उत्पन्न कर रहा था ।फिर जैसे अचानक सूर्य के प्रकाश से अँधेरा छण मात्र में ध्वस्त हो जाता है ,उसी प्रकार धोनी के तीन लगातार तेज तर्रार बाउंडरी सॉट ने सारे संशयों को  छणभर में समाप्त करते भारत को इस महत्वपूर्ण प्रतियोगिता  में खिताबी विजयश्री  दिला दी।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण व ध्यान देने की बात यह है कि ऐसी कठिन परिस्थिति व किसी  प्रतियोगिता के फाइनल जैसे महत्वपूर्ण मैच में जीतना  भारत जैसी टीम के लिए प्रायः यदि  असंभव नहीं तो अपवाद की ही बात मानी जाती रही है ,किंतु जब से धोनी ने भारतीय टीम का नेतृत्व सँभाला है तब से उन्हों ने ऐसे कई कठिन साथ ही साथ फाइनल   जैसे  महत्वपूर्ण अवसर पर सामने दिख रही निश्चित  हार के मुँह से टीम को  बाहर खींचते अपनी टीम को विजय दिलायी व भारत को गौरवान्वित किया है। उदाहरण के लिए 2007 का टी ट्वेंटी वर्ल्ड कप , या 2011 का आई सी सी वर्ल्ड कप  या हाल ही में संपन्न आई सी सी चैम्पियनशिप ,प्रत्येक ही महत्वपूर्ण प्रति- योगिता जिसमें भारतीय टीम को ऐतिहासिक  विजयश्री मिली वे  एक चमत्कारिक खिलाड़ी व कप्तान सिद्ध हुए हैं ।

इसमें भी खास बात यह है कि जहाँ सामान्यतया  विपरीत परिस्थितियों  व सामने दिख रही हार  की दशा में दूसरे कप्तान या खिलाड़ी माथे पर चिंता की लकीरें लिये व परेशान व हताश हो जाते  है वहीं धोनी ऐसी परिस्थितियों में भी कतई शांत निश्चिंत व आत्मनियंत्रित रहते हैं, जब सामने दिखती हार के समक्ष अन्य अपनी टीम व खिलाड़ियों में विश्वास खोते हुये निराशा में डूबते  व बिना लड़े ही अपनी  पराजय  स्वीकार कर लेते हैंवैसे में भी धोनी अपनी टीम व अपने साथी खिलाड़ियों में अपना अटल विश्वास कायम रखते हैं व अंतिम समय तक जूझने का हौसला दिखाते हैं, शायद यही कारण है कि धोनी और उनकी टीम असंभव दिखते को भी संभव कर दिखाते हैं ।

स्मरण आता है कि विगत चैम्पियनशिप के फाइनल में जब अंतिम ओवरों में इशांत शर्मा के बॉलिंग की इंग्लैंड के बैटर्स द्वारा बुरी  तरह धुनाई हो रही थी और तब सभी दर्शकों व खेल  विशेषग्यों को उनसे बॉलिंग कराते  जारी  रखना एक मूर्खतापूर्ण व आत्मघाती कप्तानी प्रतीत हो रही थी, ऐसे में  धोनी एक योगी की तरह शांत वह आत्मविश्वासपूर्ण दिखते अपने निर्णय पर कायम व इशांत शर्मा में अपना भरोसा रख  उनसे बॉलिंग कराना जारी रखे  और नतीजतन सबकी आशंकाओं को ध्वस्त करते व अपने कप्तान के इस विश्वास पर खरे उतरते ऐन मौके पर इशांत शर्मा ने अपनी टीम को वह सफलता दिला दी जो कि अंततः टीम के लिए  जीत का कारण भी  सिद्ध हुई।

इसी तरह  सामने दिखती जीत  अथवा जीत की प्राप्ति पर प्रायः कई खिलाड़ी व कप्तान उत्साहातिरेक में भी अपना संयम खो देते हैं, जबकि धोनी अपनी  जीत  में भी समान रूप से संयत व शांत दिखते हैं ।

इस प्रकार धोनी ने भारतीय क्रिकेट टीम को आज की यह अविश्वसनीय  जीत दिलाकर  यह  पुनः सिद्ध व करके दिखाया है  कि जो व्यक्ति  कठिन व विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धीरज नहीं खोता, मन की शांति रख विचलित नहीं होता और स्वयं व अपनी टीम में अटल विश्वास रखता है, वह निश्चय ही इन विषम परिस्थितियों से बाहर निकलने में सदा सक्षम व सदैव  विजयी होता है।महेंद्र सिंह धोनी व भारतीय क्रिकेट टीम को शत् शत् बधाई