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Saturday, August 27, 2016

जीवन पथ पर चलते चलते....

जीवन पथ पर चलते चलते....

(Translated from the English Poem - As I Walk Through Life by great English Poetess Emily Adams)

जीवन पथ पर चलते चलते
मैंने यह सीखा और जाना,
कि वर्तमान पल को जी लेते,
जो आवश्यक और उचित वही करते
बच जाते भावी दुखसंतापों से।१।
I've learned-
that you can do something in an instant
that will give you heartache for life.

मैंने सीखा यह और जाना
कि अपनों से जब भी विदा लिए
कर लेते साझा दो प्रेम बोल
है कौन जानता पल कल को
फिर मिलें कभी या नहीं मिलें
हो मिलना यह अंतिम पता नहीं।२।
I've learned-
that you should always leave
loved ones with loving words.
It may be the last time you see them.

मैंने सीखा यह और जाना
कि चलते रहना ही जीवन है
हों पांव थके, दम उठ आए
हिम्मत भी साथ विदा लेती,
फिर भी संकल्प लिए मन में
चलते रहना, बढ़ते रहना है।३।
I've learned-
that you can keep going long after you can't.

मैंने सीखा यह और जाना
कि जीवन में जो भी कर्म किया
उनकी जिम्मेदारी निज की है,
चाहे हों कितनी असफलताएं
चाहे कितने अवसाद मिले
पर दोष और को क्यों दूं मैं? ४।
I've learned-
that we are responsible for what we do,
no matter how we feel.

मैंने सीखा यह और जाना
कि निज मनोवृत्ति और आदत पर
अनुशासन और नियंत्रण आवश्यक है
काबू में रखना  उनकी लगाम
वरना स्वच्छंद हुए यदि वे
तो हो जायेंगे खुद उनके काबू में।५।
I've learned-
that either you control your
attitude or it controls you.

मैंने सीखा यह और जाना
कि जीवन की उपलब्धि का मापदंड
धनअर्जन मात्र नहीं होता
आवश्यकता भर तो यह आवश्यक होता
पर जीवन के मूल्यों और रिश्तों का
केवल धन स्थान न ले सकता।६।
I've learned-
that money is a lousy way of keeping score.

मैंने सीखा यह और जाना
कि  जीवन के निधि अनमोल मित्र
हों मसले कोई गंभीर, कठिन या फिर
बातें बस हों हंसी ठिठोली की
जो मित्र साथ में अपने हों तो
पल कैसे बीते न यह पता चले।७।
I've learned-
that my best friend and I can do anything
or nothing and have the best time.

मैंने सीखा यह और जाना
कि चाहे जो भी हालात बने
भली बुरी बातों के पल में
खुशी और नाराजगी लाजिमी है
पर कितने भी क्रोधित आवेशित हों
मन में मानवता, सहिष्णुता रहे कायम।८।
I've learned-
that sometimes when I'm angry
I have the right to be
angry, but that doesn't give me
the right to be cruel.

मैंने सीखा यह और जाना
कि विश्वास प्रेम की थाती है
हो सकता न अपेक्षित प्रेम मिले
आवश्यक न सब मनमाफिक हों
फिर भी आश्वस्त रहें मन कि
अंतर्मन में सबके है प्रेमभाव ।९।
I've learned-
that just because someone doesn't love you the
way you want them to doesn't mean they
don't love you with all they have.

मैंने सीखा यह और जाना
कि अपनों से ही गहरी चोट मिले
जीवन में यदि रिश्ते हैं,अपने हैं
तो उनका टकराना स्वाभाविक है
पर सबको सहेज, अपनाना है
धीरज रखते और क्षमा किये।१०।
I've learned-
that no matter how good a friend is,
they're going to hurt you every once
in a while and you must forgive them for that.

मैंने सीखा यह और जाना
कि औरों से क्षमा आवश्यक है
पर यह ही केवल पर्याप्त नहीं
इससे भी महत्वपूर्ण और आवश्यक
है यह कि औरों को हम भी
कर सकें क्षमा सहृदयता से।११।
I've learned-
that it isn't always enough to
be forgiven by others,
Sometimes you have to learn
to forgive yourself.

मैंने सीखा यह और जाना
कि रिश्ते कमजोर न बातों से
दो जन हैं तो बातें होंगी ही, और
स्वाभाविक खटपट और नोकझोंक
बातों में चाहे कितना मतभेद रहे
पर दिल का संगम बना रहे।१२।
I've learned-
that just because two people argue, it doesn't
mean they don't love each other.

जीवन के पथ पर चलते चलते
मैंने सीखा यह और जाना
कि दृश्य एक पर दो जन में
अंतर दृष्टिकोण का रहता है
इस दृष्टिकोण के अंतर से भी
आपसी सामंजस्य बनाये रहना है।१३।
I've learned-
that two people can look at
the exact same thing
and see something totally different.

जीवन के पथ पर चलते चलते
मैंने यह सीखा है और जाना है।१४।

-देवेंद्र

Thursday, September 10, 2015

चांद की राह, कुछ फूलों की कुछ खारों की!

चांद की राह, कुछ फूलों की कुछ खारों की!
(स्केच न. २)

कितना उदास सा होता है,
चांद का यह अकेला सफर!
सब कुछ सोया हुआ,
खामोश गुमनामी में खोया हुआ!
क्या आसमान क्या धरती
क्या पेड़ और क्या पक्षी
क्या नदियां क्या पहाड़
क्या मैदान और क्या बीहड़
मगर चांद जागता है, रात भर चलता है
क्या ठंडी, क्या गर्मी यात्रा पूरी करता है
चाहे अमावस का हो अंधेरा या पूनम का उजाला,
मंदिर का सोया शिखर, या रास्ते में जागती मधुशाला
कभी आहट से, कभी सरपट से
चलता है, कभी इस क्षितिज से कभी उस क्षितिज से
कभी सागर के इस पार, कभी उस पार
रास्ते में क्या फूल और क्या खार
कहता है अपनी खामोशी में, चलने का संकल्प है
क्या फर्क यह कि निर्धारित यह यात्रा दीर्घ या अल्प है।
-देवेंद्र

फोटो - श्री Dinesh Kumar Singh द्वारा

Sunday, June 23, 2013

जब तक पथ,यात्रा है तबतक……

पथिक अंतगति राह समाहित

पथिक मिलेगा पथ पर अपने 
और भला क्या उसका ठौर ?
चलना ही उसका जीवन है ,
दिवस, रात्रि, संध्या क्या भोर।1

पथिक नियति है बँधी राह से
साझा पदचापों का जोर 
साक्षी बन पथ स्थिर रहता ,
पथिक पग बढ़े मंजिल ओर ।2

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जीवन बहता नदी सदृश है 
धारा मध्य किनारे छोर ।
कर्म गति बन बहे निरंतर,
बंधन बाँधे रिश्तों की डोर3

जीवन प्राण,हृदय स्पंदित 
रंध्र नासिका श्वास की डोर ।
दोनों  की गति में  स्थिर है,
परमतत्व परमात्म विहोर4 

-----------------------------------
      
पथ से क्या मैं आँख चुराता
पथिक अंतगति धूल राह की।
पथ व पथिक एकनिष्ठ जब 
पूर्ण ध्येय जीवन  यात्रा की ।5


जीवन लक्ष्य बदलते रहते, 
अपनी राह बदलता कब तक।          
ध्येय सिद्ध यात्रा  क्या संभव 
जब तक पथ , यात्रा है तबतक।6

Monday, December 17, 2012

घने मेघ के मध्य कहीं जो दिखती एक रजत रेखा.......

घने मेघ के मध्य  कहीं  जो दिखती एक रजत रेखा


जीवन में प्राय:
ऐसे क्षण आते हैं,
जब सब कुछ होता दिखता प्रतिकूल
अपेक्षाओं व उम्मीदों से कतई विपरीत,
जब असफलता दिखती हर पग पर,
अनिश्चितता व निराशा के काले घने मेघ
करते अंधकार जीवन पथ पर ,
और नहीं दिखती है आगे की राह,
प्रश्न अनेकों मन में
हैं  उठती आशंकायें भविष्य के प्रति,
कि क्या होगा ,कैसा होगा जीवन-पथ आगे मेरा

किंतु इस घने मेघ के मध्य
दिखती है एक रजतरेखा,
देती संकेत उस प्रकाश-ज्योति की
जो छिपी हुई है बादल के पीछे
और जगाती मेरे अंतर्मन में
एक ज्योति मयी प्रदीप्त दामिनी
नव आशा और विश्वास लिये
कि चाहे कितना ही तम छाया हो,
पर दिप्त सूर्य की ज्योति अटल ,
जो स्थाई है,
उसकी उदित किरणों से
छँट जाते हैं काले बादल अवश्यमेव ही।

और वही स्थाई ज्योतिपूर्ण सविता बन
होती है दीप्तमान अंतर्मन में मेरे,
देती यही संदेश निरंतर,
कि हूँ मैं सदैव तुम्हारा पथप्रदर्शक,
जो संकल्पयुक्त तुम जीवन-पथ पर आगे बढ़ते हो।

तो मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ
अपने अंतर्चेतन की इस ज्योति की उँगली थामे
मन में विश्वासों की नयी शक्ति भर,
कि मंजिल अवश्य मिलती हैं,
जो यात्रा का मन में है संकल्प निरंतर ।

Wednesday, June 27, 2012

क्रोध से कृतार्थभाव- एक अति दुरूह किंतु सार्थक यात्रा।

आज प्रात: जब सोकर उठा,मन में अकस्मात यह चिंतन जागृत हुआ कि आखिर हमें क्रोध,कभी छोटी बात पर या कभी बड़ी बात पर,आता क्यों है?


मन में निवास करने वाले विचारों की विभिन्न परतें,जो सामान्यरूप में तो परदे के पीछे छिपे सारथी के रूप में मन के रथ को संचालित करती रहती हैं तदनुरूप हमारा आचरण व्यवहार होता है,चिंतन द्वारा एक-एक कर परदे के बाहर आने दिखाई देने लगती हैं।क्रोध के जनक कारण एक एक परतों में खुलकर सामने आने लगे।



प्रथम कारण तो यही सामने आया कि जब कुछ मन की हसरतें उसकी अपेक्षा के प्रतिकूल होता है तब क्रोध आता है।फिर अगला प्रश्न उठा- क्या हैं वे मन की हसरतें  अपेक्षायें, जो कि तनिक भी प्रतिकूल परिस्थिति पाकर क्रोध उत्पन्न करती हैं ? पुन: विचारों की नयी परतें खुलने लगती हैं- मन की आकांक्षाएँ,अपेक्षाएँ हैं मन की असंतुष्टियाँ व अधूरेपन जिनको पूरा करने व कुछ पाने की लालसा व आकांछा,जो अपने पास पहले है अथवा सौभाग्यवश जीवन में उपलब्ध है, इसके लिये मन के अंदर संचित अहंभाव-कभी दूसरों से श्रेष्ठ-जन्म की श्रेष्ठता,कर्म की श्रेष्ठता,धन की श्रेष्ठता,धर्म की श्रेष्ठता, ज्ञान की श्रेष्ठता, शारीरिक श्रेष्ठता, होने का अहंभाव,कभी स्वामित्व अधिकार का अहंभाव, अनेकादि परतों में मन में संचित अहंभाव

दूसरा कारक है मन में संचित असुरक्षा का भाव- प्राप्य में बाधा की असुरक्षा,प्राप्त के खोने की असुरक्षा, इत्यादि अनेकानेक असुरक्षाभाव,और तीसरा कारक है मन में संचित ईर्ष्या का भाव ।इस तरह हमारे अंदर क्रोध के जनक   प्रधान कारक जो मन में संचित हैं- अहंभाव,असुरक्षाभाव ईर्ष्याभाव स्पष्ट दिखने लगते हैं।

क्रोधाग्नि
फिर अगला प्रश्न मन में घुमड़ने लगता है कि क्या क्रोध करने से इसके कारक संतुष्ट होते हैं और फलस्वरूप क्रोध का शमन हो पाता है।विचार की नयी परतें चौंकाने वाला रहस्य सामने लाती हैं कि नहीं कदापि नहीं, क्रोध करने से उसका कारक- यानि मन का अहंभाव या असुरक्षा भाव या ईर्ष्याभाव संतुष्ट और शमन होने के विपरीत और बढ़ते है,बढ़ते ही जाते हैं, ठीक उसी तरह जिसतरह कि अग्नि में घी की आहुति देने से अग्नि और प्रज्वलित होती है।यानि मन में क्रोध का एक दुष्चक्र सक्रिय हो जाता है,और यही कारण है कि एक लघु क्रोध अंतत: एक अतिसय क्रोधाग्नि की ज्वाला में परिणित होकर प्रलयंकारी सिद्ध हो सकता है।

इस चिंतन से यह बात तो मन में स्पष्ट हो जाती है जिन कारणों की तुष्टि के लिये क्रोध किया, वे संतुष्ट व शमन होने के विपरीत और भड़क उठे,यानि क्रोध करने से कोई प्रयोजन सिद्ध होने के विपरीत बात और बिगड़ गयी।यह तो स्वयं के उपहास की स्थिति हो गयी कि जहाँ प्यास बुझाने के लिये कुआँ खोदा और खुद ही उस अंधकूप में गिरकर प्राण संकट में डाल दिये।क्रोध न सिर्फ निष्प्रयोजन है बल्कि स्वयं के लिये ही अनर्थकारी है।

कृतार्थभाव
चिंतन के इस गंभीर तल पर मन के सारे उहापोह समाप्त हो जाते हैं, परंतु मन में फिर भी एक सुखद तृष्णा जागृत होती है कि आखिर वह क्या है जिससे हमे सुख-शांति की तृप्ति प्राप्त हो सकती है,तो अचानक एक अंतर्संकेत प्राप्त होता है कि वह है क्रोध के विपरीत मन में स्थित कृतार्थ-भाव । जो प्राप्त है उसके प्रति अहंभाव रखने के बजाय यदि दाता के प्रति कृतार्थ-भाव उत्पन्न हो जाय, तो अद्भुत सुख व शांति प्रस्फुटित होती है।मन में इस प्रकार का कृतार्थ-भाव होने से सभी प्रकार के अहंभाव, असुरक्षा भाव व ईर्ष्या भाव  स्वाभाविक रूप से स्वतः दूर हो जाते हैं।

जब क्रोध के जनक सभी कारक ही नष्ट हो गये तो फिर मन में क्रोध के जन्म की संभावना ही कहाँ रह जाती है।इसप्रकार क्रोध भाव से कृतार्थभाव की विचार-यात्रा से मन को एक विलक्षण व अद्भुत शांति व स्फूर्ति मिलती अनुभव हुई।

तब तक मोबाइल की घंटी बजती है व मन का यह चिंतन-क्रम सायास भंग हो जाता है।एकाएक मन चौंक उठता है, यह जागृत अवस्था का चिंतन था अथवा स्वप्नावस्था का ।क्या क्रोध से कृतार्थभाव की यह यात्रा इतनी सहज है। क्या मनुष्य के जीवन-अवधि में मन के कोटर में संचित विचार व स्वभाव, जो क्रोध के कारकों का निरंतर पोषण करते आ रहे हैं, उनसे यूँ ही चुटकी में छुटकारा मिल जायेगा, व हम किसी मुक्त विहग की तरह सदैव के लिये मन के सुख-शांति के असीम गगन में स्वच्छंद विचरण करने की स्वंत्रता प्राप्त कर लेंगे।


इस तरह मन फिर से उसी पुराने उहा-पोह में फिर से उलझने लगा।मन के कोने में कुंडली मारे पुराने घाघ- अहं,असुरक्षा व ईर्ष्या के भाव आपस में कानाफूसी करते व सारे इस चिंतन क्रम का उपहास उड़ाते कटाक्ष करते प्रतीत हुये कि उतरो तो असली मैदान में, फिर हम बताते व नापते हैं तुम्हारे इस चिंतन क्रम की गहराई व सामर्थ्य को । बंधु ! यह क्रोध से कृतार्थभाव की चिंतन-यात्रा भले ही बड़ी सार्थक अनुभव प्रतीत हो रही है, किंतु इस पर अमल करना है अति दुरूह

इस प्रतिवाद विचार से मन की दुष्चिंता थोड़ी अवश्य बढ़ गयी, किंतु इस चिंतन क्रम से मन के अंदर ही अदर एक नया आत्मविश्वास , नयी शक्ति व नयी रोशनी भी जागृत होती प्रतीत हो रही है। मन कहता है-भले ही यह रास्ता दुरूह हो, किंतु इस शुभ यात्रा का प्रारंभ करने में हर्ज भी क्या है।