Sunday, July 12, 2015

हिम्मते मर्दां मददे खुदा -अमिताभ ठाकुर की हिम्मत और जज्बा को नमन

अमिताभ ठाकुर जी की हिम्मत सराहनीय है, वे सच्चे व जुझारू अधिकारी हैं, मुलायम सिंह, उनके परिवार व दबंग साथी या प्रायः राजनीतिक नेताओं द्वारा सरकारी कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार तो आम बात रही है, जिसे प्रायः अधिकारी अपनी नियति समझ चुप लगाये स्वीकार कर लेते हैं,  किंतु अमिताभ द्वारा सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के मुखिया के दुर्व्यवहार को सबके सामना लाना और फिर उसकी पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराना बड़े हिम्मत और साहस का काम है, इसके लिए अमिताभ को नमन और बधाई।

अमिताभ ठाकुर बिहार के मुजफ्फरपुर के मूल निवासी हैं, इनके पिता जी बोकारो स्टील प्लांट में कर्मचारी थे। अमिताभ और इनके छोटे भाई अविनाश ठाकुर जो बिहार कैडर में आई ए यस हैं, और आई ए यस सर्विस ज्वॉइन करने के पहले हमारे साथ भारतीय रेल सेवा में ट्रेनिंग कर रहे थे, दोनों आई आई टी कानपुर से  इंजीनियरिंग में ग्रैजुएशन किये हैं। अमिताभ से मेरी मुलाकात 1995 में गोरखपुर की है जब वे वहां ए यस पी थे।

कल ही किसी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई एक वीडियो क्लिप देख रहा था जिसमें लालू यादव और राबड़ी देवी पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी कार की चेकिंग से नाराज होकर अधिकारियों के साथ ऐसी बदतमीजी और अभद्रता से बात कर रहे थे जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, लालू यादव अधिकारी को कुत्ता कह रहे थे, मगर यह सब जानते हुए भी प्रशासन और पुलिस खामोश रहती है क्योंकि प्रायः अधिकारी और पुलिस नेताओं और उनके क्रिमिनल गुर्गों से डरते हैं या कई बार नेताओं के साथ स्वयं उनके कुकृत्यों में शामिल और गठजोड़ मे रहते हैं, अतः प्रायः सरकारी अधिकारी और कर्मचारी इन दबंग और गुंडे नेताओं की चाटुकारिता और उनके द्वारा किसी प्रकार की बेइज्जती, अपमान और हिंसा को बर्दाश्त कर लेने में ही अपनी सुरक्षा और भलाई समझते हैं।

यह हमारे देश में लचर प्रशासन, कमजोर और बिकी हुई भ्रष्ट पुलिस और निष्क्रिय न्यायतंत्र का नतीजा है, जहां समाज में गुंडे और अराजक लोग पूरे सिस्टम पर हाबी हैं, और उन्हें न पुलिस का डर न कोर्ट का, और अंततः वही लोग अपने मसलपावर और पैसे के दम पर नेता बनते हैं, चुनाव जीतते हैं और फिर सत्ता में बैठकर पूरे सिस्टम के साथ बलात्कार करते हैं, सरकारी कर्मचारी और आम जनता उनके शोषण और अत्याचार को मूक बर्दाश्त करने के लिए असहाय छोड़ दी जाती है, जैसे भेड़ियों के सामने लाचार मेमने।

2 comments:

  1. श्री ठाकुर द्वारा की गयी पहल, प्रशंसनीय होने के साथ अन्य उच्चाधिकारियों के लिए अनुकरणीय भी है. राजनीति के खिलाड़ी इस देश के लोकतंत्र को भी अपनी जागीर समझ बैठे हैं. देश, समाज और भावी पीढी की चिंताओं से बेखबर यह वर्ग, सत्ता सुख भोगने की लिप्सा में कुछ भी करने तो तत्पर है. यह केस एक दबंग आईपीएस अधिकारी का होने के कारण इतना प्रचार पा गया अन्यथा जिलास्तर पर रोज, मंत्रियों, पार्टी के विधायकों, और उनके समर्थकों द्वारा नियम कानून की धज्जियाँ उड़ाने के लिए अधिकारियों को बाध्य किया जा रहा है. किसी की हिम्मत नहीं है कि ऊँगली उठा सके. लेकिन इसका अंत भी नहीं दीखता. विरोधी पार्टियां भी कम नहीं हैं. उन्हें भी बस मौके की तलाश है.
    क्या लोकतंत्र में, वोट दे देने के बाद आम जनता की यही नियति है? जे0 पी0 और अन्ना हज़ारेजी का Right to recall, का सपना शायद देश का सपना ही बनकर रह जाएगा.

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  2. नेताओं की दादागिरी उनके चमचों के कारन और बढ़ जाती है. मुख्यमंत्री अपने पिता के इस करनी को सही ठहराने में लगे है.
    सबको जागरूक और अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना पड़ेगा.

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