किसी परिस्थिति , घटना और वक्त को उसके स्वाभाविक तरीके व गति से होने व गुजरने देना चाहिये , न तो उनसे मुँह चुराना और टालमटोल उचित होता है और न ही उनके साथ कोई हड़बड़ी और जल्दबाजी , अलबत्ता यह दोनों ही अतिगामी अंदाज किसी अच्छे व अपेक्षित नतीजे के लिहाज से घातक सिद्ध हो सकते हैं । सुगढ़ व स्वस्थ नदी वही होती है जो अपने स्वाभाविकता के साथ प्रवाह करती हैं , अन्यथा उनका अतिरंजित प्रवाह , ज्यादा ही धीमा अथवा ज्यादा ही तीव्र , उनके स्वरूप व आकार को अनगढ़ व छिन्नभिन्न कर देता है । अतः परिस्थिति व घटना के सामान्य गति व प्रवाह के साथ सहजता से आगे बढ़ना ही उनके साथ मर्यादित निर्वहन और अपेक्षित परिणाम को सुनिश्चित करता है ।
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Monday, March 9, 2015
Thursday, March 29, 2012
गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।
हृदय संकीर्ण, मन कुंठित, हैं हम सीमित समझ में,
हर बात पर शंका,झिझक और अविश्वास मन में,
हृदय जल रहा ईर्ष्या अग्नि में, नसें हैं ऐंठती तन में वदन में ,
कहते हैं बहुत सुनते कहाँ हैं,
आक्रोश की अग्नि में जलता जहाँ है,
अपनी बाहों का सहारा और सुख विश्राम दे दो।
गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।।
तुमने ओढ़ रखा है अपनी नील छाती पर सितारों का
दुशाला,
आँचल पर जड़ा चंदा, बिंदिया सूर्य का डाला ,
गले में हार नभगंगा,
लबों पर श्यामल मेघ का प्याला,
लबों पर श्यामल मेघ का प्याला,
तेरे आँगन में हो उत्सव, खेले दामिनी ज्वाला,
मुझे भी आज इस उत्सव चमन में आगमन का आह्वान दे
दो।
गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।।
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