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Friday, September 11, 2015

कच्चे अमरूद

(स्केच नंबर ९)

कच्चे ताजे अमरूद रहे हैं साथी अपने बचपन से,पसंद हम सबके,
चाहे घर के बागीचे में मां के रोपे हुए पेड़ की टहनी पर वे हों लदके,
या स्कूल के रास्ते में बुढ़िया दादी के घर के बागीचे में वे हों लटके,
या स्कूल के प्रांगण में अपने रेसस के टाइम कच्चे अमरूदों को पेड़ों से हम तोड़ा करते,
या फिर  रेलवे के अपने बंगलें के बागीचे के पेड़ों पर कच्चे हरे सजीले दिखते।

उम्र हो गई, फिर भी जो देखें फुटपाथों पर ठेले पर सजे हुए इनको हरे हरे और ताजे,
मुंह में पानी आ जाता, खुद को रोक न पाते, दो-चार छांटते खरीदते खाते,
इनको फांकों में काट, लगाकर नमक मशाले, जो इनको खाते
लाजबाब यह लगते, इनके स्वाद की तुलना क्या है कोई और कर पाते?

कच्चे यह अमरूद होते हैं बड़े कसैले, जो दांतों से काटें खायें,
मगर चबाते बड़े रसीले लगते हैं जितने खट्टे उतने ही हैं मीठे होयें,
मानो वह खुद के अंदर जीवन का दर्शन सारा हो लिये समेटे
कि जीवनपथ पर ऊंचनीच के अनुभव, होते हैं प्रथम बहुत कड़वे और कसैले,
मगर वही अनुभव कल बनते, आगे चलकर  अपने सच्चे साथी, मीठे फल देने वाले,
सही सबक हैं देते , विश्वास, आत्मबल, और जीवन में मनोबल बढ़ाने वाले।

-देवेंद्र दत्त मिश्र
फोटोग्राफ श्री दिनेश कुमार सिंह द्वारा

Thursday, September 10, 2015

कच्चे आंगन की मिट्टी में हराभरा वह कागदी नीबू का पेड़......

(स्केच नंबर ७)

याद आ गया बचपन का वह पेड़ कागदी नीबू,
जो हराभरा रहता था मेरे घर के कच्चे आंगन की मिट्टी में।
तपती गरमी के दिन में जिसकी छाया में मां धूप चढ़े रखती थी
मिट्टी के छिछले से बर्तन में पानी नन्हीं प्यासी गौरेयों की खातिर,
जो सुबह फुदकतीं, मगर धूप में कितनी कुंभला सी थीं जातीं,
हलक सूखते छाया में आकर, पानी पीकर, अपनी प्यास बुझाकर ,
फिर से ताजा होकर वह उस छाया में भरी दुपहरी,
फुदक फुदक कर खूब चहकतीं, और शोर शराबे करतीं।

ढले धूप जब रोज शाम मां ताजे नीबू तोड़ चार छः लाती
कुयें के ताजे ठंडे पानी में वह मीठी शिकंजी बनाती!
और बड़ी गिलास में बड़े नेह से वह पीने को थी देती,
और बड़े मजे से पीते इसको तनमन आत्मा तृप्त हो जाती
और सारे दिन भर की तीखी गर्मी कहीं दूर भूल सी जाती।

दिन हो या हो रात,सभी मर्जों का वैद्यक था वह, और बनता वह हर व्याधि का नाशी
कभी नमक काले संग चूसें,  और कभी शहद संग लेते थे इसको मुंह बासी।
मां मुझको दौड़ाती थी देने थैली में देकर हरे भरे कुछ नीबू,
जो सुन लेती चाचा, ताऊ के घर बीमारी , है बुखार या खांसी।

माह बीतते और हरे से हो जाते यह पीले,
तब मां इनको तोड़ बनाती कई अंचार रसीले
कुछ मिर्ची के इतने तीखे, जिनको खाते आंख से आंसू निकले,
और कुछ मीठे शीरे में डूबे, खट्टे मीठे, खाते आये मुंह में पानी।

मिट्टी के भी कैसे कैसे खेल अजूबे होते,
जहाँ धूप तपती में पत्ते और घास तृण तक जल जाते
वहीं पेड़ यह नीबू का और इसके नीबू फल रहते गरमी में भी लदके,
हरे भरे रहते यह कितने , कितने ताजे ताजे दिखते!

बहुत चमत्कारी होती हैं यह मिट्टी, और इसकी सौगातें,
नहीं पता कि कौन निधि कितने अनमोल कहां से आते
जो छोटा वह बड़ा और जो आज हरा वह कल पीला
बदले रूप-रंग कब कैसे केवल वक्त राज यह जानें, और क्या उसका खेला!
किसमें क्या गुण, और क्या कब अवगुण रहे पहेली समझ न आए !
जो खट्टा रस कल हो मीठा, जो मीठा वह सड़गल जाये, और मिट्टी में मिल जाये।

-देवेंद्र दत्त मिश्र

फोटोग्राफ - Shri Dinesh Kumar Singh  द्वारा

Wednesday, November 28, 2012

कार्तिकपूर्णिमा



आज कार्तिक पूर्णिमा है।जब से होश सँभाला इस दिन के महत्व इसकी पवित्रता को सन्निकट से देखने अनुभव करने का अवसर मिला।कार्तिक माह के प्रथम दिन(दीपावली से पंद्रह दिन पहले)पहले से ही तैयार लिपे-पुते तुलसी के चबूतरे पर शाम को जब माँ घी के दीपक जलाती तो मैं उनके साथ बैठा रहता और बड़ी अधीरता से उनकी पूजा समाप्त होने प्रसाद  में ढ़ी मिश्री चटपट मिलन व खाने की ताक में रहता।

मेरी माँ पूरे कार्तिक माह नियमित शाम को तुलसी की दीपपूजा करती हैं कार्तिकपूर्णिमा की शाम को ढेर सारे घी के दीपक जलाकर पेड़ा इत्यादि विशेष प्रसाद द्वारा सम्पन्न होती है। सच कहें तो कार्तिकापूर्णिमा की शाम हमारे लिये दूसरी दीपावली की तरह ही प्रकाशमय मिष्ठानमय होत।माँ  पूजा समाप्त कर तुलसी माता के गीत गातीं और हम इस उत्साह फिक्र में वहाँ बैठे रहते कि हमारे जलाये घी के दीपक ज्यादा समय तक जलें हवा के झोके सेुझें नहीं,इसी चक्कर में माँ द्वारा इस पूजा के लिये बड़ी मेहनत से घर पर ही  तैयार किया गाय का शुद्ध घी का थोड़ा अपव्यय नुकसान भी हो जाता इससे नाराज भी हो जातीं।

मैं देखता हूँ कि मेरी माँ का पूरे कार्तिक माह ही पूजा व्रत चलता रहता है,वे पूरे माह प्रति रविवार व्रत रहती हैं जिसमें शाम को बस थोड़ा सा गुड़ रोटी खाती हैंढेर सारा घर का काम दिन भर व्रत रहने से कभीकभार अस्वस्थ भी हो जाती हैं, किंतु अभी भी सत्तर वर्ष की उम्र में व्रत के कड़ाई से पालन में कोई मुरव्वत नहीं करतीं हैं।उनके इस शक्ति साहस पर अतिशय आश्चर्य भी होता है चिंता भी।

इसके अतिरिक्त अपने बचपन में यह भी देखता था कि घर के शिवमंदिर में भी कार्तिकपूर्णिमा पर विशेष पूजा हवन होता।गाँव से कई लोग गंगा स्नान हेतु काशी प्रयाग जाते।रेलवे की नौकरी में जब मैं इलाहाबाद में कार्यरत था तो कार्तिकपूर्णिमा को संगमस्नान के लिये जाता था।हालाँकि मैं इतना सौभाग्यशाली धर्मनिष्ठ तो नहीं हूं कि  नियमित गंगास्नान कर पाया हूँ पर जो भी स्वल्प अनुभव किया है उससे कहना चाहूँगा कि प्रात: सूर्योदयकाल में प्रयाग में किये गये गंगास्नान से बड़ा अद्भुत सुख सौन्दर्य आज तक कोई अन्य अनुभव नहीं हुआ।

स्कूल के लिये जब गाँव से शहर गया तब कार्तिकपूर्णिमा का सिक्खधर्म में विशेष महत्व देखने अनुभव को मिला।गुरुनानक देव का जन्मदिन इसको प्रकाशोत्सव पर्व के रूप में मनाने हेतु गुरुद्वारों की बहुत सुंदर सजावट होती और गुरुद्वारे में दिनभर पाठ चलता ।मैं अपने सिक्खधर्म अनुयायी मित्रों के साथ गुरुद्वारे जाता व वहाँ छककर प्रसाद का हलवा खाता,उस प्रसाद का स्वाद आज भी मन में उसी प्रकार ताजा है।

अपने स्कूल के  हिंदीपुस्तक में कार्तिकपूर्णिमा पर एक सुंदर निबंध भी पढ़ा था जिसे प्रसिद्ध कथाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था।इस निबंध में कार्तिकपूर्णिमा के पौराणिक महत्व से लेकर वर्तमान युग में गुरुनानक देव के जन्मदिन होने सिक्खधर्म में इसके विशेष महत्व के अतिरिक्त इस दिन को उन्होने वर्ष का सबसे पवित्र श्रेष्ठ दिन कहा है,जिस दिन स्नान,ध्यान दान द्वारा मनुष्य का तन,मन,हृदय आत्मा सभी तृप्त पवित्र हो जाते हैं।

जब मैं वाराणसी  बीय़चयू में पीजी का छात्र था तब वहाँ की अति प्रसिद्ध कार्तिकपूर्णिमा का गंगास्नान,इस दिन की शाम गंगा में दीपदान,विशेष आरती का आयोजन देखने का सौभाग्य मिला,वह सुंदर व मनोरम दृश्य आज भी मन में स्थाई है।

इसी प्रकार रेलवे के सेवाकाल की शुरुआत में जब मैं बरौनी में पदासीन था, तो वहाँ दिनकरजी की जन्मस्थली सिमरिया व मोकामा घाट क्षेत्र में पूरे कार्तिक माह गंगातट पर भारी संख्या में लोग कुटिया बनाकर कल्पवास करते व शाम को गंगा जी की भव्य आरती का आयोजन होता।इस तरह भारत के विभिन्न राज्यों व क्षेत्र में ही इस पुनीत पर्व को अपने-अपने तरीके से मनाने की प्राचीन परंपरा रही है।

हालाँकि तर्क के स्तर पर देखें तो हमारे जीवन का हर दिन,हर पल बराबर शुभ महत्वपूर्ण है,तरीके से तो हमारे जीवन का प्रत्येक ही दिन कार्तिकपूर्णिमा है,किंतु कुछ विशेष क्षण,विशेष मुहुर्त,विशेष दिन ,जब सृष्टि द्वारा कोई विशेष शुभ पहल होती है,कोई अलौकिक घटना घटित होती है,किसी महान आत्मा का संत के रूप में पृथ्वी पर अवतरण होता है,जो कि मानवसभ्यता के अस्तित्व कल्याण के आधार बनते हैं,तो वे दिन हमारे जीवन में निश्चय ही प्रधान व पवित्र स्थान रखते हैं।

इन पवित्र दिनों को उन्ही महान घटनाओं व महापुरुषों की स्मृति में जप-तप-ध्यान-दान सम्पन्न करने से  निश्चय ही हमारे आत्मा की पवित्रता जाग्रित होती है,और जिससे हमारा मन,शरीर हृदय भी पवित्र स्वस्थ होता है।इसीलिये इस प्रकार के पवित्र दिनों व अवसरों का प्राचीन समय से ही उत्सव-पर्व इत्यादि के रूप में मनाने की हमारी संस्कृति व परंपरा रही है।इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा का दिन भी हमारे संस्कृति व परंपरा में श्रेष्ठतम् स्थान रखता है।

सबको कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें।