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Friday, March 13, 2015

योग और 'चंट' योग

टीचर- पप्पू ! योग और चंट योग में क्या अंतर होता है ?

पप्पू -  मैडम ! योग शारीरीक व्यायाम , व प्राणायम ( श्वास- प्रश्वास) की एक उत्तम विधि है । योग करते समय सीजन के अनुरूप सरल और ढीला वस्त्र धारण करना होता है । यह तन और मन की एक उच्च साधना है जिसमें यम-नियम ,आहार विहार और आचार-विचार का पालन करना होता है , जिससे व्यक्ति का मस्तिष्क व शरीर स्वस्थ और मजबूत होता है ,किसी प्रकार के अवसाद व  विभिन्न शारीरिक व मानसिक बिमारियों से मुक्ति मिलती है ।

इसके विपरीत चंट योग मन . चेहरे व शरीर के अभिनय व भावभंगिमा की वह विधि है जिसे व्यक्ति को मौन धारण करने या बोलते समय खाँसने के नियम का पालन करना होता है , कभी सिर पर पगड़ी तो कभी टोपी और मफलर धारण करना होता है , कभी अनसन, कभी धरना तो कभी सड़क पर मोर्चा निकालता पड़ता है , मौके के मुताबिक व्यक्ति को झूठ , पाखंड , दूसरों की निंदा व छिद्रान्वेषण , अपने बड़े से बड़े घटिया काम को महान सिद्ध करने की कला और चतुरता दिखानी होती है । इस योग से व्यक्ति को सत्तालाभ , ऊँचे सिंहासन पर बैठने का लाभ मिलता है । मैडम ! शास्त्रों के मत से वर्तमान कलयुग में 'चंट'योग बड़ा ही प्रभावकारी व उपयोगी है और जीवन में सफल होने हेतु एक सिद्ध व उत्तम योग विधि के रूप में जाना जाता है । संयोगवश यह दोनों ही योग विधियों का जनक हमारा महान देश भारत ही है , जहाँ इन्हें हमारे कई महान ॠषियों , मुनियों व योगियों ने इनको इजाद व विकसित किया ।

टीचर- उन प्रसिद्ध ॠषियों व योगियों के नाम बताओ जिन्होंन इन महान योग व चंटयोग विधियों का ईजाद किया और इनके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया?

पप्पू - क्या मैडम ! आप तो बड़ी चंट हैं । सब जानते हुये भी उन महान लोगों का नाम मेरे ही मुँह से सुनना से  चाहती हैं ?

टीचर- ( अचकचाते हुये )अच्छा बैठ जाओ ।

( और पप्पू अपने सीट पर बैठ जाता है और अपना कान खुजाते यह गणित लगाने लगता है कि टीचर का अगला प्रश्न क्या होगा । )

अगले प्रश्न का इंतजार करें । ..........

Thursday, March 12, 2015

दूल्हा एक , सरसठ बाराती ....

चंट गुरु , प्रचंट हैं चेला
खाते गुड़ बताते ढेला ।
परदे के आगे हरिश्चंद और
पीछे जारी तिकड़म खेला ।

एक कलंदर चालीस बंदर
राजा बाँटे तिल गुड़धानी ।
हरा समुंदर गोपी चंदर ,
बोल मेरी मछली कितना पानी ?

दस बीस चालीस पचास
साठ पैंसठ सब सत्यानास ।
सरसठ हाथ चमकता धागा
चोर बन गया है राजा खास ।

राजा सिर पर मफलर बाँधे
जो मुँह खोले आती खाँसी
धाम-धूम और सजीली घोड़ी
पैदल दूल्हा घुड़चढ़े बराती ।

एडी दुड़ी तिड़ी चौवा चंपा
सेख सुतेल नापें सौ डंडा ।
तगड़ी चाँप मियाँ जी मारें
दिन भर खेलें गिल्ली-डंडा ।

ए बी सी डी इ एफ जी
उनसे निकले खंडित जी ।
खंडित जी की ढीली पैंट ,
बिना दाँव के जीतें बाजी ।

Friday, February 20, 2015

खाँसी और जनसंवेदना....

हमारे देश के एक आमपरिवार में एक आमआदमी के घर में एक आमबालक ने कभी जन्म लिया , पढ़नेलिखने में अत्यंत मेहनती , अध्यवसायी और प्रतिभावान और अपनी इस योग्यता के बदौलत देश के योग्यतम शिक्षणसंस्थान से शिक्षा प्राप्त कर देश की उच्चतम सेवा प्रतियोगिता योग्यता से उत्तीर्ण करके देश की उच्च प्रशासनिक सेवा में तैनात हुआ ।

कुछ कारणवश उसे यह सरकारी नौकरी रास नहीं आुई , और वह कुछ वर्षों पश्चात् अपनी इस उच्च व सम्मानित नौकरी और पद का त्याग करते समाज और जन सेवा कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया , उसने आमजनता के सरकारी कामकाज में होने वाली धाँधली और हीला हवाली के खिलाफ , सरकारी कामकाज व फाइल की आम आदमी को सूचना व जानकारी के अधिकार के लिये जनआंदोलन चलाये , जिसके आगे सरकार व तंत्र को भी झुकना और कानून बनाना पड़ा , जिस खातिर उसको देशविदेश में नाम , ख्याति और प्रसिद्धि और पुरस्कार अर्जित हुये।

इन शुरुआती सफलताओं से उसका जनआंदोलन में आत्मविश्वास बढ़ता गया ।  अब उसका अगला लक्ष्य था नये जन आंदोलन , नयी प्रसिद्धि की प्राप्ति। इसी बीच उसकी दृष्टि एक ऐसे जनांदोलन और उसके अगुआ बुजुर्ग युगपुरुष पर पड़ी जो सरकारी कामकाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के खात्मा हेतु सरकार के विरुद्ध जन-आंदोलन शुरू किया था , वह बुजुर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार द्वारा कड़े कानून की माँग लेकर देश में जगह जगह . विशेषकर देश की राजधानी में , आमरण अनशन कर रहा था जिसको देश की जनता का , विशेषकर देश की नव महात्वाकांक्षी युवावर्ग , का भारी समर्थन मिल रहा था। उसे यह उपयुक्ततम् अवसर लगा और वह फौरन इस आंदोलन व आंदोलन के अगुआ युगपुरुष की छतरी के प्रश्रय में आ गया ।

जनआंदोलन में मिली उसकी प्रसिद्धि और  उत्कंठा अब धीरे धीरे उसकी राजनीतिक प्रसिद्धि व उसकी सत्ता की महात्वाकांक्षा  और उत्कंठा में परिणित होने लगी ।  उसने झटपट खुद की एक राजनीतिक पार्टी गठित कर ली ,पार्टी का प्रतीक चिह्म भी झाड़ू रखा , जिससे कि सामाजिक और आर्थिक रुप से हासिये पर ऱह रहे आम और गरीब जनमानस से वह प्रतीकात्मक रूप से सीधे जुड़ सके और उनकी सहानुभूति और समर्थन पा सके , और वह इसमें बहुत शीघ्र और तेज सफल रहा ।

स्वयं को मिल रहे भारी जनसमर्थन और लोकप्रियता के कारण वह अपने बुजुर्ग पैट्रन युगपुरुष के साये से बाहर निकलकर अब स्वयं ही जनता के बीच युगपुरुष बन गया , और इस देशव्यापी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन की राजनीतिक अगुआई करने लगा।

उसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ साथ उसके शारीरिक भावभंगिमा व व्यवहार में भी कुछ खास परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे । वह जैसे ही किसी जनसंवेदना या समस्या को अनुभव करता , या  वह  किसी जनमुद्दे या समस्या पर कोई परिचर्चा शुरू करता उसे खाँसी आनी शुरु हो जाती । वह खाँसी के बढ़ते प्रकोप का कारण चढ़ती उतरती सर्दी गरमी के मद्देनजर सिर पर कागज की टोपी और गले और कान पर हमेशा  मफलर लपेटे रहता । उसके जनआंदोलन  की बढ़ती लोकप्रियता के साथ साथ उसकी बात बात में खाँसी , सिर पर कागज की टोपी और गले और कान पर लपेटा मफलर भी जनांदोलन का प्रचलित ट्रेडमार्क और फैसन बन गया ।जब कभी कोई उससे उसके बात बात में खाँसी का कारण व उसके निदान के उसके किसी प्रयास की चर्चा करता तो वह यही उत्तर देता कि वह बहुत उपचार करा लिया , बहुत से नामी गिरामी डॉक्टरों को दिखाया परंतु खाँसी ठीक ही नहीं होती । 

आखिरकार उसका राजनीतिक आंदोलन बढ़ता, निखरता और प्रसिद्ध होता चला गया , वह जनता के बीच एक युगपुरुष का अवतार , भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मुखर आवाज और भ्रष्ट सरकारी तंत्र से त्रस्त  जनता के लिये एक जनमसीहा और उम्मीद बनकर देश की राजधानी के राजनीतिक आकाशपटल पर धूमकेतु के मानिंद छा गया । वह देश , शहर , समाज में व्याप्त जनसमस्याओं की चर्चा करता , उनके कारण और जड़ में भ्रष्ट राजनेताओं को दोषारोपित करता और स्वयं को जनता की उम्मीद बताकर ,जनता द्वारा स्वयं को पाँच साल की सत्ता  का अवसर दिये जाने पर जनता के लिये काम करने और उनकी सारी समस्याओं के निवारण , सबको मुफ्त बिजली , पानी , मँहगाई से मुक्ति इत्यादि के आश्नासन देता । उसके आश्वासनों के कारण , व अन्य राजनीतिक दलों के नाकारेपन से निराश हो चुकी , जनता के बीच वह दिन दूना और रात चौगुना जनप्रिय होता गया ।

जनता के मन में उसकी भारी लोकप्रियता के समक्ष सभी राजनीतिक धुरंधर और शक्तियाँ माचिस की तीली के बने किले की मानिंद बिखर गये और वह देश की राजधानी राज्य के चुुनाव में  जनता द्वारा सर्वविजयी और सर्वोपरि बनाते राजसत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ और पदासीन हो गया ।

स्वयं राजा बनने के बाद उसके खुद के ही शासन और सत्ता में उसके लिये अब एक नयी दुनिया प्रस्तुत थी । अभी तक तो वह जनता को सपनों का प्रलोभन व आश्वासन देता आया था , अब उन्हीं सपनों को साकार करने की उसके सामने चुनौती थी । जिन समस्याओं - गरीबी , बेरोजगारी , बिजली , पानी , मँहगाई , भ्रष्टाचार की आवाज और नारे देकर वह अपने विपक्षी राजनीतिक दलों पर प्रहार करता था और जनता की तालियाँ और उनके समर्थन की हुँकार अर्जित करता था अब उन्हीं समस्याओं को खुद सुलझाने व समाधान देने की उसकी ही बारी और जिम्मेदारी थी । जो जनता कल तक उसके पीछे पीछे चलते उसके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ नारे देते घूमती थी , अब वही जनता की भीड़ उसके दफ्तर और घर के सामने अपने समस्या की गुहार और फरियाद लेकर भीड़ जमा करने लगी । वह जनता की गुहार और फरियाद सुनता मगर कुछ समाधान और राहत नहीं दे पाता । वह समस्याओं के निराकरण हेतु कुछ भी प्रभावी न कर पाने की निराशा अपने कल तक की अंधभक्त समर्थक जनता के चेहरे पर स्पष्ट देख सकता था ।  कल तक जिन समस्याओं को स्वयं जनता के बीच गिनाते वह इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाया करता था , अब जनता द्वारा उन्हीं समस्याओं की चरचा और फरियाद सुनते बहाने बनाता , उनके न हो सकने के पक्ष में तर्क करता या उनको नजरंदाज कर देता ।

वह कुछ भी प्रभावी न कर पाने से स्वयं भी बड़ा निराश सा दिखने लगा था परंतु साथ ही साथ उसकी शारीरिक भावभंगिमा में भी काफी रोचक व चमत्कारिक परिवर्तन आने लगे । अपनी कागज की टोपी तो वह सत्तासीन होने के दिन ही परित्याग कर दिया था परंतु कुछ दिन तक उसकी बातबात में खाँसी और मफलर लपेटने की आदत और स्टाइल चालू रही । मगर वह जैसे जैसे जनता की समस्याओं को नजरंदाज करने लगा उसकी खाँसी में चमत्कारिक सुधार होने लगा , सत्तासिंघासन पर बैठे बमुश्किल महीेने भर हुये कि उसकी खाँसी लगभग बिल्कुल ठीक हो गयी , जहाँ उसको पहले दिन में भी सर्दी लगती और कान और गले पर मफलर लपेटकर रहना होता , अब तो वह प्रायः बिना  मफलर बाँधे ही रहता और उसकी कनपटी पर पसीने की चुहचुहाहट व सफेद बूँदें दिखती । इस प्रकार वह अद्भुत युगपुरुष भी सिंहासन पर बैठने के चंद सप्ताह के अंदर ही बिना खाँसता , बिना मफलर लपेटे एक सहज और साधारण आभिजात्य राजनेता व राजपुरुष की तरह दिखने लगा ।

अब वह युगपुरुष अपनी भक्त जनता को देखकर जोश में आकर न तो ' इंकलाब जिंदाबाद ' के नारे ही लगाता और न ही अपनी बेसुरी आवाज में पह़ले की भाँति कोई देशभक्ति के गाने ही गाता । अब तो उसके आम जन समर्थकों को भी उसमें और अन्य साधारण राजनेताओं में अंतर और फर्क करने में कठिनाई अनुभव होती ।

वह युगपुरुष जनता व जनसमर्थन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते व उनका इस्तेलाम करते अब पहले के एक आम जननेता से परिवर्तित होकर स्वयं भी अपने विरोधी सहराजनेताओं की ही तरह एक अभिजात्य व सधा जनसंनेदनहीन राजनेता बन गया ।

Sunday, October 27, 2013

सिरहाने बैठकर पैंताने की बात करने वालों के मिथ्याचार को समझें !


बड़ा ही अजीब लगता हैं जब सिरहाने बैठे लोग  पैंताने बैठे लोगों की बात करते हैं ।महात्मा गाँधी यदि  पैंताने बैठे लोगों की बात करते थे, तो वह यह बात पैंताने बैठकर ही  करते थे न कि सिरहाने बैठकर , उनके कथनी करनी, सिद्धांत व आचरण  में एकनिष्ठता थी।

कुछ लोग अपने नाम के साथ  गाँधी सरनेम लगाकर मात्र लफ्फेबाजी करके  महात्मा  गाँधी दिखने व बनने  का ढोंग करते हैं व गाँधी के नाम से देश को,विशेषकर गरीब तबके को, गुमराह करने की कोशिश करते हैं , उनके इस पाखंड व मिथ्याचार को देश व देश की जनता को भलीभाँति समझना चाहिए ।

यह ध्यान देने की बात है कि पैंताने बैठे व्यक्ति की कोई जाति या मजहब नहीं होता, उसकी तो बस एक ही जाति व एक ही धर्म है और वह है गरीबी का, लाचारी का और निरंतर करते जीवन  संघर्ष का ।महात्मा गाँधी इस सत्य व इसकी पीड़ा  को अंतर्मन व हृदय से समझते थे  इसी लिए वे  स्वयं  एक अति गरीब व साधारण व्यक्ति का जीवन व रहनसहन स्वेच्छा से अपनाकर स्वयं भी वैसा ही सरल व अति साधारण  जीवन  जीते थे । परंतु बड़ी  हैरानी व खेदजनक बात यह है कि आज सिरहाने बैठे लोग ही बड़ी चतुराई, कुटिलता व अपने भावनोत्तेजक शब्द जाल से पैंताने बैठे लोगों को बड़ी सहजता से जाति व मजहब में बाँटकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में सफल हो रहे  हैं, व आम व लाचार आदमी को अपने साथ हो रहे  इस छल व धोखा का अहसास भी नहीं हो पा रहा ।

मैं यह नहीं कहता कि सिरहाने बैठे लोगों को राजनीति करने  व राजनीति में भाग लेने का अधिकार व योग्यता नहीं, यह तो एक लोकतांत्रिक देश में  हर व्यक्ति, देश वासी का मौलिक व संवैधानिक अधिकार है, परंतु यहाँ मुद्दा है व्यक्ति के  कथनी करनी के विभेद का, उनके पाखंड का ।आप एकतरफ गोल्फ कोर्स में जाते हैं  , बस ब्रांडेड कपड़े जूते पहनते हैं, अपनी दिनचर्या की छोटी से बड़ी जरूरत व सामान की खरीददारी विदेश में करते हैं, अपनी अधिकृत या अनधिकृत  कमाई विदेशी स्विस बैंक की तिजोरियों में जमा करते  हैं, बड़ी बड़ी इंपोर्टेड विदेशी कार में घूमते हैं, इंपोर्टेड बाइक से अपनी गैंग के साथ हाईवे पर देर रात  हाईस्पीड रेस व स्टंटबाजी करते हैं,यह सब करना आपको अच्छा लगता है व आपका शौक है तो इन्हें  आप जरूर व बेशक करिये , यह आपकी मर्जी व आपका मुकद्दर है, इसमें कोई बुराई भी नहीं, जब तक कि आप देश के  कानून के अंतर्गत रहकर आचरण करते हैं, मगर फिर आपके मुँह से गरीब, गरीबी ,गरीबों की कहानी बड़ा पाखंडपूर्ण व मिथ्याचार लगता है ।आप जो जीवन जी रहे हैं, उसकी बात करिये न, अपने जीवन शैली व आपसे जाती तौर पर जुड़े ग्रुप व क्लास की बात करिये न! आप रईस  हैं, शौक मिजाज हैं,  आप रईसी ढाटबाट व विदेशी स्तर का जीवन जीते हैं तो आप इस जीवन शैली से जुड़ी बात करिये न!  यह गरीब व गरीबी की बात आपके मेनुबुक में कहाँ से शामिल हो गयी? अपनी जीवन शैली से विपरीत जीवन व उसके आदर्श बघारने का यह पाखंड क्यों? क्या यह हक आपको इसलिए मिल जाता है कि आपने अपने  नाम के आगे  गाँधी सरनेम,जो कि आपका असली नहीं बल्कि अपने स्वार्थ व सुविधा हेतु दूसरे से अपनाया हुआ है,  जोड़ रखा है? क्या यह आपका कोरा ढोंग व भारत की गरीब जनता के साथ धोखेबाजी नहीं है?

यहाँ कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण व गंभीर हैं जिसे हर भारतीय  को स्पष्ट व पूरी तरह समझ लेना बहुत आवश्यक है ,क्योंकि यहाँ राजनीति से जुड़े ऐसे प्रधान  व्यक्ति या व्यक्तियों  के चरित्र, आचरण, व कर्म की निष्ठा का प्रश्न है, जो कल देश की जनता द्वारा चुने जाकर, जनता के प्रधान प्रतिनिधि बनकर, देश व देश की जनता के भाग्यविधाता बनने वाले हैं ।इसलिए  क्या हर भारतीय को यह जानना व समझना जरूरी नहीं कि वे अपना देश व इसकी बागडोर किस प्रकार के चरित्र व आचरण वाले  लोगों के हाथ सौंपने जा रहे हैं, वे सत्य निष्ठ लोग हैं अथवा मिथ्याचारी, इन बातों को जान लेना  देश के हर नागरिक को न सिर्फ  आवश्यक बल्कि देश के प्रति महत्वपूर्ण कर्तव्य भी है ?

प्रथम बात तो यह कि महात्मा गांधी का गांधी नाम असली था, न कि किसी पहले से ही अति प्रसिद्ध अथवा महान व्यक्ति के नाम से अपनी सुविधा व स्वार्थ हेतु मात्र अपनाया गया कोई नकली नाम ।यदि देश गांधी नाम का सम्मान करता है व पूजता है तो यह महात्मा गांधी के स्वयं की महानता व देश के प्रति महान कर्तव्य व समर्पण के कारण है न कि किसी उधार में अपनाये गये किसी और के प्रसिद्ध नाम की आड़ में ।दूसरी बात यह कि महात्मा गांधी   यदि गरीब और गरीबी की बात करते थे तो इसमें पाखंड नहीं था, बल्कि  उनका स्वयं व अपने परिवार  का  रहनसहन, वेषभूषा, खानपान, आचरण सभी अति साधारण, एक आम व गरीब आदमी की ही तरह था, उनके कथनी व जीवन शैली में एकनिष्ठता थी।तीसरी बात यह कि महात्मा गांधी सिर्फ गरीब की ही नहीं हर व्यक्ति की समूचे देश, सभी जाति,सभी मजहब, सभी समुदाय की बात करते थे, वे सबको ही सद्चरित्र व सादगी पूर्वक रहने की सलाह देते थे ।चौथी और अंतिम बात मात्र गरीबों व गरीबी संबंधित बिल और एक्ट के पैरोकार बनने या इसका ढिंढोरा पीटने मात्र  से कोई गरीबों का मसीहा नहीं होता, मसीहा तो वह होता है जो गरीब के दर्द की अनुभूति व पीड़ा को स्वयं व स्वेच्छा से जीता हो, जैसे जीसस, मदर टेरेसा या महात्मा गांधी ।बड़ी हवेली में मखमल के आरामगद्दे पर लेटकर गरीब व गरीबी के प्रति आत्मीयता व हमदर्दी जताना कोई  सदाचार व मानवता  नहीं बल्कि यह  शुद्ध मिथ्याचार व घोर  पाखंड है ।

इन महत्वपूर्ण तथ्यों के मद्दनजर हर भारतीय को  सिरहाने बैठकर पैंताने की बात करने वालों के  मिथ्याचार को भलीभाँति समझने व तदनुरुप ही अपने विवेक द्वारा अपने  चुनाव के  सही  निर्णय लेने की आवश्यकता है ।

Wednesday, July 31, 2013

क्या पुलिस व प्रशासन के लिये धर्मनिरपेक्षता का मायने यही है ?

सत्यमेव जयते ?
क्या हमारे संविधान- शिल्पियों ने  इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप  को वर्तमान विभत्सता हेतु ही गढ़ा था ?


लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता के प्रति सामान्य रूप से आस्थावान भारतीय बहुसंख्यक वर्ग की हृदय, आत्मा व सहनशीलता को झँकझोरती व चुनौती देती यह दो दिनों के अंदर हुईं देश के अंदर दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं -

1.दिल्ली में एक किशोर युवा गौरव पांडेय को मोटरसाइकल स्टंटबाजी के गुनाह में पुलिस उसे निर्दयता व बेरहमी से सरेआम गोलियों से भून देती है, जबकि वही पुलिस एक खतरनाक आतंकवादी को भी उसके किसी धर्म विशेष से जुड़े होने के नाते उसे पकड़ने या उसके विरुद्ध कार्यवाही करने में हिचकिचाती और हीलाहवाली करती है ।

2.
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री एक युवा व कर्मठ आइ ए यस महिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को इसलिए निलंबित करते हैं कि उसने अपनी ड्यूटी ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा से करते एक विशेष समुदाय द्वारा सार्वजनिक सरकारी भूमि पर अवैध रूप से निर्मित पूजा भवन को तुड़वा दिया, जबकि उन्हीं मुख्य मंत्री महोदय की अपनी सरकार के ही एक मंत्री जो एक विशेष समुदाय से ताल्लुकात रखते हैं खुलेआम धर्म के नाम पर देश द्रोह तक कर देने की चुनौती देते हैं उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही तो दूर उन्हें ऐसा न करने का निर्देश या औपचारिक हिदायत तक नहीं देते। 

हमारे संविधान ने हमारे देश को धर्म निरपेक्ष रखा है ताकि सभी धर्म, बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक, बराबर अधिकार व आजादी से रहें किंतु यह घटनाएं भारतीय बहुसंख्यक वर्ग की धर्म निरपेक्षता में उनकी आस्था को झँकझोर देने वाली हैं ।

यह धर्म निरपेक्षता है या धर्म भेदभाव पूर्णता , जबकि कानून व न्याय की शपथ लेने वाले व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के स्थान पर तैनात लोग व संस्था ही धर्मविशेष के आधार पर सही गलत का फैसला और सजा निर्धारित कर रहे हैं ?

बहुसंख्यक वर्ग के विरुद्ध सत्ता का इतना दुरुपयोग व भेद भाव का आचरण , विशेष कर न्याय व कानून के मामलों में, तो शायद मुगल व ब्रिटिश सल्तनत में भी नहीं हुआ था जबकि सत्तासीन विदेशी थे और वे बहुसंख्यक वर्ग के धर्म से गैर व इनके विरोधी थे।

ऐसा प्रतीत होता है कि देश के वर्तमान सत्तालोलुप व स्वार्थी राजनीतिक वातावरण में हमारा स्वयं अपने देश व मातृभूमि में ही अपना जीवन व आस्था अब सुरक्षित व सुनिश्चित नहीं है ।