Tuesday, December 25, 2012

कुछ डिप्रेसिंग व कुछ इंस्पायरिंग.....


कब्बन पार्क-बंगलौर - प्रातःकाल की अलौकिक सुंदर छटा


इस वर्ष के बीतने में चंद दिवस ही बाकी हैं व नयावर्ष आने को है,यह समय प्रत्येक व्यक्ति हेतु बीते वर्ष में लिये गये रिजोलुसन्स व अन्य निर्धारित लक्ष्यों के प्रति उपलब्धि का लेखाजोखा करने व नये वर्ष हेतु नये रिजोलुसन्स लेने व नये लक्ष्य निर्धारित करने का समय होता है।

वैसे मैं अपने जीवन में कभी इतना नियमबद्ध,अनुशासित व दृढ़संकल्पयुक्त तो नहीं रहा कि हर नये वर्ष कोई नया रिजोलुसन लेता हूँ व उसको प्राप्त करने हेतु जी-जान से प्रयास करता हूँ, परंतु इस वर्ष की शुरूआत में अपने हेतु तीन छोटे-मोटे लक्ष्य रखे थे- पहला तो था अपना शारीरिक वजन आठ से दस किलो घटाना , दूसरा था कार ड्राइविंग सीखना और तीसरा था कन्नड़ भाषा सीखना।किंतु तीनों निर्धारित लक्ष्यों में मेरा प्रदर्शन अच्छा तो दूर , संतोषजनक भी नहीं रहा।

हुआ यूँ कि पिछले जनवरी वार्षिक हेल्थचेकअप में वैसे तो प्रभु कृपा से(हाँ प्रभुकृपा ही कह सकते हैं जब कोई निजी व विशेष प्रयास नदारद हो) सब कुछ सामान्य निकला, सिवाय की डाक्टर की हिदायत थी कि मेरी 5 फीट आठ इंच की हाइट के मुताबिक मेरा वर्तमान 77 किलो वज़न,सामान्य से लगभग दस किलो ज्यादा है, अतः मुझे अपने डाइट में कुछ बदलाव व अपनी दिनचर्या में थोड़ा शारीरिक व्यायाम व सुबह की सैर शामिल करना चाहिये।

शाकाहारी होने व खान-पान  भी अति साधारण ही होने के नाते मेरे ओवरवेट का कारण डाइट तो कम पर सिडेंटरी ( शारीरिक श्रमरहित) जीवनशैली ही ज्यादा जिम्मेदार लगती है।कुछ दिन तो सुबह की सैर व सूर्यासन इत्यादि की शुरुआत व इसका क्रम जारी रहा , परंतु पुरानी जड़ता व आलस्य-स्वभाव,व कुछ-न-कुछ घरेलू परेशानियों के बहाने के कारण ,सब ब्रेक हो गया व जिंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर चलने लगी, नतीजन इस दिशा में प्रगति भी सीफर ही रही।इसी प्रकार ड्राइविंग भी संतोषजनक स्तर तक नहीं सीख पाया।कन्नड़ थोड़ा बहुत पढ़ने- लिखने का तो अभ्यास हुआ है किंतु बोलने व बातचीत करने में तो अभी भी प्रगति लगभग शून्य ही हैं।

विगत सप्ताह रेलवे विभाग के एक शीर्षस्थ अधिकारी दिल्ली से बंगलौर दौरे पर आये तो उन्होंने परले सुबह कब्बनपार्क में सैर करने की इच्छा व्यक्त की व उन्हें सुबह साढ़े-पाँच बजे पार्क ले जाने व उनकी सुबह की सैर में साथ रहने की जिम्मेदारी मुझे सौपी गयी। उन साहब की तेजतर्रार छवि व रोबदार व्यक्तित्व के बारे में मैं सुना था अत: इस जिम्मेदारी को निभाने व किसी भी प्रकार की त्रुटि न होने की में मन में भारी घबराहट थी।

सर शेषाद्रि अय्यर स्मारक लाइब्रेरी, कब्बनपार्क
सुबह के छः जब हम  कब्बन पार्क पहुँचे तो वहाँ सुबह की सैर करने वालों की सामान्य चहलपहल थी। सुबह-सुबह कब्बन पार्क जाने व वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य व सैर का आनंद लेने का मेरा भी यह प्रथम अनुभव था, और यह यह निश्चय ही अद्भुत था। साहब के सैर करने की चाल काफी चौकस व तेज थी, उनकी तेज चाल के साथ मिलकर चलना मेरे लिये लगभग असंभव हो रहा था और उनके साथ सैर करने के दस मिनट पश्चात् ही मेरी हालत पस्त हो गयी और मैं पिछड़ने लगा। संयोगवश एक अन्य सहयोगी अधिकारी व एक रक्षाकर्मी साथ में थे जो साहब के साथ सैर में साथ देते रहे अन्यथा तो मेरे लिये बड़ी ही शर्मसार स्थिति हो गयी थी।

उन्होने मेरी इस शारीरिक अनफिटनेस पर मुझे खूब लताड़ा।उन्होंने तकरीबन डेड़ घंटे की तेज सैर पूरा करने के पश्चात ही विश्राम लिया व फिर उन्होने शारीरिक फिटनेस, इससे संबंधित अपने निजी अनुभव की अनेक महत्वपूर्ण बातें व नसीहतें बतायी जो निश्चय ही चकितकारी थीं। उन्होंने मुझसे पूछा कि इससे पहले मैं उनसे कब मिला था व उनमें क्या परिवर्तन देखता हूँ,तो मैंने अपने स्मरण के आधार पर बताया कि पिछली बार मैं उन्हे दिल्ली में 2006 में देखा था और तब वे काफी ओवरवेट दिखते थे और अब दिखता है कि उन्होंने अपना काफी वजन कम किया है।

उन्होंने कहा मात्र काफी कम नहीं, बल्कि विगत पाँच वर्षों में उन्होंने अपना 41 किलो वजन कम किया है। फिर उन्होंने एक अनुभवी डॉक्टर व कुशल डाइटिसियन की तरह विभिन्न खाद्य व पेय पदार्थों की कैलोरी मात्रा व सही निर्धारित डाइट व दिनचर्या के बारे अनेक महत्वपूर्ण बातें बतायीं।मैं अचंभित व सहमा सा उनकी बातें ध्यान से सुनता रहा।अंत में उन्होंने अपने इस कड़ी हिदायत के साथ अपनी बात समाप्त की व कब्बनपार्क से विदा लिया कि मुझे नियमित प्रतिदिन एक घंटे की सैर,शारीरिक व्यायाम,योगाभ्यास करना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि अगली बार जब उनसे मिलूँ तो मैं शारीरिक रूप से बिल्कुल फिट हूँ।

बंगलौर में ही मेरे एक अन्य सहयोगी अधिकारी व धनिष्ठ मित्र हैं,जिनकी विगत जनवरी के स्वास्थ्यपरीक्षण में कुछ असामान्य रिपोर्ट आयी थी व अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ दिनों तक वे बड़े चिंतित भी थे, उन्होंने विगत दस-ग्यारह महीनों में अपने खानपान व नियमित सुबह की सैर की सहायता से अपना 9-10 किलो बजन कम किया है और वे अब काफी स्वस्थ व फिट दिखते हैं। वे भी एक अति दृढ़संकल्पी व लगनशील व्यक्ति हैं व उन्हें मैं हमेशा नयी विधाओं व कुशलता,जैसे पुस्तकलेखन करने,गिटार बजाना सीखने,नयी शैक्षणिक उपाधियाँ अर्जित करते रहने में हमेशा तल्लीन देखता रहा हूँ।

इसी प्रकार विगत माह मेरा छोटाभाई , जो वाराणसी में रहता है, बंगलौर आया व उससे मैं वर्षों बाद मिला तो उसे अचंभित सा उसे देखता रहा कि उसने अपना वजन 10-12 किलो कम कर लिया है, व जैसे उसकी छात्रजीवन की शारीरिक फिटनेस फिर से वापस आ गयी हो।इसी प्रकार मेरे कई सहयोगी,साथी व परिचित हैं जिनका अपना शारीरिक फिननेस व संतुलित शारीरिक वजन बनाये रखना मुझे अचंभित सा करता है।

जब ऐसे अति दृढ़संकल्पी, सक्षम व कर्मशील लोगों से मुलाकात होती है तो निश्चय ही स्वस्थ रहने व शारीरिक रूप से फिट रहने की प्रेरणा व उत्साहवर्धन के साथ ही साथ थोड़ा डिप्रेसन भी अनुभव होता है कि इस दिशा में मैं स्वयं कितना कमजोर-संकल्प-शक्तिवान व नाकारा व्यक्ति हूँ।हाँ आप समझ ही सकते हैं कि जब मैं नये साल के रिजोलुसन के बावजूद व सालभर बीत जाने के पश्चात् भी अपना दस किलो तो दूर, दो-तीन किलो वजन भी नहीं कम कर पाया,ड्राइविंग जैसे साधारण पर अति उपयोगी कुशलता को भी ढंग से नहीं सीख पाया,या बंगलौर में जहाँ रहते हुये पाँच साल से ज्यादा हो गये पर यहाँ की स्थानिय भाषा कन्नड़ भी अभी तक बोलचाल के स्तर पर नहीं सीख सका, तो अपने इस नाकारेपन , नालायकी व संकल्पशक्क्ति की कमजोरी का अहसास मन को थोड़ा डिप्रेस  भी करता है।

फिर भी मूलतः व सत्य तथ्य तो यही है कि जब आप अपने किसी परिचित,मित्र अथवा घर के सदस्य को कुछ असंभव सी उपलब्धि हासिल करते देखते हैं तो आपको एक अद्भुत व नयी प्रेरणाशक्ति हासिल होती है जो आपको भी इसी प्रकार असंभव से लगने वाले लक्ष्य को भी हासिल करने के लिये प्रयास करने का हौसला व आत्मविश्वास देती है व आप नये जोश के साथ अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने का गंभीर प्रयास करने लगते हैं।

नये वर्ष पर आप अवश्य ही नये रिजोलुसन्स लेने की तैयारी कर रहे होंगे, परंतु मुझे तो अब भी अपने पुराने साल के अधूरे लक्ष्यों को ही पूरा करना है।आशा करता हूँ कि कम से कम नये वर्ष में अपने मित्रों , सहयोगियों की चमत्कारिक उपलब्धियों के प्रेरणास्वरूप मैं भी अपने निर्धारित अधूरे लक्ष्यों को अवश्य प्राप्त कर पाऊँगा।

स्वयं के साथ सबको नये वर्ष की मंगलकामना कि सब के निर्धारित लक्ष्य व मनोकामनायें पूरी हों, सभी स्वस्थ,प्रसन्न व मंगलमय हों।   

Thursday, December 20, 2012

आशा-विश्वास धारयेत् सदा.......


आशा व विश्वास का प्रकाश जीवन में आवश्यक व अपरिहार्य है।

मैं लगभग दो वर्षों से इस ब्लाग पर लिख रहा हूँ। यह तो नहीं कह सकता कि मैं बहुत नियमित व नियमबद्द होकर लिख पा रहा हूँ, किंतु फिर भी वक्त की अनुमति व परिस्थितियों के सामंजस्य में जितना हो पाता है, अवश्य लिखते रहने का स्वयं के साथ किया गया सहज संकल्प निभ रहा है।इस लेख को लिखते समय यह सुखद व संतोषप्रद अनुभूति हो रही है कि यह मेरे ब्लॉग की दो सौवीं पोस्ट है। आप कोई भी कार्य हृदय से करते हों, तो उस कार्य की यात्रा में प्राप्त होने वाले इस प्रकार के मील के पत्थर निश्चय ही एक विशेष व उत्साहवर्धक क्षण होते हैं। इससे नियमित लिखते रहने हेतु आत्मविश्वास व निरंतर प्रेरणा प्राप्त होती है।

लेखन हेतु सकारात्मक विषय, सुखद घटनायें,जीवनयात्रा में निरंतर प्राप्त हो रहे सुंदर अहसास  व अनुभव निश्चय ही प्रेरणाश्रोत होते हैं, किंतु दुर्भाग्यवश हमारा जीवन व इस संसार का अनुभव सदैव सुखद ही तो नहीं होता, बल्कि बहुधा जीवन में कई बार दुखद,निराशाप्रद, व जीवन के प्रति आशा व विश्वास की दृढ़ नींव को हिलाने वाली घटनाये भी अनुभव करनी व देखनी ही पड़ती हैं। किंतु जीवन के ये नकारात्मक अनुभव भी कई बार मन को इतना झँकझोर कर रख देते हैं कि उनके कारण मन इतना उद्वेलित हो उठता है कि इनसे मन में उठने वाले भावुक विचार लेखन में भी स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त हो जाते हैं।

हाल के दिनों में इसी प्रकार की कुछ दुखद घटनायें घटित हुई हैं, जिनकी कल्पना मात्र ही मन को झँकझोर देती है।कुछ दिन पूर्व अमरीका के एक स्कूल में एक मानसिक रूप से विछिप्त युवक द्वारा बीस-बाईस मासूम स्कूली बच्चों का खुलेआम बंदूक की फायरिंग द्वारा नरसंहार इसी प्रकार की दुखद घटना है जो मन को विचलित कर देती है। किंतु उससे भी आहतकारी,दुखदायी व स्तंभित करने वाली घटना हमारे देश की ही राजधानी, नई दिल्ली , में घटित हुई है, जिसमें एक युवा छात्रा के साथ चलती हुई बस में ही बस के कर्मचारियों व उसके सहयोगियों द्वारा वहसी जानवरों की तरह बलात्कार व हिंसा की वारदात गयी , और वह लड़की शरीर व मन दोनों स्तर पर बुरी तरह से घायल व छत-विछत सफदरजंग अस्पताल में जिंदगी व मौत से अभी भी जूझ रही है ।  यह घटना न सिर्फ हमारे देश के लिये एक शर्मनाक व कलंकपूर्ण हादसा है, अपितु यह संपूर्ण मानवता व मानवीय-सभ्यता में विश्वास के ताने-बाने व आधार को झँकझोर देने वाली घटना है।

एक सभ्य समाज व शांतिस्थापित राज्यव्यवस्था में यह स्थाई धारणा व विश्वास अपेक्षित है कि एक आम आदमी, स्त्री हो या पुरुष, अपने मन में बिना किसी आंतरिक भय व असुरक्षा के कहीं भी आ जा सके,नियमानुकूल अपनी जीवन-चर्या अपनी इच्छानुरूप जीने की आजादी रखे।यदि आमनागरिक इस आजादी व सुरक्षा से वंचित है, तो फिर कैसी यह राजव्यवस्था व कैसी इस समाज की सभ्यता।इस अराजक स्थिति को भला एक संवैधानिक राजव्यवस्था कैसे माना जा सकता है।

हालाँकि चोरी,डकैती ,अराजकता किसी भी समाज व राज्य में सर्वकाल से वर्तमान रहे हैं,किंतु किसी सभ्य व न्याय-आधारित समाज में, विशेष तौर पर उसके अति आबाद , विकसित क्षेत्रों ,विशेषकर  देश की राजधानी  अथवा बड़े शहरों जैसे प्रधान स्थानों,में आम आदमी कमोवेस अपनी सुरक्षा व निर्भय जीवनचर्या के प्रति आश्वस्त होता है। विश्व के विकसित देशों ,उनके बड़े शहरों में भी, भले ही हिंसा व अराजकता की छिट-पुट घटनायें विभिन्न कारणों से घटित होती रहती हैं, किंतु वहाँ एक सामान्य नागरिक,बिना किसी भेदभाव के,स्त्री हों या पुरुष, अपनी सामान्य सुरक्षा के प्रति आश्वस्त रहता है।इसके पीछे प्रधान कारण यही है कि भले ही अराजकता, हिंसा , अपराध की कोई घटना होती हो,फिर भी वहाँ लोगों को वहाँ की पुलिस व कानूनव्यवस्था पर पूरा विश्वास होता है कि है वहाँ कोई भी अपराधी अपराध करके दंडित हुये बिना  बच नहीं सकता । इसी कारण वहाँ अपराधी भी कोई अपराध करने में पुलिस व कानून से काफी खौफ खाते हैं। वहाँ जो भी अपराध की घटनायें यदा-कदा होती भी हैं, तो वे पेशेवर अपराधी व अराजक व्यक्तियों द्वारा कम बल्कि मानसिक रूप से विछिप्त, पागलपन के शिकार व आत्मघाती लोगों द्वारा ही ज्यादा घटित होती हैं। अमरीका में घटी घटना इसी श्रेणी में आती हैं। जबकि हमारे देश में होने वाली अपराध व बलात्कार की घटनायें, जैसा कि हाल ही में दिल्ली में घटित हुई है,पेशेवर अपराधियों व अराजक तत्वों का पुलिस-सुरक्षा-कानून व दंड व्यवस्था के प्रति बेखौफ रवैये के कारण है, जो अति गंभीर व चिंताजनक स्थिति है, और जिसे किसी भी सभ्य व न्यायसंगत राज्यव्यवस्था के अंग के रूप में तो कतई स्वीकारा नहीं जा सकता।

वैसे भी देखें तो इस तरह की घटना दिल्ली के लिये कोई नयी बात नहीं है।यदि आप दिल्लीवासी हैं अथवा कुछ वर्ष आप दिल्ली में निवास किये हों तो निश्चय ही आपका दिल्ली के इस वहसी व डरावने चेहरे की एकाध झलक से अवश्य साबका पड़ा होगा।दिल्ली देश की राजधानी होने के नाते न सिर्फ देश का राजनीतिक अखाड़ा है अपितु यह जघन्य अपराधों, हिंसक घटनाओं, विशेषकर महिलाओं पर यौन-हमलों,हिसा ,बलात्कार जैसी क्रूर घटनाओं का भी केंद्र है।इस  तथ्य के आधार पर यह आकलन करने में हमें कोई गुरेज नहीं होना चाहिये कि राजनीतिक चंडाल-चौकड़ी व हिंसा-अपराध-बलात्कार में चोली-दामन के संबंध होता है।

वैसे तो किसी भी राजव्यवस्था में कानून व शांति व्यवस्था की स्थापना व इसका निरंतर व प्रभावी नियमन एक कठित चुनौतीपूर्ण कार्य हैं किंतु यह भी उतना ही सत्य है,और जैसा कि पहले बताया व विकसित व सभ्य देशों के उदाहरण से पुष्ट होता है ,कि यदि राज्य की न्याय व सुरक्षाव्यवस्था दक्ष व सक्रिय हो,किसी भी नियमउल्लंघन अथवा अराजक कार्य के विरुद्ध कठोर निर्धारित दंडव्यवस्था हो,न्यायएजेंसियों द्वारा अपराध के केसों का द्रुत निस्तारण व राज्यसंविधान के विधिनिर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन हो तो निश्चय ही समाज में किसी दुराचारण-नियम उल्लंघन व अराजक स्थिति व घटना की संभावना न्यूनतम हो जाती हैं।अनेक पश्चिमी देशों के अतिरिक्त पूर्व के भी कुछ देश जैसे सिंगापुर,जापान इत्यादि इस बात के उदाहरण हैं जहाँ नागरिक अधिकारों के उल्लंघन,उनके विरुद्ध अपराध की घटनायें न्यूनतम संख्या में घटती हैं।

दुर्भाग्य से हमारे देश में जब भी कोई ऐसी घटना घटती है तो इसे स्त्री-पुरुष संबंधों की असमानता,पुरुष का स्त्री के शोषण की परंपरा से जोड़ दिया जाता है।यहाँ तक कि तथाकथित नारीअधिकार संगठन भी इसी तरह की नारेबाजी व धरनो-प्रदर्शनों का आयोजन कर अपने जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लेते हैं। इसी प्रकार विभिन्न मनोवैज्ञानिक विश्लेषक भी बलात्कार व हिंसा जैसे अपराधों हेतु अपराधी की मानसिक विकृति को ही जिम्मेदार मानते । इस तरह के जघन्य अपराधों का कारण मात्र अपराधी व्यक्ति का मानसिक रूप से विकृत होना जैसा  विश्लेषण विकसित व सभ्य समाज, जहाँ नियम,कानून व न्याय प्रक्रिया का दृढ़ता से पालन होता है , हेतु तर्कसंगत हो सकता है, किंतु हमारे देश व समाज जैसे स्थान जहाँ पुलिस,नियम,कानून,न्याय-प्रणाली की खुलेआम धज्जी उड़ाने का रिवाज है,जहाँ लोग जघन्य से जघन्य अपराध करके कानून के शिकंजे से दूर बेखौफ घूमते हैं, जिस देश की संसद व विधायिका के एक चौथाई माननीय सदस्य स्वयं ही जघन्य अपराधों,चोरी,डकैती,अपहरण,बलात्कार के अभियुक्त होने के बावजूद हमारे चयनित जनप्रतिनिधि बन संविधान की रक्षा करने की शपथ लेने जैसा भोंडा मजाक करते हों,और अपने सारे अपराधों व दुष्कृत्यों के बावजूद स्वयं सरकारी सुरक्षा व संरक्षण में बेखौफ घूमते हों,जहाँ अपराध के शिकार लोग न्याय से वंचित बस कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते-लगाते ही अपने जीवन के मूल्यवान वर्ष व जीवन की सारी शांति व सुख खोकर घुट-घुट कर जीने व एक दिन दम तोड़ देते हों, वहीं जघन्य अपराधी व दुराचारी कानून के फंदे से दूर मूछों पर ताव देते सारे दुराचारों को लगातार करते रहते व ठाट का जीवन जीते हों, उस देश व समाज में भला अपराधियों व दुराचाराचारियों को बेखौफ जघन्य अपराध के प्रोत्साहन के अतिरिक्त क्या संदेश जाता है।

स्मरण आता है कि कुछ वर्षों पूर्व दिल्ली के समीप ही गाजियाबाद के निठारी में एक प्रभावशाली व्यवसायी द्वारा अपने नौकर की सहायता से नरपिशाचों को शर्मसार करने वाली घटना में अनेकों मासूम लड़कियों व युवतियों के बलाक्तार व हत्या की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आयी थी तो उस राज्य के मुख्यमंत्री के छोटेभाई व स्वयं भी राज्यसरकार में मंत्री ने यह बयान दिया था कि बड़े-बड़े राज्यों में इस तरह की छोटी-मोटी घटनायें होती रहती हैं।वे महोदय वर्तमान में भी राज्य में मंत्रीपद को सुशोभित कर रहे हैं।इन प्रकार के उदाहरणों से यह  सत्य स्पष्ट है कि आज जो इस तरह के जघन्य अपराध हो रहे हैं उसके लिये हमारे चयनित जनप्रतिनिधियों,संसद व विधायिका के सदस्यों का स्वयं अपराधकार्यों में हिस्सेदारी,उनके द्वारा अपराधियों व अराजक तत्वों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर संरक्षण,पुलिस व सुरक्षा एजोंसियों का भ्रष्टाचार व राजनीतिक दबाव के परिवेश में अपराधियों के विरुद्ध ठोस व प्रभावी कार्यवाही में हीलाहवाली व नाकारपन तथा हमारी न्यायप्रणाली का ढीला-ढालापन व उसकी नपुंसकता सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

इन घटनाओं व चिंतनीय हालातों से आम आदमी के मन में घोर निराशा व कुंठा के भाव आने स्वाभाविक हैं,किंतु मनुष्य होने के नाते हम यह भी नहीं भूल सकते की आशा ही जीवन है।हमारा इतिहास साक्षी है कि जब भी अराजक स्थिति व मानवता पर प्रहार की स्थिति आती है,जब-जब समाज में अराजक व अपराधी तत्व बेखौफ होकर दुराचार करने लगते हैं व आम आदमी का जीना मुहाल कर देते हैं,तब-तब नव जन चेतना जागृत होती है जिसकी शक्ति से ऐसे सत्पुरुषों व सत्शक्तियों का अभ्युदय होता है जो दुष्ट शक्तियों का संहार कर मानवता की रक्षा हेतु शांति,सुराज व सदाचार की स्थापना करते हैं। 

इस प्रकार मानव सभ्यता की चिरंतनता को ध्यान में रखते हुये हमें यह आशा व विश्वास कायम रखकर चलना ही होगा कि निश्चय ही एक दिन हालात बदलेंगे,समाज में उभरते अपराधी व अराजक प्रवृत्ति व इसमें संलग्न तत्वों पर अंकुश लगेगा व हमारा देश, समाज सुरक्षित, निर्भय, शांतिपूर्ण व सहज-जीवन-योग्य होगा। 

Monday, December 17, 2012

घने मेघ के मध्य कहीं जो दिखती एक रजत रेखा.......

घने मेघ के मध्य  कहीं  जो दिखती एक रजत रेखा


जीवन में प्राय:
ऐसे क्षण आते हैं,
जब सब कुछ होता दिखता प्रतिकूल
अपेक्षाओं व उम्मीदों से कतई विपरीत,
जब असफलता दिखती हर पग पर,
अनिश्चितता व निराशा के काले घने मेघ
करते अंधकार जीवन पथ पर ,
और नहीं दिखती है आगे की राह,
प्रश्न अनेकों मन में
हैं  उठती आशंकायें भविष्य के प्रति,
कि क्या होगा ,कैसा होगा जीवन-पथ आगे मेरा

किंतु इस घने मेघ के मध्य
दिखती है एक रजतरेखा,
देती संकेत उस प्रकाश-ज्योति की
जो छिपी हुई है बादल के पीछे
और जगाती मेरे अंतर्मन में
एक ज्योति मयी प्रदीप्त दामिनी
नव आशा और विश्वास लिये
कि चाहे कितना ही तम छाया हो,
पर दिप्त सूर्य की ज्योति अटल ,
जो स्थाई है,
उसकी उदित किरणों से
छँट जाते हैं काले बादल अवश्यमेव ही।

और वही स्थाई ज्योतिपूर्ण सविता बन
होती है दीप्तमान अंतर्मन में मेरे,
देती यही संदेश निरंतर,
कि हूँ मैं सदैव तुम्हारा पथप्रदर्शक,
जो संकल्पयुक्त तुम जीवन-पथ पर आगे बढ़ते हो।

तो मैं भी आगे बढ़ जाता हूँ
अपने अंतर्चेतन की इस ज्योति की उँगली थामे
मन में विश्वासों की नयी शक्ति भर,
कि मंजिल अवश्य मिलती हैं,
जो यात्रा का मन में है संकल्प निरंतर ।

Friday, December 14, 2012

कुछ खोया और कुछ पाया मैं।




शाश्वत नियम जगत का ऐसा,
बनना और बिगड़ते रहना।
जो सोना था अब वह मिट्टी,
कुछ खोया और कुछ पाया मैं।1

कहीं जमीं और कहीं फलक थी,
कभी धूप और कभी छाँव थी
जीवन के दुख सुख सहते रह,
कुछ रोया कुछ हँस पाया मैं।2

कभी नज्म और कभी छंद में
मुक्तगीत कुछ लय-स्वर-बद्धित।
उर के दर्द गीत बन ढलते
मौन रहा कुछ कह पाया मैं।3

चंचल नदी बहे जीवन भर,
पर समाधि सागर दे देता ।
स्थिर ध्येय गतिमय राहें,
कुछ स्थिर कुछ बह पाया मैं।4

फैले रिश्तों की चादर पर,
कुछ सिलवटें उभर आती हैं।
जीवन सूत वक्त की किरची, 
कुछ उलझा कुछ सुलझाया मैं ।5

देता समय निरंतर उत्तर,
मगर शेष हैं प्रश्न अनेकों ।
जीवन रोज पहेली पूछे ,
कुछ बूझा कुछ बिसराया मैं।6

प्रात: उदित निरंतर यात्रा ,
अस्तकाल विश्राम  समाहित।
जीवन दीप निरंतर जलता,
कुछ जागा कुछ सो पाया मैं।7

Tuesday, December 4, 2012

चरित्र व नैतिकता के चरित्र (Characteristics) – स्थाई (Immutable) या परिस्थितिजन्य(Circumstantial)?

प्रबंधन गुरु नितिन नोहरिया - फैकल्टी डीन, एच.बी.यस.
हाल ही में माह अक्तूबर 2012 की Business and Economy पत्रिका में श्री नितिन नोहरिया,विश्वप्रसिद्ध प्रबंधन गुरु व हार्वर्ड विजनिस स्कूल के वर्तमान डीन, का एक लेख How to Build Responsible Business Leaders? को पढ़ने का अवसर मिला जो प्रबंधन विज्ञान में चरित्र व नैतिकता से संबंधित वर्तमान चुनौतियों व विगत  में प्रकाश में आयी व्यवसाय जगत में कुछ  उथल-पुथल भरी घटनाओं के परिपेक्ष्य में अति सामयिक व विषयसंगत  है।

इस लेख द्वारा लेखक ने चरित्र व सदाचार के संबंध में हमारे पूर्वाग्रह व गलत धारणाओं पर प्रकाश डालते हुये , इस विषय में विभिन्न अध्ययनों द्वारा प्राप्त नतीजों के आधार पर वास्तविक तथ्यों को सामने रखने व नेतृत्वकर्ताओं द्वारा इस संदर्भ में सही सोच व धारणा को अपनाने व इसके माध्यम से संस्थानों में स्वस्थ व सकारात्मक वातावरण बनाते हुये कार्यउत्पादकता व दक्षता को बढ़ा सकने की बात कही है।

जब भी किसी नेतृत्वकर्ता,राजनीतिक ,व्यवसायिक, आध्यात्मिक या चाहे कोई भी अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र होका कोई कदाचार व नैतिकता के विरुद्ध कोई कार्य या क्रियाकलाप प्रकाश में आता है, तो प्राय: हमारी सामान्य प्रतिक्रिया यही होती की है वह व्यक्ति चरित्रहीन या खोटे आचरण का व्यक्ति था, इसीलिये उसने ऐसा दुष्कर्म या कदाचार किया।

लेखक का कहना है कि  यह तो दुनिया का चलन है कि हम संसार को दो हिस्से में बाँटने का प्रयाश करते है- एक तरफ अच्छे लोग,जो  स्थाइत्व व सदाचारपूर्ण जीवन जीते है व जिनका जीवन की कठिन परीक्षा व परिस्थितियों  में भी चरित्र अडिग होता है, व दूसरी तरफ बुरे लोग,जो अपने जीवन के कठिन परीक्षा व विषम परिस्थितियों  में अक्सर अपने चरित्र से फिसल जाते हैं।

हमारी इस प्रकार की बनी अवधारणा के अंतर्गत मनुष्य का चरित्र,चाहे अच्छा हो अथवा बुरा, और जो बचपन में पारिवारिक व मातापिता से संस्कारगत प्राप्त होता है, अपरिवर्तनीय होता है ।हमारी सामान्य धारणा है कि मनुष्य का रित्र अंतर्निहित होता है व जीवन में किसी विषम परिस्थिति में वहीं उजागर होकर धरातल पर आ ही जाता है।परंतु लेखक की मान्यता है कि यह अवधारणा त्रुटिपूर्ण है।इनके अनुसार तो मनुष्य के चरित्र का विकास भी मनुष्य  की बुद्धिमत्ता,सूझबूझ व किसी अन्य अर्जित कुशलता, व उनके आजीवन क्रमिक विकास प्रक्रिया के समान ही,  निरंतर व आजीवन विकसित व परिष्कृत होता रहता है।

जन-सामान्य धारणा के विपरीत चरित्र द्विचर(Binary) नहीं है।संसार को अच्छे-बुरे के दो धड़ में बाँटना कतई संभव नहीं,बल्कि अधिकांश मनुष्यों का चरित्र व आचरण,अच्छा अथवा खराब, परिस्थितिजन्य व हालात के संदर्भ में होता है।लेखक ने एक अति महत्वपूर्ण बात यह कही है कि प्राय: लोग अपने चरित्र की क्षमता का अति-प्राक्कलन,वास्तविकता से ज्यादा आकलन कर बैठते हैं,नतीजतन चरित्र के निर्धारित मापदंडों पर हम खरे नहीं उतरते तो अच्छे-बुरे की मुहर लगाने लगते हैं।

इस संदर्भ में लेखक ने अमरीकी विश्वविद्यालयों में किये गये कुछ अध्ययनों का भी उद्धरण दिया है।दो मुख्य अध्ययन जिसमें एक है प्रिन्स्टन युनिवर्सीटी में किया गया Good Samaritan Experiment व दूसरा है येल युनिवर्सीटी में किया गया Milgram Experiment.

प्रथम प्रयोग में करीब 70 धर्मशास्त्र के छात्रों को कई समूहों में बाँटकर एक दूसरे के ग्रुप को संक्षिप्त वार्ता प्रस्तुत करनी थी।आधे छात्रों को आध्यात्म के कैरियर संभावनाओं पर वार्ता देनी थी व आधे छात्रों को परकल्याण के दृष्टांतो पर।छात्रों को युनिवरसीटी में वार्ता हेतु निर्धारित कक्ष तक पहुँचने हेतु मैप उपलब्ध करा दिया गया व उनमें से कई को यह भी ऐतिहात कर दिया गया था कि वे वार्ता के निर्धारित सीडूल से लेट हैं अत: अपने निर्धारित कक्ष तक पहुँचने में शीघ्रता करें,कुछ को अलग से बता दिया गया कि अभी उनके पास अतिरिक्त समय है व अपनी सहूलियत से कक्षा में पहुँच सकते हैं।उनके जाने के रास्ते में एक बूढ़ा घायल दर्द से कराहता मदद माँग रहा था।अध्ययन का प्रश्न था कि क्या ये छात्र घायल व लाचार बूढ़े की सहायता करेंगे।अध्ययन में पाया गया कि जिन्हे निर्देश था कि वे कक्षा के लिये लेट हैं उनमें से केवल 10 प्रतिशत लोग बूढ़े की सहायता हेतु रुके,आध्यात्म कैरियर संभावना वार्ता ग्रुप के छात्रों में केवल 30% ही बूढ़े पर तवज्जो डाली अन्यथा तो अधिकाँश उसे अनदेखा किये चले गये,इसी प्रकार परकल्याण दृष्टांत वार्ता समूह के 50 प्रतिशत बूढ़े की सहायता हेतु बिना कक्षा-वार्ता की परवाह किये रुके।इस प्रकार इस अध्ययन के यह निष्कर्ष निकला कि एक ही समूह के छात्र जो सच्चरित्र हेतु वाकायदा प्रशिक्षित हैं  व जिनमें सच्चरित्र की स्थापना व स्थाइत्व सामान्य से ज्यादा अपेक्षित है, वे भी विषम व तनाव की परिस्थितियों में अपने अपेक्षित आचरण व चरित्र में कमजोर व्यवहार करते पाये गये।

दूसरे अध्ययन में कुछ लोगों को अध्यापक की भूमिका में कुछ छात्रों,जो वस्तुत: व्यावसायिक अभिनयकर्ता थे,को पढ़ाने का कार्य दिया गया,जिसमें छात्रों को वर्तनी के कुछ नये शब्द सीखने थे।अध्यापकों व छात्रों को अलग-अलग कक्ष में रखा गया जिससे एक दूसरे को देख नहीं सकते थे किंतु एक दूसरे की आवाज स्पीकर के माध्यम से सुन सकते थे।अध्यापकों को निर्देश था कि जब भी कोई छात्र वर्तनी सीखने में गलती करता है,तो अध्यापक एक डायल घुमाकर छात्र को बिजली का झटका देंगे।हर अगली गलती के लिये बिजली के करेंट को बढ़ा दिया जाता।वस्तुत: किसी को भी कोई वास्तविक बिजली का झटका नहीं दिया गया पर अध्यापक जैसे ही डायल घुमाकर करेंट बढ़ाते,अभिनय करते छात्र जोर से बिजली का झटका लगने का ड्रामा करके जोर से चीखते व दीवार से सिर मारते।बहुत से अध्यापक बिजली का बढ़ा झटका देने व छात्रों की दर्दभरी चीख सुन असहज अनुभव करते व छात्रों को यातना स्वरूप बिजली का झटका बढ़ाने से इंकार कर देते,किंतु उनको यह नसीहत देने पर कि यह उनके ड्यटी का हिस्सा है,वे छात्रों को बिजली का झटका देना जारी रखते।इस प्रकार इस अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि अपने कर्तव्यवोध व ऊपर से मिले हुये निर्देशों के अनुपालन के दृष्टिगत लोग कोई जघन्य व अमानवीय कार्य भी कर सकते हैं,जो उनका सामान्य चरित्र व आचरण नहीं भी हो सकता है।

ऊपर वर्णित दोनों अध्ययन हमें यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य का चरित्र व आचरण बहुधा परिस्थिति जन्य होता है।अत: सामान्यअवधारणा के आधार पर अच्छे चरित्र के लोग अथवा बुरे चरित्र के लोग के दो दृढ़ समूह में लोगों को बाँटकर देखना एक अतिवादी व सत्य से परे का दृष्टिकोण है।

यथार्थत: हमें यह समझने की जरूरत है कि जहाँ नेतृत्व द्वारा लोगों को उनके यथास्थिति रूप में बिना किसी अच्छे या बुरे की ब्रांडिंग किये स्वीकार करते हैं,लोगों को उनकी गलतियों को मानवीय भूल समझते हुये अपनी भूल को सहज स्वीकार कर लेने का उपयुक्त ,एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक सुरक्षा, वातावरण दिया जाता है, उस संस्थान अथवा निकाय में स्वाभाविक रूप से लोगों की पारस्परिक विश्वसनीयता व कार्यदक्षता उच्चकोटि की होती है बनिस्बत कि ऐसे संस्थान जहाँ लोगों की गलतियों के लिये नेतृत्व द्वारा उनको अस्वीकार किया जाता है,उन्हें सच बोलने व अपनी गलतियों को स्वीकारने पर सजा का भय होता है,वहाँ अविश्वसनीयता पनपती है,पारस्परिक असहयोग व द्वेष बढ़ता है,व ऐसे में स्वाभाविक है कि संस्थान या निकाय की कार्यदक्षता धराशायी होता है

इस प्रकार जब किसी संस्थान या निकाय के नेतृत्वकर्ता जब अपनी टीम के लोगों को यह  मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ होते हैं,तो सामान्यतया उपरोक्त वर्णित अध्ययन में पाये गये तथ्यों के अनुरूप ही लोग अपने अंतरात्मा की आवाज सुनने व सही-गलत के निर्णय हेतु अपने विवेक का इस्तेमाल करने के बजाय ऊपर से प्राप्त निर्देश पालन के आवरण में अपने सामान्य व अपेक्षित चरित्र व आचरण के विपरीत,अवांछनीय व्यवहार करते हैं ।

कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारे संस्थानों व निकायों, विशेषकर हमारे सरकारी संस्थान,अपने कर्मचारियों,लोगों को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का वातावरण प्रदान करने की अपनी असमर्थता के कारण उनको अपने कार्य के प्रति प्रोत्साहित करने  व कार्यदक्षता स्थापित करने में भारी विफलता मिलती है व हमारे निकाय व संस्थान सकारात्मक प्रगति व कार्यदक्षता की उपलब्धियाँ प्राप्त करने में बुरी तरह विफल सिद्ध हो रहे हैं।

इसीलिये लेखक के ही शब्दों में- जिम्मेदार नेतृत्व को सदैव अपने कर्मचारियों द्वारा हकीकत में सामना होने वाली परिस्थितियों व प्रलोभनों का भान व इनके प्रति जागरूकता होनी चाहिये।इसलिये उन्हें हमेशा ऐसे निकाय व संस्थानगत-चरित्र के निर्माण करना चाहिये जिसमें सभी को अच्छे आचरणशीलता हेतु प्रोत्साहन व पुरस्कार प्राप्त होता हो, जहाँ लोगों को निर्भीकता पूर्वक , बिना किसी आशंका के, अनुचित व अनैतिक कार्य व आचरण के विरुद्ध स्पष्ट बोलने व मना करने की आजादी हो। हममें से अधिकांश,जिन्हे अपने चरित्र व आचरण पर अति व जरूरत से ज्यादा विस्वास होता है, को यह समझना चाहिये कि यह हमारा मिथ्याभिमान है व यह हमारे विनाश का कारण बन सकता है। आशा है कि यह नव-विवेक व जागृति सभी नेतृत्वकर्ताओं में विकसित होगी व जिससे सभी प्रकार के निकाय व संस्थान, वह चाहे राजनीतिक हों या व्यवसायिक या आध्यात्मिक,सबमें विकसित होगी व इसमें सबकी बेहतरी निहित है।