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Thursday, July 11, 2013

जीवन......एक कहानी.



दिन छलिया है कब तक इसका साथ रहेगा बन आलम।
कुछ उगने में यह खो जाता, बीते कुछ यह ढलने में ।1।

रात बेवफा साथी कब तक, ना जाने कब होती ओझल, 
कुछ कटती सपनों के आलम, कुछ करवट कई बदलने में ।2। 

ताने बाने ऐसे बिखरे, लगे जिंदगी एक कहानी ।
कुछ कट जाती कहने में और कुछ कट जाती सुनने में ।3।

मेरी किस्मत मुझे सुनी कब, करती मुझसे आँख मिचौली ।
कभी पलक हाथों से ढकती, खुले आँख फिर पल भर में ।4।

इसको भला समझ क्या पाता , जीवन पूरा है घनचक्कर।
केंद्र विंदु में है कुछ पैठा ,कुछ वृत्तों के घेरों में ।5।

नाटक दृश्य बदलते रहते,पात्र बने हम अभिनय करते ।
समय मूक दर्शक बन देखे, हम हँसने में रोने में ।6।

Saturday, April 7, 2012

खुशियाँ सौगात लायी हूँ मैं चाँदनी।



एक दिन चाँदनी रास्ते में मिली ,
पास आकर यह मुझसे कहने लगी ,
मैं आती हूँ अक्सर तुम्हारी गली,
हूँ हैरान  तुमसे कभी ना  मिली ।1।

बातें उसकी असर यूँ कि जादू की जैसा
मैं खड़ा देखता उसको ठिठका ठगा सा,
ऐसी उजली निगाहें मन हुआ बावला सा,
पूछ बैठा पता क्या ठिकाना और कैसा ।2।

बोली यूँ जैसे होठों पे मोती खिले-
शाम मुझको बुलाती जो सूरज ढले,
चाँद मेरा है घर वहीं से सवारी चले,
बाहें खोले जमीं से मैं मिलती गले।3।

मेरे चाँदी के रथ से हैं परियाँ उतरती,
नाचतीं मुस्कराती, मगन होती धरती ,
रातरानी जूही देख मुझको ही खिलती,
मेरी किरणों से गंगा अमृत की बहती । 4।

हूँ चमकती तो दुनिया है जन्नत लगे ,
फूलों को चूमती उनमें मधुरस पगे ,
देख मुझको मोहब्बत के अरमान जगे,
होते बेताब दिल और है नीयत डिगे ।5।

रात तनहा अकेली बड़ी स्याह होती ,
उसका आँचल बनी मैं ना जो बिखरती,
रोशनी के बिना कितनी गमगीन होती ,
न पहलू में खुशियों की मोती बिछाती। 6।

माँग मेरे सजी है सितारों की वेणी,
गीत शीतल हवा की मैं फिरती सुनी,
सेज मैं हूँ सजाती ले शबनम-मनी,
खुशियाँ सौगात लायी हूँ मैं चाँदनी।7।

Tuesday, April 3, 2012

रात करती इशारे कि महफिल उठी......




सर्द आहें तो कितनी निकलती मगर,
दिल की जलती अगन कब है इससे बुझे
शक्ल अपनी दिखे ख्वाइशें थी बहुत,
आईने की इजाजत मिली ना मुझे।1

खुद की आवाज तक तो वो सुनता नहीं,
खाक उसकी मुनादी से बस्ती  जगे।
टेढ़ी गलियों में चलने की आदत उसे,
सीधे रिश्ते उसे  रास कब से  लगे ।2

कल जो पहलू से गुजरे यूँ इक अजनबी,
आज महफिल में उनकी ही  चर्चा किये ।
कल जो नजरंदाज उनको किये हरघड़ी,
आज उनकी ही आँखों से जमकर पिये।3

कितनी मुश्किल थी वह इंतजार-ए- घड़ी,
लमहे गिनते हुये  जिंदगी यूँ कटी ।
शम्मा जलती रही चाँद ढलता रहा,
रात करती इशारे कि महफिल उठी ।4

शोर इतना था कि उनकी महफिल चली,
पर रास्ते में दिखे फख्त तन्हा अकेले।
आज वे ही चुराते नजर मुश्किलों में,
कल बढ़कर सभी बोझ कंधों पर झेले।5

कर दो उनको इशारे कि इनायत करें,
कितनी बेताब महफिल है उनके बिना।
कुछ लमहों की गुस्ताखियों के लिये ,
कौन सदियों तलक जुल्म-ए-गिनती गिना ।6।

वक्त कितने गुजारे ज़िरह में मगर,
उनकी बदहालसूरत जो भी ज़ान लेते।
जो दो घूँट पानी हलक को मिला था,
बड़ी बेबसी से वे न दम तोड़े होते ।7।