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Sunday, March 25, 2012

मौन थे ल़ब तो हृदय ने गीत गाया.....




दृष्टि के उन्माद में जलता रहा मैं,
शेष केवल रह गयी है भष्म मेरी।
काल के दृढ़ पृष्ठ पर ढलता रहा मैं,
है लहू से रिक्त अब हर शिरा मेरी। 1।

जो अपरिचित शब्द हैं वे गीत मेरे ,
परिचित प्रतिध्वनि आ रही है  शोर बनकर ।
मैं तो था एक रहगुजर  गुमनाम सा,
कुछ निशानी शेष हैं पदचिह्न बनकर ।2।

छोर जिनको छोड़कर मैं दूर निकला,
गहन जकड़े हैं मुझे जंजीर बनकर।
शस्त्र मेरे तरकशों में रिक्त हैं अब,
स्वयं मुझको बींधते अरि-तीर बनकर।3।

तुम कहे थे छोड़ दूं मैं हृदय वीथि,
मैं तो तेरा शहर ही हूँ छोड़ आया।
तुम कहे तो दफ्न खुद को कर दिया,
(किंतु)मौन थे लब तो हृदय ने गीत गाया।

अनगिनत पहेलियाँ हम बूझते पर
आसान सी जीवन पहेली में उलझते।
सहजता से सुलझ जाते छोर सारे,
खींचने से उलझे धागे कब सुलझते।5।

 

Friday, November 25, 2011

मौन,शांति और सत्य....


(मेरी यह छोटी सी भेंट उन महापुरुषों को समर्पित है जो सत्य बोलने का साहस रखते हैं व न्याय की स्थापना के लिये निरंतर संघर्षरत हैं।)


मौन शांति है,मौन सहमति,
यह तो प्राय: ही भ्रम होगा।
शांति-मौन या तटस्थ-मौन ?
पहले भेद समझना होगा।1

निर्भयता ही सत्यनिरूपित,
भयमन क्या सच कह पाता है?
सच तो है शिव भी सुंदर , पर
सत्य भयावह भी होता है।2

न्याय बिना, हर-जन-सुख के बिन,
शांति रही बेमानी ही है।
न्यायरहित यह शांति ढोंग है,
गलाघोटती बंधन ही है।3

अशांत मौन की होगी ही
ऊँची यह प्राचीर तोड़नी।
बहुधा सच के चित्कारों में,
बसती है शांति की जननी।4

बहुत रह लिये तटस्थ मौन तुम,
अब तो सच कहना ही होगा।
त्याग मखमली सुविधा पथ
यह,अंगारों पर चलना होगा।5

पर सावधान सच के संग ही,
हिंसात्याग निभाना होगा।
सत्य कहो पर उद्वेग-रहित हो,
अहं-त्याग भी करना होगा।6

Tuesday, November 22, 2011

.......मैं अपनी ही धुन में गाता ।


मुखर मौन, विराम शब्द जब,
कौन राग मैं गीत सुनाऊँ।
जगत यदि यह है भ्रमपूरित,
फिर किसको मैं सच कह पाऊँ।1।

रीता स्वरूप, आगमन अपूर्ण,
छाया क्या  अभिव्यक्ति कहे?
क्रंदन के ऊँचे स्वर,फिर भी
वेदना मेरी अव्यक्त रहे।2

अधरों का गतिमय होना क्या,
मौन रहे जो नयन तुम्हारे।
कलियाँ खिल सौरभ क्या दें
जो विमुख हुयीं बसंत-बयारें  ।3।

संवेदना सहज क्या मिलती,
हृदय शुष्क जो तेरा रहता।
जल के बीच निरा व्याकुल
चातक बस प्यासा ही मरता।4।

नूपुर की घ्वनि में खो जाते
हैं आह वेदना हत-पग के स्वर ।
अंतर्दाह शांत क्या कर पाते
गतिमय वात डोलाते चँवर।5।

आश्वासन अपने क्या देते,
जब शब्द-तीर संघात किये।
कँवच मेरी क्या रक्षा करता,
निज खड्गों ने ही आघात दिये।6।

नियति- दिशा का अनुभव है पर
विषम पथों पर ही मैं चलता
माना मेरे गीत अनसुने,पर
मैं अपनी ही धुन में गाता।7।

पतित हो रहा स्व-उलझन में ही,
माना मेरा तुम उपहास करोगे।
चोट मर्म से जो आंसू छलके,
(शायद) आँचल से आँसू भी पोंछोगे।8।