Showing posts with label चुनाव. Show all posts
Showing posts with label चुनाव. Show all posts

Thursday, August 22, 2013

कब मनायेंगे हम वोट का भी त्यौहार?

वोट माडी !


कल बंगलौर रूरल संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव था ।मेरा आवास इसी क्षेत्र के अंतर्गत है, और भाग्यवश मेरा वोटर लिस्ट में नाम दर्ज है,अतः इसबार मैंने भी मतदान किया ।ईमानदारी की बात तो यह कि मैंने अपने जीवन में यह पहली बार मतदान किया , अन्यथा इसके पूर्व या तो कभी वोटर लिस्ट में नाम ही नहीं सम्मिलित था,यदि नाम था तो वोट देने गये तो पता चला कि मेरा वोट तो पहले ही डाला जा चुका है, या मतदान के दिन कोई आकस्मिक कार्य आ गया, या किसी उच्च विभागीय अधिकारी द्वारा निर्धारित निरीक्षण अथवा मीटिंग में फँस गये, और वोट देने नहीं जा सके, इस प्रकार कोई न कोई छोटा या बड़ा कारण वोट डालने में रोड़ा बन ही जाता है और मैं अपना वोट देने से चूक जाता रहा हूँ ।

हालांकि आमलोगों में सामान्य तौर पर यह एक बहस का मुद्दा रहता है कि आखिर वोट देने का फायदा ही क्या जब प्रायः राजनेता व राजनैतिक पार्टियाँ भ्रष्ट, धर्म, जाति और समुदाय के नाम पर समाज को बाँटने और विवाद पैदा करने वाली, काम कम भाषणबाजी ज्यादा करने वाली, स्वार्थी, सत्ता लोभी इत्यादि इत्यादि हैं, हमारे राजनैतिक नेता देशहित में कम अपितु निजी सुविधा, व धनसम्पत्ति अर्जन व इसके तिकड़म में ज्यादा व्यस्त रहते हैं , और यदाकदा एकाध योग्य प्रत्याशी
होते भी हैं ,जिनसे जनता कुछ अच्छे कार्य व उन्नति की कुछ उम्मीद कर सकती है, तो ऐसे एकाकी लोगों का कोई राजनैतिक आधार ही नहीं है और जब वे चुनाव जीत ही नहीं सकते, और यदि जीत भी गये तो सत्ता में आने से रहे, तो ऐसे प्रभावहीन प्रत्याशी पर अपना वोट जाया करने का फायदा ही क्या?

इस प्रकार एक मतदाता के मन में इस चुनावी प्रक्रिया के प्रति इतनी नकारात्मक व कुंठादायी तस्वीर बन जाती है कि मतदान करने हेतु उसके हृदय में किसी भी प्रकार का उत्साह बचता ही नहीं, और नतीजतन स्वतंत्र सोच के अधिकांश मतदाता चुनाव को मात्र बकवास और ढोंग समझते इससे उदासीन होकर मतदान करते ही नहीं,और जो लोग मतदान में हिस्सा लेते भी हैं वे प्रायः किसी न किसी जाति, धर्म, समुदाय, गुट में आस्था रखने व उससे संबंधित पार्टी के प्रत्याशी को ही वोट देने में विश्वास रखते हैं, न कि निजी विवेक व अपनी स्वतंत्र सोच पर।यहीं कारण है कि संसदीय व एसेंबली जैसे महत्वपूर्ण चुनाव, जिनसे हमारे देश व राज्य की , और सच पूछें तो अपरोक्ष रूप से हमारी,आम जनता की, स्वयं की अगले पाँच वर्ष की किस्मत निर्धारित होती है, हमारा और हमारे बच्चों का भविष्य, रोजी रोजगार के अवसर इन पर निर्भर करता है, को भी आधी से ज्यादा जनता इसे गौड़ व फालतू समझते मतदान में भाग ही नहीं लेते ,और इस प्रकार देश में कुल औसत मतदान बामुश्किल पचास प्रतिशत रहता है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि लोकतंत्रीय प्रणाली में जहाँ सरकार और सत्ता केवल और केवल चुनाव के रास्ते व इस प्रक्रिया से ही निकलती है, वहाँ यदि हम वाकई में अच्छी व कार्यकुशल सरकार व प्रशासन की आकांक्षा रखते हैं ,और अपने देश व समाज की उन्नति हेतु संजीदा हैं,वर्तमान में किसी प्रकार का बदलाव व सुधार करना चाहते हैं, तो चुनाव प्रक्रिया को स्वीकार करने व इसमें भागीदारी करने के अतिरिक्त नागरिकों के पास विकल्प ही क्या है । ऐसे में हमारा ,आम जनता का, चुनाव प्रकृया की नकारात्मक स्थिति व वातावरण के कारण, इसके प्रति उदासीनता व इससे हमारे पलायन द्वारा भला कौन सा समाधान निकलने वाला है, बल्कि सच कहें तो हमारा यह पलायनवादी व्यवहार वैसा ही है जैसे बिल्ली को अपनी ओर आक्रमण करते देख कबूतर अपनी आँख मूंद और सिर नीचे गाड़ निष्क्रिय बैठ जाता है, और नतीजतन बिल्ली बड़ी सहजता से उसे अपना शिकार बना लेती है । क्या हम भारतीय भी मतदान से पलायन करके इसी अबोध कबूतर की भाँति इन धूर्त व कुटिल राजनैतिक व धार्मिक नेताओं के शिकार नहीं बन रहे हैं?
 
विषय से भटकने हेतु पाठकगण मुझे क्षमा करेंगे किंतु यहाँ मैं अपने भारतीय जनमानस का विभिन्न तीज त्यौहारों के प्रति तीव्र , सच कहें तो जुनून के स्तर तक, आकर्षण की चर्चा करना चाहूंगा ।अभी हाल ही में मैं अवकाश पर उत्तर प्रदेश अपने पैतृक स्थान गया, जहाँ कार्य वश विभिन्न स्थानों मीरजापुर, वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ इत्यादि जाना हुआ, यह देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि वहाँ सभी मुख्य सड़क
ें,राजमार्ग, रास्ते, गली, कूचे गेरुआ वस्त्र धारी जनशैलाब से अटे पड़े हैं, बताया गया कि यह सब काँवरिया हैं जो श्रावण माह में काँवर में गंगा जल लेकर प्रमुख शिवमंदिरों की पैदल यात्रा करते हैं, कहीं कहीं तो ये पचास किलोमीटर से लेकर दो सौ किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करते हैं,सड़कों,राष्ट्रीय राजमार्गों, राजपथों, शहर के अंदर आवागमन की मुख्य सड़कों पर इनके उमड़ते शैलाब से सभी तरह का यातायात अवरुद्ध हो जाता है, इस धार्मिक जनशैलाब के अनियंत्रित व अराजक , व कभी कभी तो अप्रत्याशित रूप से हिंसक, व्यवहार से पुलिस और प्रशासन के सामने कानून व्यवस्था की भारी समस्या उत्पन्न हो जाती है, यहाँ तक कि मुख्य राष्ट्रीय राजमार्गों का एक साइड वाहनों के यातायात को अस्थाई रूप से रोककर इन काँवरियों के स्वच्छंद उपयोग हेतु छोड़ दिया गया है, इस प्रकार लगभग पूरे प्रदेश में इन काँवरियों के कारण सारा यातायात व कार्य रोजगार विगत एक माह से ठप सा हो गया है । इसी प्रकार बंगलौर में देखता हूँ कि विगत दो दिन रक्षा बंधन के त्यौहार के सिलसिले में बाजार और सड़कें खरीदारी करने वालों की भारी तादाद व उनकी गाड़ियों से अटे पड़े थे ।मिठाई की दुकान पर तो रेलवे के टिकट रिजर्वेशन सेंटर से भी ज्यादा भीड़ दिख रही थी ।

यह तो मात्र कुछ उदाहरण हैं, हमारे देश में कोई भी त्यौहार ले लें, क्या दशहरा क्या ईद, क्या दीवाली क्या बकरीद,क्या पोंगल क्या गणपति पूजा, क्या नमाज क्या मंदिर पूजा,क्या उत्तर क्या दक्षिण , हमारे शहरों के सभी प्रमुख मार्ग व रास्ते जन शैलाब से अटे रहते हैं, क्या बच्चे क्या बूढ़े ,क्या महिला क्या पुरुष सबमें इन अवसरों, त्यौहारों पर जबर्दस्त उत्साह और सबकी अनिवार्य भागीदारी देखने को मिलती है, प्रायः तो इन अवसरों, त्यौहारों पर कार्य और स्कूल में छुट्टी भी रहती है और इस प्रकार बिना किसी अवरोध के सभी इन्हें उल्लास से मनाते हैं, यदि किसी त्यौहार पर छुट्टी नहीं भी है, तो भी लोग काम पर न जाने बल्कि अपना त्यौहार उत्सव मनाने हेतु स्वतंत्र होते हैं ।

प्रश्न यह उठता है कि जिस देश के नागरिक अपने धार्मिक व सामाजिक तीज-त्यौहार के प्रति इतने जागरूक, इतने उत्साही हैं, भला वही नागरिक मतदान जैसे अपने मौलिक दायित्व, वह मतदान जिसके परिणाम पर देश का साथ ही साथ उनका निजी व परिवार का भी भविष्य निर्भर करता है, के प्रति इतने उदासीन क्यों रहते है?


लोकतंत्र की अच्छाइयों, बुराइयों, भारत के संदर्भ में लोकतंत्र की सार्थकता व इसके हानिलाभ पर बहस और विवाद चर्चा का एक पक्ष हो सकता है, किंतु इस स्थापित सत्य से किसी की भी असहमति नहीं हो सकती कि अंततः लोकतंत्र
ीय प्रणाली ही आम नागरिक की व्यक्तिगत आजादी व उसके मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी दे सकती है, अन्यथा तो भूत से लेकर वर्तमान तक पूरे विश्व में कितने ही प्रमाण हैं कि लोकतंत्र के इतर कोई भी अन्य प्रणाली की परिणति अंततः नागरिकों की आजादी पर कुठाराघात और उनके मौलिक अधिकारों के हनन में ही होती है।

इस प्रकार लोक तंत्र की अपरिहार्यता को ध्यान में रखते इसकी रक्षा व इसको जनहित में प्रभावी बनाने हेतु जनजन की मतदान में भागीदारी भी अपरिहार्य है ।लोकतंत्र की रक्षा व इसके प्रभावी बनने हेतु प्रत्येक नागरिक द्वारा मतदान उसके किसी धार्मिक पर्व व त्यौहार से किसी भी रूप में कम नहीं होना चाहिए ।हमारा भारतीय जनमानस अपने धार्मिक तीज त्यौहारों के प्रति जिस प्रकार जागरूक, सक्रिय व उत्साहित रहता है व इन्हें बड़े जोशखरोश के साथ मनाता है, वहीं जोश और खरोश उन्हें मतदान के अवसर पर भी दिखाना होगा, तभी सार्थक बदलाव संभव, तभी राजनैतिक व धार्मिक ठेकेदारों से हमारी आजादी भी संभव है । 


अब बस यही इंतजार व कामना है कि कब मनायेंगे हम वोट का भी त्यौहार?

Tuesday, July 16, 2013

सुधार व बदलाव के पहल की जिम्मेदारी – व्यक्ति की, नेता की अथवा समाज की ?




फेसबुक पर मेरे एक मित्र हैं संजीव सिंह जी जो बिहार से हैं व दिल्ली में रहते हैं । संजीव जी के लेख व विचार चिंतनपूर्ण, गम्भीर व  अर्थपूर्ण होते है। जैसा की हमारे देश की वर्तमान राजनैतिक व सामाजिक स्थिति व इनमें निहित मूल्यों में निरंतर गिरावट हो रही है , जिससे हर आम आदमी व उसका जीवन प्रभावित हो रहा  है और इससे हर विवेकशील व्यक्ति चिंतित है, संजीव जी ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं कि किस प्रकार चुनाव आने की बयार के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सफेदपोश नेता भी गाँव की ओर मँडराने व अपने लोक लुभावने नारों व वादों से वोटरों को अपने पक्ष में प्रभावित  करने हेतु प्रयासरत हो गये हैं । 

हालाँकि मैं इस विषय पर ज्यादा कुछ लिखने अथवा कहने की परिस्थिति व कुशलता नहीं रखता , और इस विषय पर किसी प्रकार की चर्चा, जो कि फेसबुक पर आजकल बहुत जोरशोर पर है, में किसी भी प्रकार की सक्रियता नहीं रखता परंतु संजीव जी के दिये विचार के परिप्रेक्ष्य में मैं भी अपना विचार अभिव्यक्त करने से स्वयं को नहीं रोक पाया। संजीव जी व मेरे बीच इस विषय में हुए पूरे वार्तालाप का अंश यहाँ प्रस्तुत है -

संजीव सिंहः सफेद पजामा और कुर्ता पहने नेता अब गाँव में दिखने लगे है। दूर से उड़ती धूल दिखे तो जरूरी नहीं गाँव वाले उसे अब बबंडर समझे। वह जान गए है कोई नेता की गाड़ी होगी। चुनाब के बादल घिरने शुरू हो गए है। नेता आश्वासनो से भरा थैला पकड़े गाँव में धमकने को है। चाटुकार अपनी जुबान को मीठे शब्दों से भर लें। राजनीतिक मर्यादा और देश की हालात पर अब गंभीर भाषण होगी। भ्रष्टाचार,सांप्रदायिकता और मँहगाई डाइन पर तनातनी होगी। अब गाँव से दूर नहीं रह गए है। बस वे आने वाले ही है। हमारे गंगौर में तो आने भी लगे है।
कुँवर बेचैन का एक मशहूर गीत है, उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से। जितनी दूर नयन से सपना, जितनी दूर अधर से हँसना, जितनी दूर किनारा, टूटी नाव से। उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से। मेरे ख्याल से देश के नेता अब उतनी ही दूर रह गए है। जितनी दूर भीड़ से धक्का, जितनी दूर धोनी से छक्का। जितनी दूर यूपीए अपनी झूठ से, उतनी दूर एनडीए अपनी फूट से। जितनी दूर दलाल खड़ा है 2 जी से, जितनी दूर खड़ी है कैटरिना, सलमान से, जितनी दूर माईक से भाषण, उतनी दूर नेता तुम मेरे गाँव से।

मैं- वैसे देखा जाये तो राजनीतिक नेता हमारे समाज के मानसपुत्र ही हैं ।जैसी समाज की मानसिकता व सोच होगी वही तो नेतृत्व इसे मिलेगा, जो हम बोते हैं वही तो काटते हैं ।अभी देखिए चुनाव के पहले सब मँहगाई, भ्रष्टाचार, खराब कानूनव्यस्था, रुका विकास जैसी समस्याओं पर कितना भाषण दे रहे हैं पर जब असली चुनाव की बारी आयेगी तो अधिकांशतः तो हम वोट ही नहीं देंगे या देंगे भी तो उसका मुख्य आधार हमारी जाति या हमारा मजहब होता है, न कि विकास या अच्छी सरकार, विशेष कर उत्तरप्रदेश व बिहार के परिप्रेक्ष्य में तो यह सत्य शत्प्रतिशत् लागू होता है । राजनीतिक व्यवस्था को छोड़ भी दें तो हमारा निजी व सामाजिक आचरण भी इन मसलों पर क्या कम पाखंड पूर्ण है । सच कहने- करने व अपने सुविधाजनक कहने-करने में बड़ा ही फर्क होता है ।मुझे तो लगता है हमारी समस्या की जड़ में राजनीति व नेता -परेता  नहीं अपितु मूलतः हमारा स्वयं का  व हमारे समाज का पाखंडपूर्ण आचरण व व्यवहार है ।हर व्यक्ति व समाज आखिर वही  तो वापस पाता है जिसका वह हकदार होता है , और हमारा हक वही तो होगा जैसा हमारा कर्म व आचरण होगा। बोवे पेड़ बबूल का आम कहाँ से होये ?

संजीव सिंह- आप सही कह रहे है।मूलत: समस्याओं की जड़ यही है। अगर समस्या सामाजिक है तो उसका हल भी वहीं होगा।

मैं- मसला यह है कि व्यक्ति से ही समाज बनता है ।हालाँकि व्यक्ति का स्वयं का आचरण कमोवेश समाज की दशा व पर्यावरण के अनुरूप अवश्य निर्धारित होता है , परंतु समाज के अति व्यापक व सामूहिक होने के कारण उसकी पैमाइश व अकाउन्टबिलिटी मुश्किल है, बनिस्बत व्यक्ति के स्तर पर ही सही सोच, सही निर्णय व सही आचरण से स्थिति के बदलाव व सुधार में जाती तौर पर फर्क लाया जा सकता है, ऐसी मेरी समझ व मेरा मानना है ।

संजीव सिंह- दरअसल यह पूरी की पूरी समस्या ही सामाजिक है। व्यवस्थागत ढ़ांचा कमजोर हुआ है।सामाजिक कानून अपना काम करना बंद कर दिया है। डंडे से तो,सामाजिक कानून बहाल होने से रहा। छोटी छोटी मर्यादाएँ भंग हुई जा रही है । वैकल्पिक सोच और आधार का अकाल है। अपनी सहूलियत और सुविधा प्राथमिकता में आ गई। हम जवाब राजनीति में ढ़ूढ़ते है।समस्या जबकि सामाजिक है।फिर परिणाम से क्या उम्मीद। विशेषज्ञों की अपनी सीमाएँ है।हर संदर्भ में तकनीकि जानकारी मांग नहीं सकते।ना ही यह सामाधान है। तकनीकी से विज्ञान चलता है समाज नहीं।अगर होता तो सरकारी हर काम आज दुरूस्त चलता। तकनीकि कमेटी और प्रशासनिक तौर पर सक्षम लोग वहाँ बैठे है। दरअसल स्वार्थ और सुविधा मूल समझ का हिस्सा बन गया है। मुझे आपकी बातों के आलावे यह कारण प्रमुख लगते है।

मैं- स्वार्थ व सुविधापरता व्यक्तिगत स्तर पर शुरू होकर संकलित स्वरूप में ही एक सामाजिक समस्या बन जाती है ।चूँकि समाज की दशा व सोच व्यक्ति हेतु प्रेरणा श्रोत (अच्छी प्रेरणा अथवा बुरी प्रेरणा भी ) का कार्य करते है अतः समाज में व्याप्त स्वार्थपरता व सुविधापरता निश्चय ही व्यक्ति हेतु उत्प्रेरक का कार्य करती है, कह सकते हैं कि व्यक्ति व समाज दोनों ही इस दुष्चक्र के शिकार हैं ।चूँकि समाधान की जड़ें सदैव इकाई में निहित होती है अतः व्यक्ति के समाज की इकाई होने के नाते सामाजिक बुराइयों का निराकरण व समाधान भी तकनीकी तौर पर व्यक्ति के स्तर पर ही निहित है ।इस प्रकार हम सभी ही व्यक्तिगत स्तर पर इस परिस्थिति के निवारण व बदलाव हेतु जिम्मेदार व उत्तरदायी हैं, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है ।

संजीव जी अथवा आप पाठकग मेरे इस विचार से कितना सहमत होंगे मुझे नहीं मालूम परंतु मेरी समझ में किसी भी क्षेत्र में ,चाहे वह प्रशासनिक क्षेत्र हो या राजनीतिक क्षेत्र हो या  सामाजिक क्षेत्र हो, किसी सुधार  की पहल प्रथमतया व्यक्तिगत स्तर पर, खासतौर उन व्यक्तियों द्वारा जो अधिकार संपन्न, आर्थिक राजनैतिक प्रशासनिक अथवा सामाजिक  , हैं व संबंधित क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका में हैं, होनी चाहिये । सुधार की पहल मात्र लफ्फेबाजी व भाषण तक सामित न होकर व्यक्ति के कर्म,आचरण व व्यवहार में भी परिलक्षित होनी चाहिये । कोई भी सुधार व बदलाव त्याग व कठिन प्रयास से संभव होता न कि कोरे भाषणों व नारेबाजी से, जो कि दुर्भाग्य से आज न सिर्फ राजनीतिक  पार्टियों का शगल है अपितु सोशल मीडिया व पत्रकारिता जगत भी कमोवेश इसी ढर्रे पर ही चल रहे हैं।