Tuesday, September 22, 2026

सृष्टि-रचना (Cosmogenesis) : उपनिषदों का दृष्टिकोण

ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक के अंतर्गत आने वाला ऐतरेय उपनिषद वैदिक वांग्मय के अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ दार्शनिक ग्रंथों में से एक है। इसके प्रथम अध्याय में सृष्टि-रचना (Cosmogenesis), विराट पुरुष और मानव शरीर (Embodiment) के उद्भव की कथा प्रतीकात्मक शैली में प्रस्तुत की गई है। यह दिव्य आख्यान दर्शाता है कि कैसे संपूर्ण चराचर सृष्टि एक ही परम चेतना से उत्पन्न हुई और अंततः उसी में प्रतिष्ठित है।

भाग 1: सृष्टि एवं मानव शरीर की उत्पत्ति (प्रथम अध्याय)

1. सृष्टि-पूर्व अवस्था: केवल 'आत्मा' का अस्तित्व

कथा की शुरुआत उस बिंदु से होती है जब ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं था—न सूर्य, न पृथ्वी, न आकाश और न कोई जीव। केवल एक मात्र परम चेतना या ब्रह्म (आत्मा) ही विद्यमान थी।

मूल उपनिषद मंत्र

ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत् ।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ (ऐतरेय उपनिषद, अध्याय 1, खंड 1, मंत्र 1)

भावार्थ: सृष्टि के प्रारंभ में केवल एक 'आत्मा' (परम चेतना) ही थी। उसके अतिरिक्त हिलने-डुलने या चेष्टा करने वाली कोई दूसरी वस्तु नहीं थी। उस परम सत्ता ने संकल्प (ईक्षण/विचार) किया— 'क्यों न मैं लोकों (ब्रह्मांड) की रचना करूँ?'

 

परमात्मा के इसी दिव्य संकल्प से चार मुख्य लोकों की रचना हुई:

·       अम्भ: आकाश व द्युलोक से ऊपर का जलमय दिव्य लोक

·       मरीचि: प्रकाशमान अंतरिक्ष लोक

·       मर: मर्त्यलोक अथवा पृथ्वी

·       आपः: पाताल अथवा निचले लोक

2. विराट पुरुष और देवताओं की उत्पत्ति

लोकों की रचना के बाद परमात्मा ने विचार किया कि इन लोकों के नियमन व संचालन के लिए लोकपालों (रक्षकों) की आवश्यकता है। तब उन्होंने आदि-तत्वों के जलीय अंश से एक 'विराट पुरुष' (ब्रह्मांडीय पुरुष) की आकृति को ऊपर उठाया और उसे घनीभूत आकार प्रदान किया:

विराट पुरुष का प्रकटीकरण

सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामुूर्च्छयत् ॥ (ऐतरेय उपनिषद 1.1.1)
तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथापिण्डं, मुखाद्वाग्वाचोऽग्निः ।
नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुः ।
अक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः ।
कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशः... ॥

भावार्थ: जब परमात्मा ने उस विराट पुरुष पर ध्यान (तप) केंद्रित किया, तो उसके अंग एक-एक करके अंडे की तरह प्रस्फुटित होने लगे और उनसे अधिष्ठाता शक्तियाँ प्रकट हुईं।

 

शारीरिक अंग / आधार

अभिव्यक्त शक्ति (इंद्रिय)

अधिष्ठाता देवता (कॉस्मिक शक्ति)

मुख

वाक् (बोलने की शक्ति)

अग्नि

नासिका

प्राण व घ्राण शक्ति

वायु

नेत्र (अक्षि)

चक्षु (दृष्टि)

सूर्य (आदित्य)

कर्ण

श्रोत्र (श्रवण शक्ति)

दिशाएँ

हृदय

मन (संकल्प-विकल्प)

चंद्रमा

नाभि

अपान (उत्सर्जन शक्ति)

मृत्यु देव

 

3. देवताओं की भूख-प्यास और आश्रय की खोज

सृष्टि में प्रकट होने के उपरांत इन सभी शक्तिशाली देवताओं को भूख और प्यास ने घेर लिया। यह क्षुधा-पिपासा वस्तुतः कर्म और भोग की स्वाभाविक प्रेरणा थी। देवताओं ने परमात्मा से प्रार्थना की: "हमारे लिए कोई ऐसा स्थान या शरीर निश्चित कीजिए जहाँ रहकर हम अन्न ग्रहण कर सकें और अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकें।"

4. मानव शरीर की रचना: 'सुकृतं बत'

परमात्मा ने पहले विभिन्न पशु जीवों (गौ, अश्व आदि) की रचना की, किंतु देवताओं ने उन्हें अपर्याप्त माना। अंत में, परमात्मा ने एक सर्वांग-सुंदर 'मनुष्य रूप' (पुरुष शरीर) बनाकर देवताओं के समक्ष उपस्थित किया।

मानव शरीर की दिव्यता

ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति ।
पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ (ऐतरेय उपनिषद 1.2.3)

भावार्थ: परमात्मा जब देवताओं के सामने मनुष्य रूप को लेकर आए, तो सभी देवता हर्षित होकर बोल उठे— 'सुकृतं बत' (वाह! यह तो अत्यंत सुंदर, श्रेष्ठ और सर्वगुण-संपन्न रचना है)। परमात्मा ने आज्ञा दी— 'अब तुम सब अपने-अपने नियत स्थानों (इंद्रियों) के अनुसार इसमें प्रवेश करो।'

 

परमात्मा के निर्देश पर सभी देव-शक्तियाँ मनुष्य देह में प्रविष्ट हुईं:

·       अग्नि: वाणी बनकर मुख में समाया।

·       वायु: प्राण बनकर नासिका छिद्रों में प्रवेश कर गया।

·       सूर्य: दृष्टि बनकर आँखों में प्रतिष्ठित हुआ।

·       दिशाएँ: श्रवण शक्ति बनकर कानों में समा गईं।

·       चंद्रमा: विचार व भावना बनकर हृदय (मन) में बैठ गया।

5. परमात्मा का ब्रह्मरंध्र से प्रवेश: 'विद्रुति' द्वार

जब सभी देवता अपने-अपने स्थानों पर प्रतिष्ठित हो गए, तब सृष्टिकर्ता परमात्मा ने विचार किया:
"यदि वाणी केवल बोल रही है, आँखें केवल देख रही हैं, और कान केवल सुन रहे हैं, तो फिर 'मैं' कौन हूँ? मेरे बिना इस संपूर्ण देह-तंत्र का क्या प्रयोजन है?"

आत्मा का अनुप्रवेश

स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत ।
सैषा विद्रुतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनं लोका तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना ॥ (ऐतरेय उपनिषद 1.3.12)

भावार्थ: परमात्मा ने मनुष्य के मस्तक की सीमा (कपाल संधि या ब्रह्मरंध्र) को विदीर्ण कर स्वयं उस देह में 'जीवात्मा' के रूप में प्रवेश किया। इस कारण इस सर्वोच्च द्वार को 'विद्रुति' (आनंद का द्वार) कहा जाता है। यह परमात्मा का मुख्य निवास स्थान है।

 

शरीर में प्रवेश करने के बाद उस चेतना ने जब चारों ओर देखा, तो उसने अनुभव किया कि जो सत्ता बाहर व्याप्त है, वही भीतर भी है। उसने विस्मय से उद्घोष किया— "इदमदर्शम्" (अरे! मैंने उस परम सत्य, अपने वास्तविक स्वरूप ब्रह्म को साक्षात देख लिया है)।

6. रहस्यवादी संज्ञा: 'इदन्द्र' से 'इन्द्र' नामकरण

उपनिषद की इस कथा का समापन एक अत्यंत रोचक एवं रहस्यमयी दार्शनिक तथ्य के साथ होता है:

इन्द्र शब्द का वास्तविक रहस्य

तस्मादिदन्द्रो नामेदमन्द्रो ह वै नाम ।
तमदिन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण... ॥ (ऐतरेय उपनिषद 1.3.14)

भावार्थ: क्योंकि चेतना ने परम सत्य को 'इदम्' (यह प्रत्यक्ष) रूप में देखा था, इसलिए उनका वास्तविक नाम 'इदन्द्र' (यह देखने वाला) हुआ। परंतु देव शक्तियों को परोक्ष (गूढ़ व रहस्यमयी) भाषा प्रिय होती है ('परोक्षप्रिया इव हि देवाः'), इसलिए लोक में उन्हें परोक्ष रूप से 'इन्द्र' कहा जाने लगा। यहाँ इन्द्र स्वर्ग के राजा नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित सर्वशक्तिमान आत्म-चेतना हैं।


उपसंहार एवं व्यावहारिक साधना सार

ऐतरेय उपनिषद का यह समग्र आख्यान आधुनिक मनुष्य को तीन क्रांतिकारी दृष्टिकोण प्रदान करता है:

1. व्यष्टि और समष्टि की एकात्मता: हमारी आँखें सूर्य से, वाणी अग्नि से और प्राण वायु से जुड़े हैं। ब्रह्मांड और मानव शरीर अलग नहीं हैं—जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है (यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे)।

2. चेतना की प्राथमिक सर्वोच्चता: आधुनिक भौतिकवाद मानता है कि मस्तिष्क से चेतना उत्पन्न होती है। उपनिषद इसके विपरीत सिद्ध करता है कि पंचमहाभूत और मस्तिष्क स्वयं चेतना (प्रज्ञान) के भीतर आभासित होते हैं। चेतना प्राथमिक आधार है।

3. जीवन का परम साध्य: मनुष्य शरीर ही वह दुर्लभ माध्यम है जहाँ बैठकर परमात्मा स्वयं को पहचान सकता है। जब हम अंतर्मुखी होकर अपनी वृत्तियों से परे साक्षी-भाव में स्थित हो जाते है तब हमारी अंतर्
चेतना भी आश्चर्य और आनंद से भरकर कह उठती है— "इदमदर्शम्—प्रज्ञानं ब्रह्म" (मैंने अपने ही भीतर उस परम  को साक्षात पा लिया है)।

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