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Sunday, December 16, 2018

मन के अंदर चल रहा निरंतर संघर्ष कठिन यह मानव के ...

इच्छाओं के चक्रवात से निरंतर जूझ रहा यह मानव मन
उड़ जाता है अशक्त आत्मबलरहित तिनके के माफिक।
इधर उधर बेचैन कहीं भी, बिना छोर और बिना ठिकाना
दरबदर भटकता व्यग्र बावला भटका राह हो राही एक।

मगर बंधा यह संस्कारों से, अंतर्चेतन के कुछ धागों से,
जुड़ा हुआ यह इनसे जितना जाने या अनजाने में ही,
चेताते यह इसको जब भी यह उड़ता, मनमानी करता
समझाते हैं बतलाते हैं इसे सही क्या और गलत क्या।

राह कौन सी इसकी जाती सुख को और खुशहाली को,
शांति और उन्नति का जो पथ सहज सुरक्षित हो सकता है
और कौन सी राह इसे खड्डे में अवनति में ले जाएगी,
कल बन सकती काल, विनाश और अनहोनी का कारण।

मन की मनमानी और अंतर्चेतन के बीच यह संघर्ष निरंतर जारी रहता है मानव मन के अंदर प्रतिपल प्रतिक्षण
मानव का अंतर्चेतन है जब तक विजयी,है लगाम हाथ
तब तक जीवन में सब शुभ होता सुख फलदायी होता है।

वरना मन जो है प्रचंड और चलती उसकी ही मनमानी
अपने अंतर्चेतन ध्वनि की करते हुए अवहेलना उपेक्षा
संतापों का होआमंत्रण अवसादों का होना अपरिहार्य
फिर है विनाश का आमंत्रण, निश्चित अनिष्ट संभावित है।
#देवेंद्र

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Thursday, September 10, 2015

जो नीम नीम, वही है हकीम!

जो नीम नीम, वही है हकीम!

(स्केच नंबर ५)  ७ सितंबर २०१५

हरे भरे दिखते कितने तुम ,
जो समीप वह छाया पाता।
मस्त पवन संग मस्त झूमते ,
सावन तुझको अंग लगाता। १।

सावन की बहती पुरवाई ,
और ललनायें झूला झूलें।
तेरी हर डाली मचल मचल,
कजरी पचरा के गीत ढलें।२।

यूं दिखते हो सुंदर भावन ,
जब लद जाते हैं पुष्प धवल।
तव अंग अंग ऐसा सजता, कि
मां दुर्गा का फैला हो आंचल ।३।

पर तेरी हरीतिमा सुंदरता ,
है अंदर समेटे कड़वापन ।
फिर निमकौली से सजते जब,
तीक्ष्ण गंध असहज करती मन। ४।

मानव जीवन भी कुछ तेरे जैसा ,
कितने कड़वेपन और सारे गम ।
फिर भी हर अनुभव नयी सीख,
जो नीम नीम, वही है हकीम ।५।

जो बाहर से मीठा लगता,
वह अंदर से कड़वा होता ।
जो देता ऊपर दर्द बहुत ,
वह अंदर से है सुख दे जाता। ६।
#Devendra Dutta Mishra

फोटोग्राफी - श्री Dinesh Kumar Singh  द्वारा