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Tuesday, February 14, 2023

दुख एवं करुणा के आर्द्र स्वर - हमारे विवेक व चेतना के गज़र

विगत दो दिन से अधिकांश समय अस्पताल में ही गुजर रहा है, मेरी मां अस्वस्थ हैं, भर्ती हैं। चूंकि वह अभी आईसीयू में हैं इसलिये अधिकांश समय अस्पताल के रिसेप्शन एरिया में प्रतीक्षा बेंचों पर ही बैठे बीतता  है। अस्पताल में लोगों(भर्ती मरीजों के परिजनों) के बीच होना एक विशेष गहरा भावनात्मक अनुभव होता है, किसी रंगमंच पर चल रहे बहुआयामी दृशयमंचन से कहीं कम नहीं-कुछ बदहवास से, कुछ गंभीर से, कुछ मसगूल से कुछ उदासीन से, कुछ उतावले में चलते, कुछ आहिस्ता सोच और चिंता में, विभिन्न भाव, विभिन्न रूप, विभिन्न दृश्य।
सामने, बरामदे के दूसरे किनारे की बेंच पर एक महिला करुणार्द व शांत भाव में बैठी हैं, चिंताग्रस्त बार बार आईसीयू की ओर जाने वाली रैम्प की ओर व्यग्रता से निहारती हुई। बीच बीच में दो युवा, शायद उनके बेटे या संबंधित, जब भी पास से हड़बड़ाहट में आ जाते,उनकी व्यग्र और उदास आंखें पूछती हुई उनसे कि क्या हाल है मरीज (शायद उनके पतिदेव) का, क्या कहते हैं डॉक्टर, कोई घबराने की बात तो नहीं। एक दो घंटे बाद एक करुण क्रंदन सुनाई दिया,उधर ध्यान गया तो देखा वही महिला फूट फूट कर रो रही है, अनहोनी जिसकी आशंका में वह घंटों से व्यग्र और चिंतित दिख रहीं थी वह घटित हो गई थी , पूरी रिसेप्शन प्रतीक्षा एरिया उस महिला के करुण क्रंदन से विह्वल हो रहा था, वो कहते हैं ना कि इतनी करुणा कि स्थिति कि वहां मौजूद किसी का भी गला रुंध जाये कलेजा फट जाये, मुझे अनुभव हुआ मैं स्वयं और मेरे आस पास सबकी आंखे नम हो आयीं थी उस महिला के करुण क्रंदन से। दोनों युवक उस महिला को ढांढ़स बधाने का प्रयास कर रहे थे परंतु वह महिला कैसे ढॉढ़स पाती!
पौराणिक ग्रंथों कथाओं में हम सबने ही पढ़ा है कि भगवान राम मां सीता का त्याग और उनके आदेश पर लक्ष्मण मां सीता को वन में छोड़ आते हैं, तो वन में अकेली मां सीता, वह भी गर्भावस्था की नाजुक अवस्था में, राम से वियोग के दुख में जो करुण क्रंदन करती हैं कि पूरा वन - पेड़ पौधे, घास - पत्ते, पशु-पक्षी, वन का कण-कण उनके करुण क्रदन से करुणार्द हो उठता है, वहां की धरती सिसकने लगती है। जब शकुंतला को महाराज दुष्यंत पहचानने से इंकार करते हैं और प्रहरी उसे अपमानित कर राजदरबार से बाहर निकाल देते हैं , तो गर्भवती शकुंतला वन में जो करुण क्रंदन करती है उससे पूरा वन रोने लगता है। 

एक दुखी नारी का करुण क्रंदन से वहां उपस्थित किसकी आंखे आर्द्र नहीं कर देता! वहां भी सभी इसी अनुभव से गुजर रहे थे।
अस्पताल के यह दुख-करुणा के अनुभव कतई अनपेक्षित होते हैं, कोई भी नहीं चाहता ऐसे अनुभव बिना किसी विवशता के देखना और  उससे गुजरना, मगर इसका दूसरा पक्ष देखें तो इन दृश्यों और अनुभवों में सच्चा जीवन दर्शन निहित होता है, इन अनुभवों से जीवन की सच्चाई हमें प्रतिबिंबित हो जाती है। हमारे दुख, हमारे जीवन में आने वाले वियोग, विछोह के यह अनुभव हमें हमारे जीवन में प्राप्त संबंधों, सहारों, प्रियजनों (जिनकी सामान्य परिस्थितियों में प्रायः हम अनदेखी और उपेक्षा कर देते हैं, और गाहे-बगाहे तिरस्कार एवं अनादर भी) की उपस्थिति का महत्व एवं मायने समझा देते हैं, यह हमारी सोयी, बेहोश पड़ी चेतना एवं विवेक को जाग्रत करने में सहायता करते हैं। 

Saturday, November 24, 2012

विचार बनायें जीवन.....



इस तथ्य से ,कि हमारे मन के विचार ही स्थूल रूप धारण कर अंतत: हमारे वास्तविक जीवन में परिणित होते हैं, परिचय व स्वयं के जीवन में भी स्वल्प अनुभव तो विगत कुछ वर्षों से ही होता रहा है ।इसी निरंतर हो रही अनुभूति व उपजते क्रमश: विश्वास के प्रभाव में ही शायद मैंने कुछ दिनों पहले ही फेसबुक पर 'चिंतन' नाम से एक नया वेबपेज बनाया, जिसका टाइटल विवरण इस प्रकार  है-This whole universe is creation of our thoughts. अपने इस वेबपेज पर मैं अपने मन में उठने वाले विचार,कवितायें,कथन इत्यादि प्रतिदिन पोस्ट कर रहा हूँ और इससे मन को बड़ा अच्छा व प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

इस वेबपेज की रचना के कुछ दिन पश्चात ,तीन-चार दिन पहले ही, जबलपुर से मेरे एक मित्र,जो कि रेलवे में ही कार्यरत हैं,ने कुछ कार्यवश फोन किया व मेरी पत्नीजी जोकि अस्वस्थ चल रही हैं के स्वास्थ्य सुधार की हालचाल जानने के सिलसिले में ही उन्होने हमें एक अंग्रेजी मूवी The Secret देखने का सुझाव दिया।उन्होने यह विशेष जोर देकर कहा कि मैं व मेरी पत्नी दोनों को ही यह मूवी अवश्य देखनी चाहिये। उन्होंने इस मूवी की C.D. की प्रति भी जबलपुर से बंगलौर आने वाली ट्रेन में नियुक्त रेलवे स्टाफ के माध्यम से भेज दी जो मुझे कल सुबह मिल गयी।

हालाँकि आँफिस में कार्य की व्यवस्ततावश इसे तुरंत देखना संभव नहीं होता था परंतु दोपहर  लंच के पश्चात मैं अपने लैपटाप पर इस C.D की जाँच करने व मूवी से परिचय पाने की उत्सुकता को नहीं रोक पाया। किंतु जैसे-जैसे यह मूवी शुरुआत से आगे बढ़ी यह मुझे अति रोचक ,चमत्कारिक व अलौकिक प्रभाव वाली लगने लगी,मैं मंत्रवत् इसे करीब डेढ़ घंटे बिना किसी अंतराल के देखता रहा।इस बीच आफिस में बीच-बीच में मेरे स्टाफ की आवाजाही, मेरे मोबाइल फोन पर आनेवाली काल जैसे छोटे-मोटे व्यवधानों की उपेक्षा भी करनी पड़ी।

जैसा कि मूवी के शीर्षक The Secret से ही यह संकेत मिलता है , यह हमारे जीवन से संबंधित एक अद्भुत रहस्य से परिचित कराती है।यह मूवी कुछ वर्तमान विश्व के सुप्रसिद्ध दार्शनिकों,लेखकों,पराभौतिकशास्त्रियों ,डाक्टरों,सफल व्यवसायियों की विचार-श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत है जिसमें आदि से अंत तक परत-दर-परत इस रहस्य को उद्घाटित किया गया है कि किस प्रकार हमारा जीवन -हमारा भौतिक शरीर,इसका स्वास्थ्य ,जीवन के हालात,इसकी परिस्थितियाँ व परिवेश ,हमारे मन में लगातार उपजते व पल रहे विचारों के ही स्थूल स्वरूप हैं एवं अपनी विचारश्रृंखला व दृष्टिकोण में बदलाव से अपनी जिंदगी में भी अनोखा बदलाव ला सकते हैं।

मूवी को रोचक व सनसनीखेज बनाने हेतु इसकी शुरुआत ऐसे दृश्यों से है जहाँ जीवन के इस रहस्य को अतीत के प्रभावशाली व बुद्धिजीवियों द्वारा इस रहस्य को गह्वर तहखाने में सदा छुपा कर रखने व एक सामान्य मनुष्य को सदैव इससे अनभिज्ञ रखने का प्रयास करते हैं व अचानक परिस्थितिवश यह  रहस्य इस मूवी के पात्र को संयोगवश हाथ लगता है, जिससे कि उसका संपूर्ण जीवन ही बदल जाता है।

मूवी के प्रथम भाग में  इस रहस्य का उद्घाटन होता है कि पूरा ब्रहमांड आकर्षण के सिद्धांत पर कायम है,सूर्य,ग्रह,तारे,पृथ्वी,पिंड,अणु,परमाणु सभी पर (गुरुत्व)आकर्षण का नियम समान रूप से लागू होता हैं,यहाँ तक कि यह सिद्धांत हमारे जीवन में भी पूरी तरह लागू होता है।

जिस प्रकार किसी भौतिक पिंड की आकर्षण शक्ति उसके केंद्र बिंदु में स्थित होती है उसी प्रकार हमारे शरीर का केंद्रबिंदु हमारा मस्तिष्क है।हमारे मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले विचार के स्वभाव के अनुरूप ही हम बाहरी चीजों,परिस्थितियों व अन्य व्यक्तियों को अपने जीवन में आकर्षित करते हैं,और स्वाभाविक रूप से इसी अनुरूप हमारा पूरा जीवन निर्मित होता है,अर्थात् हमारे विचार ही हमारे जीवन का निर्माण करते हैं।

आकर्षण का सिद्धांत बड़ा वफादार होता है,जो आप सोचते हैं वही आप के साथ घटित होता है।जब आप किसी बात को आवेश के साथ सोचते हैं वह आपके साथ उतनी ही तेजी से घटित होता है।हमारे अच्छे विचार हमारे जीवन में सुख शांति प्रसन्नता व समृद्धि लाते हैं जबकि वुरे विचार दुख,अशांति,क्षोभ व अभाव लाते हैं।हमारे विचार उर्जातरंग के रूप में निरंतर उत्पन्न होकर सृष्टि की अनंत उर्जाके सानिध्य में अपने स्वभाव के अनुरूप आकर्षण उत्पन्न करते हैं व विभिन्न चीजों को हमारे जीवन में घटित करते हैं।

इस प्रकार हमारी जिंदगी हमारे मन में चल रहे विचारों से ही निर्मित है।सकारात्मक विचार नकारात्मक विचारों से सैकड़ो गुना ताकतवर होते है।इसलिये हमें अपने सोच व नजरिये में सदा ही सकारात्मक होना चाहिये।

मूवी में यह स्पष्ट किया गया है कि यह सृष्टि एक अनंत शक्ति व ऊर्जा संपन्न असीम क्षमतावान विशाल जिन्न की तरह है जो हमारी सभी ख्वाहिसों को उतनी ही  वफादारी से पूरा करती है जितना कि जिन्न अपने मालिक से कहता है कि-आपकी ख्वाहिश ही मेरे लिये हुक्म है मेरे आका।इस प्रकार आप अच्छा सोचते हैं या बुरा सोचते हैं,सकारात्मक सोचते है अथवा नकारात्मक सोचते हैं,इनमें बिना कोई विभेद किये यह सृष्टि आपके विचारों को आपकी ख्वाहिस समझ उन्हें अवश्य पूरा करती हैं।

इस प्रकार जीवन में आप जो कुछ भी चाहते है-सुख,समृद्धि,स्वास्थ्य, सफलता,चाहे जो भी, सब आपको इसी आकर्षण के सिद्धांत से यह सृष्टि आपको जीवन में अवश्य उपलब्ध कराती है।इस सिद्धांत का हम अपने जीवन में कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं इसके लिये तीन प्रमुख बातें बतायी गयी हैं- पहला सृष्टि से प्रश्न करें अर्थात् अपनी ख्वाहिसों की फेहरिस्त आप सृष्टि को ठीक-ठीक व स्पष्ट रूप से बतायें,यह बताना नितांत जरूरी है। सृष्टि को आप अपना मीनूकार्ड समझें।

दूसरा आप सृष्टि पर पूरा भरोसा करें, उसे अपनी ख्वाहिसें बताकर आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी सृष्टि के साथ संतुलन बैठाये जीते रहें,सृष्टि अपने तरीके से आपकी सारी ख्वाहिशें एक दिन अवश्य पूरी करेगी।

तीसरा है  प्राप्त करना यानि सृष्टि को अपनी ख्वाहिसें बताने के बाद,सृष्टि की उदारता व वफादारी के प्रति आस्था रखते हुये इस अहसास के साथ जीना शुरू कर दें कि आपकी ख्वाहिशें पूरी हो चुकी हैं। वह सब कुछ आप को पहले ही प्राप्त हो गया है जो आपने सृष्टि से माँगा है,आप परिपूर्ण हो गये हैं।
ख्वाहिशें रखने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनको प्राप्त कर लेने का सिद्दत के साथ अहसास रखना क्योंकि आपका अहसास ही आकर्षण की शक्ति को प्रभावी बनाता है, आपके ख्वाहिश की चीजों को आपकी ओर आकर्षित करता है ।

सचेत यह रहना है कि सृष्टि को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके अहसास अच्छे हैं अथवा बुरे,आपके अहसास घृणा,क्रोध,दुखपीड़ा व अवसाद के हैं या प्रेम,करुणा,प्रसन्नता व आनंद के हैं ,आपके जीवन में सृष्टि वही आकर्षित कर तोहफे में आप को देगी जैसे आपके स्वयं के अहसास हैं।अत: अपने अहसास के प्रति सदैव सचेत रहें,यदि जीवन में सुख,समृद्धि व प्रसन्नता पानी है तो आपको हमेशा इसी अहसास में जीना होगा कि आप सुखी हैं,आप समृद्ध हैं व आप निरंतर प्रसन्न हैं।

अपने मस्तिष्क की अद्भुत कल्पनाशीलता का इन्ही अहसासों को मुकम्मल बनाने में उपयोग करें,जिस सुंदर घर की आपको चाह है उस घर में आज से ही अपने कल्पनाशीलता व अहसास में रहना शुरू कर दें,जो समृद्धि,धन आपकी चाहत में है उसके अहसास में आज से ही जीना शुरू कर दें।

यह सब बातें कहनें में जितनी ही  अच्छी व आसान लगें, अच्छे अहसासों को अपना स्वभाव बनाना कोई सहज बात नहीं। किंतु कृतज्ञता भाव के निरंतर अभ्यास से सुखद अहसास में जीना कतई संभव हो जाता है।जो भी आपको जीवन में प्राप्त है,उसके हेतु इस सृष्टि,अपने माता-पिता,उन सभी लोगों के प्रति जिन्होने आपके जीवन में छोटा से छोटा या बड़ा से बड़ा योगदान अथवा खुशियाँ दी है,उन सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें। अपने रिश्तों,चाहे घरपरिवार हो अथवा सामाजिक अथवा कार्यसंबंधित,सभी संबंधों में दूसरे पक्ष की अच्छाइयों व गुणों को पहचाने,उन्हें आदर दें व उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।फिर तो अच्छे अहसास में सदैव रहना आपका स्वभाव ही बन जायेगा।

मूवी के अंतिम चरण में चार विशेष बातों-समृद्धि का रहस्य,स्वास्थ्य का रहस्य,संसार का रहस्य व आपका रहस्य की चर्चा की गयी है।पूरा विवरण तो इस मूवी को देखकर ही अपने तरीके से समझा जा सकता है किंतु कुछ प्रधान बातें जो मुझे समझ में आयीं मैं यहाँ कहना चाहूँगा –
सृष्टि के उपलब्ध संसाधन असीम व अनंत हैं,उसके पास आपकी किसी भी ख्वाहिश को पूरा करने की पूरी क्षमता है,अत: उसपर पूरी आस्था रखते उससे संतुलन बनाकर रहते सब उसके हवाले कर दें, वह आपको वह सब कुछ देगी,आप को उन सब चीजों से समृद्ध बनायेगी जिनकी आप खवाहिश करते हैं।

हमारे शरीर व इसके स्वास्थ्य में भी हमारे मस्तिष्क व इसके विचारों की मुख्य भूमिका है।हमारे नकारात्मक विचार,मन में तनाव व दु:ख के अहसास के साथ जीने का स्वभाव ही हमारे शरीर में बीमारी का रूप धारण करते हैं।यदि हम मन में स्वस्थ रहने के संकल्प व सदैव अच्छे अहसास के साथ रहें तो लाइलाज ,यहाँ तक कि कैंसर ,बिमारी भी ठीक हो सकती है।इस बात के अनेकों उदाहरण इस मूवी में उद्धृत किये गये हैं।

इसी तरह संसार में भी प्राय: जो हम नहीं चाहते उसका विरोध करने लगते हैं,यह हम भूल जाते हैं कि विरोध करने में भी हमारी सारी ऊर्जा उसी चीज पर फोकस होती है जिसका हम विरोध करते हैं,इस प्रकार एक प्रकार से हम उसकी सहायता ही करते हैं,जितना विरोघ करते हैं वह उतना ही बढता है।ङमें विरोध के बजाय उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये जो हम चाहते हैं,युद्ध नहीं चहते तो इसका विरोध करने के बजाय शांति का पक्ष व पहल करें।हमें ध्यान रहे हम दुनिया बदलने के लिये नहीं बल्कि सृष्टि के बहाव के साथ बहते हुये इसकी प्रसन्नता,रचनात्मकता का आनंद लें,खुश रहें।

अंतिम बात स्वयं का रहस्य जानने के आशय से यह है कि हम मात्र एक शरीर के परे वस्तुतः एक ऊर्जापिंड हैं व इस प्रकार इस सृष्टि व इसकी अनंत ऊर्जा के हिस्से हैं।हम सभी एक दूसरे से ऊर्जा के स्तर पर जुड़े हुये हैं,हम सभी एक हैं।सृष्टि में सबकुछ ऊर्जा है।दुनिया ऊर्जा से बनी है-चाहे क्वांटम फिजिक्स के सिद्धांत से अथवा आध्यात्मिक।सृष्टि में सब आपस में जुड़े है,हम सब अनंत शक्ति हैं होने वाली संभावनाओं के।

ऊर्जा अंदर से ही आती है।आपका चुनाव क्या है आपका बुरा अतीत अथवा आपके सुनहरे भविष्य का अहसास।आप अपनी जिंदगी के शिल्पकार,आप ही लेखक हैृ,कलम आपके हाथ हैं।जहाँ हैं वहीं से शुरू कर सकते हैं,आकर्षण का सिद्धांत काम करना शुरू कर देता है।आपके हर नहीं को आपने बनाया है।हमारी सीमायें असीम हैं।आपके जीवन का उद्देश्य आप स्वयं बनाते हैं,जो आप स्वयं तय करते हैं, कोई दूसरा आपके ऊपर नहीं थोप सकता।

जिसको करनें में खुशी मिले वही करिये। मन की खुशी ईधन है आपकी कामयाबी का।अपने आनंद का अनुसरण करिये व सृष्टि आपके लिये सारे दरवाजे खोल देगी।अपने उत्साह दीवानगी के पीछे जाइये।जिंदगी बेमिसाल हे,गजब का सफर है।भविष्य अपार संभावनों का है। हम अभी तक मष्तिस्क का केवल 5%ही उपयोग करते हैं कल्पना करें यदि आप इसका 100% उपयोग करे तो क्या नहीं संभव है।

आपका नृत्य कोई और नहीं, आपको करना है, आपका गीत कोई और नहीं आपको स्वयं गाना है, आपकी कहानी कोई और नहीं आप को स्वयं लिखनी है । आप कौन है और  क्या हैं और क्या होना चाहते हैं इसका फैसला आपको करना है।

Friday, November 9, 2012

उसका सब कुछ, उसका सारा।


एको त्वमसि द्वितीयो नास्ति ।

जग से मैं क्या माँग सकूँ हूँ,
मुझसे अधिक जगत बेचारा

जो मागूँ
तो उससे मागूँ, जो
देता सबको सहज सहारा ।

जग से मैं क्या मन-दुख बाँटूँ,
मुझसे अधिक जगत दुखियारा

जो
दुख बाँटू उससे बाँटू, जो
दुखतारण
, जो तारणहारा।

जग से क्या मैं लगन लगाऊँ,
जगत बेवफा,दिल का खारा।
लगन लगाऊँ उससे, जिससे
दिल लागे भवसागर तारा।

गीत जगत के क्या मैं गाऊँ
जगत अशांत क्षुब्ध चित्कारा।
गाऊँ गीत वही धुन साधूँ,
साँस बसा जो प्रेम-पियारा।

चित्र जगत के क्या मैं खींचू
धुँधला जगत विकृतमय चेहरा।
मन स्थापित एक मूर्ति वह,
जिसने सारा जगत उकेरा।

ध्यान जगत का क्या मैं साधूँ
बिखरा जगत,उजड़ता थारा।
मैं तो उसकी धुनी रमाऊँ
जो ब्रह्मरंध,जागृत सहसारा

जग को क्या मैं दे सकता हूँ,
जग की क्षुधा अतृप्त अहारा।
स्वयं समर्पित उसको होऊँ,
उसका सबकुछ, उसका सारा।

Saturday, January 7, 2012

रे मन क्यों तुम होये दु:खी…..


विगत कुछ दिन मानसिक स्तर पर उलझन भरे रहे और इस कारण कुछ दिनों से  स्थाई चित्त से बैठकर लिखना भी न हो सका , अपने ब्लॉग पर नियमित लेखन तो व्यवधित रहा ही, साथ-साथ अपने प्रिय मित्र प्रवीण पाण्डेय जी के ब्लाग न दैन्यं न पलायनम् सहित अपने अन्य प्रिय ब्ल़ॉग न तो पढ़ पाया न ही उनपर कोई टिप्पड़ी ही लिख पाया, जिसका मन में बड़ा मलाल हो रहा है ।

वैसे तो ईश्वर की कृपा से तो सामान्यतः सब कुशल ही चल रहा है, किंतु ये उलझनें छोटे-मोटे घरेलू , कार्यालय सम्बंधित, स्वयं की व अपने पिताजी के स्वास्थ्य संबंधित मसले जैसे कई सीमाओं पर रहीं और मानसिक स्तर पर कमोवेश अस्त-व्यस्तता सी बनी रही।

हालाँकि उम्र व कार्य-अनुभव के इस पड़ाव पर आकर सोचसमझ में इतनी स्थिरता व संतुलन क्षमता आ जाती है कि आप जीवन के हर मसले-चाहे घरेलू हों अथवा आपके काम-व्यवसाय से संबंधित, में सहज रहना कमोवेश सीख ही लेते हैं और इनको लेकर मन में कोई उलझन तो नहीं पालते, कितु जब कुछ ऐसे मसले खड़े हो उठते हों जो आपकी निष्ठा, विश्वसनीयता से संबंधित हों और वह भी ये प्रश्न उनके ही द्वारा उठाये जा रहें हों जिनके प्रति आप अंधभक्ति से समर्पित हैं(स्वाभाविक रूप से इसमें आपकी पत्नी व आपके बॉस दोनों मुख्यरूप से शामिल होते हैं),तो यह वैचारिक संतुलन बिगड़ जाता है,आप अधीर और दुखी हो जाते हैं,आप आहत व पराजित सा अनुभव करने लगते हैं।

ऐसे में स्वयं के ही प्रति मन में अनकों प्रश्न बादल बनकर छाने लगते हैं - क्या चुपचाप समर्पित होकर बिना स्वयं का यशोगान किये अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहने का तात्पर्य है कि आप गौण व योगदान रहित हैं? क्या आत्मश्लाघा रहित हो चुपचाप अपना कर्तव्य निभाना आपकी कमजोरी है? क्या काम के दौरान आने वाली परेशानियों व चुनौतियों को अपने ही स्तर पर सुलझा लेना,व उनका कोई ढिंढोरा न पीटना,आपकी अकुशलता व परिस्थितियों से समझौतावादी दृष्टिकोण हैं? क्या अपनी दैनिक घरेलू या व्यावसायिक परेशानियों को किसी से कहते नहीं फिरते और उनका किसी से गाना न गाने का अर्थ है आप बस मौज-मस्ती कर रहे हैं?

अब क्या करें,कुछ चीजें आपकी आदत होती हैं और फिर आपमें संस्कार बनकर स्थापित हो जाती हैं,और आप उन्हें चाहकर भी नहीं बदल पाते।और ऐसी स्थिति में आप स्वयं के ऊपर मुस्करा  ही सकते हैं और स्वयं को यही आश्वासन दे सकते हैं कि हम तो बस ऐसे ही हैं।

स्कूल और फिर कॉलेज के दिनों से ही यह रहा कि चाहे स्कूल में टॉप कियें हों अथवा किसी विषय में सामान्य मार्क्स आये हों पर अपने मित्रों में या घर में सारी बात बस इसी पर समाप्त हो जाती की हाँ बस पास हो गये,इससे ज्यादा कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई और न तो कभी आवश्यक समझी गयी।

स्कूल के पश्चात् किस युनिवरसीटी या कॉलेज में दाखिला लेना है या किस कोर्स का चयन करना है, अपने रहने की या खाने-पीने की व्यवस्था करनी है,सब स्वयं के जिम्मे व निर्णय पर रहा , माता-पिता द्वारा आर्थिक जिम्मेदारी निभाने के अलावा न तो कभी कोई हस्तक्षेप रहा और न तो उनको कहीं भी पीछे पीछे आने,देखने या लगे रहने की आवश्यकता हुई। बस जीवन में जो सही-गलत समझ आया,स्वयं ही निर्णय लिया व उसे करते रहे,सफलता मिली या असफलता सब चुपचाप सिर-माथे, सबकी जिम्मेदारी स्वयं के उपर ही लेना पसंद रहा, इन मामलात में न तो कभी किसी ने कोई सवाल ही किया और न कभी किसी को कोई जबाब देने की आवश्यकता हुई।तो पढ़ाई के दिनों से  यही स्वतंत्रमना व आत्मश्लाघा व औपचारिकता रहित स्वभाव जो बन गया , वही पारिवारिक गृहस्थ जीवन व नौकरी कार्यपेशे में भी कायम रहा है।

किंतु इस स्वभाव के कारण जीवनयात्रा में कई बार कुछ उलझनों व व्यतिक्रमों का भी अनुभव व साबका करना पडा  है । विचार करने पर कारण समझ में आता  है कि  व्यवहारिक जीवन व कार्य जगत की अपनी आवश्यक औपचारिकतायें होती हैं,आप वास्तव में क्या कहते हैं या करते हैं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आपका कहना व करना दूसरों को जैसे आपकी पत्नी,सहकर्मी,बॉस,मातहत इत्यादि , यानि वे सभी जिनके साथ आपको जीवनव्यवहार में संतुलन बनाकर रखना है और जिनके आपके प्रति दृष्टिकोण से आपके जीवन को सुख-दुःख व सुगमता व सुचारुता निर्धारित होती है, को आपका कहना या करना क्या प्रतीत होता है, उसका उनके लिये क्या अर्थ है और वह उन्हे कैसे प्रभावित करता है?

यही कारण है कि आपके कहने व करने की जो भी वास्तविक मन्शा हो, किंतु दुनियादारी में ज्यादा महत्वपूर्ण है आपके व्यवहार की वाह्य औपचारिकता  का वह आवरण जिनके माध्यम से ही आप  अपने परिवेश में आपसी संवाद व कार्यव्यवहार स्थापित कर रहे होते हैं।

तो दुनियादारी के हिसाब से आवश्यक उचित औपचारिकता के अभाव में कई बार आपके बहुत अच्छे मंशा वाली भी कही बातें अथवा किये गये कार्य दूसरे व्यक्ति को नागवार,त्रुटिपूर्ण अथवा अनुचित या विपरीत मंशामय प्रतीत हो सकता है, और इस  कारण आपसी संबंधों में कई बार संदेह व भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

हाँलाकि जब कोई आपके मूलभूत मूल्यों व सिद्धांतो,जो आपके व्यक्तित्व व चरित्र से जुड़े होते हैं,पर संदेह,शंका या आक्षेप करता है,तो निश्चय ही आप आहत व मानसिक रूप से व्यथित व व्यग्र हो उठते हैं, किंतु शांतचित्त से सोचने पर  ऐसी परिस्थिति में उचित समाधान यही नजर आता है कि स्वयं के आत्मविश्वास को बनाये रखें व दूसरों को भी आपको समझने का वक्त दें, क्योंकि यह देखा गया है कि समय व हालात एक न एक दिन शंका व संदेह के बादल को दूरकर सच्चाई व न्याय के उजाले को अवश्य सबके सामने ला ही देता है।

नये वर्ष की यही मंगलकामना व विश्वास, स्वयं के प्रति व उन सभी के प्रति जिनकी मेरे प्रति धारणा व विश्वास के दृष्टिकोण से मेरे दैनंदिन जीवन का संतुलन व सुख-शांति जुड़ा है, करता हूँ ।