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Sunday, December 16, 2018

मन के अंदर चल रहा निरंतर संघर्ष कठिन यह मानव के ...

इच्छाओं के चक्रवात से निरंतर जूझ रहा यह मानव मन
उड़ जाता है अशक्त आत्मबलरहित तिनके के माफिक।
इधर उधर बेचैन कहीं भी, बिना छोर और बिना ठिकाना
दरबदर भटकता व्यग्र बावला भटका राह हो राही एक।

मगर बंधा यह संस्कारों से, अंतर्चेतन के कुछ धागों से,
जुड़ा हुआ यह इनसे जितना जाने या अनजाने में ही,
चेताते यह इसको जब भी यह उड़ता, मनमानी करता
समझाते हैं बतलाते हैं इसे सही क्या और गलत क्या।

राह कौन सी इसकी जाती सुख को और खुशहाली को,
शांति और उन्नति का जो पथ सहज सुरक्षित हो सकता है
और कौन सी राह इसे खड्डे में अवनति में ले जाएगी,
कल बन सकती काल, विनाश और अनहोनी का कारण।

मन की मनमानी और अंतर्चेतन के बीच यह संघर्ष निरंतर जारी रहता है मानव मन के अंदर प्रतिपल प्रतिक्षण
मानव का अंतर्चेतन है जब तक विजयी,है लगाम हाथ
तब तक जीवन में सब शुभ होता सुख फलदायी होता है।

वरना मन जो है प्रचंड और चलती उसकी ही मनमानी
अपने अंतर्चेतन ध्वनि की करते हुए अवहेलना उपेक्षा
संतापों का होआमंत्रण अवसादों का होना अपरिहार्य
फिर है विनाश का आमंत्रण, निश्चित अनिष्ट संभावित है।
#देवेंद्र

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Wednesday, September 18, 2013

मनख्वाबों की पुष्पवाटिका ......


मन में ख्वाबों के दीप जला ,
मैं नियमित अर्घ्य दिया करता ।
कुछ कमल खिले कुछ जलकुंभी 
कुछ कीचड़ में ,कुछ पानी में ।१।

मनभाव कई विकसित होते ,
फूलों के जैसे नवरंग लिये 
कुछ खिलते सूरज उजियारे
कुछ रातों के अँधियारे में ।२।

यह  चार पलों का जीवन था ,
कब गुजर गया यूँ मिला जुला।
दो पल काटे तनहाई  संग,
दो कटे यार -रुसवाई  में ।३।

कुछ पता नहीं, काबू भी क्या ?
अनजान किनारे और दरिया ।
कुछ तलक बहा मौजों की तलब,
कुछ माजी बनकर कस्ती में ।४।

ख्वाबों की भी  तासीर अजूबी,
एतबार है इनका बेमानी ।
उड़ते हैं  तो छूते अर्श ऊँचाई ,
गिरते तो  औंधे नीची फर्शों में ।५।

क्या साथ निभे हम दोनों का 
क्या हो भी अपनी कहासुनी ?
मन उलझन में उसकी बस्ती ,
मैं अपने गीतों की गलियों में ।६।

कुछ रिश्ते जीवन में ऐसे ,
जैसे नींदो में  सपने हों ।
जब तक बेहोशी, वे कायम ,
टूटें बिखरे जब होशों में ।७।


यह भी उसका अहसान रहा 
जीवन सच अनुभव करा दिया 
कि अपनो से नेह लगाकर 
हम जीते कितने बेमानी में ! ८।

Tuesday, October 30, 2012

हैं दुनियाभर के रंजोगम,फिर भी मुस्कराते रहें।


कितना गम
और 
कितनी खुशी




परिवर्तन जीवन का अपरिहार्य नियम है।हमारा जो भी आज है वह कल कल में बदल जाता है व आने वाला कल एक नया आज लाता रहता है।आज जो हमारा अति प्रिय है,जिसको पाकर हम अति धन्य हैं,जिसके विछोह की कल्पना मात्र से हम अधीर हो सकते हैं,वहीं प्रियतम चीज कल हमसे निश्चय रूप से विलग हो जायेगी।जिन सुख-सुविधाओं के प्रति हमारा आग्रह है,जिनके बिना हम अपने सहज जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते,वहीं सुख-सुविधायें किसी न किसी कारण से हमसे दूर होंगी व हमें नये परिस्थितियों में इन सुख सुविधाओं से रहित जीवन जीना पड़ता है।

सबसे चुनौतीपूर्ण परिवर्तन का सामना तो हमें अपने जीवन में अपने शरीर व स्वास्थ्य को लेकर करना पड़ता है।नयी अवस्था,नया जोश,भरपूर ऊर्जा,लालित्य से भरा चेहरा व अंगप्रत्यंग ऐसा प्रतीत होता है मानों हमें पंख लगे हों,यूँ जैसे हम आसमान में उड़ रहे हो।फिर एक दिन अचानक जब एक व्यक्ति को जब यह पता चलता है कि जिस रूप-रंग-अंग लालित्य पर उसे बड़ा नाज है वह तेजी से क्षिण होने लगे हैं,चेहरा रूपहीन हो रहा है,दाँत टूट रहे है,बाल झड़ रहे हैं,चेहरे पर झुर्रियाँ आ रहीं हैं,घुटने जबाब दे रहे हैं,रक्तचाप बढ़ा हुआ है,और हृदय निरंतर कमजोर हो रहा है और किसी भी दिन इसकी गति अचानक रुक सकती हैं,गुर्दा लीवर जैसे प्रधान अंग लाचार और कमजोर हो रहे हैं और इस कारण शरीर की ऊर्जा व जोश निरंतर क्षिण हो रहा है।

निजी स्वास्थ्य की चुनौतियों के साथ-साथ इसी अवस्था में व्यक्ति के सामने पारिवारिक जिम्मेदारियों व सम्बंधों के स्तर पर भी अनेक चुनौतियाँ व जटिलतायें मुँह बा कर सामने खड़ी हो जाती हैं। अपने जीवनसाथी के स्वास्थ्य की समस्यायें,दाम्पत्यजीवन में अति घर्षण,बच्चों की शिक्षा-दिक्षा व उनका कैरियर,बुजुर्ग माता-पिता का दिनपरदिन बिगड़ता जा रहा स्वास्थ्य,नजदीकी नातों-रिश्तों की खटपट व उनसे संबंधित जिम्मेदारियों के निर्वहन का दायित्व,कुल मिलाकर कहें तो व्यक्ति अंदर और बाहर से,मन और शरीर से पूरा झकझोर दिया जाता है,यूँ प्रतीत होता है मानों अति ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर लगातार दौड़ते जा रहे घोड़े को उसका सवार लगातार कोड़े मार रहा हो कि और तेज दौड़ो,तुम रुक नहीं सकते,तुम थम नहीं सकते,तुम साँस भी नहीं ले सकते।इस तरह व्यक्ति  बेहाल दौड़ता जाता है,जहाँ उसका मन और शरीर दोनों निरंतर घायल व लहूलुहान हो रहा है।कितने रंजोगम,कितनी अकुलाहट,कितनी बेचैनी,मानों दुष्चिंताओं व परेशानियों के गहरे स्याह बादल ही उसके जीवन में उतर आये हों और उसके जीवन का उजाला घटाघोप अँधेरे से ढक सा गया हो।

इन दुविधाओं व दुश्चिंताओं में फँसे विचारश्रृंखलाओं की उलझन में फँसे व्यक्ति के मन के गहरे अंतर्चेतन से भी कभी एक चिंतन की चमकती लकीर मन के सतह पर तैर जाती है।यह व्यक्ति से कुछ गहरे प्रश्न करती है- किस बात से तुम हो दुखी,क्या तुम्हे पता नहीं कि तुम्हारा पूरा जीवनघटनाक्रम एक निरंतर चलचित्र है।जिसको तुम अपना निजी समझते हुये उसपर अधिकार जताते फिरते हो,उसके हमेशा पास रहने का मोह जताते हो, वह वास्तव में कभी तुम्हारा था ही नहीं। जिनको तुम परेशानी,कष्ट,दुख समझते हो और उनसे हमेशा आँख-बचाते, भागते फिरते हो ,उन्ही की माला अंतत: जिंदगी तुम्हारे गले में एक दिन डालेगी और तुम बिना कुछ कर पाने की स्थिति में इन्हीं अवांछित चीजों व परिस्थितियों के साथ जीने को मजबूर होगे।फिर किस चीज पर अधिकार जताना व किस चीज से आँख बचाना।समझो तो सबकुछ तुम्हारा ही है,और ज्यादा समझना चाहते हो तो तुम्हारा तो कुछ भी नहीं है।फिर किसके पास होने का हर्ष और किसके खोने का गम। 

वैसे भी इन सारे तथाकथित दुखों-मुसीबतों के बीच भी यदि व्यक्ति शांत,संयत और स्मितमय बना रहे तो प्राय: संभव कि कल फिर जीवन में आने वाले नये उजालों व खुशियों को वह फिर से पहचान पाये व आनंदित हो सके वरना तो हमेशा दुखी स्वभाव रखने से व्यक्ति को जीवन में अँधेरे का इतना अभ्यास हो जायेगा कि तुम कल के उजाले को भी नहीं सहन कर सकेगा।

इसलिये यह जीवन-चलचित्र हमारे सामने सुख लाता है अथवा दुख,प्रिय लाता है अथवा अप्रिय,हमें सदैव शांत व प्रसन्न रहना है, अक्ष्क्षुण शांति व चिर आनंद ही हमें हमारा स्वभाव बनाना होगा।

जीवन दे चाहे दुनियाभर के रंजोगम हमें फिर भी हम मुस्कराते रहें।

Friday, October 26, 2012

मन विहग क्यों हो विकल !



मन अशांत रहता है,चिंता करता है,विषाद करता है,क्रोध करता है, ईर्ष्या करता है,पश्चाताप् करता है,घृणा करता है,इसकी उद्ग्वीनता व विकलता के न जाने कितने आयाम हैं!

भौतिक व रसायन विज्ञान के कोर्स में पढ़ा था कि चाहे परमाणु हो अथवा कि कोई पिंड, उनकी शांत व संतुलित अवस्था उसकी अंतर्निहित ऊर्जा की पूर्णता की अवस्था में ही होती है,जब तक वह पूर्णता की अवस्था प्राप्त कर नहीं लेता,उसकी अस्थिरता व व्यग्रता बनी रहती है, व वह अनेक क्रियाओं,प्रतिक्रियाओं,गति,टकराव,खंडन,विखंडन, संघर्षण,आवेषण,संग्रह,विग्रह जैसी अनेकों भौतिक व रासायनिक क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं से गुजरता रहता है।जैसे ही वह अपनी अंतर्निहित ऊर्जा की पूर्ण अवस्था प्राप्त कर लेता है,उसका सारा आवेग समाप्त हो जाता है,और शांत,संतुलित,स्थिर होकर स्थाइत्व की चिर-अवस्था में स्थापित हो जाता है।

इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि चाहे एक सूक्ष्म परमाणु हो अथवा छोटा-बड़ा पिंड या पदार्थ,उसकी अंतर्निहित अपूर्णता ही उसके द्वारा किसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया अथवा किसी आवेग-संवेग के व्यवहार का कारण होती है।

विचार करता हूँ तो अनुभव होता है कि यहीं पूर्णता का सिद्धांत हमारे मन के साथ भी लागू होता है।मन हमारा अपूर्ण व अतृप्त है,इसीलिये इतना क्षुब्ध,अशांत व अस्थिर है,हर छोटी बड़ी बात पर आंदोलित व उद्वेगित होता रहता है,क्रिया-प्रतिक्रियाओं के मकड़जाल में उलझा सा रहता है।

इतना ही नहीं,मन विचारों का जनक व प्रधान नियंत्रक होने के कारण, यह हमारे अंदर अनेकों नकारात्मक, अशुभ,अहितकरविचारों को जन्म देता है, जो न सिर्फ स्वयं का बल्कि अपने प्रभाव व व्यवहार क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति के विचारों व कार्य-व्यवहार को प्रभावित करते हैं।यह तथ्य तो हमारे निजी अनुभव से ही सिद्ध हो जाता है कि एक अशांत व्यक्ति के संगत में हम स्वयं कितने अशांत हो जाते हैं,जबकि एक शांत व स्थिरचित्त व्यक्ति के संसर्ग व सत्संग में हमें कितनी शांति,स्थाइत्व व  आनंद का अनुभव होता है।

अब एक मौलिक प्रश्न उठता है कि आखिर हमारा मन इतना अपूर्ण,व नतीजतन अशांत, क्यों है, व इसकी पूर्णता व स्थाई शांति की प्राप्ति का उपाय क्या है? चूँकि यह प्रश्न मनोविज्ञान व आध्यात्म क्षेत्र से मुख्य सरोकार रखता है,और मेरा इस क्षेत्र में कोई औपचारिक ज्ञान नहीं है,अतः इस प्रश्न के उत्तर देने की मुझमें सहज योग्यता नहीं हैं,शायद पाठक स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर मुझसे बेहतर समझते हों।

किंतु व्यक्तिगत अनुभव व स्वाध्याय के माध्यम से जो थोड़ा बहुत इस विषय में समझ पाया हूँ उसके आधार पर तो मेरा तो यही विचार है कि हमारे मन की अपूर्णता का कारण है हमारा स्वयं के प्रति ही अपूर्णता का दृष्टिकोण।हमारा स्वयं के प्रति अहंभाव,एकांगीभाव, कि समष्टि से अलग  हमारा निजी अस्तित्व है, का दृष्टिकोण हमें पूर्ण से अलग व इसप्रकार हमें अपूर्ण व अस्थिर बना देता है।

सत्य तो यह है कि हम स्वयं ही समष्टि हैं और इस सत्य की पुष्टि ईशावाष्य उपनिषद् के निम्न शांति मंत्र से होती है-

ऊँ पूर्णमद:पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

अर्थात् वह ( आत्मा अथवा परमात्मा) पूर्ण(अनंत) है,और यह (जगत्) भी पूर्ण है, और यह पूर्ण उसी पूर्ण से व्युत्पत्त है। इसलिये इस पूर्ण से पूर्ण निकाल लेने पर भी वह पूर्ण मात्र ही बचता है।

इस सत्य के विपरीत जब हम विभेद में जीते है,अपने-पराये की अतिरेक भावना व आग्रह में रहते हैं,तो हमारी अंतर्निहित ऊर्जा अपूर्ण हो जाती है, व इस प्रकार इस अपूर्णता की स्थिति में हमारा मन व चित्तवृत्तियाँ अनेक प्रकार के आवेश,उद्वेग,चिंता-विकलता के आरोह-अवरोह में गिरते-उठते रहते हैं।

यह सिद्धांत के स्तर पर सोचना व तर्क करना तो सहज है किंतु वास्तविक आचरण के स्तर पर अनुपालन उतना सहज नहीं, बल्कि अति कठिन ही है।किंतु इतना तो स्पष्ट होता है कि हमारी सुख-शांति,शारीरिक अथवा मानसिक,मन की शांति व स्थिरता पर ही निर्भर है,और जैसा ऊपर चर्चा हुई,मन की शांति व स्थिरता उसकी पूर्णता की अवस्था में स्थापित होती है।

अतः अपने स्वयं के सुख-शांति की खातिर हमें स्वयं के प्रति अहंभाव,एकांगीभाव का त्याग करके समष्टि में ही, सबके अस्तित्व में ही अपना स्वयं का भी अस्तित्व होने के दृष्टिकोण के साथ जीना सीखना होगा, वरना तो यह मन विकल पक्षी बन भटकता रहेगा व नतीजतन हमारी सुख-शांति भी हमसे दूर ही रह जायेगी।  

Tuesday, September 18, 2012

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।


मन की संकल्पना हो शुभ  और पवित्रमय


Youtube पर ही एक दिन शिवसंकल्पसूक्त की क्लिप मिली जो किसी प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक की  आवाज में थी, तो इन मंत्रों को सुन मन मंत्रमुग्ध हो गया। फिर कुछ ऐसा आभाष हुआ कि इन मंत्रों को तो पहले भी सुना है।

विचारों के अश्व भूतकाल की तलहटी में दौड़ पड़े व कुछ-कुछ यह समझ में आया कि यह तो बचपन में मेरे पैत्रिक-घर के शिव-मंदिर में श्रावण में होने वाले वार्षिक रुद्राभिषेक पाठ में ब्राह्मणपुजारी के द्वारा उच्चरित मंत्र हैं।सारे दृश्य आँख के सामने तैर से गये- श्रावणपूर्णिमा के कुछ दिन पूर्व मंदिर की रंगाई-पुताई में अपने बड़े बाबूजी (ताऊ जी) की सहायता करना,पूजा के दिन बेलपत्रादि,मंदार इत्यादि के पुष्प इकट्ठा करना व पुरोहित जी व अन्य ब्राह्मण पुजारियों द्वारा रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों व श्लोकों के स्वच्छ व प्रवाहमय उच्चारण के साथ बड़े बाबूजी द्वारा पाँच-छः घंटे की लम्बी अवधि तक श्रृंगी की सहायता से गो-दुग्ध द्वारा शिवलिंग का रुद्राभिषेक करना।हालाँकि मंत्रों के गूढ़ अर्थों से कोई परिचय नहीं होता था, किंतु वे कानों में ध्वनिस्वरूप प्रविष्ट कर हमेशा के लिये परिचित अवश्य बन गये।

अब इतने अंतराल के पश्चात् जब ये परिचित-ध्वनि श्लोक सुनने को मिले तो मन में इनका अर्थ जानने की उत्सुकता जगी।संयोगवश घर में आध्यात्मिक पुस्तकों के मेरे लघुसंकलन में गीता प्रेस प्रकाशित रुद्राष्टाध्यायी पुस्तक उपलब्ध थी और सुखद संयोगवश यह पुस्तक संस्कृत श्लोकों के हिंदी अर्थ व व्याख्या सहित है,मेरे मन की जिज्ञाषा की पिपाषा को शांत करने में यह पुस्तक बड़ी ही सार्थक सिद्ध हुई।

रुद्राष्टाध्यायी पुस्तक शुक्ल यजुर्वेद के विशिष्ट प्रधान सूक्तों व मंत्रों- जैसे शिवसंकल्प सूक्त,पुरुषसूक्त,आदित्यसूक्त,वज्रसूक्त,रूद्रसूक्त इत्यादि सहित दस ध्यायों का अद्भुत संकलन है। रुद्राष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय , जिसमें कुल 10 श्लोक हैं, के अंतिम छः श्लोक ही शिव संकल्पसूक्त हैं, जो शुक्ल यजुर्वेद के 34वें अध्याय का अंश है।

शिव संकल्पसूक्त हमारे मन में शुभ व पवित्र विचारों की स्थापना हेतु आवाहन करता है। मन हमारी इंद्रियों का स्वामी है।एक तरफ हमारीं इन्द्रियाँ जहाँ भौतिक विषयवस्तु की तथ्यसूचना प्राप्त करने का कार्य करती हैं, वहीं हमारा मन इन इंद्रियों में ज्ञानरुपी प्रकाश बनकर इन तथ्यों का विश्लेषण कर व उनको निर्देश प्रदान कर हमारे विचारों के रुप में  हमें यथोचित कर्म करने हेतु उत्प्रेरित करता है ।इस प्रकार हमारा मन जितना शुभसंकल्प युक्त है, हमारा जीवन व इसका अभीष्ट कर्म उतना ही शुभ, सुंदर, पवित्र व कल्याणमय होता है।

पाठकों की सुविधा हेतु मैंने रुद्राष्टाध्यायी पुस्तक व इंटरनेट पर प्राप्त हुई जानकारी के आधार पर शिवसंकल्प सूक्त के इन छः अद्भुत संस्कृत श्लोकों व इनके हिंदी में अर्थ यहाँ प्रस्तुत किया है-

 शिवसंकल्प सूक्त
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥१॥

वह दिव्य ज्योतिमय शक्ति (मन) जो हमारे जागने की अवस्था में बहुत दूर तक चला जाता है, और हमारी निद्रावस्था में हमारे पास आकर आत्मा में विलीन हो जाता है,वह प्रकाशमान श्रोत जो हमारी इंद्रियों को प्रकाशित करता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः
यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥२॥

जिस मन की सहायता से ज्ञानीजन(ऋषिमुनि इत्यादि)कर्मयोग की साधना में लीन यज्ञ,जप,तप करते हैं,वह(मन) जो  सभी जनों के शरीर में विलक्षण रुप से स्थित है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।


यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु
यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥३॥

जो मन ज्ञान, चित्त , व धैर्य स्वरूप , अविनाशी आत्मा से सुक्त इन समस्त प्राणियों के भीतर ज्योति सवरुप विद्यमान है, वह मेरा मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥४॥

जिस शाश्वत मन द्वारा भूत,भविष्य व वर्तमान काल की सारी वस्तुयें सब ओर से ज्ञात होती हैं,और जिस मन के द्वारा सप्तहोत्रिय यज्ञ(सात ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला यज्ञ) किया जाता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः
यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥५॥

जिस मन में ऋग्वेद की ऋचाये व सामवेद व यजुर्वेद के मंत्र उसी प्रकार स्थापित हैं, जैसे रथ के पहिये की धुरी से तीलियाँ जुड़ी होती हैं, जिसमें सभी प्राणियों का ज्ञान कपड़े के तंतुओं की तरह बुना होता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  ॥६॥

जो मन हर मनुष्य को इंद्रियों का लगाम द्वारा उसी प्रकार घुमाता है, तिस प्रकार एक कुशल सारथी लगाम द्वारा रथ के वेगवान अश्वों को नियंत्रितकरता व उन्हें दौड़ाता है, आयुरहित(अजर)तथा अति वेगवान व प्रणियों के हृदय में स्थित  मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो।

शिवसंकल्प सूक्त की Mp3 file का लिंक नीचे दिया है। मुझे विश्वास है आप अवश्य इसे सुनकर मेरी ही तरह इन मंत्रों में कुछ क्षणों हेतु खो ही जायेंगे।

अंत में इसी कामना के साथ यहां इति की अनुमति चाहता हूँ कि मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो –

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। 

Wednesday, June 27, 2012

क्रोध से कृतार्थभाव- एक अति दुरूह किंतु सार्थक यात्रा।

आज प्रात: जब सोकर उठा,मन में अकस्मात यह चिंतन जागृत हुआ कि आखिर हमें क्रोध,कभी छोटी बात पर या कभी बड़ी बात पर,आता क्यों है?


मन में निवास करने वाले विचारों की विभिन्न परतें,जो सामान्यरूप में तो परदे के पीछे छिपे सारथी के रूप में मन के रथ को संचालित करती रहती हैं तदनुरूप हमारा आचरण व्यवहार होता है,चिंतन द्वारा एक-एक कर परदे के बाहर आने दिखाई देने लगती हैं।क्रोध के जनक कारण एक एक परतों में खुलकर सामने आने लगे।



प्रथम कारण तो यही सामने आया कि जब कुछ मन की हसरतें उसकी अपेक्षा के प्रतिकूल होता है तब क्रोध आता है।फिर अगला प्रश्न उठा- क्या हैं वे मन की हसरतें  अपेक्षायें, जो कि तनिक भी प्रतिकूल परिस्थिति पाकर क्रोध उत्पन्न करती हैं ? पुन: विचारों की नयी परतें खुलने लगती हैं- मन की आकांक्षाएँ,अपेक्षाएँ हैं मन की असंतुष्टियाँ व अधूरेपन जिनको पूरा करने व कुछ पाने की लालसा व आकांछा,जो अपने पास पहले है अथवा सौभाग्यवश जीवन में उपलब्ध है, इसके लिये मन के अंदर संचित अहंभाव-कभी दूसरों से श्रेष्ठ-जन्म की श्रेष्ठता,कर्म की श्रेष्ठता,धन की श्रेष्ठता,धर्म की श्रेष्ठता, ज्ञान की श्रेष्ठता, शारीरिक श्रेष्ठता, होने का अहंभाव,कभी स्वामित्व अधिकार का अहंभाव, अनेकादि परतों में मन में संचित अहंभाव

दूसरा कारक है मन में संचित असुरक्षा का भाव- प्राप्य में बाधा की असुरक्षा,प्राप्त के खोने की असुरक्षा, इत्यादि अनेकानेक असुरक्षाभाव,और तीसरा कारक है मन में संचित ईर्ष्या का भाव ।इस तरह हमारे अंदर क्रोध के जनक   प्रधान कारक जो मन में संचित हैं- अहंभाव,असुरक्षाभाव ईर्ष्याभाव स्पष्ट दिखने लगते हैं।

क्रोधाग्नि
फिर अगला प्रश्न मन में घुमड़ने लगता है कि क्या क्रोध करने से इसके कारक संतुष्ट होते हैं और फलस्वरूप क्रोध का शमन हो पाता है।विचार की नयी परतें चौंकाने वाला रहस्य सामने लाती हैं कि नहीं कदापि नहीं, क्रोध करने से उसका कारक- यानि मन का अहंभाव या असुरक्षा भाव या ईर्ष्याभाव संतुष्ट और शमन होने के विपरीत और बढ़ते है,बढ़ते ही जाते हैं, ठीक उसी तरह जिसतरह कि अग्नि में घी की आहुति देने से अग्नि और प्रज्वलित होती है।यानि मन में क्रोध का एक दुष्चक्र सक्रिय हो जाता है,और यही कारण है कि एक लघु क्रोध अंतत: एक अतिसय क्रोधाग्नि की ज्वाला में परिणित होकर प्रलयंकारी सिद्ध हो सकता है।

इस चिंतन से यह बात तो मन में स्पष्ट हो जाती है जिन कारणों की तुष्टि के लिये क्रोध किया, वे संतुष्ट व शमन होने के विपरीत और भड़क उठे,यानि क्रोध करने से कोई प्रयोजन सिद्ध होने के विपरीत बात और बिगड़ गयी।यह तो स्वयं के उपहास की स्थिति हो गयी कि जहाँ प्यास बुझाने के लिये कुआँ खोदा और खुद ही उस अंधकूप में गिरकर प्राण संकट में डाल दिये।क्रोध न सिर्फ निष्प्रयोजन है बल्कि स्वयं के लिये ही अनर्थकारी है।

कृतार्थभाव
चिंतन के इस गंभीर तल पर मन के सारे उहापोह समाप्त हो जाते हैं, परंतु मन में फिर भी एक सुखद तृष्णा जागृत होती है कि आखिर वह क्या है जिससे हमे सुख-शांति की तृप्ति प्राप्त हो सकती है,तो अचानक एक अंतर्संकेत प्राप्त होता है कि वह है क्रोध के विपरीत मन में स्थित कृतार्थ-भाव । जो प्राप्त है उसके प्रति अहंभाव रखने के बजाय यदि दाता के प्रति कृतार्थ-भाव उत्पन्न हो जाय, तो अद्भुत सुख व शांति प्रस्फुटित होती है।मन में इस प्रकार का कृतार्थ-भाव होने से सभी प्रकार के अहंभाव, असुरक्षा भाव व ईर्ष्या भाव  स्वाभाविक रूप से स्वतः दूर हो जाते हैं।

जब क्रोध के जनक सभी कारक ही नष्ट हो गये तो फिर मन में क्रोध के जन्म की संभावना ही कहाँ रह जाती है।इसप्रकार क्रोध भाव से कृतार्थभाव की विचार-यात्रा से मन को एक विलक्षण व अद्भुत शांति व स्फूर्ति मिलती अनुभव हुई।

तब तक मोबाइल की घंटी बजती है व मन का यह चिंतन-क्रम सायास भंग हो जाता है।एकाएक मन चौंक उठता है, यह जागृत अवस्था का चिंतन था अथवा स्वप्नावस्था का ।क्या क्रोध से कृतार्थभाव की यह यात्रा इतनी सहज है। क्या मनुष्य के जीवन-अवधि में मन के कोटर में संचित विचार व स्वभाव, जो क्रोध के कारकों का निरंतर पोषण करते आ रहे हैं, उनसे यूँ ही चुटकी में छुटकारा मिल जायेगा, व हम किसी मुक्त विहग की तरह सदैव के लिये मन के सुख-शांति के असीम गगन में स्वच्छंद विचरण करने की स्वंत्रता प्राप्त कर लेंगे।


इस तरह मन फिर से उसी पुराने उहा-पोह में फिर से उलझने लगा।मन के कोने में कुंडली मारे पुराने घाघ- अहं,असुरक्षा व ईर्ष्या के भाव आपस में कानाफूसी करते व सारे इस चिंतन क्रम का उपहास उड़ाते कटाक्ष करते प्रतीत हुये कि उतरो तो असली मैदान में, फिर हम बताते व नापते हैं तुम्हारे इस चिंतन क्रम की गहराई व सामर्थ्य को । बंधु ! यह क्रोध से कृतार्थभाव की चिंतन-यात्रा भले ही बड़ी सार्थक अनुभव प्रतीत हो रही है, किंतु इस पर अमल करना है अति दुरूह

इस प्रतिवाद विचार से मन की दुष्चिंता थोड़ी अवश्य बढ़ गयी, किंतु इस चिंतन क्रम से मन के अंदर ही अदर एक नया आत्मविश्वास , नयी शक्ति व नयी रोशनी भी जागृत होती प्रतीत हो रही है। मन कहता है-भले ही यह रास्ता दुरूह हो, किंतु इस शुभ यात्रा का प्रारंभ करने में हर्ज भी क्या है।