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Tuesday, December 16, 2014

क्या बाकी विश्व का संकट अमरीका के निज-अस्तित्व हेतु कोई संकट और मायने नहीं रखता है ?

मेरे एक कॉलेज मित्र हैं जो विगत पंद्रह वर्षों से  अमरीका में रहते हैं । बड़े विद्वान व्यक्ति हैं , अपनी आईआईटी से इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में पीएचडी के पश्चात कुछ वर्ष अमरीकी युनिवरसीटी में प्रोफेसर रहते अध्यापन कार्य किया और विगत कुछ वर्षों से एक मुख्य इंडस्ट्री कंपनी मे आर एँड डी के मुखिया हैं । विद्युत संचालित मशीन, मोटरगाड़ियों व उपकरणों के अत्याधुनिक पावर ड्राइव अनुसंधानों व तकनीकी विकासों में उनकी महारत व विशेष अभिरुचि है । 

इसके अलावा ग्लोबल परिपेक्ष्य में उर्जा श्रोतों , विशेषकर वैकल्पिक उर्जा श्रोतों , के बदलते स्वरूप व इनके विकास के प्रति उनकी गहरी समझ व जानकारी है । सोसल मीडिया के माध्यम से उनसे लगातार बने रहते संपर्क व सानिध्य से समय समय पर उर्जा क्षेत्र में हो रहे नये अनुसंधानों व विकास की संभावनाओं और इनके आर्थिक वित्तीय पक्षों व परिणामों पर उनकी परिचर्चा द्वारा प्रायः बड़ा उपयोगी ज्ञानलाभ मिलता रहता है ।

अभी कुछ सप्ताह पूर्व से पेट्रोलियम ऑयल की कीमतों में लगातार जारी भारी गिरावट के कारणों पर उन्होंने बड़ी रोचक जानकारी दी । उनके अनुसार पेट्रोलियम ऑयल के कीमतों में भारी गिरावट के मूल कारण सप्लाई-डिमांड के सामान्य आर्थिक व मुक्त बाजार के मूल समीकरण के बजाय मूलतः जियोपॉलिटिकल हैं । उनके विचार से  यह आईएसआईएस , रूस, ईरान व कुछ अन्य देश , जो तेल के चढ़ते अंतर्राष्ट्रीय मूल्य के कारण तेल के  निर्यात द्वारा भारी मुनाफा कमा कर अपनी आर्थिक व सामरिक क्षमता को वृहत स्तर पर बढ़ाते विश्व के ऊपर अपना दबदबा व आतंक फैलाने का प्रयास कर रहे थे , उनके ऊपर आर्थिक अंकुश लगाने की यह अमरीका व अमरीकी कंपनियों की सोची समझी रणनीति है ।

मेरे मित्र के अनुसार गैसोलीन के दाम में भारी गिरावट से अमरीकी नागरिकों व उपभोक्ताओं में बहुत खुशी का वातावरण है क्योंकि गैसोलिन के मूल्यों में भारी गिरावट को बेतहासा रूप से मोटर वेहिकिल का उपयोग करने वाले अमरीकी लोगों को अपनी आमदनी में एक प्रकार से महत्वपूर्ण बढ़त व बचत दिखती है। साथ ही साथ अमरीकी मोटर निर्माता कंपनियाँ भी पेट्रोल के गिरते कीमत को अपने व्यवसाय हेतु बड़ी अपार्च्युनिटी की तरह देखती हैं  अतः अमरीका के इस रणनीति को महत्वपूर्ण व अति प्रभावशाली मोटरनिर्माता कंपनियों का भी भारी समर्थन मिलता है । 

वैसे तो यह बड़ी चौंकाने वाली व अजीबोगरीब बात लगती है कि जब  उर्जा विशेषज्ञ यह घोषणा व चेतावनी करते नही थक रहे हैं कि हमारे फॉजिल फ्यूल व पेट्रोलियम ईंधन श्रोत इनके बेतहासा दोहन के फलस्वरूप लगभग चुकने के कगार पर हैं , उनकी बची मियाद बमुश्किल अगले चार पाँच दसक है ऐसे में इनके मूल्यों में भारी गिरावट और उनके बेतहासा उपयोग को अमरीका अथवा विश्व के किसी अन्य प्रभुत्वसंपन्न देशों द्वारा और गति देना कहाँ की समझदारी है ? साथ ही साथ पेट्रोलियम उत्पादों के बेतहासा उपयोग  से  पर्यावरण को पहुँच रहे गंभीर व अपूरणीय क्षति का अलग से संकट बढ़ रहा है और यह स्वयं ही विश्व मानवता क्या हमारी संपूर्ण सृष्टि हेतु गंभीर चिंता की बात दिखती है।

परंतु विश्व के अस्तित्व पर भारी संकट की आशंका की इन बातों व गंभीर तथ्यों के प्रति अमरीका द्वारा विश्व को धता बताने व गैसोलीन के बेतहासा उपयोग को लगातार बढ़ावा के अमरीकी रणनीति को स्पष्ट करते हुये मेरे मित्र यह रोचक व निश्चय ही बाकी विश्व हेतु अति चिंताजनक यह  जानकारी देेते हैं कि अमरीका सिर्फ अपने देश व अपने नागरिकों के हित के बारे में ही सोचता है , उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अमरीकी हितसाधन के बदले बाकी विश्व को क्या और कैसी कीमत चुकानी पड़ रही है , बाकी विश्व रहे या भाड़ मे जाये बस अमरीका और अमरीकावासी मजे व सुविधा से रहें , यही अमरीका व अमरीकी अर्थव्यवस्था का सदा से मंत्र व सिद्धांत रहा है।

वैसे देखें तो किसी भी प्रभुत्व व साधनसंपन्न व्यक्ति , समाज या देश के लिये ऐसी स्वार्थ व अहंकारपरक सोच व मानसिकता कोई नयी व आश्चर्यजनक बात नहीं , उन्हें अपनी प्रभुता व सुविधा के आगे बाकी अन्य किसी की भी मौलिक से मौलिक आवश्यकता व जरूरत भी गौड़ लगती है , लोग उनकी सुविधाआपूर्ति के लिये मरे या जियें उन्हें इससे अपना कोई भी लेनादेना नहीं दिखता ।

परंतु गंभीर प्रश्न यह है कि अपने अंधे स्वार्थ व अहंकार हेतु समष्टि के बाकी हिस्से के अस्तित्व व हित व रक्षा की घोर अवलेहना व उसको दाँव पर लगाना क्या अमानवीय व घोर असहिष्णुता नहीं है ? क्या समष्टि के बाकी के विनाश में स्वयं का भी विनाश निहित नहीं होता? क्या शरीर के किसी इतर अंग की पीड़ा से मस्तिष्क या हृदय जैसे महत्वपूर्ण शरीर के भाग अप्रभावित हुये बिना रह सकते हैं ? इसका सीधा व सपाट उत्तर तो यही मिलता है कि नहीं । हमारे भारतीय शास्त्रों में विश्वबंधुत्व व विश्वसुखशांति के निम्न स्वस्ति पाठ का विधान शायद इसी गहन चिंतन व अनुभूति के मद्देनजर किया गया होगा -

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत् ।

Wednesday, June 20, 2012

रजत-पटल पर स्याह बिंदु क्यों ?



“मैं मन ही मन कामना कर रहा था कि इन (रजत गुप्ता) पर लगे सारे आरोप गलत सिद्ध हो जायें। एक व्यक्ति जो इस महान देश में अपने सपने लेकर आया, और वह महान अमरीकी सपने और उन्हे साकार कर पाने का एक अद्भुत उदाहरण रहा ,किंतु दुर्भाग्य से अंततः इनपर लगे सारे आरोपों हेतु बड़े ठोस सबूत उपलब्ध थे और हमने इनके लिये इन्हे दोषी पाया।“ यह कथन था प्रधान जूरी रिचर्ड लेप्कोस्की का जिन्होने फैसला सुनाने के पश्चात् अपनी बातचीत में मन की पीड़ा अभिव्यक्त करते हुये बताया।

इसी तरह एक अन्य जूरीसदस्य भी फैसले के बाद अपने मन का दुःख नहीं रोक पाये और उन्होंने कहा- “सच पूछिये तो मेरे अंदर एक संघर्ष चल रहा था, मैं इस अद्भुत व्यक्ति के विलक्षण जीवन के नतीजे को निर्धारित करने का प्रयास कर रहा था।“

इस तरह महान अमरीकी स्वप्न का एक नायाब उदाहरण, और कहानी की किताबों में वर्णित किसी सफल नायक सा सम्पूर्ण जीवन एक ही घटना में टूटकर बिखर और खाक में मिल गया ।

भारत में एक अति साधारण परिवार में जन्म,किशोरावस्था में असमय माता-पिता की मृत्यु व अनाथ होने की अनिश्चितता व जीवन-संघर्ष,फिर भी अपनी प्रतिभा व लगन से आई आई टी में दाखिला और 1971 में मेकैनिकल ईंजिनियरिंग की विशिष्ट योग्यता से पढ़ाई पूरी करने के उपरांत, विश्व के श्रेष्ठतम् प्रबंधन संस्थान हारवर्ड बिजनिस स्कूल से एम.बी.ए की पढ़ाई पूरी कर विश्व की एक अति श्रेष्ठ परामर्शदाता कंपनी मैकेन्जी व मैकेन्जी में नौकरी और बीस वर्ष से भी कम अवधि में कंपनी के शिखर पद ,विश्व प्रबंध निदेशक, पर नियुक्ति, इस पद पर लगातार तीन टर्म तक, वर्ष 1994 से 2003 तक कार्यरत, कंपनी प्रबंध निदेशक से सेवानिवृत्ति के उपरांत कंपनी के वरिष्ठ पार्टनर तथा विश्व के अन्य प्रतिष्ठित बैंको व कंपनियों- गोल्डमैन सैक्स,प्रॉक्टर व गैंबल इत्यादि के निदेशकमंडल में नियुक्ति, देश विदेश में अनेक प्रतिष्ठित प्रबंधन व स्वास्थ्य शिक्षा संस्थानों के स्थापना व कुशल संचालन में प्रमुख व अगुआ की भूमिका,कई निजी फंड कंपनियों के संस्थापक व मालिक, दुनिया के तमाम धर्मार्थ संस्थानों के प्रबंधन व संचालन में प्रमुख भूमिका,विश्व में वर्तमान महान हस्तियों,राजनीतिक व प्रशासनिक मुखियाओं से प्रगाढ़ मित्रता व श्रेष्ठ सभा-गोष्ठियों में प्रायः प्रमुख वक्ता व अतिथि के रूप में विश्व भर में आमंत्रित होने वाले एक अति महत्वपूर्ण व्यक्ति, भला इससे अद्भुत, कहानी की किताबों के महान नायक जैसा सफल जीवन भला और क्या हो सकता है ।

किंतु यह सब कुछ, एक महान उपलब्धियों भरा रजत-पटल सा चमकता महिमामंडित जीवन , एक स्याहमयी घटना से सदैव के लिये धूमिल व कलंकित हो गया ।यह सारी उत्कृष्ट उपलब्धियाँ एक ही क्षण में ध्वस्त हो गयीं । जो व्यक्ति संसार हेतु आदर्श व अनुकरणीय था,एक ही क्षण में कलंकित व आर्थिक दुष्कर्म का पर्याय बन गया।

मन में यह प्रश्न हथौड़े की तरह प्रहार करता है- ऐसा क्यों । आखिर रजत पटल पर स्याह बिंदु क्यों ? जो अपने जीवन की लगनशीलता,अनुशासन , संयम व धैर्य की पराकाष्ठामयी तपस्या द्वारा सफलता के शिखर पर पहुँचता है, वही व्यक्ति भला कैसे अपने एक धर्मच्युत कदम से पतित-स्वर्गदूत की भाँति अवरोहित होकर गर्त को प्राप्त हो जाता है।उसका एक क्षणिक पाप उसके आजीवन संचित पुण्य को वाष्पीभूत कर उन्हें शून्य बना देता है। क्या है जो पूर्णता की पराकाष्ठा में भी एक ऐसी अतृप्त प्यास की तरह जगता है,और सामने बहती सुर-सरिता के अमृत को त्याग पाप-चसक की सिलती बूँदों को चाट कर तालु की तृष्णा को सिंचित करने को विवश करता है ? क्या है जो निधियों बीच रहने पर भी दरिद्रता व तृष्णा की अग्नि मन में प्रज्वलित रखता है? क्या राग,द्वेष,लोभ,मोह,मद,मात्सर्य देव तुल्य मानव के अंदर भी सुसुप्त अवस्था में स्थापित रहते हैं व अनुकूल परिस्थिति पाते ही प्रदीप्त अग्नि की तरह जागृत हो जीवन के पुण्य-कुटीर को क्षणमात्र में भष्मीभूत कर देते हैं?क्या धर्म,अर्थ व काम के त्रिशरीरी स्वरूप हमारे अंदर निरंतर संधानमयी हैं ? मनुष्य के सामने यह यक्षप्रश्न निरंतर उपहासमयी स्वरूप में खड़ा है, कि कोई युधिष्ठिर तो इसका सामना करे,समाधान बताये।किंतु क्या युधिष्ठिर को भी सत्य छोड़ अर्धसत्य अपनाने पर विवश नहीं किया गया,उन्हे भी तो इस अर्धसत्य के प्रतिकार में धर्मराज के पद से अल्पच्युत होना पड़ा और स्वर्गारोहण के समय उन्हें भी दंडस्वरूप कनिष्ठा ऊंगली का कष्टमय परित्याग करना पड़ा था। तो इस माया से लिपटे जगत में अपने कर्म के प्रतिकार की अग्नि परीक्षा से तो प्रत्येक को गुजरना ही पड़ता है, वह सीता हो या कुंती।    

इन प्रश्नों के उत्तर तो अपने-अपने दृष्टिकोण को अनुसार अनेकों व इनकी समीक्षा में भी अनेकों तर्क-वितर्क हो सकते हैं, किंतु यधार्थ जीवन में यह उत्कर्ष व उत्थान के साथ नियत पतन एक अपरिहार्य व दुःखद संयोग की तरह सदैव परछाई की तरह साथ रहा है, अब चाहे इसे बिडंबना की संज्ञा दी जाय अथवा तकदीर का खेल।

मन में घुमड़ते ये प्रश्न सहसा कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हो जाते हैं-

उदित सूर्य अस्ताचल जाता,
दिवस रात्रि के अंक समाता,
धवल चाँदनी सिंचित धरती,पर
रजत पटल(चंद्रमा) पर स्याह बिंदु क्यों
?

उदभव जो करता वह गिरता,
सिंधुवाष्प वारिधि में मिलता,
निधि मिलती जो कल खो जाती,
उत्थान-पतन की चक्रगति क्यों ?

रजत पटल पर स्याह बिंदु क्यों ?