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Thursday, March 29, 2012

गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।




हृदय संकीर्ण, मन कुंठित, हैं हम सीमित समझ में,
हर बात पर शंका,झिझक और अविश्वास मन में,
हृदय जल रहा ईर्ष्या अग्नि में, नसें हैं ऐंठती तन में वदन में ,
कहते हैं बहुत सुनते कहाँ हैं,
आक्रोश की अग्नि में जलता जहाँ है,
अपनी बाहों का सहारा और सुख विश्राम दे दो।
गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।।  

तुमने ओढ़ रखा है अपनी नील छाती पर सितारों का दुशाला,
आँचल पर जड़ा चंदा, बिंदिया सूर्य का डाला ,
गले में हार नभगंगा
लबों पर श्यामल मेघ का प्याला,
तेरे आँगन में हो उत्सव, खेले दामिनी ज्वाला,
मुझे भी आज इस उत्सव चमन में आगमन का आह्वान दे दो।
गगन तुम और थोड़ा सा हमें विस्तार दे दो ।।

Sunday, March 25, 2012

मौन थे ल़ब तो हृदय ने गीत गाया.....




दृष्टि के उन्माद में जलता रहा मैं,
शेष केवल रह गयी है भष्म मेरी।
काल के दृढ़ पृष्ठ पर ढलता रहा मैं,
है लहू से रिक्त अब हर शिरा मेरी। 1।

जो अपरिचित शब्द हैं वे गीत मेरे ,
परिचित प्रतिध्वनि आ रही है  शोर बनकर ।
मैं तो था एक रहगुजर  गुमनाम सा,
कुछ निशानी शेष हैं पदचिह्न बनकर ।2।

छोर जिनको छोड़कर मैं दूर निकला,
गहन जकड़े हैं मुझे जंजीर बनकर।
शस्त्र मेरे तरकशों में रिक्त हैं अब,
स्वयं मुझको बींधते अरि-तीर बनकर।3।

तुम कहे थे छोड़ दूं मैं हृदय वीथि,
मैं तो तेरा शहर ही हूँ छोड़ आया।
तुम कहे तो दफ्न खुद को कर दिया,
(किंतु)मौन थे लब तो हृदय ने गीत गाया।

अनगिनत पहेलियाँ हम बूझते पर
आसान सी जीवन पहेली में उलझते।
सहजता से सुलझ जाते छोर सारे,
खींचने से उलझे धागे कब सुलझते।5।

 

Friday, December 2, 2011

मैं गीतों में अब रहता हूँ।


दिन तो हमने साथ गुजारे
रहे अपरिचित हृदय हमारे
यदि मेरा परिचय पाना हो
गीत कभी पढ़ लेना मेरे।1

कह न सका मैं जो तुमसे
अव्यक्त भाव वे गीत बने।
गुजरे जो पल बिन संग तेरे
वे लमहे आँसू- शब्द बने।2

तिनकों में मैं ढ़ूँढ़ रहा था,
खोये दाने मुक्तामणि के।
हाथ न आयी जीवनमोती
सौगात मिले कुछ कंकण के।3

भरी थाल में डूब हथेली,
चुपके से मिल कीँ कुछ बातें
मीठी कितनी हारी बाजी
देकर तुम्हें जीत सौगातें।4
  
हृदय प्रेम से रहा छलकता
प्रिय था तब प्रत्येक समर्पण।
प्रेमशून्यता  प्रश्नपूर्ण बन,
बिम्ब भ्रमित शंका का दर्पण।5

कल जो मेरी चर्चा भर से
लालकपोलित शरमा जाते ।
पीड़ा आज पहुँचती भारी,
मेरा नाम लबों पर लेते।6

अब तो क्या मैं मिल पाऊँगा,
जब खुद को ही ढूढा करता हूँ।
जो न मिली तेरी चौखट तो,
मैं गीतों में अब रहता हूँ।7