Sunday, July 24, 2011

मोहयात्रा


पंडित शुचिधर्म शास्त्री अपनी अनुशासित दिनचर्या के अनुरूप नित्यक्रिया व स्नान से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण कर ताम्रपात्र में पु:ष्प व बेलपत्र अभिरचित पवित्र जल धारण किये , मन में शिवस्त्रोत्र का जाप करते संयमित कदम से शिवमंदिर की ओर जा रहे थे।

मंदिर गाँव के दक्षिण , उनके आवास से चार-पाँच फर्लांग की दूरी पर था।यह मंदिर गाँव के जमींदार ने लगभग सौ वर्ष पहले निर्माण कराया था । शुचिधर्म के दादाजी मंदिर के पुजारी थे और मंदिर प्रांगण में ही एक कुटियानुमा मकान में सपरिवार रहते थे।उनके देहावसान के उपरांत शुचिधर्म के पिता मंदिर के पुजारी बने, किंतु मंदिर प्रांगण का कुँआ सूख जाने व जल की समस्या के कारण अपना नया आवास गाँव के निकट तालाब के पास अपने पुस्तैनी जमीन में बना लिया और परिवार सहित यहीं रहने लगे। सुबह शाम की दैनिक मंदिर पूजा अब घर से ही आ जा कर करते।यही क्रम शुचिधर्म ने जारी रखा है।

पंडित शुचिधर्म का बडा भरा-पूरा परिवार था- चार बेटे,बहुएँ,कई पोते-पोतियाँ,सम्पन्न परिवार था।इनके आवास से मंदिर आवागमन का रास्ता पहले पगडंडीनुमा पर साफसुथरा था। किन्तु विगत कुछ वर्षों से कुछ निम्न जाति के लोग रास्ते के समीप गांव के इस हिस्से में बस गये और उनके सूकर आदि पालतू जानवरों व विष्टा के कारण रास्ते के किनारे जगहजगह गंदगी हो गयी थी, रास्ते के समीप गंदे पानी और विष्टा-कीचड से भरे गड्ढे में सूकर लोटपोट व धमाचौकडी करते। पंडित शुचिधर्म इस रास्ते की गंदगी व गंदे दृश्य को किसी तरह बरकाते व सहन करते,मन ही मन कुढते, मंदिर पूजा हेतु आवागमन करते।

आज मंदिर जाते वही अनर्थ हुआ जिससे पंडित शुचिधर्म सदा बचते बचाते थे। रास्ते के किनारे कीचड से भरे गड्ढे में एक प्रौढ सूकर गुरगुराहट भरते ,अपने में ही मस्त, कीचड में अपनी पूँछ ऐंठते- पटकते धमाचौकडी खेल और कीचड बिखेर रहा था। शुचिधर्म इस गंदगी को बहुत बरकाते हुये रास्ते से निकल जाना चाहे, पर यह क्या, कीचड के कुछ छींटे उनकी धवल धोती, पवित्र शरीर व पूजा-जल में पड ही गये। यह भारी अनर्थ था। शुचिधर्म की वेदना व क्रोध का पारावार न था और मारे गुस्से के पागल हो , पास में पडे पत्थर को उठाया और सूकर को दे मारा। यह इतना जोरदार आघात था कि  सूकर  के प्राण पखेरू उड गये। किन्तु प्राण त्यागने के पूर्व सूकर ने शुचिधर्म को कडा श्राप दिया कि – रे पंडित तूने अकारण मुझ निर्दोष का वध किया है, इसलिये तू भी मृत्यु को प्राप्त हो और तुरंत सूकर-योनी में जन्म ले।पंडित को काटो तो खून नहीं।वह हाथ जोड सूकर से अपने क्रोध वशीभूत किये गये भयंकर अपराध के लिये क्षमा और श्राप से मुक्ति व अपने दीवन के लिये प्राण की भीख माँगने लगे। सूकर श्रापमुक्ति तो दे नहीं सकता किंतु प्राण त्यागने के पूर्व यह उपाय अवश्य बताया कि यदि उनके सूकर जन्म के उपरांत, उनके इस मानव जन्म के पुत्र या पोते उनका वध कर दें तो अवश्य ही उन्हे सूकर योनी से मुक्ति मिल जायेगी।

अब शुचिधर्म करते भी क्या, उदास-दुःखी मन घर वापस आये, सारा वृतांत घर वालों को सुनाया,रोते-बिलखते परिवारवालों से विदा लेते ,शरीर त्याग दिया और सूकर योनि में उसी सूकर परिवार में नया जन्म लिया।नया जीवन, नया परिवेश,नये माता-पिता, नया परिवार, किंतु पूर्व-जन्म की स्मृतियाँ यथावत थीं। नया परिवेश विष्टा, गंदगी व कीचड से भरा था, जिससे वे घृणाँ करते ,रोते-बिलखते रहते। जहाँ अन्य सूकर-शिशु विष्टा-कीचड के गड्ढे में लोटते-पोटते खेलते, वहीं शुचिधर्म गड्ढे के बाहर डरे-सहमे रोते बिलखते रहते। सभी सूकर उनका मजाक उडाते, सिवाय उनकी सूकर माँ के , जो मात्र उन्हे स्नेह, प्रेम व दुलार व आश्वासन देती, अपने स्तन से दुग्ध-पान कराती। शुचिधर्म यदि इस विषम वीष्टा-गंदगी से भरे परिवेश में यदि जीवित थे तो बस उनकी सूकर माँ का स्नेह व प्रेम था।उसी के प्रयाश से वे धीरे-धीरे  वीष्टा-कीचड के गड्ढे में उतरने, लोटने-पोटने व सूकर का स्वाभाविक भोजन का आनंद उठाने के अभ्यस्त होने लगे।

उधर उनके पुत्रों परिवार वालों को एक दिन उनकी व उनके श्राप-निवारण की सुध आयी,तो दौड-दौडे उसी नियत स्थान- वीष्टा-कीचड के गड्ढे के समीप हाथ में पत्थर उठाये पहुँच गये,जहाँ शुचिधर्म अपने सूकर माँ के साथ गड्ढे में खेल में रमें था। जान-पहचान हुई,सबका रोना बिलखना शुरू हो गया, उनके पुत्र तो यह दृश्य व अपने पिता की घृणित जीवन दशा देख क्षोभ व दुःख से भर गये, और उनके इस नारकीय जीवन से मुक्ति हेतु हाथ में लिये पत्थर से वार करने को तत्पर हो गये। सूकर माँ अपने पुत्र के बिछडने के भय व आशंका में प्रलाप करने लगी। शुचिधर्म धर्मसंकट में पड गये और अपने सूकर माँ के प्रेम-स्नेह के मोह में अपने ही पुत्रों से अपनी जान की मोहलत माँगने लगे। अपने पुत्रों को यह समझा-बुझा कर वापस कर दिया कि वे कुछ दिन अपनी सूकर माँ के साथ रह लें, फिर वे लोग कुछ समय के उपरांत आकर उन्हें इस सूकर जीवन से मुक्ति दें।

सूकर माँ इस नयी परिस्थिति व अपने पुत्र को शीघ्र खोने के भय व असुरक्षा की भावना के कारण, शुचिधर्म को शीघ्र-विवाह करने व पुत्र से बिछडने से पहले पोते का मुँह देखने का आग्रह करने लगी। शुचिधर्म को अपनी इस माँ के प्रति अति प्रेम व आदर था, अंतः उसके इस आग्रह के न टाल सके और उनका शीघ्र ही एक सुंदर सी सूकरकन्या से विवाह हो गया। कुछ दिनो के उपरांत उनके परिवार में और वृद्धि हो गयी जब उनकी सूकर माँ की अपार हार्दिक इच्छा के अनुरूप शुचिधर्म कई सुंदर सूकर पुत्रों के पिता बन गये। धीरे धीरे वे अपनी इस नयी पारिवारिक जिम्मेदारी में इतना रम व खो गये कि उन्हे अपने पुराने परिवार के प्रति मोह तो दूर, स्मृति भी क्षिण सी होने लगी।

कुछ माह उपरांत, उनके पूर्वजन्म के पुत्रों को जब अचानक उनकी सुध आयी तो फिर से वे पत्थर से लैश , उनका वध कर उन्हें श्रापमुक्ति देने उस स्थान पर आ पहुँचे। शुचिधर्म के लिये तो यह और धर्मसंकट व उहापोह की स्थिति थी। एक तरफ उनका पुराना बिछडा परिवार व उनसे मिलने की ललक तो दूसरी और उनका नया भरा-पूरा परिवार , उनके प्रति उपजा अपार प्रेम व मोह और इनसे बिछडने की कल्पना मात्र से मन में उठने वाला भारी दुःख।

अंततः शुचिधर्म ने जी कडा कर साफ शब्दों में अपने पूर्वजन्म के पुत्रों को यह समझा कर वापस कर दिया कि वे अब अपने इस नये भरे-पूरे परिवार में अति प्रसन्न हैं, वे लोग भी अब उनका मोह व चिंता छोड , उन्हें भूल जायें और वापस लौट जायें।

यह मोहयात्रा निरंतर है ।

Friday, July 15, 2011

गुलमोहर,काली घटा,आधी जुलाई..

आज सुबह की सैर पर निकला तो इत्तफाकन इन तीनों पर साथ साथ ही दृष्टि और ध्यान गया- पार्क में पीत-रक्ताभवर्ण फूलों से लकदक गुलमोहर का पेड, आसमान मे छायी काली घटा , मानों अल्लढ आलसी व अर्धनिद्रित सूरज ने इनकी रजाई ओढ रखी हो, और हाँ आज पन्द्रह जुलाई यानी आधी जुलाई, । इस ध्यानसंगम में कैलास गौतम जी की कविता की निम्न पंक्तियाँ अचानक मनसतह पर उभरकर तैरने लगी है-  
 
गुलमोहर,काली घटा,आधी जुलाई क्या करूँ!
खींच कर मारी है राई फिर किसी ने क्या करूँ!

जी हाँ , यह दृश्य तो मन और हृदय दोनों के अति कोमल तंतुओं पर राई की सिटकी मार  उन्हें झंकृत सा कर दिया है।पता नहीं आपने राई की सिटकी की चोट खायी है या नहीँ और शायद यह भी सोच रहे हों कि भला एक रत्तीभर से भी छोटी राई की सिटकी की भी कोई चोट होती होगी पर यकीन मानें यह चोट होती है बडी कसकदार- ठीक वैसी ही जैसी फुलगेंदवा की मार, सीधे कलेजवा पर ठेस लगाती है।कैलास गौतम जी तो बडे कवि हैं, और इस अनूठे दृश्य को देखकर अपनें मन में उपजी खास मीठी कुलबुलाहट को अपने सहज चटपटी कविता के अंदाज में बयाँ कर दिये, पर हमारे जैसे सामान्य बुद्धि-विवेक व अभिव्यक्ति क्षमता वाले व्यक्ति के लिये यह इतना सहज नहीं। मैं तो इस अंतर्आनंद को बस यही अभिव्यक्ति दे सकता हूँ कि – ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अंतर्मन ही भावे । 

वैसे आधी जुलाई मेरे लिये बचपन से ही खास रही है ( शायद इस पक्षपात का एक कारण यह  भी हो कि मेरा जन्मदिन उन्नीस जुलाई है - जिसे आप आधा जुलाई ही मान सकते है ) । गरमियों की भयंकर तपन व लम्बे गृष्मावकाश के उपरांत जब जुलाई के दूसरे हफ्ते में स्कूल खुलता, काली घटाएं पूरे आसमान को ढक देंती और झमाझम बारिस शुरु हो चुकी होती।बिना छाता और जूते के ( एक पाँलिथीन की बरसाती होती भी तो उसमें अपने स्कूल बैग को लपेट लेते ताकि किताबें व नोटबुक्स को भीगने से बचा सकें। ), दौडते हुये, पानी से भरे खेतों-क्यारियों के बीच पैर से छपाछप खेलते , झमाझम बारिस में भीगते स्कूल पहुँच जाते। अगर किसी दिन घनघोर बारिस हो जाती और पास की नदी में आचानक बाढ आ जाती और गुरुजी लोगों के अनुपस्थित होने से स्कूल का चपरासी रेनी-डे की छुट्टी घोषित कर देता, तो उदास मन से घर लौटना पडता ( उदास इसलिये नहीं कि हम बडे पढाकू थे बल्कि इसलिये कि स्कूल में छुट्टी होने से घर जाकर खेतों में छोटा-मोटा काम करना पडता था।) 

वैसे युवा होने पर और अब इस प्रौढावस्था में भी मुझे यह आघी जुलाई उतनी ही रोमांचित ( और इस रोमांच का आप क्या अर्थ निकालना चाहते हौं यह मैं आप पर ही छोडता हूँ ।) करती आयी है क्योंकि मेरी मौरिज-एनिवर्सरी भी दस जुलाई को पडती है।

बचपन के उन रोमांचक यादों में मन को उत्फुल्ल करने वाला एक और दृश्य था - विद्यालय प्रांगण में फैले अनेक गुलमोहर के पेड सुन्दर लाल-पीले रंगीले फूलों से लक-दक हो जाते थे, और कुछ ऐसा दृश्य हो जाता मानों सुहागन स्त्रियाँ हरी साडियों में सजी, व रंग-बिरंगे फूलों की थाल सिर पर श्रद्धा से रखे , माँ शीतला की पूजा हेतु शांतभाव से खडी हैं।

तो गुलमोहर,काली घटा,आधी जुलाई की इस तिकडी ने हर साल की तरह  ही फिर आज मेरे मन और हृदय के कोमल धरातल पर खींच कर जोर से राई की सिटकी मारी है और इसकी मीठी टीस से अनेक सुखद अनुभूतियाँ मन में झंकृत हो उठी हैं।

Wednesday, July 13, 2011

नौकरशाही व कार्यदक्षता के लिये निरुत्साह


मुझे अपने बचपन का एक दृश्य याद आता है-गाँव में रामलीला का धनुष-बाण का प्रकरण । यज्ञमंडप में श्रीराम ने धनुष तोड दिया है और सभास्थल श्रीराम के जयघोष से गूँज उठता है।सीताजी द्वारा वरमाल की  तैयारी चल ही रही है कि अचानक स्टेज पर परशुराम जी क्रोध से भरे अपना फरसा लहराते रौद्र रूप में प्रकट होते हैं और कडकती आवाज में सवाल करते हैं कि किस दुष्ट ने शिव का महान धनुष तोडने का दुःसाहस किया है, वह तुरत सामने आये और उनके फरसे से मृत्यु-दंड प्राप्त करे अन्यथा वे सभा में बैठे सारे राजाओं को मार डालेंगे। मंच पर सन्नाटा छा जाता है और वहाँ पर बैठे राजा जनक सहित सभी राजाओं के हलक में जान आ जाती है कि अब क्या होगा, कौन बचायेगा उन्हे परशुराम के कोप व फरसे से ।तभी स्टेज पर लँगडा जोकर प्रकट होता है, और अपनी भचकती टाँगों से स्टेज पर दुहाई देते यह कहते भागता है- बहुत अच्छा किया मेंने जो धनुष नहीं तोडा। दर्शक ताली बजाकर जोकर के नाटक न मसखरेपन का मजा लेते थे।

पर अब मैं विचार करता हूँ तो मुझे जोकर के उस मसखरेपन में एक सधे हुये नौकरशाह की गहरी सोच नजर आती है।हमारी नौकरशाही में जब भी कोई श्रीराम बनकर धनुष तोडता या तोडने की कोशिश करता है और परिणामस्वरूप उसे शासनतंत्र में बैठे अनेकों फरसाधारी परसुरामों के कोप का सामना करना पडता है, उस समय हमारी नौकरशाही में बैठे निकम्मी जमात रूपी जोकरों को स्टेज पर प्रकट होने का सटीक मौका मिलता है और वे पूरे दमखम व ऊँची आवाज में अपने निकम्मेपन की दुहाई देने लगते हैं, जैसे- मैंने इसीलिये फलाँ-फलाँ प्रोपोजल में टाँग अडायी थी, मेंने तो पहले ही कहा था कि दाल में कुछ काला है और इसीलिये फाइल को अपने ड्रार में घुसेड दिया था और सालों हस्ताक्षर नहीं किया, आदि आदि ।

हमारी नौकरशाही की ढाँचागत व्यवस्था ही ऐसी है कि किसी तरह की नयी सोच, नई पहल , लीक से हटकर काम करने,अधिक मुस्तेदी या दक्षता दिखाने के हजारों-हजारों खतरे हैं और कागजी रिकार्ड में किसी न किसी विवादास्पद आरोपों के भागीदार बनने के चांस बढते हैं, जबकि निकम्मे-नाकारेपन के लिये न सिर्फ किसी भी प्रकार का दंड के विधान का अभाव है, बल्कि उल्टे कोई भी निर्णय न लेने व न्यूनतम रिस्क उठाने के कारण ऐसे लोग कागजी रिकार्ड में पूरे पाकसाफ,विवादरहित सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि ज़ब किसी महत्वपूर्ण प्रोन्नति या पुरस्कार देने की बारी आती तो प्रायः निकम्मे- नाकारे नौकरशाह सूची में उच्चतम पायदान पर होते हैं।क्रिकेट की भाषा में समझने की कोशिश करें तो कह सकते हैं कि जो बल्लेबाज रिस्क उठाकर शॉँट मारता है, भले ही टीम के लिये कितने महत्वपूर्ण रन बनाया हो, पर किसी भी छोटी-बडी गलती के लिये आउट करार दे दिया जायेगा जबकि जो बिना कोई रन बनाये भी बस डिफेन्ड करता रहे, आउट न हो वही विजयी घोषित होगा।मुझे अपने विभाग के एक वरिष्ठ सहकर्मी का स्मरण आता है जो दिन में गिनकर फाइलें ( ज्यादा से ज्यादा पाँच या छः) हस्ताक्षर करते थे और अंततः विभाग के वरिष्ठतम पद को सुशोभित करते हुये मूछों पर ताव देते हुये नौकरी से रिटायर हुये, बल्कि रिटायरमेंट के बाद भी अपने अच्छे रसूख के कारण अभी भी एक सरकारी सम्बंधित विभाग में ही एक उच्च महत्वपूर्ण पद की शोभा बढा रहे हैं।

इस तरह हमारी नौकरशाही में जहाँ निकम्मे-नाकारेपन में न तो किसी तरह की झंझट व लफडा, उल्टे पुरस्कार व प्रोन्नति के बेहतर अवसर हें, वहीं कार्य-पहल व निर्णयशील बनने के हजारों-हजार खतरे और जिसका सीधा मतलब है भविष्य में मिलने वाले पुरस्कार व प्रोन्नति के अवसरों को सीधे-सीधे दाँव पर लगाना। शायद यही कारण है कि हमारी नौकरशाही में कार्य-पहल,दक्षता व निर्णय लेने के प्रति भारी निरुत्साह है।

Sunday, May 8, 2011

माँ तुम ममता......


 
माँ तुम ममता,स्नेह,दया और प्रेममूर्ति हो।
शुष्क उपेक्षित इस जीवन में तुम नेहमूर्ति हो।
अंधकारमय इस कूपभवन में तुम दीपमूर्ति हो। 
पंचतत्व के इस शरीर में तुम प्राणमूर्ति हो। 
 
दीव्यमयी हो,ज्योति मयी हो,तेजमयी हो।
हूँ अपूर्ण मैं तुम प्रसाद व पूर्णमयी हो।
तुम बिन जगत अस्त व्यस्त तुम श्रृँगारमयी हो।
जगतपुरुष है कृत्य और तुम परिणाम मयी हो। 
 
माँ तेरा यह अचल स्नेह गंगा बन बहता।
तेरी करुणा वात्सल्य क्षीर आँचल में मिलता।
तेरा नेह दुलार शब्द है मेरा  लोरीगीत बनता।
तेरी स्मृति तेरा चिंतन ही मेरी पूजा बनता।
 
हो अस्तित्व , प्राण ,ध्यान , चिंतन तुम मेरी।
माँ तुम जननी,पालनकर्तृ और मोक्षकर मेरी।
तुम संस्कार,नाम,जीवन-ज्ञान-दीप हो मेरी।
तुम त्रिभुवनस्वरूपिणि,सकल अस्तित्व हो मेरी।
 
जीवनपथ है तापमयी चलना अति दुष्कर हो।
माँ यदि तेरा स्नेहाँचल मेरे शीश पर न हो।
तुम मां करुणामयी, प्रेम-सागर-मयी हो।
मेरे उद्भव की कारण, नेह-क्षेम-कुशलमयी हो।

Wednesday, May 4, 2011

.......क्षण का उन्माद।



राग है या द्वेष है?
लोभ है या मोह है?
है ये मद कि मात्सर्य है?
धर्म है कि अर्थ है यह?
काम है वा मोक्ष है?
कौन है यह?
 
अपरिचितो सा,
प्रविष्ट करता मन महल में,
प्रत्यंचा के तीर जैसा,
द्रुत पवन के वेग जैसा, 
आधिपत्य संपूर्ण करता,
मष्तिस्क और विवेक पर।
 
हो रहे क्यों उन पलों में
चिन्तनों के हर पटल,
शान्त,मौन व निर्वाद,
असहाय और कुंठित,
संस्कार होते सब पराजित,
थके,स्तब्ध व प्रभावित,
उन पलों में।
 
कौन है यह?
सअहं अतिकार करता ,
चेतना जो शून्य करता,
यह एक क्षण का उन्माद!

Tuesday, May 3, 2011

खरगोश के संग खेल-दौड, शिकारी संग मिल शिकार................


यह खेल भी अजूबा है,
बडा ही रोमांच डूबा है,
खरगोश जब छोटा था
नटखट बडा प्यारा था,
मासूम था।
शिकारी के ही छत्रछाया में,
उसके अपने ही लान में,
इसी शिकारी कुत्ते के साथ
धमाचौकडी खेलता था।
उछलकूद करता था
कभी कुलाचें मारता था
हवा-पलटी करता था।
 
शिकारी भी
अपने इस पालतू खरगोश
और पालतू शिकारी कुत्ता,
दोनों की इस धमाचौकडी पर
खूब आनंद लेता था
फूला न समाता था।
उन्हें पुचकारता था
एक को गाजर 
तो दूसरे को बोटी
बडे चाव से खिलाता था।
 
खरगोश अब ढीठ,
बहुत ढीठ हो गया था।
शिकारी कुत्ते के साथ खेलते-खेलते
अब खुद को भी 
शिकारी बडा समझता था।
बडा ही दबंग हो गया था।
पूरा हुडदबंग। 
 
हद  तो तब हो गयी
जब एक दिन,
नाइन इलेवेन के दिन,
वह मालिक शिकारी
की थाली में रखे गाजर
पर झपट्टा मार दिया।
पालने-पोसने वाले मालिक का ही
फीस्ट खराब कर दिया।
 
शिकारी मालिक को 
यह नागवार गुजरा।
और खरगोश पर वह
बहुत बुरी तरह विफरा।
उसने इस गुस्ताख को दबोचने के लिए
शिकारी कुत्ते को ललकारा,
ब्लडी खरगोश को मारने  के लिए 
खुद भी बंदूक लिये हुँकारा।
 
कुत्ता तो कुत्ती चीज होती है।
दोस्ती तो ठीक है मगर
उसे बोटी भी तो खानी होती है।
सो मालिक के हुकुम की खातिर,
अपनी बोटी इंतजाम की खातिर,
और साथ में पुराने दोस्त
खरगोश से दोस्ती के बहाने की खातिर,
वह एक कुत्ता खेल खेलने लगा।
 
मालिक के सामने भौकता था,
कि शिकार का मुस्तैदी से पीछा कर रहा है।
उधर दोस्त को 
होशियार भी कर देता था कि 
शिकारी किधर से गोली चलाने वाला है।
तो कुत्ता गजब का कुत्तापन दिखा रहा था।
एक तरफ खरगोश के साथ
खेलदौड कर रहा था
तो द्सरी ओर शिकारी के साथ
नूरा शिकार भी कर रहा था।
 
जब आखिर खरगोश
शिकारी की गोली से
ढेर हो गया है।
खरगोश का खेल
खत्म हो गया है।
पर कुत्ते का कुत्तापन का खेल
अब भी जारी है।

कुत्ता शिकारी की टाँगों के पास
खडा है दुम हिलाते,
वफादार बना सा दिखता।
मगर आँखों में लालच
और उम्मीद की चमक लिये कि
मालिक इस शिकार का इनाम देगा।
दो चार बोटी खाने को फेंक देगा।
कुत्ता गजब के कुत्तेपन का खेल
खेल रहा है
शिकारी को अब भी लगता है कि
कुत्ता तो वफादार है,
और उसके शिकार में
बराबर मदद कर रहा है।

Monday, May 2, 2011

...लोकतंत्र सी आत्मा को।


 
राजनीतिक इंद्रियाँ जो,
हुईं अनियंत्रित प्रबल।
क्यों कोसते हो तुम निरर्थक,
लोकतंत्र सी आत्मा को।1
 
आत्मा तो अनादि है,
अजर अमर अप्रमेय है।
अदग्ध अक्षय अतिक्त है
अदृश्य अजन्म अज्ञेय है।2
 
लोकतंत्र जन आत्मा है,
लोकतत्र जन चेतना है.
लोकतंत्र समाधान बनता
जो भी जन की वेदना है।3
 
तरु-जडे ही जब विषैली,
पुष्प-फल को दोष कैसा?
स्वयं जब क्षलमयी जीवन
दूसरे से भरोष कैसा? 4
 
स्वयं मिथ्याचार पर दूजा
सची हो , यह बडा पाखंड है।
सुविधानुसार नियमविग्रह
यह बडा ही प्रवंच है।5
 
सत्य आंच रहित  होता
निडर निस्पृह निभय होता
आचरण में हरिश्चंद होता
आदर्श में यह राम होता।6
 
ज्ञान में यह बुद्ध होता
महावीर जैसा शुद्ध होता
नीति में करमचंद होता
प्रीति में नानकचंद होता।7
 
पर-उपदेश देना बाद में
प्रथम स्वयं को निर्देश दो।
घृणा से बचकर रहो तुम
अब प्रेम का संदेश दो।8