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Friday, June 15, 2012

जनसुविधाओं में शारीरिक रूप से अक्षमजनों के सहूलियत की घोर उपेक्षा।



दूरदर्शन पर हाल ही में शुरू हुआ आमिर खान का साप्ताहिक प्रोग्राम सत्यमेय जयते काफी प्रभावकारी ज्वलंत सामाजिक यथार्थ मुद्दों पर आधारित हैं।यह प्रोग्राम देखकर आपका मन बिना प्रभावित हुये नहीं रह सकता। तेरह कड़ियों वाले इस साप्ताहिक टीवी प्रोग्राम में प्रत्येक कड़ी एक नये गंभीर सामाजिक मुद्दे पर आधारित है।

विगत रविवार के नये इपिसोड में उन्होंने शारीरिक रूप से अक्षम व विकलांग व्यक्तियों को सामाजिक,मानसिक व्यावहारिक स्तर पर होने वाली अनावश्यक ,पर दुर्भाग्य से कटु-यथार्थ,कठिनाइयों पर प्रभावकारी रूप से प्रकाश डाला है।घर से लेकर सामाजिक परिवेश, घर-परिवार,स्कूल, कॉलेज, कार्यालय-कार्यस्थल तक सभी जगह शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों  द्वारा सामना की जाने वाली मानसिक व व्यवहारिक पीड़ा व कठिनाइयों को इस प्रोग्राम ने अति प्रभावकारी व जीवंत तरीके से दर्शाया है।

प्रोग्राम में शामिल शारीरिक रुप से अक्षम कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के अतिरिक्त, उनके परिवारजनों, संबंधित स्कूल के प्रिंसिपलों द्वारा इस समस्या व इससे संबधित मूलगत कारणों को बड़े प्रभावी रूप में समझाने का प्रयाश किया गया कि किस तरह हमारे देश व समाज में शारीरिक विकलांगता को मात्र एक शारीरिक अक्षमता के रूप में स्वीकार करते हुये उसके समाधान  हेतु सार्थक कदम उठाने के बजाय इसे संबंधित व्यक्ति या परिवार हेतु अभिशाप व दुर्भाग्य समझते हुये उनके प्रति समाज द्वारा व्यवहार में या तो लाचारी व दयाभाव दर्शाया जाता है, अथवा उनके प्रति उपेक्षा व अपमान का भाव दिखाते है।यह अति दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

प्रोग्राम में शामिल कुछ ऐसे खास व्यक्ति थे जो शारीरिक रूप से जरूर अक्षम रहे हैं  किंतु अपने मनोबल,धैर्य व जीवन के प्रति अदम्य उत्साह की शक्ति से जीवन में उन्होने वह सफलता अर्जित की जो एक सर्वशारीरिकक्षमता व सुविधा सम्पन्न  व्यक्ति के लिये भी सामान्यतया संभव प्रतीत नहीं होता। उनके द्वारा अपने स्वयं के जीवन के अनुभव व अपने प्रयाश द्वारा सामने आयी कठिनाइयों का दृढ़ संकल्प से सामना निश्चय ही आँख खोलने वाला व अति प्रेरणादायी है।

वैसे चर्चा के स्तर पर तो यह विषय विगत कुछ वर्षों से काफी महत्वपूर्ण रहा है किंतु जमीनी स्तर पर तो कुछ विशेष उपलब्धि नजर नहीं आती।जैसा आमिर खान के प्रोग्राम में दिखाया गया कि चाहे हमारे फुटपाथ हो,या कोई सरकारी कार्यालय,चाहे पोष्टऑफिस हो या अस्पताल, चाहे कोई धार्मिक स्थान हो या रेलवे स्टेशन ,चाहे स्कूल हों या विश्वविद्यालय,प्राय: सभी जन-स्थान एक विकलांग व्यक्ति के उपयोग व सहूलियत के दृष्टिकोण से सर्वथा असहज असुविधाजनक हैं इनमें सुधार हेतु किसी सार्थक प्रयाश का  सर्वत्र अभाव दिखता है। ( हालाँकि दिल्ली मेट्रो रेल जैसी कुछ नयी जनसुविधाये निश्चय ही इस समस्या के प्रति संवेदनशील रही हैं व मेट्रो रेल स्टेशनों व मेट्रो रेल कार में संबंधित सुविधाओं,जैसे इलेवेटर्स,इस्केलेटर्स इत्यादि, को प्रदान करने का विशेष ध्यान रखा है और हमारे देश में इस तरह की सार्थक शुरूआत निश्चय ही अति प्रशंसनीय है। )

यदि हम विकसित देशों , विशेषकर पश्चिमी अन्य विकसित देशों- जैसे यूरोप के देश,अमरीका या सिंगापुर जापान में उपलब्ध जनसुविधाओं में शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों की सहूलियत व सुविधा के स्तर से तुलना करें तो अपने देश की जनसुविधाओ की उपेक्षापूर्ण व संवेदनहीन दशा आत्मग्लानि अपराधबोध का भाव पैदा करती हैं। बड़े शहरों की बात दूर,वहाँ के छोटे कस्बे भी इन सुविधाओं के मामले में हमारे मेट्रोपोलिटन शहरों से भी कहीं बेहतर अधिक मानवीय हैं। सड़क के फुटपाथ,बस स्टॉप,जन शौचालय,स्कूल,कॉलेज,विश्वविद्यालयों,सरकारी या प्राइवेट सभी कार्यस्थल, व इनकी पार्किंग, प्रवेश द्वार ,दरवाजे इत्यादि इसका ध्यान रखते हुये बनाये गयें हैं कि एक व्हील चेयर में बेठा व्यक्ति,जो स्वयं उठने चलने-फिरने से लाचार है, सुगमता से बिना किसी तरह की असहायता लाचारी का अनुभव किये कहीं भी जा सके अपनी आवश्यक जरूरतें पूरी कर सके।

जब मैं अपनी पढ़ाई के सिलसिले में कुछ अवधि के लिये यू.यस. में था तो वहाँ इस संदर्भ में एक दो वाकयों को देखकर मन बड़ा प्रभावित हुआ। एक दिन मैं अपने एक सहपाठी मित्र के साथ विश्वविद्यालय की कार-पार्किंग एरिया से गुजरते हुये अपनी कक्षा की ओर जा रहा था कि अपनी कार पार्क कर उससे उतरने का प्रयाश करतीं एक बुजुर्ग महिला की ओर दृष्टि गयी। वे काफी बुजुर्ग थीं शायद घुटनों की तकलीफ के कारण वाकिंग स्टिक की सहायता से ही खड़ी हो पाती थीं,इस कारण उन्हे कार से उतरने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी।औपचारिकतावश हम उनका अभिवादन करते उनकी सहायता हेतु कार के निकट आये।वे मुस्कराते हुये अभिवादन का जबाब देते बड़ी बेफिक्री से बिना हमारी सहायता लिये कार से उतरीं और फिर कार के दूसरे साइड का दरवाजा खोलकर अपनी सहयात्री एक अति बुजुर्ग महिला जो व्हील चेयर में थी की कार से उतरने में सहायता करने लगीं। उम्र के हिसाब से निश्चय ही दोनों महिला माँ-बेटी या समकक्ष रही होंगी।कार से उतरकर दोनों बुजुर्गमहिला बड़े ही आत्मविश्वास चेहरे पर स्मितभाव के साथ विश्वविद्यालय भवन के अंदर प्रस्थान कीं। हम दोनों आश्चर्य से यह दृश्य देखते रहे।यह निश्चय ही हमारे लिये अद्भुत अकल्पनीय था , जहाँ बुजुर्गों को मात्र लाचारी असहाय रूप में देखने का हमें अभ्यास है।

वहाँ विश्वविद्यालय भवन के भारी-भरकम प्रवेशद्वार से लेकर सभी दरवाजे कारिडोर के रास्ते इस सुविधा के साथ बने हैं कि व्हीलचेयर पर बैठा बुजुर्ग व्यक्ति भी बिना किसी अन्य सहायता के स्वयं ही सुगमता से, बिना किसी का सहायता के, जा सके।सभी प्रसाधन स्थान भी इन सुविधाओं को ध्यान में रखते हुये बनाये गये हैं।सबसे प्रभावित करने वाली बात तो वहाँ के पैदलयात्री पथ(Pedestrian Path),बस-स्टैंड जनपरिवहन बसों की प्रदान सुविधायें हैं।वहाँ के फुटपाथ इस सुविधा के साथ हैं कि  व्हील चेयर पर बैठा व्यक्ति भी अकेले बिना किसी सहायता के -जा सके सुगमता से सड़क पार कर सके।सभी बस स्टैंड पर व्हील चेयर पर बैठे व्यक्ति हेतु निर्धारित मार्क्ड जगह है ।बस के रुकने पर धक्कमधुक्की होने के बजाय सर्वप्रथम व्हीलचेयर अथवा अन्य विकलांग व्यक्तियों का प्रवेश होता है।व्हीलचेयर सहित व्यक्ति के प्रवेश हेतु बस-दरवाजों में विशेष प्रकार के हाइड्रॉलिक लिफ्टर लगे हैं जिनकी सहायता से व्यक्ति व्हीलचेयर में बैठे ही बस के अंदर सुरक्षित बिना असुविधा के पहुँच पाता है।बस ड्राइवर स्वयं उठकर व्हीलचेयर सहित व्यक्ति को निर्धारित सीट तक पहुँचने सीटबेल्ट लगाने में सहायता करता है।इसी तरह की सहायता विकलांग यात्री को बस से उतरने में भी मिलती है।इस तरह सभी मूलभूत सुविधाओं के निर्माण करते समय इन छोटी-छोटी बातों   आम-नागरिकों,विशेषकर  शारीरिक अक्षमता वाले व्यक्तियों, के सहूलियत को ध्यान में रखते हैं।

यदि हम वास्तव में मानवता सभ्यता की बात करते हैं, तो यथार्थ में तो किसी देश में मानवीय मूल्यों,संवेदनाओं सभ्यता के अनुपालन के सच्चे मापदंड तो हमारी जनसुविधायें व इनकी आमजन की आवश्यकता के प्रति संवेदनशीलता ही है ।अत: हम मानवीय संवेदनाओं पर चाहे कितनी ही बढ़चढ़ कर बातें करें,भाषण दें,किंतु जमीनी स्तर पर हमारी जनसुविधाओं में इन पहलुओं की घोर उपेक्षा हमारी मानवीय मूल्यों संवेदनाओं के प्रति, सामाजिक स्तर पर भी और देश के स्तर पर भी, घोर उपेक्षा का भाव दर्शाती है हमारी सभ्यता संस्कार के उदार-पक्ष की ओर प्रश्नचिह्न ही खड़ा करती हैं।