Sunday, October 27, 2013

सिरहाने बैठकर पैंताने की बात करने वालों के मिथ्याचार को समझें !


बड़ा ही अजीब लगता हैं जब सिरहाने बैठे लोग  पैंताने बैठे लोगों की बात करते हैं ।महात्मा गाँधी यदि  पैंताने बैठे लोगों की बात करते थे, तो वह यह बात पैंताने बैठकर ही  करते थे न कि सिरहाने बैठकर , उनके कथनी करनी, सिद्धांत व आचरण  में एकनिष्ठता थी।

कुछ लोग अपने नाम के साथ  गाँधी सरनेम लगाकर मात्र लफ्फेबाजी करके  महात्मा  गाँधी दिखने व बनने  का ढोंग करते हैं व गाँधी के नाम से देश को,विशेषकर गरीब तबके को, गुमराह करने की कोशिश करते हैं , उनके इस पाखंड व मिथ्याचार को देश व देश की जनता को भलीभाँति समझना चाहिए ।

यह ध्यान देने की बात है कि पैंताने बैठे व्यक्ति की कोई जाति या मजहब नहीं होता, उसकी तो बस एक ही जाति व एक ही धर्म है और वह है गरीबी का, लाचारी का और निरंतर करते जीवन  संघर्ष का ।महात्मा गाँधी इस सत्य व इसकी पीड़ा  को अंतर्मन व हृदय से समझते थे  इसी लिए वे  स्वयं  एक अति गरीब व साधारण व्यक्ति का जीवन व रहनसहन स्वेच्छा से अपनाकर स्वयं भी वैसा ही सरल व अति साधारण  जीवन  जीते थे । परंतु बड़ी  हैरानी व खेदजनक बात यह है कि आज सिरहाने बैठे लोग ही बड़ी चतुराई, कुटिलता व अपने भावनोत्तेजक शब्द जाल से पैंताने बैठे लोगों को बड़ी सहजता से जाति व मजहब में बाँटकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में सफल हो रहे  हैं, व आम व लाचार आदमी को अपने साथ हो रहे  इस छल व धोखा का अहसास भी नहीं हो पा रहा ।

मैं यह नहीं कहता कि सिरहाने बैठे लोगों को राजनीति करने  व राजनीति में भाग लेने का अधिकार व योग्यता नहीं, यह तो एक लोकतांत्रिक देश में  हर व्यक्ति, देश वासी का मौलिक व संवैधानिक अधिकार है, परंतु यहाँ मुद्दा है व्यक्ति के  कथनी करनी के विभेद का, उनके पाखंड का ।आप एकतरफ गोल्फ कोर्स में जाते हैं  , बस ब्रांडेड कपड़े जूते पहनते हैं, अपनी दिनचर्या की छोटी से बड़ी जरूरत व सामान की खरीददारी विदेश में करते हैं, अपनी अधिकृत या अनधिकृत  कमाई विदेशी स्विस बैंक की तिजोरियों में जमा करते  हैं, बड़ी बड़ी इंपोर्टेड विदेशी कार में घूमते हैं, इंपोर्टेड बाइक से अपनी गैंग के साथ हाईवे पर देर रात  हाईस्पीड रेस व स्टंटबाजी करते हैं,यह सब करना आपको अच्छा लगता है व आपका शौक है तो इन्हें  आप जरूर व बेशक करिये , यह आपकी मर्जी व आपका मुकद्दर है, इसमें कोई बुराई भी नहीं, जब तक कि आप देश के  कानून के अंतर्गत रहकर आचरण करते हैं, मगर फिर आपके मुँह से गरीब, गरीबी ,गरीबों की कहानी बड़ा पाखंडपूर्ण व मिथ्याचार लगता है ।आप जो जीवन जी रहे हैं, उसकी बात करिये न, अपने जीवन शैली व आपसे जाती तौर पर जुड़े ग्रुप व क्लास की बात करिये न! आप रईस  हैं, शौक मिजाज हैं,  आप रईसी ढाटबाट व विदेशी स्तर का जीवन जीते हैं तो आप इस जीवन शैली से जुड़ी बात करिये न!  यह गरीब व गरीबी की बात आपके मेनुबुक में कहाँ से शामिल हो गयी? अपनी जीवन शैली से विपरीत जीवन व उसके आदर्श बघारने का यह पाखंड क्यों? क्या यह हक आपको इसलिए मिल जाता है कि आपने अपने  नाम के आगे  गाँधी सरनेम,जो कि आपका असली नहीं बल्कि अपने स्वार्थ व सुविधा हेतु दूसरे से अपनाया हुआ है,  जोड़ रखा है? क्या यह आपका कोरा ढोंग व भारत की गरीब जनता के साथ धोखेबाजी नहीं है?

यहाँ कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण व गंभीर हैं जिसे हर भारतीय  को स्पष्ट व पूरी तरह समझ लेना बहुत आवश्यक है ,क्योंकि यहाँ राजनीति से जुड़े ऐसे प्रधान  व्यक्ति या व्यक्तियों  के चरित्र, आचरण, व कर्म की निष्ठा का प्रश्न है, जो कल देश की जनता द्वारा चुने जाकर, जनता के प्रधान प्रतिनिधि बनकर, देश व देश की जनता के भाग्यविधाता बनने वाले हैं ।इसलिए  क्या हर भारतीय को यह जानना व समझना जरूरी नहीं कि वे अपना देश व इसकी बागडोर किस प्रकार के चरित्र व आचरण वाले  लोगों के हाथ सौंपने जा रहे हैं, वे सत्य निष्ठ लोग हैं अथवा मिथ्याचारी, इन बातों को जान लेना  देश के हर नागरिक को न सिर्फ  आवश्यक बल्कि देश के प्रति महत्वपूर्ण कर्तव्य भी है ?

प्रथम बात तो यह कि महात्मा गांधी का गांधी नाम असली था, न कि किसी पहले से ही अति प्रसिद्ध अथवा महान व्यक्ति के नाम से अपनी सुविधा व स्वार्थ हेतु मात्र अपनाया गया कोई नकली नाम ।यदि देश गांधी नाम का सम्मान करता है व पूजता है तो यह महात्मा गांधी के स्वयं की महानता व देश के प्रति महान कर्तव्य व समर्पण के कारण है न कि किसी उधार में अपनाये गये किसी और के प्रसिद्ध नाम की आड़ में ।दूसरी बात यह कि महात्मा गांधी   यदि गरीब और गरीबी की बात करते थे तो इसमें पाखंड नहीं था, बल्कि  उनका स्वयं व अपने परिवार  का  रहनसहन, वेषभूषा, खानपान, आचरण सभी अति साधारण, एक आम व गरीब आदमी की ही तरह था, उनके कथनी व जीवन शैली में एकनिष्ठता थी।तीसरी बात यह कि महात्मा गांधी सिर्फ गरीब की ही नहीं हर व्यक्ति की समूचे देश, सभी जाति,सभी मजहब, सभी समुदाय की बात करते थे, वे सबको ही सद्चरित्र व सादगी पूर्वक रहने की सलाह देते थे ।चौथी और अंतिम बात मात्र गरीबों व गरीबी संबंधित बिल और एक्ट के पैरोकार बनने या इसका ढिंढोरा पीटने मात्र  से कोई गरीबों का मसीहा नहीं होता, मसीहा तो वह होता है जो गरीब के दर्द की अनुभूति व पीड़ा को स्वयं व स्वेच्छा से जीता हो, जैसे जीसस, मदर टेरेसा या महात्मा गांधी ।बड़ी हवेली में मखमल के आरामगद्दे पर लेटकर गरीब व गरीबी के प्रति आत्मीयता व हमदर्दी जताना कोई  सदाचार व मानवता  नहीं बल्कि यह  शुद्ध मिथ्याचार व घोर  पाखंड है ।

इन महत्वपूर्ण तथ्यों के मद्दनजर हर भारतीय को  सिरहाने बैठकर पैंताने की बात करने वालों के  मिथ्याचार को भलीभाँति समझने व तदनुरुप ही अपने विवेक द्वारा अपने  चुनाव के  सही  निर्णय लेने की आवश्यकता है ।

Friday, October 25, 2013

विरह गीत मैं अब लिख लूँगा


प्रेम वृष्टि तेरी वह अद्भुत ,
हूँ कृतार्थ आजीवन तेरा  ।
अब जो कठिन  वेदना देते  ,
वह भी मैं हँसकर सह लूँगा।१।

प्रेमसुधा की अर्पण तुमने,
पी जिसको मैं  धन्य हुआ ।
अब जो तुम विषपान कहे  तो
वह भी मैं हँसकर पी लूँगा ।२।

कितनी सहज रही यात्रा वह,
साथ कदम मिल दोनों चलते ।
जो तुम अपना साथ छुड़ाते,
कठिन राह पर  मैं चल लूँगा ।३।

प्रेमगीत मैं जो भी  लिखता,
भावों में तुम ही बसते थे ।
जाते छोड़ हृदय वीथी तुम,
विरह गीत मैं अब लिख लूँगा ।४।

मैं कहता था तुम सुनते थे,
बातें कई हृदय की मन की ।
मौन याद कर वे सब लमहे ,
छुपकर आँसू ढलका लूँगा ।५।

साथ तुम्हारा ही जीवन सुख,
पेंग दिए तुम मैं उड़ जाता ।
हाथ खींचते जो तुम अपना,
स्थिर हो दुःख मैं सह लूँगा ।६।

जो तुम हँसते बिखरें मोती ,
भर-भर मुट्ठी उन्हें बाँटता ।
भारी मन जो तुम होते हो,
स्मित कृपण बन मैं जी लूँगा ।७।

जो चाहा मैं निज को देखूँ
तुम मेरे दर्पण बन जाते ।
हटा दिया जो दर्पण तुमने ,
अपनी छवि खो मैं जी लूँगा।८।

Wednesday, October 23, 2013

सिर्फ अपनी पसंद की ही नहीं, बल्कि वह करें जो सही व आवश्यक है !


व्यक्ति के जीवन में नितांत आवश्यक है उसके द्वारा  यह  समझना कि उसके लिए क्या होना सही  है, बजाय कि उसके द्वारा  सिर्फ वही करना अथवा होना जो कि उसे भावनात्मक स्तर पर स्वयं को अच्छा व रुचिकर लगता है ।

प्रायः एक व्यक्ति को जीवन के  शुरुआती दौर में  इसकी ठीक ठीक समझ ही नहीं होती कि उसके लिये क्या होना सही है, हितकर  है , यदि किसी प्रकार से उसे इसका संकेत अथवा साक्षात्कार भी होता है, तो प्रायः उचित व सही चीजें स्वाद रहित व ऊपरी तौर पर कम आकर्षक होने के कारण या तो व्यक्ति द्वारा उपेक्षित  हो जाती है, अथवा उनका  व्यक्ति के रुचि व पसंद के मुताबिक न होने के कारण, वह उनको जानबूझकर नजरंदाज कर देता है ।

कहते हैं कि व्यक्ति को सही या गलत की सही परख व अनुभूति उसके अपने जीवन में स्वयं द्वारा की गयी गलतियों व  असफलताओं से सबक के रूप में ही  मिलती हैं, परंतु मसला यह है कि आजीवन बस गलतियां पर गलतियां करते रहने, व मात्र असफलताओं से जूझते रहने हेतु व्यक्ति की जीवन अवधि  व उसकी क्षमता बहुत थोड़ी व सीमित है ।अतः सहज व सफल जीवन जीने हेतु यह भी कतई आवश्यक है कि व्यक्ति लगातार न  सिर्फ निजी गलतियों व असफलताओं से सबक ले बल्कि साथ ही साथ दूसरों की गलतियों व असफलताओं से भी आवश्यक शिक्षा ग्रहण करता रहे व इन नसीहतों के मद्देनजर अपने जीवन पथ में जरूरी तब्दीली व सामंजस्य करते आगे बढ़े।

हालांकि दूसरों के अनुभवों व विचारों को यथास्वरूप अपनाने में व्यक्ति के भेड़चाल स्वभाव होने  व हर बात में बस दूसरों की ही नकल की  प्रवृत्ति का खतरा बनता है, साथ ही साथ इससे व्यक्ति की स्वतंत्र व मौलिक रूप से सोचने व करने की क्षमता प्रभावित होती है। अतः दूसरे के अनुभवों को स्वयं के जीवन में  बहुत सावधानी, विवेचनापूर्ण व संज्ञानपूर्वक ही अपनाना उचित होगा ।

एक प्रकार से कहें तो दूसरों के सही गलत,सफलता-असफलता  के अनुभव व उदाहरण से स्वयं के लिए  शिक्षा व नसीहत लेना किसी दुधारी तलवार की धार पर चलने से कतई कम नहीं, यह कार्य बहुत सावधानी, कुशलता व दक्षता के साथ ही करना होता   है अन्यथा यह व्यक्ति की मदद करने के विपरीत उसे हानिकारक  व उसके जीवन के प्रगति की राह   में गंभीर  बाधा बन सकता है  ।

इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में  व्यक्ति के  जीवन में एक सही मेंटर या मार्ग दर्शक का होना नितांत  मायने  व महत्वपूर्ण हो जाता है ।एक व्यक्ति के जीवन में मार्गदर्शक  विभिन्न रूप में हो सकते हैं जैसे मातापिता, अध्यापक, मित्र, बॉस, सहकर्मी, पत्नी, आध्यात्मिक गुरु या अन्य ।परंतु इसके साथ  यह तथ्य भी ध्यान में रखना उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता  है कि हर मार्गदर्शक  के स्वयं के  अनुभव, विवेक, व दक्षता के रूप में उसकी निहित  सीमायें होती हैं, अतः व्यक्ति को  अपने मार्गदर्शक  के अनुभव,  सलाह व शिक्षा से एक सीमा तक ही सहायता मिल सकती है, अन्यथा व अंततः तो व्यक्ति को स्वयं के विवेक, आत्मनिर्णय का ही मुख्य अवलंबन होता है व इन्हीं  के ही आधार पर उसे अपने जीवन के फैसले,सही या गलत,  लेने होते हैं ।

इन तथ्यों  के अतिरिक्त, व्यक्ति के जीवन में अंतिम व निर्णायक बात है उसका  जीवन  परिस्थितियों व मिलने वाले नतीजों के प्रति स्वयं का दृष्टिकोण, व्यक्ति का  अपनी सफलताओं अथवा  असफलताओं, विशेषकर असफलताओं , के  प्रति पूरी जिम्मेदारी व जबाबदेही होना , यानी व्यक्ति के साथ जीवन में जो भी भला या बुरा हुआ, जीत मिली या हार, सफलता मिली अथवा असफलता, सबको सहजता से स्वीकार कर लेना व अपने हर कार्य व निर्णय के लिए पूरी तरह से जबाबदेही रखना ।इस दृष्टिकोण के साथ व्यक्ति  स्वाभाविक रूप से अपने  जीवन  में आत्मनिर्भर, स्वावलंबी व सामने आने वाली किन्हीं भी  परिस्थितियों हेतु निर्भीक व तैयार रहता है ।

कह सकते हैं व्यक्ति की सही करने की समझ उसके जीवन की सर्वोपरि सीख व उपलब्धि है ।सिर्फ अपनी  पसंद की ही नहीं, बल्कि वह करना जो सही और आवश्यक है ।

Saturday, October 19, 2013

आराम बड़ी चीज़ है, मुँह ढक कर सोइये!

आज अखबार में  एक रोचक रिपोर्ट पढ़ी, नींद के बारे में -Why do we sleep? So that brain can flush out toxins. यानी - हम क्यों सोते हैं? जिससे हमारे मस्तिष्क में जमा विषाक्त पदार्थ  बाहर निकल सके व यह शुद्ध हो सके।

यह रिपोर्ट अमरीका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय के स्नायुऔषधि Neuromedicine केंद्र के निदेशक,मैकेन नीदरगार्ड व उनकी टीम द्वारा किये गये विभिन्न अध्ययन व प्रयोगों पर आधारित है,जिनसे यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि हमारे मस्तिष्क के लंबे समय तक जागने  व लगातार सक्रिय रहने  से इसके  अंदर लगातार  बनते रहने  व जमा हुए विभिन्न विषाक्त पदार्थों का हमारे नींद व आराम  की अवस्था में शोधन व मस्तिष्क की  साफसफाई का कार्य संपन्न होता है ।

उनके अध्ययन से यह पता चलता है कि हमारी नींद की अवधि में मस्तिष्क के अंदर स्नायुतंत्रों से निर्मित " ग्लिम्फैटिक सिस्टम" के बंद दरवाजे खुल जाते है, जिससे हमारे मस्तिष्क व स्नायु तंत्र की जीवनरेखा , सेरेब्रोस्पाइनल द्रव (CSF ), का मस्तिष्क में प्रवाह तीव्र  व  अतिरिक्त होने लगता है, जिससे इसका  शुद्धिकरण उसी प्रकार  होता है  जैसे कि किसी वाटर रिसाइक्लिंग प्लांट में प्रदूषित जल सर्कुलेशन द्वारा शुद्ध हो जाता है ,या यह भी कह सकते हैं कि यह सिस्टम मस्तिष्क के अंदर एक प्रकार की गुफाओं का जाल है, जिनके मस्तिष्क की जाग्रत अवस्था में  बंद रहने वाले  द्वार हमारी  नींद की अवस्था में खुल जाते हैं व मस्तिष्क द्रव  इनसे प्रवाहित होकर उसी प्रकार शोधित व स्वच्छ हो जाता है, जैसे पहाड़ व धरती के गर्भ की शिराओं से प्रवाहित जल अपना  मटमैलापन व गंदगी  खोकर  पुनः शुद्ध व पीनेयोग्य  हो जाता है ।

इस अध्ययन हेतु अनुसंधानकर्ताओं ने सर्वप्रथम चूहों पर किये अपने प्रयोग में उनके मष्तिक द्रव में रंगीन डाई इंजेक्ट किया, और तत्पश्चात चूहों के मस्तिष्क के अध्ययन से यह मिला कि चूहों की बेहोशी अथवा नींद  की स्थिति में रंगीन डाई मस्तिष्क के अंदर तेजी से व बड़े क्षेत्र में फैलती है, इसके विपरीत चूहों की जागृत अवस्था में रंगीन डाई का फैलाव अति धीमा व सीमित हो जाता है ।इससे उन्होने यह निष्कर्ष निकाला कि नींद अथवा अचेतन अवस्था में मस्तिष्क के अंदर विभिन्न कोशिकाओं व इनसे निर्मित विभिन्न मस्तिष्क नियंत्रण प्रणालियों  के सामान्य तौर पर बंद दरवाजे खुल जाते हैं, जिससे मस्तिष्क द्रव के प्रवाह हेतु अतिरिक्त मार्ग व क्षेत्र मिल जाते हैं, जिससे उसके प्रवाह को अतिरिक्त गति व विस्तार मिल जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि किसी वाटर फिल्टर प्लांट में अशुद्ध जल के लगातार सर्कुलेशन से अशुद्ध  जल वापस  शुद्ध हो जाता है ।उनके प्रयोग की नतीजों के आधार पर कहें तो  नींद की अवधि में मस्तिष्क का अंतर्क्षेत्र 50 से 60 प्रतिशत तक बढ़ जाता है ।

यदि हम भारतीय योग व आध्यात्म की भी बात करें तो इसमें निद्रा भी एक प्रकार की अति प्रभावकारी यौगिक प्रक्रिया व साधना ही होती है जिससे हमारे मस्तिष्क व शरीर की शुद्धि व इनके मृत महत्वपूर्ण कोशिकाओं का  पुनर्निर्माण होता है,जिससे मनुष्य का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पुनर्स्थापित व सुनिश्चित होता है ।

हम मनुष्य के पूरे जीवन काल को देखें तो बाल्यावस्था में हम नींद का भरपूर आनंद उठाते हैं, यही कारण है कि बच्चे प्रायः निरोग, प्रसन्नचित्त व किसी प्रकार की थकावट हुये सदैव जोश व सक्रियता से भरपूर रहते हैं ।इसी प्रकार हमारे  युवावस्था में अति ऊर्जावान व ताजगी से भरपूर होने के पीछे स्वस्थ व गहरी नींद का विशेष योगदान होता है ।परंतु मनुष्य की आयु  बढ़ने के साथ साथ जीवन की बढ़ती आपाधापी, जिम्मेदारी की दुश्चिंताओं,अतिरिक्त  कामकाज के दबाव में मस्तिष्क  को आवश्यकता के अनुरूप नींद व आराम न मिलने  के फलस्वरूप इसका दुष्प्रभाव न सिर्फ मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर बल्कि  शरीर पर भी  स्पष्ट  दृष्टिगोचर होने लगता है, जैसे शरीर की त्वचा की चमक धीरे धीरे कम होना, चेहरे पर चमक, ताजगी व आत्मविश्वास के बजाय कांतिहीनता,  मुरझायापन  व निराशा दिखाई देना इत्यादि ।धीरे धीरे मस्तिष्क द्रव  की बढ़ती अशुद्धियों व इनके परिणाम स्वरूप इसकी  घटती दक्षता के कारण मस्तिष्क दुश्चिंता व अवसाद जैसी बीमारियों का शिकार होने लगता है, जिससे मनुष्य न सिर्फ अनिद्रा जैसी मानसिक बीमारी का शिकार होता है, बल्कि मस्तिष्क द्रव के प्रदूषित होने से शरीर की बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता लगातार  क्षीण होने से शरीर विभिन्न बीमारियों का शिकार व रुग्ण हो जाता है ।और सच कहें तो मनुष्य मानसिक, शारीरिक रुग्णता के दुष्चक्र में फँस जाता है व इस प्रकार उसका संपूर्ण जीवन ही सुख शांति से रहित, अवसाद, दुख व अशांति से भर जाता है, कई बार तो मनुष्य को अपना जीवन ही निरर्थक, कष्ट पूर्ण व बोझिल  लगने लगता  है, जिसकी परिणति प्रायः मनुष्य की  गंभीर रुग्णता  व असमय मृत्यु में  होती है ।

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि नींद व आराम का हमारे स्वस्थ व दीर्घ जीवन हेतु विशेष महत्व है ।इसलिये भले ही हम इसे मजाक समझकर टाल दें, परंतु यह कहावत बड़ी अर्थ पूर्ण व सार्थक ही है कि "आराम बड़ी चीज़ है, मुँह ढककर सोइये।"

Monday, October 14, 2013

रक्तबीज बढ़ते ही जाते, जितना इनपर वार किया है ।

हम हर वर्ष मनाते हैं दुर्गा पूजा और दशहरा,
दिलाते हैं स्मरण स्वयं को शक्ति की,विश्वास की,
कि बुराई पर होती है  अच्छाई की जीत, पाप पर पुण्य की जीत ,
अहंकार पर प्रेम की जीत, दुराचार पर सदाचार की होती रहे जीत।

इसी के प्रतीक स्वरूप हर वर्ष एक नया महिषासुर निर्मित करते हैं ,
व सजे धजे पंडाल में, उसके नाश व मानमर्दन की मूर्ति स्थापित करते हैं
रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण जैसे दुर्दम्य राक्षसों के बनाते हैं नयेनये पुतले,
खूब सजाधजा, रंगरोगन लगा, धूमधाम से उनका दहनउत्सव करते हैं ।

फिर भी आश्चर्य तो यह कि लगातार बढ़ती ही जाती है आबादी , इन
नये नये  व दुर्दांत महिषासुरों से, शुम्भनिशुम्भों से  , आततायी रावणों से,
वे तो हो रहे  हैं और  सशक्त व बलवान, दिन दूने रात चौगुना के माफिक,
उन्हीं का दिखता बोलबाला चारों ओर,  बढ़ते ही हैं,घटने का तो नाम ही नहीं लेते हैं ।

कई बार तो इन राक्षसों का पराक्रम और ताकत इतना सकते में डाल देता है
कि लगता है कि यह सारा उत्सव ,तामझाम इनकी ही प्रशस्ति में है ,
हमारे त्योहारों की फिल्म के असली हीरो तो यही तथाकथित विलेन ही हैं,
माँ दुर्गा, भगवान राम ,ये विजय के प्रतीक , तो  बस साइड रोल में हैं ।

रक्तबीज बढ़ते ही जाते, जितना इनपर वार किया है

Monday, October 7, 2013

संघर्ष और सफलता.....

आज अखबार पढ़ते बाॅलीवुड की दो प्रसिद्ध  शख्सियतों के छपे इंटरव्यू पर सरसरी तौर पर निगाह गयी, एक तो एक्ट्रेस मल्लिका सहरावत और दूसरे प्रसिद्ध गायक अभिजीत ।ध्यान से पढ़ने पर इनका इंटरव्यू इतना रोचक व प्रेरणा दायी लगा कि मैं इनपर अपने विचार लिखने का संवरण नहीं रोक सका।

मल्लिका सहरावत का जन्म हरियाणा के एक गाँव मोठ में एक मिडिल क्लास परिवार में हुआ, और उनकी छोटी कक्षा की पढ़ाई निरवाना में हुई ।उनके पिता श्री मुकेश लाम्बा हरियाणा सरकारी विभाग में इंजिनियर थे, जो बाद में ट्रांसफ़र होकर परिवार सहित  दिल्ली आये, और  मल्लिका की आगे की पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई ।

मल्लिका का मूल नाम रीमा लाम्बा था, व बचपन से उनकी आकांक्षा फिल्मों में काम करने की थी , परंतु उनकी कंजर्वेटिव  पारिवारिक पृष्ठ भूमि व उनके पिता की पारंपरिक सोच,कि नारी नुमाइश की चीज नहीं और उसकी सीमा व मर्यादा मात्र घर की चहारदीवारी के अंदर व बालबच्चों व घर की देखभाल तक सीमित होनी चाहिए,  उन्हें फिल्मों में काम करने की अनुमति कदापि न देते, अतः मन में फिल्म एक्ट्रेस का सपना लिए  वे एक दिन अपना घर छोड़ कर मुंबई भाग आयी।उनके पिता उनकी  इस हरकत से इतने आहत व नाराज हुए कि उन्होंने अपनी पुत्री से सदैव के लिए नाता तोड़ लिया, यहाँ तक कि उन्हें अपनी पुत्री के नाम के आगे अपने  पारिवारिक सरनेम लाम्बा  भी  गँवारा नहीं था, इसलिए इन्होंने अपना नाम बदलकर मल्लिका सहरावत कर लिया, जो उनकी माँ के मेडेन नाम से लिया  है।

वे मुंबई के एक साधारण चाल में किराए पर रहतीं, लोकल ट्रेन में धक्का खाते फिल्मों में काम हेतु संघर्ष करती रहीं।काफी समय के संघर्ष के उपरांत उन्हें छोटे मोटे मॉडलिंग व फिल्म में एक्स्ट्रा रोल के काम मिले, अंततः महेश भट्ट की फिल्म मर्डर  से उन्हें ब्रेकथ्रू मिला और उनका नाम फिल्मों में बोल्ड व बिंदास रोल हेतु  प्रसिद्ध होता गया ।फिर वे संयोग वश अंतर्राष्ट्रीय फिल्मएक्टर व मूवी  मेकर जैकी चैंग के संम्पर्क में आयीं, जिससे उन्हें हॉलीवुड मूवीज में काम करने का अवसर मिला।वर्तमान में वे आइटम सांग व अपनी छवि के अनुरूप  ग्लैमरस रोल करना पसंद करती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इन कामों से उन्हें अच्छा पैसा मिलता है जिससे वे अपने उच्च स्तर के मँहगे रहनसहन को मेंटेन कर पाती हैं ।

उनके पिता व उनका परिवार, सिवाय उनके छोटे भाई के जो उनके साथ मुंबई रहता है, उनसे अभी भी नाराज व संबंध विच्छेद रहते, जिसका मल्लिका बहुत दुख होता है किन्तु उन्हें इस बात का बहुत संतोष होता है कि वे अपना जीवन अपने सपनों व आकांक्षा के अनुरूप व आत्मनिर्भर होकर जी रहे हैं ।उनका यह भी सपना है कि भारत की हर नारी आत्मविश्वास व आत्मनिर्भर होकर जिये, न कि मात्र पुरुष समाज के नियंत्रण व आधिपत्य का एक लाचार जीवन ।

मल्लिका सहरावत की बिंदास छवि व अलग खयालात से उनके पिता की ही तरह  भले ही कोई असहमत हो व उन्हें नापसंद करता हो, परंतु इसमें निश्चय ही कोई  संदेह नहीं कि मल्लिका सेहरावत  भारतीय नारी के स्वयं की सोच व जीवन के सपनों के प्रति दृढ़  आत्मविश्वास व आत्मबल की प्रतीक हैं, जो अपने सपनों व आकांक्षाओं की प्राप्ति हेतु किसी भी प्रकार के संघर्ष का सामना करने का हौसला रखती है ।

इसी प्रकार प्रसिद्ध गायक अभिजीत के जीवन की संघर्ष गाथा भी कम रोमांचक व प्रेरणा दायी नहीं है ।अभिजीत का जन्म कानपुर में एक साधारण बंगाली परिवार में हुआ था, पिता का व्यवसाय डूब जाने व परिवार की माली हालत खराब होने से इनका परिवार कठिनाई से गुजर रहा था, इनके बड़े भाई कम उम्र में ही पढ़ाई छोड़ परिवार के गुजरबसर के लिए छोटा मोटा काम करते ।अभिजीत की रुझान संगीत व म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट्स में थी, सो वे छोटे मोटे ऑर्केस्ट्राओं में गाने बजाने का काम करते ।जीवन संघर्ष व कठिनाई से जरूर भरा था पर किशोर अभिजीत का दिली सपना फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग का था ।अपने इसी सपने को लिए वे एक दिन घर से भागकर मुंबई आ गये ।तीन चार साल तक परिचितों, रिश्तेदारों के यहाँ शरण लिए काम की तलाश करते रहे, फिर छोटी मोटी नौकरी करते किराये की चाल रहकर अपने गाने के ऑडिसन हेतु कई साल म्यूजिक स्टूडियो व संगीतकारों के चक्कर काटते संघर्ष रत रहे।कई वर्ष के संघर्ष के बाद  अंततः उन्हें आर डी बर्मन ने देवानंद की फिल्म आनंद और आनंद में किशोर कुमार के साथ एक डुएट प्लेबैक  सांग गाने का मौका दिया, परंतु फिल्म और गाना दोनों बुरी तरह असफल रहे व यह मौका भी अभिजीत को गुमनामी से बाहर लाने व जीवन में  बेहतर मौका दिलाने में नाकाम रहा ।अंततः दस साल के लंबे संघर्ष के बाद संगीत कार आनंद मिलिंद द्वारा फिल्म बागी में मिले गाने के मौके से इनको वास्तविक सफलता व पहचान मिली ।फिर तो अभिजीत दा ने मुड़कर नहीं देखा  ,व  नब्बे के दसक में वे बॉलीवुड में सबसे सफल गायक की शोहरत व सफलता हासिल किये ।आज भी उनकी पहचान व सफलता एक अच्छे पार्श्वगायक की बनी हुई है ।

ऐसा नहीं कि मल्लिका सहरावत अथवा अभिजीत मात्र ही इस संघर्ष से मिली सफलता के उदाहरण हैं, बल्कि सच पूछें तो अमिताभ बच्चन से लेकर शाह रुख खान तक  प्रायः सभी प्रसिद्ध कलाकारों को अंततः सफलता व पहचान  काफी संघर्ष व मसक्कत के बाद ही मिली, अलबत्ता सहज व बिना किसी संघर्ष के  सफलता के उदाहरण तो अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलते हैं ।

यदि फिल्म जगत अथवा कलाकारों के अन्यथा भी अध्ययन करें तो भी यही  पायेंगे कि व्यक्ति को जीवन में सफलता कड़े संघर्ष व मसक्कत के उपरांत ही मिलती है, अर्थात् संघर्ष किसी सफल व्यक्ति के जीवन स्क्रिप्ट का अनिवार्य हिस्सा है।

हालांकि ऐसे भी कम उदाहरण नहीं हैं जब किसी व्यक्ति को कड़े संघर्ष के उपरांत सफलता नहीं मिल पायी, अनगिनत ही उदाहरण मिल जायेंगे कि संघर्ष करते रहे, पर व्यक्ति को सफलता नहीं मिली व गुमनामी में खोकर अनजान जीते मरखप गये, बॉलीवुड में तो ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जायेगें, परंतु उतना ही यथार्थ  यह भी है कि प्रायः जीवन संघर्ष के नतीजतन सफलता एक न एक दिन  अवश्य ही  हासिल होती है, बस इतना कि आप इन संघर्ष व कठिन हालात को धीरज रखकर सामना करते मौके पर अटल  खड़े   रह सकने का हौसला कायम रखें ।