Saturday, April 7, 2012

Innovative Minds and Entrepreneurship (नवाचार व उद्यमशीलता) - पार्ट 1



Innovation यानि नवाचार आजकल प्रबंधन की बोलचाल की भाषा में प्रायः उपयोग में आने वाला शब्द है । एक रिपोर्ट के अनुसार तो विगत वर्षों में प्रबंधन वृत्त क्षेत्र में यह सबसे अधिक उपयोग में आने वाला शब्द रहा है ।

वैसे तो अंग्रेजी शब्दावली के अनुसार Innovation शब्द का शाब्दिक अर्थ नवीनता से जुड़े अर्थ में अनेक निम्न शब्द जैसे- नवीनता ,नवीनीकरण ,नवपरिवर्तन,नयापन ,नवोत्थान ,नवोन्मेष ,नई खोज ,नई पद्धति इत्यादि हैं, किंतु मेरी समझ से हिंदी भाषा में इसके लिये एक अति सार्थक शब्द लगता है – नवाचार और मैंने अपने इस लेख में इसी शब्द का प्रयोग किया है ।

नवाचार के संबंध में मुझे एक अति प्रासंगिक कथन महाभारत ग्रंथ का निम्नलिखित श्लोक लगता है-

क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति,

विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।


नासंपृष्टो व्यपयुंक्ते परार्थे


तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥

यह कथन विदुर, जो रिश्ते में धृतराष्ट्र के भाई व उनके नीतिमंत्री थे, ने धृतराष्ट्र को नीति की व्याख्या करते हुये एक बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण व चरित्र के विश्लेषण में बताया था , जिसका भावार्थ इस प्रकार है-

एक बुद्धिमान व्यक्ति  की  समझ अति तीव्र, वह दूसरों के बात व विचार को ध्यान से व धैर्य से सुनता है,  वह उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही अपनी समझ व धारणा बनाता है, न कि मात्र मनगढ़ंत स्वेच्छा द्वारा , वह दूसरे के काम व जिम्मेदारी में तब तक टाँग नहीं अड़ाता, जब तक उसे कहा न जाय अथवा उसकी नितांत आवश्यकता न हो, बुद्धिमान व्यक्ति के यह प्रधान लक्षण होते हैं ।  

इसपर तो हम सब ही सहमत होंगे कि अस्सी के दसक के उत्तरार्ध अथवा नब्बे के दसक के पूर्वार्ध में भारत में इन्फोसिस, विप्रो और टी.सी.यस. जैसी सूचना तकनीकि कम्पनियों की स्थापना व उनके द्वारा अपनायी गयी व्यवसायिक पद्धति व कार्यप्रणाली न सिर्फ भारत बल्कि अंतर्राष्ट्रीय उद्योग जगत में भी नवाचार की अद्भुत उदाहरण थी और उनके इस नवोन्मुख व्यावसायिक व तकनीकि प्रणाली के सोच व अमल ने संपूर्ण विश्व व्यवसाय जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया।यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि  वर्तमान  इक्कीसवीं शताब्दी के अति आधुनिक सूचना तकनीकी प्रणाली से समृद्ध जिस विश्व में हम रह रहे हैं, उसमें इन कंपनियों की अपनायी नवीन सोच व कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

इन कंपनियों के संस्थापको व अगुआ,नेतृत्व-कर्ताओं- श्री नारायणमूर्ति, अजिम प्रेमजी एवं अन्य, के प्रबंधन सिद्धांत, कौशल व रणनाति का विश्लेषण करें तो हमें मिलेगा कि उपरोक्त नीति श्लोक में वर्णित सभी प्रधान गुण इन महानुभावाओं में नैसर्गिक रूप से व कूट-कूट कर भरे थे । आज भी , भारत में अथवा विश्व में कहीं भी, जो नयी-नयी कंम्पनियाँ नवाचारपूर्ण व्यवसायिक तौर तरीकों के साथ उभर रही हैं व सफलता के नये आयाम स्थापित कर रही हैं , उनके नेतृत्व व प्रबंधन कर्ताओं में इन्ही प्रधान गुणों की प्रधानता व महत्व है।

इसतरह, मेरे विचार से नवाचार का तात्पर्य इन्ही बुद्धिमत्तापूर्ण गुणधर्मों को अपने कर्मक्षेत्र में पूरी ईमानदारी व शिद्दत  से अपनाने से है । कुछ अति लोकप्रिय व सफल मुख्य कार्य प्रबंधक जैसे श्री ई श्रीधरन, पूर्व मुख्य कार्य निदेशक दिल्ली मेट्रों रेल कारपोरेसन , श्री यन. सिवसैलम, मुख्य कार्य निदेशक बंगलोर मेट्रों रेल कारपोरेसन, जिनके साथ मुझे अपने प्रोफेसनल कैरियर में सन्निकट से कार्य करने का अवसर हुआ, के कार्यप्रणाली व नेतृत्व शैली की मैं समीक्षा करता हूँ तो उनके नेतृत्व व प्रबंधन नीति व प्रणाली में इन्ही बुद्धिमत्तापूर्ण गुणों की ही प्रधानता देखता हूँ ।

तो कह सकते हैं कि उच्चकोटि की उद्यमशीलता व व्यवसायिक मानदंडों के अनुरूप उपलब्धि व इनके नये आयामों की स्थापना नवाचार पूर्ण गुणधर्मों के ईमानदारी से अनुपालन द्वारा सर्वथा संभव है , और इन नवाचारों की उपलब्धि हेतु आवश्यक है नीति अनुरुप बुद्धिमत्तापूर्ण कुशल व सक्षम प्रबंधन व  नेतृत्व , जो खुले मस्तिष्क, सहज विवेक,टीम व सहकर्मियों के साथ असीम धैर्य व विश्वास के गुणधर्मों पर आधारित होता है ।

हमारे सरकारी व सार्वजनिक सेवा क्षेत्र में संलग्न विभाग, जिनकी कार्यकुशलता , दक्षता, व उनकी व्यवसायिक व्यवहार्यता ( Viability) पर प्रायः प्रश्नचिह्न उठते रहे हैं , और आज ये विभाग इन मोर्चों पर कठिन चुनौतियों व अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं, उनके नेतृत्व व प्रबंधन-कर्ताओं को इन नवाचार व इसके आवश्यक गुणधर्मों के ईमानदारी व सही अर्थों में अनुपालन हेतु गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है ।     

खुशियाँ सौगात लायी हूँ मैं चाँदनी।



एक दिन चाँदनी रास्ते में मिली ,
पास आकर यह मुझसे कहने लगी ,
मैं आती हूँ अक्सर तुम्हारी गली,
हूँ हैरान  तुमसे कभी ना  मिली ।1।

बातें उसकी असर यूँ कि जादू की जैसा
मैं खड़ा देखता उसको ठिठका ठगा सा,
ऐसी उजली निगाहें मन हुआ बावला सा,
पूछ बैठा पता क्या ठिकाना और कैसा ।2।

बोली यूँ जैसे होठों पे मोती खिले-
शाम मुझको बुलाती जो सूरज ढले,
चाँद मेरा है घर वहीं से सवारी चले,
बाहें खोले जमीं से मैं मिलती गले।3।

मेरे चाँदी के रथ से हैं परियाँ उतरती,
नाचतीं मुस्कराती, मगन होती धरती ,
रातरानी जूही देख मुझको ही खिलती,
मेरी किरणों से गंगा अमृत की बहती । 4।

हूँ चमकती तो दुनिया है जन्नत लगे ,
फूलों को चूमती उनमें मधुरस पगे ,
देख मुझको मोहब्बत के अरमान जगे,
होते बेताब दिल और है नीयत डिगे ।5।

रात तनहा अकेली बड़ी स्याह होती ,
उसका आँचल बनी मैं ना जो बिखरती,
रोशनी के बिना कितनी गमगीन होती ,
न पहलू में खुशियों की मोती बिछाती। 6।

माँग मेरे सजी है सितारों की वेणी,
गीत शीतल हवा की मैं फिरती सुनी,
सेज मैं हूँ सजाती ले शबनम-मनी,
खुशियाँ सौगात लायी हूँ मैं चाँदनी।7।

Thursday, April 5, 2012

आज रहते वही कितने तन्हा अकेले ।


(मेरी यह रचना, जो मेरे ब्लॉग की 150वीं पोस्ट भी है, उम्र के पड़ाव पर तनहाई का दर्द सह रहे बुजुर्गों को समर्पित है । शायद इस नज़्म के कुछ अल्फाज अकेले जिंदगी का सफर तय कर रहे बुजुर्गों को उनकी तनहाई व उदासी के अहसासेगम में हमदर्द बन सकें ।)


आज रहते वहीं कितने तन्हा अकेले ,
जिनके हाथों ने थे आशियाने सजाये ।
नाखुदा बन हमारी किये परवरिस थे,
आज दिखते यूँ लाचार, बेजान साये ।1
 
दिखती खामोश आँखें हैं उनकी सवाली
कल देतीं थी जो हर जबाबी इशारा ।
चेहरा कि मानो है  गम का दरिया ,
बहे खुश्क पानी यूँ आखों से खारा   ।2

रखे  हाथ सिर पर हमारे दुआ का ,
सूरत हमारी अब देखने को तरसते।
थे लोरी से देते हमें चैन की नींद ,
बेचैनी पल-पल की खुद सहते रहते ।3

किये बलिदान सुख सब हमारी ही खातिर,
हम मसरूफ यूँ कि न देखें भी मुड़के ।
बिठाकर हमें जिनपर दुनिया दिखायी ,
आज वे मजबूत  कंधे हैं बेबस झुके । 4

कितने बचकानी मसले वे सुनते हमारे,
पर धीरज से उनका समाधान देते ।
हमसे पूछें जो वापस वे छोटी भी बातें ,
हम बड़े अनमने भाव वापस में देते ।5

बोझिल सी हालात इस पड़ावेउमर की,
इक वीरान दरख्त की है खामोशी फैली।
पंछी उड़े  सारे कल बसेरा था जिनका,
झुर्रियों में छिपी उनके जिंदगी की पहेली।6

जो उँगली पकड़ हम चलना थे सीखे,
पीड़ा तनहाई की आज वे हाथ सहते ।
रोशन किया हमें जो खुद को जलाकर, 
उन बुझती शमा को बुढापा हैं कहते ।7

Wednesday, April 4, 2012

छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।


छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।।
बैठे हो पहलू में मेरे ,दिल में यह ख्वाब जगे।।

बेखबर तारे हैं यह़ आसमान भी उनीदा है,
चाँद निकलेगा यह अरमान अभी जिंदा है।
पल दो पल का यह अनजान सफर तो नहीं,
ताउम्र रात की खातिर कई हसरतें बासिंदा हैं ।
आज क्यों सर्द,गैर-जुम्बिस ये कायनात लगे ।
छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।1।

माथे की सिलवटों में दिखती कैसी यह उलझन है ?
पाँव में जकड़ी हुयी जंजीरों की अजीब रुनझुन है।
दास्तान अपनों से कलतक जो हम सुना न सके ,
गैरों से आज गाता रहा मन में लगी कैसी धुन है ?
तेरी  चौखट से भली तो रकीब-ए-दर खार  लगे।
छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।2।

यह लबों का दर्देगम या पैमाने की खामोशी है ,
इस मुस्कान के पीछे क्या छिपी कोई उदासी है ?
राह में मिलते हैं अब वे इक अजनबी की तरह,
उनका यह बेगानापन गोया जीते जी फाँसी है ।
मेरी रुसवाई में शामिल थे खुद मेरे अपने सगे।
छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।3।

आफताबे सुर्ख किरन पूछें हर स़हर यह पता,
चाँद की नर्म किरन की सैर का इधर रस्ता,
एक तेरी ही थी कमी इस स़फर में, वरना तो
गुज़रे इस राह से कितने  कारवाँ औ दस्ता ।
हर सुबह है लाये खुशी और नयी भाग्य जगे ,
छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।4।

छेड़ दो गीत कि यह शाम बहुत उदास लगे ।।
बैठे हो पहलू में मेरे ,दिल में यह ख्वाब जगे।।

Tuesday, April 3, 2012

रात करती इशारे कि महफिल उठी......




सर्द आहें तो कितनी निकलती मगर,
दिल की जलती अगन कब है इससे बुझे
शक्ल अपनी दिखे ख्वाइशें थी बहुत,
आईने की इजाजत मिली ना मुझे।1

खुद की आवाज तक तो वो सुनता नहीं,
खाक उसकी मुनादी से बस्ती  जगे।
टेढ़ी गलियों में चलने की आदत उसे,
सीधे रिश्ते उसे  रास कब से  लगे ।2

कल जो पहलू से गुजरे यूँ इक अजनबी,
आज महफिल में उनकी ही  चर्चा किये ।
कल जो नजरंदाज उनको किये हरघड़ी,
आज उनकी ही आँखों से जमकर पिये।3

कितनी मुश्किल थी वह इंतजार-ए- घड़ी,
लमहे गिनते हुये  जिंदगी यूँ कटी ।
शम्मा जलती रही चाँद ढलता रहा,
रात करती इशारे कि महफिल उठी ।4

शोर इतना था कि उनकी महफिल चली,
पर रास्ते में दिखे फख्त तन्हा अकेले।
आज वे ही चुराते नजर मुश्किलों में,
कल बढ़कर सभी बोझ कंधों पर झेले।5

कर दो उनको इशारे कि इनायत करें,
कितनी बेताब महफिल है उनके बिना।
कुछ लमहों की गुस्ताखियों के लिये ,
कौन सदियों तलक जुल्म-ए-गिनती गिना ।6।

वक्त कितने गुजारे ज़िरह में मगर,
उनकी बदहालसूरत जो भी ज़ान लेते।
जो दो घूँट पानी हलक को मिला था,
बड़ी बेबसी से वे न दम तोड़े होते ।7।

Monday, April 2, 2012

इक नयी सुबह औऱ नयी किरन....



यह सन्नाटा क्यों बस्ती में,
वीरान शहर क्यों लगता है।
कल खूब मनी दिवाली थी,
क्यों आज अँधेरा  जगता है ?1?

सब ओर बिछी है खामोशी
कुछ कहने में  है रुसवाई ?
वे आवाजे गुम हुई कहाँ, जो
कल तक थीं अलख जगाई ।2

अब वे ही हैं गुमशुदा हुये,
जो मुझे यहाँ तक लाये थे।
वे आज जमीं की जद तकते,
जो चॉद पर पैर जमाये थे।3

पत्थर भी मारा उसने ही ,
जो  शीशे के घर में हैं रहते ।
वे हमें गुनाही कहते,  जो
खुद कत्लेआम किया करते।4

रहे तड़पते प्यासे, जो खुद
कुयें पर पानी भरते थे।
नहीं मयस्सर दोगज़ कपड़े,
जो कफ़न सजाया करते थे।5

कल मेले में जो बिछड़े थे ,
उनके मिलने की न खबर आई।
कलतक जो खुदमुख्तारी थे,
हैं आज़ वे लाचार सवालाई ।6

कहते सुनते ही यह रात कटे,
या कुछ पल तो आँख लगेगी?
इक नयी सुबह औऱ नयी किरन,
जब कल जग की नींद खुलेगी।7

हे राम ! आप महान अतिशय और हृदय उदार थे।



हे राम ! आप महान अतिशय और हृदय उदार थे।।
प्रेम,करुणा,शील,सनेह, दया के आप प्रभु आगार थे।।

यह धरा थी संत्रप्त जब दानवी अत्याचार से,
पाप से, पाखंड से, लोभ और  अनाचार से,
निज-बाहुबल से दुष्टदल का नाश करके ,
ताडका, मारीच अगनित राक्षसों को मार करके,
शांति और सौहार्द का वातावरण स्थापित किये थे।
हे राम ! आप महान अतिशय और हृदय-उदार थे ।।
प्रेम,करुणा,शील,सनेह, दया के आप प्रभु आगार थे ।1।

विमाता कैकेई के कुआग्रह को सहज धारण किये,
परिवार की सुख शांति खातिर राजपद खाली किये।
पित-बचन पालन के लिये सहर्ष ही वन को गये,
भाइयों से प्रेम अद्भुत, सदा भातृत्वमय जीवन जिये ।
मित्र,भाई और प्रजा, सबके हृदय और प्राण थे।
हे राम ! आप महान अतिसय और हृदय-उदार थे।।
प्रेम,करुणा,शील,सनेह, दया के आप प्रभु आगार थे।2।


वरना इतर युग में रहे होते हमारी इस धरा पर ,
राजमद के दंभ में अनगिनत ही अनाचार तत्पर ।
राज्य छीना,छल किया,विष दिया निज भाइयों को ,
बिन लड़े एकसूई नोक जमीन न दी पांडवों को ,
हठवशी उन कौरवों ने सगों से ही महाभारत किये थे।
हे राम ! आप महान अतिशय और हृदय-उदार थे।।
प्रेम,करुणा,शील,सनेह, दया के आप प्रभु आगार थे।3।

शुभसंकल्प स्थापित करें प्रभु आप हम सबके हृदय में ,
आचरण शालीन हो शत्रु पर भी मिलती विजय में ,
अशांत तप्त उर शुष्क में शांति की गंगा बहा दें,
विश्व मन को जीतने को प्रेम की सेना सजा दें,  
हे प्राणनाथ करुणानिधान आप शांति अवतार थे ।
हे राम ! आप महान अतिशय और हृदय-उदार थे।।
प्रेम,करुणा,शील,सनेह, दया के आप प्रभु आगार थे।4।