Saturday, September 14, 2013

हिंदी के सेवक

सितंबर माह का पहला पखवाडा सरकारी तौर पर हिंदी पखवाडा के रूप में मनाते हैं जिसका समापन १४ सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में होता है ।सभी सरकारी दफ्तरों, विशेष कर केंद्र सरकार अधीनस्थ विभागों, संस्थानों व कंपनियों में यह अनिवार्यतः मनाया जाता है ।जैसा कि हम सबको पता ही है कि हर सरकारी कार्यालय ,संस्थान में वाकायदा हिंदी विभाग होता है,जिसे प्रशासनिक भाषा में राजभाषा विभाग कहते हैं,  जिसका काम ही है हिन्दी का प्रचार प्रसार करना ।

सरकारी नौकरी की शुरुआत में मुझे यह नहीं समझ में आता था कि आखिर हिंदी को हिन्दी न कहकर राजभाषा क्यों कहते हैं, जबकि हकीकत में  राजकीय कामकाज से तो इसका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं (मेरे इस कथन से आप असहमत हो सकते हैं परंतु मैं जो यथार्थ अनुभव किया हूँ वही लिख रहा हूँ ।) फिर धीरे धीरे समझ में आया कि दरअसल हिंदी शब्द से धर्म विशेष की बू आती है जो देश की आजादी के बाद सत्ता में आये  हमारे तथाकथित धर्म निरपेक्ष नेताओं की छवि की चकमक सफेदी पर सांप्रदायिक  धब्बा लगा सकती थी, इसलिए राजनीतिक सहूलियत हेतु उन्होंने  हिंदी के बजाय इसका नाम राजभाषा रख दिया।राजनैतिक व सामाजिक कारणों से इसी प्रकार के अनेक पाखंड हमारे जीवन में अंतरंग स्थान रखते हैं अतः हमें हिंदी या राजभाषा नाम  को लेकर कोई आश्चर्य की आवश्यकता नहीं है ।
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हर सरकारी कार्यालय में तिमाही हिंदी बैठक,मेरा मतलब राजभाषा बैठक, नियमतः अनिवार्य है जिसमें हिंदी में कामकाज के प्रगति का व्यौरा दिया जाता है और हिंदी में कामकाज को और सुधारने की रणनीति पर चर्चा होती है ।यदि आप विगत बीस सालों से हिंदी की प्रगति  के आँकड़े सुनते रहे हों, तो मेरी तरह आप भी आश्चर्य करेंगे कि आखिर जब ९०-९५ प्रतिशत काम हिंदी में हो ही रहा है, फिर यह  बैठक व हिंदी में काम करने की बारबार दुहाई देने की आवश्यकता ही क्यों ?और फिर आप किसी सरकारी दफ्तर के कामकाज के रिकॉर्ड्स व फाइल  की जाँच कर लें आपको यह हकीकत स्पष्ट हो जायेगी कि सरकारी कामकाज अधिकांशतः किस भाषा में होता है, और निश्चय ही वह भाषा हिन्दी नहीं है, इस प्रकार हमारे सरकारी विभागों में हिन्दी में कामकाज की वस्तुस्थिति , हिंदी विभाग द्वारा इसका प्रचार प्रसार, इससे संबंधित तमाम बैठकें, दिये जाने वाले आँकड़े किसी घनचक्कर या मजाक  से कम नहीं है ।
 
सरकारी कार्यालयों में हिंदी  पखवाडा का आयोजन वैसा ही रोचक दिखता है जैसा कि वार्षिक गणेशोत्सव अथवा दुर्गा पूजा, कार्यालयों में जगहजगह बैनर पोस्टर जिसपर हिंदी में कामकाज हेतु प्रोत्साहन हेतु महान विभूतियों, जैसे महात्मा गाँधी, नेहरू, राजेंद्र प्रसाद इत्यादि, कई तो ऐसे नाम जिन्हें आपने हिंदी के कोर्स में  न तो कभी पढ़ा न सुना, इन महान विभूतियों के कथन पढ़ते तो यही अनुभव होता है कि मात्र हिंदी ही हमारे राष्ट्र की उद्धारक, रक्षक व स्वाभिमान है ।मुझे इन कथनों को पढ़कर उसी प्रकार की आत्म ग्लानि होती है जिसप्रकार महिलाओं की मर्यादा में जगह जगह लिखा यह कथन कि 'यत्र नार्यस्त पूज्यंते रमंते तत्र देवता' अथवा प्रायः पुलिस थाने में लिखा संदेश कि 'सत्यमेव जयते' अथवा  घूस देना या लेना दंडनीय अपराध है,जबकि वस्तुस्थिति है सर्वथा विपरीत  ।

सबसे बड़ी कोफ्त तो तब होती है जब हिंदी पखवाडा उत्सव के नाम पर ऑर्केस्ट्रा पार्टी, गीत संध्या, डीजे पार्टी, हास्य कविसम्मेलन व शेरो शायरी का आयोजन किया जाता है ।इन आयोजनों में कोई बुराई नहीं, परंतु इन्हें हिंदी समारोह से जोड़ना अजीब व अटपटा लगता है ।वैसे हो सकता है मेरी ही कम समझ का फेर हो क्योंकि जमाना ही मार्केटिंग का है और हो सकता है कि हमारे हिंदी प्रचारक प्रसारक  हिंदी के मार्केटिंग की यही रणनीति उचित समझते हों, परंतु मेरी एक बात से आप निश्चय ही सहमत होंगे कि इन साठ वर्ष से भी समय से लगातार हिंदी के प्रचार प्रसार के सरकारी   हथकंडों व टोटकेबाजी से हिंदी की कोई सार्थक प्रगति व उन्नति तो नहीं दिखाई देती ।

कई आधुनिक विचार धारा व जीवनशैली के लोगों को तो यह हिन्दी विंदी पढ़ना पढ़ाना, या हिंदी में बोलने या कामकाज करने का विचार  ही बकवास लगता है ।(मैं अहिंदी भाषी नहीं अपितु हिंदी भाषी भारतीयों की ही बात कर रहा हूँ ।) उनकी सोच में हमारे बच्चों की  पढ़ाई लिखाई अंग्रेजी में होने, अंग्रेजी बोलचाल से उनका  ज्ञान अंतर्राष्ट्रीय स्तर का, विशेष कर पाश्चात्य जगत के बराबरी का हो जाता है जिससे बच्चों के  विदेश में पढ़ने जाने   व विदेशी कंपनियों में रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं, अन्यथा तो हिंदी अथवा अन्य स्थानीय भाषा में पढ़लिख कर भी आदमी गँवार का गँवार ही रह जाता है, इस पढ़ाई का नौकरी व रोजी रोजगार में कोई लाभ नही होता ।परंतु हम यह भूल जाते हैं कि हमारी मातृभाषा हमारी नैसर्गिक ताकत व प्रतिभा होती है, वैज्ञानिक रूप से भी  यह सिद्ध है कि दो वर्ष की उम्र होने तक ही बच्चे की आधी शब्दावली व सामान्य परिज्ञान विकसित हो जाता है अतः मातृभाषा स्वाभाविक रूप से हमारी आधार भूत ताकत व क्षमता है जिसे नकार कर अथवा इसकी उपेक्षा करके हम अपने स्वाभाविक  ज्ञानार्जन व नैसर्गिक प्रतिभा के अनुसार व्यक्तित्व विकास से वंचित रह जाते हैं ।अततः हमारी यही कमजोरी सफल वैज्ञानिक, इंजिनियर,लेखक, व्यवसायी अथवा अन्य अनुसंधान क्षेत्र जिनमें नैसर्गिक प्रतिभा का विशेष महत्व होता है में पिछड़ेपन के परिणाम के रूप में दृष्टिगोचर होती है ।

मुझे हिंदी अथवा हमारी अन्य भारतीय भाषाओं के असली मित्र व सेवक तो कंप्यूटर सॉफ्टवेयर व मोबाइल फोन की विदेशी कंपनियां,जैसे माइक्रोसॉफ़्ट, गूगल, एप्पल, सैमसंग और नोकिया  लगती हैं जिन्होंने कंप्यूटर व मोबाइल पर हिंदी व हमारी अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में लिखने, टाइपिंग करने, पढ़ने ,ऑनलाइन शब्दावली की फ्री व बहुत आसान  सुविधा उपलब्ध करायी है जिससे वर्तमान आधुनिक तकनीकी युग में हिंदी का हर प्रकार के कामकाज में सहूलियत के साथ उपयोग संभव है ।

हमारी हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की गरिमा व मर्यादा की पुनर्स्थापना में मददगार ,इन सच्चे सेवकों को हिंदी दिवस पर शत शत नमन व इनका हार्दिक आभार ।

Tuesday, September 10, 2013

प्रकृति और अपरिग्रह

आज रात करीब तीन बजे ही नींद खुल गयी  और अनुभव हुआ कि पेट में भारी हलचल चल रही है, अभी कुछ ठीक से समझ भी पाता कि उल्टी जैसा अनुभव हुआ व मैं हड़बड़ी में भागता किसी तरह सिंक तक पहुँच सका, और फिर वमन का एक भारी दौर, पांच मिनट तक चले अपने शरीर के पाचनतंत्र की इस उत्छालन  प्रकिया में मेरे शरीर का तार-तार हिल गया, मुंह के स्वाद का तो यह हाल था मानो मैंने गलती से एसिड पी लिया हो।

अंततः शरीर के इस स्वतः संचालित परिमार्जन प्रक्रिया द्वारा शरीर के अंदर संचित हुए  विषादग्रस्त व अवांछनीय पदार्थों के निवारण से पेट को काफी राहत अनुभव हो रहा था व शरीर की अन्यमनस्कता भी धीरे-धीरे शांत हो रही थी।

कारण तो स्पष्ट ही था, पिछले दिन का असंयमित भोजन व खानपान, दो बार गणेश चतुर्थी पूजा का प्रसाद, फिर एक जन्मदिन की पार्टी में अतिरिक्त वसा व चीनी युक्त  खानपान व डिनर इस प्रकार अति भोजन का  ही यह दुष्परिणाम  था ।कई बार न चाहते हुए भी व अंतर्विवेक की चेतावनी के बावजूद भी हम औपचारिकता वश अतिभोजन के शिकार और बीमार पडते हैं।

यह स्वयं अनुभूत सत्य  है कि हमारा शरीर व इसके विभिन्न तंत्र की कार्यप्रणाली व  संचालन अपरिग्रह नियम पर आधारित है, शरीर वही स्वीकार कर सकता है जिसकी उसे अपरिहार्य आवश्यकता है, शरीर की मौलिक  आवश्यकता के इतर इसमें जो भी प्रविष्ट होता है वह इसके हेतु  अवांछित वैसे हानिकारक है। अतः हमारे शरीर व इसके विभिन्न नियंत्रण प्रणाली का निरंतर व अथक प्रयास यही रहता है कि अवांछित पदार्थ प्रथम तो शरीर में प्रविष्ट ही न करें, इसीलिए जरूरत से अधिक खाते ही तुरंत हमारे अंदर से सावधानी व खाने पर तुरंत  विराम देने हेतु संकेत आने शुरू हो जाते हैं, यह अलग बात है कि हम उन संकेतों की उपेक्षा करते खाना जारी रखते हैं, और आवश्यकता से अधिक यदि खा भी लिया तो यथाशीघ्र अवांछित पदार्थ का  शरीर से निवारण करें। इस प्रकार मेरे शरीर ने भी अपना मौलिक धर्म निभाते  अवांछित व अपचित अतिरिक्त भोजन पदार्थ  को वमन प्रक्रिया द्वारा शरीर से निवारण कर दिया  ।

सच कहें तो जब तक शरीर अपने अपरिग्रह नियम के पालन में सक्षम व सक्रिय  है तब तक हमारे शरीर में किसी प्रकार की व्याधि अथवा विकार नहीं होता, परन्तु जैसे ही इसका अपरिग्रह नियम भंग होता है, किसी भी कारण वश,  प्रायः तो हमारे स्वयं द्वारा ही  शरीरधर्म व इसके सदाचार के प्रति  अनुशासन हीनता व इनकी अवहेलना द्वारा ही , हमारा शरीर अनेक विकार व व्याधियों का शिकार बनता है।देखें तो हमारे शरीर के विभिन्न  विकार जैसे मोटापा, अतिरिक्त कोलेस्ट्रल इत्यादि, जो  अंततः गंभीर बीमारियों जैसे मधुमेह, रक्त चाप व अन्य हृदय संबंधी गंभीर रोग में रूपांतरित हो जाते हैं, के मूल में शरीर के अपरिग्रह नियम का भंग होना ही है ।

देखें तो हमारा शरीर ही नहीं अपितु प्रकृति का हर पक्ष अपरिग्रह सिद्धांत पर ही कार्य करता है, ग्रह नक्षत्रों,  हमारी पृथ्वी की गतिशीलता, सूर्य चंद्रमा एवं अन्य प्रकाश श्रोतों से हमें प्राप्त प्रकाश व ऊर्जा, पृथ्वी पर चर अचर सभी प्रकार का जीवन इसी अपरिग्रह नियम का पालन करते हैं। भौतिकी विज्ञान में विभिन्न सिद्धांत, चाहे वह प्रकाशिकी के हों, चाहे ध्वनितंत्र, चाहे  यांत्रिकी के हों अथवा हाइड्रालिक्स के सिद्धांत सभी का आधार अपरिग्रह नियम का अनुपालन है ।प्रकाश का परावर्तन, अपवर्तन अथवा विवर्तन सभी गुण अपरिग्रह के नियम के अनुपालन के ही परिणाम हैं ।

इसी प्रकार हमारे पशु पक्षियों के व्यवहार में भी अपरिग्रह धर्म का अनुपालन स्पष्ट गोचर होता है ।वे अपनी मौलिक आवश्यकताओं के इतर कोई भी सुविधा का निर्माण अथवा भविष्य हेतु संचयन नहीं करते ।शायद अपरिग्रह के सामान्य नियम के अनुपालन में अपवाद  मनुष्य मात्र ही हैं, मनुष्य अपने अतिरिक्त बुद्धि कौशल व जीवन व्यवहार चातुर्य की सहायता से न सिर्फ अपने जीवन यापन को सुगम बनाने का प्रयास करता है, अपितु वह अपनी व अपने भावी पीढ़ी की आवश्यकता हेतु भी सुविधा संचय करता है, और यही पर अपरिग्रह नियम भंग  होता है । आवश्यकता से अधिक अथवा भविष्य हेतु संचय अपरिग्रह सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत है ।सुविधाओं का अतिरिक्त संचयन न मात्र उनके प्रबंधन की समस्या को बढ़ाता है, अपितु यह सुविधाओं व संसाधनों की सामान्य व सहज  उपलब्धता में भी गतिरोध उत्पन्न उत्पन्न करता है ।समाज में व्याप्त विभिन्न आर्थिक विषमताओं, व इनके परिणाम स्वरूप उत्पन्न जटिल सामाजिक विषमताओं के मूल में भी मनुष्य द्वारा  अपरिग्रह नियम की उपेक्षा ही है ।

प्रकृति के संतुलन का आधार उसके अपरिग्रह नियम का अनुपालन ही है।मनुष्य द्वारा इस प्राकृतिक नियम की अवहेलना के  परिणाम स्वरूप जो भी असंतुलन उत्पन्न होता है, प्रकृति अंततः उस संतुलन को वापस स्थापित करने का प्रयास करती है, जिसे हम प्रायः प्राकृतिक आपदा समझते हैं ।इस प्रकार  हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमें जिन प्राकृतिक आपदाओं व संकटों का आज सामना कर रहे हैं इनके हेतु जिम्मेदार हम स्वयं हैं, इनके मूल में मनुष्य की अपरिग्रह नियम की घोर अवमानना ही है ।

Wednesday, September 4, 2013

दीप बन जलते रहो तुम

है अँधेरा गहन कितना ,
दीप बन जलते रहो तुम ।
पतझड़ों के दौर हों पर ,
पुष्प बन खिलते रहो तुम ।१।  

                          
कौन कहता है गगन का
विस्तार होता है असीमित ?
हौसला ग़र पास हो तो ,
नाप सकते छोर हो तुम ।२।

क्या असंभव, कल्पना क्या ?
कहते किसे दिन में सितारे ?
जो भी सोचो, घटित हो वह,
सोचकर देखो स्वयं  तुम ।३।

कौन कहता आ नहीं
सकते धरा पर चाँद तारे ?
वे सिमटते मुट्ठियों में ,जो
नभ ऊँचाई  उठ खड़े तुम ।४।

विस्तार इतना ! लहर कितनी !
गंभीर है अति  गर्भ सागर ।
फिर भी जो डुबकी लगाओ,
रत्नमणि निधि पा सको तुम ।५।

श्वेत,श्यामल,देश,मजहब,
भेद कितने , नफरतें सौ  ।
जो समझते मनुजता को ,
बंधु जग को  मानते  तुम ।६।

करतल लकीरों में छिपे हैं,
आगत समय के संकेत हलके ।
पढ़ते हृदय निज चेतना जो
जानते  भवितव्यता तुम ।७।

Being Powerfull but Strayed !

 
सब कुछ एक साथ करने की कवायद में  अंततः कुछ भी नहीं हो पाता



For some time I am noticing a serious pattern of scattering in my daily routine and time management. With smart phone in hand, it appears to be great being connected with outside world twenty four hours through facebook, emails and whattsapp,an easy access to my library, the online books collection, which is enlarging in terms of numbers and memory space on my device every day and gives great freedom to read my favorite books any where and anytime, great freedom about listening my favorite music and songs, here again my music and songs collection has swelled in recent time greatly, and the most importantly the great freedom now I enjoy to write and post my blogposts, straight through the Android blogger app downloaded on my mobile set. 

Also it's too handy for any required knowledge and information, anything means anything, any topic on science or maths to clarify doubts of my daughter in her study, to know about any topic, wordmeaning of any word, any general and current news and information about our hobbies, sports, movies, music, politics, what not? So overall to say I should feel wow to clutch this magic tool in my hand all the way, every single hour in my daily life.

How much it have been important for me and in my wife, that I could realiz when it slipped in water few days back accidentally and went dead for few hours and then I felt so incomplete, deprived and helpless without it's readily help available and granted.

But then in backdrop has been churning a whirlpool of reality check. When I audit my progress of last few months about my most priority and important domains of my work related either to my job or and especially to my personal and family life, I am shocked and seriously disappointed to learn that my progress in all the areas above has been poor, in fact it has been dipped badly, hardly I have finished reading any good book, hardly I have been able to listen my favorite Sanskrit bhajans and songs out of my golden collection in routine , hardly I listened any audio book on leader ship and motivation out of my great collection stored in the memory card of my mobile set, hardly I have written any beautiful poem for last some time, and worst and most regretting failing badly to spare important time to help my daughter in her studies, especially when her half yearly examination has been approaching fast.

My wisdom now shouts at me and asks hey man! what the hell you are doing,what about your time management, where is your focus, why you the hell  have been so scattered.

Yes, I can see how scattered I have been,appearing to do everything but actually doing nothing. It haunts where it goes  wrong.

Give a thought and then you realize that  you lack consistency, you lack single mindedness, trying to do everything at every time ultimately sums to accomplish nothing all along. A straight single mindedness, undertaking only one job at a time with all the focus and energy there till it gets over and seen the end is essential to accomplish any important task.To achieve anything remarkable like getting read a set of your favorite and selected books, listen your favorite music and the selected audio tapes to help in personally development, following your health and exercise regime, the daily morning walk and workout needs a sheer single mindedness, commitment and consistent efforts on one's part.

Having give with a tool in hand, however power full and smart it may be, but ultimately it only matters how the person has used it and accomplished the task in hand as well, some thing positive and usefull.

Monday, September 2, 2013

The Peak and Crest

Often the heart sinks,
of the difficulties that one faces in life,
it looks going so tough, like no way out.

And then one needs to stop a few moments ,
just to relax and shed it back,
to realize it's nothing unusual for the one.

It's nothing like feeling alone ,the unfortunate one,
as every  other as well  negotiating through
the tough path that life lays in front, the sideways implanted of trees laden with fruits,
some are sweet  and some are sour
what ever they are, for the time being they're your .

So much uncertain, so much fragile, but for the certainty every thing that is a while ,
sticks good or pinches the bad, tomorrow it has to change.
Only the way out is to keep on journying,
till the last step,the last breath .

Tuesday, August 27, 2013

हमारे माननीय नेता और मंत्री -जनहित में काम नहीं करते तो कम से कम बोलने में तो संयम रखें!



यह सिर्फ नारी के साथ ही नही देश की आत्मा के साथ बलात्कार है .

विगत सप्ताह मुंबई में एक युवा महिला पत्रकार के साथ बलात्कार की घटना अति जघन्य व शर्मनाक है , किंतु इस घटना पर महाराष्ट्र के गृहमंत्री श्री आर आर पाटिल का दिया बयान कि महिलाओं को अपने काम के सिलसिले में किसी सुनसान अथवा विषम स्थान पर जाने से पहले पुलिस की अनुमति व इस्कोर्ट लेनी चाहिए, इस घटना से भी ज्यादा शर्मनाक व निराशा जनक है ।
याद आता है कि घटना के एक दिन बाद हमारे देश के एक प्रमुख नेता व माननीय सांसद श्री लालू प्रसाद यादव जी व उनके राजनीतिक बंधु बिहार राज्य के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने भी कुछ इसी प्रकार का बयान दिया था । इसी प्रकार घटना के एक दो दिन बाद टीवी पर किसी चर्चा में भाग लेते समाजवादी पार्टी के एक नेता व माननीय सांसद श्री नरेश अग्रवाल को यह कहते सुना कि देश में बढ़ते बलात्कार की घटनाओं हेतु फिल्मों व टीवी में दिखाई जाने वाली हिंसा और लड़कियों, महिलाओं द्वारा पाश्चात्य व आधुनिक फैसन में उत्तेजक परिधान धारण करना है ।
इसी प्रकार स्मरण आता है कि कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली में एक युवती, जो आधी रात्रि के समय अकेली कार से किसी सुनसान रास्ते से अपने ऑफिस से घर वापस जा रही थी, की बलात्कार व हत्या की घटना पर वहां की मुख्यमंत्री, जो कि स्वयं महिला हैं, का बयान था कि महिलाओं को असमय रात को और अकेले घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए ।
प्रश्न यह उठता है कि हमारी सरकार,इसके मंत्री और हमारे चुने जनप्रतिनिधि जनता के जानमाल व मौलिक अधिकारों की रक्षा, जनता के हित में काम करने हेतु जनता द्वारा चयनित और नियुक्त होते हैं अथवा जनता को मात्र उपदेश देने और उसे अपना नैतिक ज्ञान बघारने हेतु?
यह अति दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि दिल्ली और मुंबई जैसे हमारे देश के प्रधान शहरों में भी किसी युवती के साथ सरेआम बलात्कार व हत्या जैसी घटना के उपरांत वहाँ की सरकार के मुखिया, मंत्री कानून और व्यवस्था की विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेने व स्वयं को ऐसे जघन्य अपराधों हेतु नैतिक रूप से जिम्मेदार मानने के बजाय उल्टा अराजकता की शिकार महिलाओं व आम जनता को ही अपना उपदेश व नसीहत का पाठ पढ़ाना शुरू कर देते हैं कि युवा महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं हेतु उनकी अपनी उत्तेजक भेषभूषा, घर से उनका असमय व अकेले बाहर निकलना या स्थानीय पुलिस को अपने आने जाने की सूचना न देना ,इत्यादि इत्यादि है,यानि उनके कहने का लब्बोलुआब यह कि महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना व हादसा हेतु महिलायें स्वयं ही दोषी हैं ।
कई बार तो अति तब हो जाती है जब हमारे कुछ महान नेता "पाप से घृणा करो पापी से नहीं" की तर्ज पर जनता को अपना संत उपदेश देते यहाँ तक कहते सुने जा सकते हैं कि बेचारे बलात्कारी तो अबोध बालक हैं, वे तो बस टीवी और फिल्मों में हिंसा देखकर गुमराह और भटक जाते हैं और बलात्कार व हत्या की साधारण सी नादानी कर देते हैं ।
 
यह जनता और देश के साथ कैसा मजाक है? क्या हमारे जनप्रतिनिधियों, जिम्मेदारी के शीर्ष पद पर आसीन मंत्रियों को इस साधारण सत्य का कतई भान नहीं कि देश का संविधान जनता का धरोहर है, संविधान के अंतर्गत सरकार का चयन करते एवं स्वयं भी संविधान का अनुपालन करने हेतु कानून से प्रतिबद्ध, जनता अपनी आत्मरक्षा व सुरक्षा के सारे अधिकार सरकार को इसी विश्वास के साथ सुपुर्द कर देती है कि सरकार उसके जानमाल,इज्जत आबरु, उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगी , अतः सरकार की यह न सिर्फ नैतिक अपितु यह उसकी वैधानिक जिम्मेदारी है कि वह राज्य के प्रत्येक नागरिक के जान माल व मौलिक अधिकारों की रखवाली व पूरी तरह रक्षा करे, न कि जनता को मात्र कानून का पाठ पढ़ाये और जनता के साथ किसी अन्याय व अपराध की स्थिति में इनपर किसी प्रकार की रोकथाम व प्रभावी कार्यवाही करने के बजाय उल्टा जनता के आचरण व व्यवहार में मीनमेख निकाल उसे नैतिकता का उपदेश बघारे।
हमारे जनप्रतिनिधियों को अपने पाखंडपूर्ण व्यवहार को त्याग जनता व देश के प्रति अपनी नैतिक व वैधानिक जिम्मेदारी पर गंभीरता व ईमानदारी से ध्यान देना चाहिए ।उन्हें यह समझना चाहिए कि हमारी स्वतंत्रता का अर्थ है आम नागरिक को स्वतंत्र बोलने की आजादी, स्वतंत्र खाने, पहनने की आजादी, स्वतंत्र घूमने, आने जाने, अपना कार्य व्यवहार की आजादी,आम नागरिक को अपने हर प्रकार के दैनिक कार्यव्यवहार की आजादी,और इस प्रकार की अति साधारण आजादी की अनुपस्थिति में हमारी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं ।
आम नागरिक हेतु इस दैनिक कार्य व्यवहार की आजादी व इसकी गारंटी उपलब्ध कराना हमारी सरकार व हमारे चयनित जनप्रतिनिधियों की नैतिक व वैधानिक जिम्मेदारी है ।और विडंबना यह कि हमारे सरकार के मंत्री व जनप्रतिनिधि अपनी इस नैतिक व वैधानिक जिम्मेदारी निर्वहण में पूरी तरह विफल, उल्टा राज्य मे व्याप्त अराजकता, बिगड़ती कानून व्यवस्था व इसकी शिकार व त्रस्त जनता को नैतिकता का उपदेश व नसीहत सुनाते हैं ।
सरकार की ढुलमुल नीति, और देश भर में बिगड़ती कानून व्यवस्था और हाल ही मुंबई व हरियाना राज्य में घटित बलात्कार की शर्मनाक घटनाओं पर चिंता जताते हमारी सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार, केंद्रसरकार व सभी राज्य सरकारों,  को कड़ी फटकार लगायी है, उसका कहना है -
"Something has seriously gone wrong in the society. Something appears to have broken down in society and in the law enforcing machinery. It doesn’t appear we are living in a state ruled by law . The authorities need to explain."
अर्थात् हमारे समाज में कहीं कुछ गंभीर रूप से ग़ड़बड़ चल रहा है, हमारी सामाजिक  व कानून व्यवस्था में गम्भीर रूप से बिखऱ गयी है।लगता ही नहीं कि हम किसी कानून संचालित राज्य में रह रहे हैं। सरकार इस हेतु जबाबदेह है ।
अरे महोदय आप अपनी वैधानिक जिम्मेदारी, जनता का हित उसकी सुरक्षा का दायित्व,ठीक से निभा नहीं सकते तो कम से कम बकवास तो न करें, कम से कम थोड़ी शालीनता व मर्यादा का ध्यान रख अपना मुँह तो बंद रख सकते हैं !