Sunday, March 18, 2012

ओटक्कुष़ळ (बाँसुरी) / जी० शंकर कुरुप


महाकवि के नाम से प्रसिद्ध महान मलयाली कवि श्री जी० शंकर कुरुप , जिनकी अद्भुत काव्यरचना ओटक्कुष़ळ (बाँसुरी)  हेतु उन्हें सन् 1965 में प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था ,की काव्यरचना को पढ़कर मन में एक अलौकिक शांति व ऊर्जा की अनुभूति होती है।

उनकी इस अद्भुत काव्यरचना के एक विशेष अंश का हिन्दी रूपांतरण यहाँ प्रस्तुत है।

ओटक्कुष़ळ (बाँसुरी)
लीला-भाव से जीवित गीतों को गाने वाले
दिशा और काल की सीमाओं से निर्बंध हे महामहिमामय !
मैं जनमा था अज्ञात-अपरिचित
कहीं मिट्टी में पड़े-पड़े नष्ट हो जाने के लिये,
किन्तु तेरी वैभवशालिनी दया ने
मुझे बना दिया बाँसुरी 
चराचर को आनन्दित करनेवाली ।
तू ने अपनी सांस की फूँक से
उत्पन्न कर दी है प्राणों की सिहरन
इस निःसार खोखली नली में ।

मन को मगन कर देने वाले 
अखिल विश्व के अनोखे गायक !
तू ही तो है जो मेरे अन्दर गीत बनकर बसा है;
अन्यथा क्या बिसात थी इस तुच्छ जड़ वस्तु की
किंचित भी कर सकती राग-आलाप
इस प्रकार हर्षोल्लास से भरकर ।

मन्द हास का मनोरम नवल-धवल फेन,
प्रेम प्रवाह की कलकल मन्द्र ध्वनि,
मानव अहंकार की उद्दाम लहरों का उछाल,
अश्रुसिक्त नेत्रों के नीले कमल,
दैन्य-दारिद्र्य के वर्षाकालीन मेघॊं की काली छाया,
सांसारिक पापों के भँवर जाल
--इन सब को साथ लिये-लिये बहती रहे

मेरे अन्दर की संगीत कल्लोलिनी यह सरिता
हे प्रभु ! 

हो सकता है कि कल यह बंशी 
मूक होकर काल की लम्बी कूड़ेदानी में गिर जाये
या यह दीमकों का आहार बन जाये, या यह 
मात्र एक चुटकी राख के रूप में परिवर्तित हो जाये ।
तब कुछ ही ऐसे होंगे जो शोक-निःश्वास लेकर
गुणों की चर्चा करेंगे;
लेकिन लोग तो प्रायः बुराइयों के ही गीत गायेंगे ।
जो भी हो, मेरा जीवन तो तेरे हाथों समर्पित होकर
सदा के लिये आनन्द-लहरियों में तरंगित हो गया,
धन्य हो गया ! 
1929
( हिंदी रूपांतरण कविता कोश के सौजन्य से)

Friday, March 16, 2012

पुनर्नवा




जीवन की यह निरंतर यात्रा,
(चलते रहना ही तो जीवन है,)

जब भी होता हूँ विश्रांत मैं,
और यह यात्रा अनुभव होती है
दुस्तर और कठिन,
अचानक पहुँचती है दृष्टि
नवकोपलों से सजे  वृक्ष पर,
जो अभी कुछ दिनों पहले ही
पतझड़ के थपेड़े से निस्पत्र,
कितना असहाय,निर्बल और लाचार
भविष्यहीन दिखता था,
मानों उसकी यात्रा का
हो अंतिम विश्राम  यह,
समय की पूर्णता को
हो गया हो प्राप्त वह।

किंतु तापमान परिवर्तित होता है,
ऋतु बदलती है,
पुनर्संचारित होता है
इस मरणासन्न वृक्ष में नवजीवन,
नयी आशा नया परिवेश बनकर ।
नयी कोपलें जन्म लेती हैं,
और यह वृक्ष पुनर्नवा हो उठता है,
नवविश्वासमयी, नवऊर्जामयी हो
इसकी यात्रा निरंतर रहती है,
इसकी प्रेरणा
मेरे जीवनयात्रा को देती है नवसंबल,
निरंतर यात्रा का है यह अद्भुत संदेश ।