किसी परिस्थिति , घटना और वक्त को उसके स्वाभाविक तरीके व गति से होने व गुजरने देना चाहिये , न तो उनसे मुँह चुराना और टालमटोल उचित होता है और न ही उनके साथ कोई हड़बड़ी और जल्दबाजी , अलबत्ता यह दोनों ही अतिगामी अंदाज किसी अच्छे व अपेक्षित नतीजे के लिहाज से घातक सिद्ध हो सकते हैं । सुगढ़ व स्वस्थ नदी वही होती है जो अपने स्वाभाविकता के साथ प्रवाह करती हैं , अन्यथा उनका अतिरंजित प्रवाह , ज्यादा ही धीमा अथवा ज्यादा ही तीव्र , उनके स्वरूप व आकार को अनगढ़ व छिन्नभिन्न कर देता है । अतः परिस्थिति व घटना के सामान्य गति व प्रवाह के साथ सहजता से आगे बढ़ना ही उनके साथ मर्यादित निर्वहन और अपेक्षित परिणाम को सुनिश्चित करता है ।
Monday, March 9, 2015
Sunday, March 8, 2015
नारी , एक आधुनिक अधिकारसंपन्न समर्थ नागरिक और उसकी जाती चुनौतियाँ ....
मेरे एक कॉलेज मित्र ने व्हाट्सअप ग्रुप में नारी के जीवन , उसके जीवन में विभिन्न रिश्तों की भूमिका की निहित चुनौतियों की चर्चा करते एक सुंदर कविता लिखी है , और अंत में उन्होंने नारी के प्रति व्याप्त सामाजिक अन्याय व पीड़ा की चर्चा करते उनके प्रति दृष्टिकोण में बदलाव और सम्मान और आदर के लिये सबका आह्नान किया है ।
इस बाबत मैंने अपने मित्र के साथ निम्न विचार साझा किये जो एक मित्र के साथ विचार विमर्श के मद्देनजर थोड़ा-बहुत मनोविनोद सम्मिलित भीे है , जो आशा है कि कोई पाठक अन्यथा नहीं लेंगे । :-)
' मेरे प्रिय दोस्त , जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत अनुभव है , हमारे तुम्हारे जैसे इस ग्रुप के सदस्य तो नारी का सम्मान करते ही हैं , न सिर्फ सम्मा़न करते हैंं बल्कि घर में उनकी डांट-डपट और नसीहत भी नियमतः और बराबर नतमस्तक चुपचाप सुन लेते हैं । :-)
जहाँ तक उनके (नारी ) प्रति किसी सामाजिक विपरीतता , भेदभाव या चुनौतियों का प्रश्न है , तो पूर्व में अवश्य लड़कियों की शिक्षा और नौकरी को लेकर सुविधा व अवसर की कमी की भारी विवशता व कठिनाई थी , मगर हमारी पीढ़ी के साथ यह कमी काफी हद तक दूर हुई है और हम सभी अपनी बेटियों को बेटे के बराबर ही उनकी परवरिस पर ध्यान व उनको शिक्षा दीक्षा का सुयोग्य अवसर दे रहे हैं । इस प्रकार नारी के प्रति किसी सामाजिक पूर्वाग्रह , भेदभाव व असहयोगात्मक दृष्टिकोण में काफी व प्रभावी बदलाव व सुधार प्रत्यक्ष दिखता है ।
मुझे लगता है कि वर्तमान में नारी के सामने किसी सामाजिक कठिनाई व चुनौती के बनिस्बत उसके निर्भयता व सुरक्षा संबंधी गंभीर मसले व समस्यायें हैं , खासतौर पर जब उनको अब अपने शिक्षा और कामकाज के बाबत देर सबेर घर से बाहर अकेले आने जाने की अनिवार्यता व आवश्यकता है , और यह समस्या हमारे देश में खराब कानून व्यवस्था , पुलिस व सुरक्षातंत्र के बुरी तरह से नाकारेपन से जुड़ी है , और जिससे न मात्र नारी समुदाय को अपनी मर्यादा व अस्मिता संबंधित विशेष कठिनाई व चुनौती का सामना तो करना पड़ ही रहा है , बल्कि देश का एक साधारण नागरिक भी वर्तमान पुलिस की भ्रष्ट व्यवस्था , नाकारेपन व विफल लॉ ऑर्डर की स्थिति से बुरी तरह प्रभावित , भयग्रस्त और लाचारी से जूझ रहा असहाय सा दिखता है।
हमारे देश में कानून तोड़ने वाले, किसी प्रकार का क्राइम का अंजाम देने वाले , चोरी , बलात्कार जैसे संगीन अपराधी , बेखौफ होकर गलत काम और अपराध को अंजाम कर सकते और करते रहते हैं क्योंकि एक तो उन्हें देश में किसी नियमकानून व उसके दंड का कोई डरभय नहीं और प्रायः अपराधी , कानून तोड़ने वाले, क्राइम करने वाले , किसी न किसी रूप में राजनीतिक क्षेत्र व पुलिसतंत्र में अपना गहरा रसूख रखते हैं , इसलिये भी वे जघन्य से जघन्य अपराध व गलतकाम करने में बेहिचक व बेखौफ होते हैं ।
तो मेरी समझ में आज के समय में हमारे देश में नारी की समस्यायें व चुनौतियाँ मात्र सामाजिक कम बल्कि कमजोर व लचर 'लॉ एण्ड ऑर्डर' व सामान्य तौर पर पुलिस व न्यायतंत्र की विफलता व इसमें व्याप्त गहरे भ्रष्टाचार से संबंधित समस्या ज्यादा है , जिसे सही गवर्नेंस, दक्ष व कुशल पुलिसतंत्र व लॉ एण्ड ऑर्डर के सेटअप से अवश्य प्रभावी रूप से कन्ट्रोल व सुधारा जा सकता है । बस इसके लिये उच्चस्तर पर सही व सच्चे राजनीतिक व प्रशासनिक संकल्प व पारदर्शिता की आवश्यकता है । '
आपका मित्र -
सादर - देवेंद्र
तुम जागृत तो जग हो जागृत.......
( अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ' नारी ' के सम्मान में विनम्रतापूर्वक समर्पित )
नारी !
तुम जननी , धात्री तुम संगिनी ,
आदिगुरु तुम , स्नेहदुलारमूर्ति तुम भगिनी ।
प्रेम , स्नेह , ममता की खातिर ,
कितने कष्ट सहे हैं तुमने ! कितने त्याग किये हैं तुमने!
स्वयं रक्त को दूध बनाकर , जीवन अमृत देती हो पीने !
मगर जगत ने माना तेरी करुणा को तेरी कमजोरी ?
जिसको आँचल छाँव दिया है वही किया तुमसे बरजोरी ?
आज बता दो जग को कि तुम और नहीं हो कोई अबला ,
शंखनाद दे शक्ति सन्निहित बतला दो कि तुम हो सबला ।
तुम सशक्त हो , शक्तिमयी हो ,
तुम समर्थ, परिपूर्णमयी हो ।
माना तुम माँस्वरूप करुणा की सागर,
प्रेम , दया ,ममता की आगर ,
मगर दृष्टि जो कलुष किसी की
पड़ती हो , मर्यादा हरती ,
बन दुर्गा तुम दुर्जन को संहारती ,
काली प्रचंड तुम कलुष नाशती ।
आज समय इस आवाहन का,
तुझको 'निर्भया' होकर जगने का ,
तुम जागृत तो जग हो जागृत
कर दो पशुता का सिर उच्छेदित ।
फिर भी मूल तुम्हारी करुणा ,
प्रेम स्नेह ममता कर वीणा ।
तेरी वृष्टि जगतमय अमृत ,
करो निरंतर सबको पोषित ।
- देवेंद्र दत्त मिश्र
Friday, February 20, 2015
खाँसी और जनसंवेदना....
हमारे देश के एक आमपरिवार में एक आमआदमी के घर में एक आमबालक ने कभी जन्म लिया , पढ़नेलिखने में अत्यंत मेहनती , अध्यवसायी और प्रतिभावान और अपनी इस योग्यता के बदौलत देश के योग्यतम शिक्षणसंस्थान से शिक्षा प्राप्त कर देश की उच्चतम सेवा प्रतियोगिता योग्यता से उत्तीर्ण करके देश की उच्च प्रशासनिक सेवा में तैनात हुआ ।
कुछ कारणवश उसे यह सरकारी नौकरी रास नहीं आुई , और वह कुछ वर्षों पश्चात् अपनी इस उच्च व सम्मानित नौकरी और पद का त्याग करते समाज और जन सेवा कार्य में स्वयं को समर्पित कर दिया , उसने आमजनता के सरकारी कामकाज में होने वाली धाँधली और हीला हवाली के खिलाफ , सरकारी कामकाज व फाइल की आम आदमी को सूचना व जानकारी के अधिकार के लिये जनआंदोलन चलाये , जिसके आगे सरकार व तंत्र को भी झुकना और कानून बनाना पड़ा , जिस खातिर उसको देशविदेश में नाम , ख्याति और प्रसिद्धि और पुरस्कार अर्जित हुये।
इन शुरुआती सफलताओं से उसका जनआंदोलन में आत्मविश्वास बढ़ता गया । अब उसका अगला लक्ष्य था नये जन आंदोलन , नयी प्रसिद्धि की प्राप्ति। इसी बीच उसकी दृष्टि एक ऐसे जनांदोलन और उसके अगुआ बुजुर्ग युगपुरुष पर पड़ी जो सरकारी कामकाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के खात्मा हेतु सरकार के विरुद्ध जन-आंदोलन शुरू किया था , वह बुजुर्ग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकार द्वारा कड़े कानून की माँग लेकर देश में जगह जगह . विशेषकर देश की राजधानी में , आमरण अनशन कर रहा था जिसको देश की जनता का , विशेषकर देश की नव महात्वाकांक्षी युवावर्ग , का भारी समर्थन मिल रहा था। उसे यह उपयुक्ततम् अवसर लगा और वह फौरन इस आंदोलन व आंदोलन के अगुआ युगपुरुष की छतरी के प्रश्रय में आ गया ।
जनआंदोलन में मिली उसकी प्रसिद्धि और उत्कंठा अब धीरे धीरे उसकी राजनीतिक प्रसिद्धि व उसकी सत्ता की महात्वाकांक्षा और उत्कंठा में परिणित होने लगी । उसने झटपट खुद की एक राजनीतिक पार्टी गठित कर ली ,पार्टी का प्रतीक चिह्म भी झाड़ू रखा , जिससे कि सामाजिक और आर्थिक रुप से हासिये पर ऱह रहे आम और गरीब जनमानस से वह प्रतीकात्मक रूप से सीधे जुड़ सके और उनकी सहानुभूति और समर्थन पा सके , और वह इसमें बहुत शीघ्र और तेज सफल रहा ।
स्वयं को मिल रहे भारी जनसमर्थन और लोकप्रियता के कारण वह अपने बुजुर्ग पैट्रन युगपुरुष के साये से बाहर निकलकर अब स्वयं ही जनता के बीच युगपुरुष बन गया , और इस देशव्यापी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन की राजनीतिक अगुआई करने लगा।
उसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ साथ उसके शारीरिक भावभंगिमा व व्यवहार में भी कुछ खास परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे । वह जैसे ही किसी जनसंवेदना या समस्या को अनुभव करता , या वह किसी जनमुद्दे या समस्या पर कोई परिचर्चा शुरू करता उसे खाँसी आनी शुरु हो जाती । वह खाँसी के बढ़ते प्रकोप का कारण चढ़ती उतरती सर्दी गरमी के मद्देनजर सिर पर कागज की टोपी और गले और कान पर हमेशा मफलर लपेटे रहता । उसके जनआंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता के साथ साथ उसकी बात बात में खाँसी , सिर पर कागज की टोपी और गले और कान पर लपेटा मफलर भी जनांदोलन का प्रचलित ट्रेडमार्क और फैसन बन गया ।जब कभी कोई उससे उसके बात बात में खाँसी का कारण व उसके निदान के उसके किसी प्रयास की चर्चा करता तो वह यही उत्तर देता कि वह बहुत उपचार करा लिया , बहुत से नामी गिरामी डॉक्टरों को दिखाया परंतु खाँसी ठीक ही नहीं होती ।
आखिरकार उसका राजनीतिक आंदोलन बढ़ता, निखरता और प्रसिद्ध होता चला गया , वह जनता के बीच एक युगपुरुष का अवतार , भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मुखर आवाज और भ्रष्ट सरकारी तंत्र से त्रस्त जनता के लिये एक जनमसीहा और उम्मीद बनकर देश की राजधानी के राजनीतिक आकाशपटल पर धूमकेतु के मानिंद छा गया । वह देश , शहर , समाज में व्याप्त जनसमस्याओं की चर्चा करता , उनके कारण और जड़ में भ्रष्ट राजनेताओं को दोषारोपित करता और स्वयं को जनता की उम्मीद बताकर ,जनता द्वारा स्वयं को पाँच साल की सत्ता का अवसर दिये जाने पर जनता के लिये काम करने और उनकी सारी समस्याओं के निवारण , सबको मुफ्त बिजली , पानी , मँहगाई से मुक्ति इत्यादि के आश्नासन देता । उसके आश्वासनों के कारण , व अन्य राजनीतिक दलों के नाकारेपन से निराश हो चुकी , जनता के बीच वह दिन दूना और रात चौगुना जनप्रिय होता गया ।
जनता के मन में उसकी भारी लोकप्रियता के समक्ष सभी राजनीतिक धुरंधर और शक्तियाँ माचिस की तीली के बने किले की मानिंद बिखर गये और वह देश की राजधानी राज्य के चुुनाव में जनता द्वारा सर्वविजयी और सर्वोपरि बनाते राजसत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ और पदासीन हो गया ।
स्वयं राजा बनने के बाद उसके खुद के ही शासन और सत्ता में उसके लिये अब एक नयी दुनिया प्रस्तुत थी । अभी तक तो वह जनता को सपनों का प्रलोभन व आश्वासन देता आया था , अब उन्हीं सपनों को साकार करने की उसके सामने चुनौती थी । जिन समस्याओं - गरीबी , बेरोजगारी , बिजली , पानी , मँहगाई , भ्रष्टाचार की आवाज और नारे देकर वह अपने विपक्षी राजनीतिक दलों पर प्रहार करता था और जनता की तालियाँ और उनके समर्थन की हुँकार अर्जित करता था अब उन्हीं समस्याओं को खुद सुलझाने व समाधान देने की उसकी ही बारी और जिम्मेदारी थी । जो जनता कल तक उसके पीछे पीछे चलते उसके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ नारे देते घूमती थी , अब वही जनता की भीड़ उसके दफ्तर और घर के सामने अपने समस्या की गुहार और फरियाद लेकर भीड़ जमा करने लगी । वह जनता की गुहार और फरियाद सुनता मगर कुछ समाधान और राहत नहीं दे पाता । वह समस्याओं के निराकरण हेतु कुछ भी प्रभावी न कर पाने की निराशा अपने कल तक की अंधभक्त समर्थक जनता के चेहरे पर स्पष्ट देख सकता था । कल तक जिन समस्याओं को स्वयं जनता के बीच गिनाते वह इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाया करता था , अब जनता द्वारा उन्हीं समस्याओं की चरचा और फरियाद सुनते बहाने बनाता , उनके न हो सकने के पक्ष में तर्क करता या उनको नजरंदाज कर देता ।
वह कुछ भी प्रभावी न कर पाने से स्वयं भी बड़ा निराश सा दिखने लगा था परंतु साथ ही साथ उसकी शारीरिक भावभंगिमा में भी काफी रोचक व चमत्कारिक परिवर्तन आने लगे । अपनी कागज की टोपी तो वह सत्तासीन होने के दिन ही परित्याग कर दिया था परंतु कुछ दिन तक उसकी बातबात में खाँसी और मफलर लपेटने की आदत और स्टाइल चालू रही । मगर वह जैसे जैसे जनता की समस्याओं को नजरंदाज करने लगा उसकी खाँसी में चमत्कारिक सुधार होने लगा , सत्तासिंघासन पर बैठे बमुश्किल महीेने भर हुये कि उसकी खाँसी लगभग बिल्कुल ठीक हो गयी , जहाँ उसको पहले दिन में भी सर्दी लगती और कान और गले पर मफलर लपेटकर रहना होता , अब तो वह प्रायः बिना मफलर बाँधे ही रहता और उसकी कनपटी पर पसीने की चुहचुहाहट व सफेद बूँदें दिखती । इस प्रकार वह अद्भुत युगपुरुष भी सिंहासन पर बैठने के चंद सप्ताह के अंदर ही बिना खाँसता , बिना मफलर लपेटे एक सहज और साधारण आभिजात्य राजनेता व राजपुरुष की तरह दिखने लगा ।
अब वह युगपुरुष अपनी भक्त जनता को देखकर जोश में आकर न तो ' इंकलाब जिंदाबाद ' के नारे ही लगाता और न ही अपनी बेसुरी आवाज में पह़ले की भाँति कोई देशभक्ति के गाने ही गाता । अब तो उसके आम जन समर्थकों को भी उसमें और अन्य साधारण राजनेताओं में अंतर और फर्क करने में कठिनाई अनुभव होती ।
वह युगपुरुष जनता व जनसमर्थन की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते व उनका इस्तेलाम करते अब पहले के एक आम जननेता से परिवर्तित होकर स्वयं भी अपने विरोधी सहराजनेताओं की ही तरह एक अभिजात्य व सधा जनसंनेदनहीन राजनेता बन गया ।
Saturday, January 24, 2015
जीवन यात्रा ...... एक सरित प्रवाह
उठते सुबह का उनींदापन और आलस्य,
या शाम के थके पाँव
कराते अनुभव निराशा और उत्साह हीनता का
रुकते , ठहरते , धीमे पड़ते , मना करते से
जीवन पथ पर आगे बढ़ने से ,
करते मन को जोशहीन , उलाहना से देते कि
बहुत हो चुका , बहुत चल चुके , बहुत कर चुके
वही पुराने काम और घिसी-पिटी सी बातें और जरूरतें
रोज रोज की , कितनी नीरस , उत्साह हीन सी
वही पुरानी बात , चकल्लस , लोग पुराने
नया नहीं कुछ करने को , कहने को ,
मिलने को , आगे बढ़ने को !
फिर विवेक के कोने से ,
मन में जगता एक रिमाइंडर कि
देखो ! सूरज भी तो उगता है प्रतिदिन
निश्चित समय और जगह से ,
चलता रहता एक गति से , एक ही पथ से
प्रतिदिन , प्रतिपल , बिना थके वह , बिना निराशा
निश्चित पथ पर अविचल , अविकल
बिन गति खोये , सदा युक्तश्री
स्वयं धरा यह , प्रकृति पूर्ण यह
निज गति में और निहित कर्म को नियमित करते
पथ पर हैं वे आगे बढ़ते , अपने अपने निर्धारित पर ।
यही धर्म है , यही कर्म है , जीवन है यह ही
कि अपने अपने निर्धारित जीवन- पथ पर
बिना निराशा, उकताये बिन ,
निज शक्ति , संकल्प संग ले ,
बढ़ते रहना , चलते रहना ।
गति ही देता नवीनता , नूतनता जीवन में ,
सरित-प्रवाह ही जीवन है ।
© देवेंद्र
Thursday, December 18, 2014
स्वयं हन्ता (अ)मानव और उसका मिथ्यालाप !
रक्त तो निर्दोष और मासूम का ही हरदम बहा है ,
कभी शरीर को तो कभी आत्मा को छलनी कर रहा है ।
है मगर यह घोर सत्य जारी अनवरत ,
हर युग समय हर काल देश समाज पर कि
रक्त तो निर्दोष और मासूम का ही हरदम बहा है ।
बहता कभी यह धर्म की बलिबेदियों पर ,
तो है कभी बहता यह समर रणभूमि पर ,
है कभी बहता सत्ता की दलाली और शतरंजी चाल पर ,
और बहता है कभी मद मान अहं तलवारों की धार पर ,
है कभी बहता चढ़ गरीबी की शूलियों पर ,
और बहता है कभी इस धरा पर आगमन के पूर्व ही ,
माता के गर्भ में निज प्राण के अधिकारियों के हाथ से ही ।
श्रद्धांजली देने हेतु उनको उठते हाथ कितने ,
जो हाथ खुद ही उन मासूम रक्तों से सने हैं !
वे आँखे आज नम होती हैं उन मासूमों की याद में
जिनमें पाशविकता ,वहसीपन के सदा कीचड़ जमे हैं ।
यह मनुज भी ढोंग कितने ! पाखंड कितने ! कर रहा है
युग युगों से आदि से , आरंभ से , हर काल क्षण से,
निज हाथ से ही यह मनुजता की सदा हत्या किया है,
और फिर उसी मृत मनुजता की लाश पर ही
कुछ चंद आँसू और डालता श्रद्धांजलि सुमन
स्वयं उन रक्त रंजित निर्मम निज हाथ से ही
और पढ़ता खोखले वह मर्सिया के गीत कुछ पल
मनुजता , मासूमियत की दर्दनाक हत्या मौत पर।
यह मनुज का ढोंग यूँ ही अनवरत चलता रहेगा ,
किंतु दुखद बात कटु सच यह नहीं बदलेगा कि
रक्त तो निर्दोष और मासूम का ही हरदम बहा है
कभी शरीर को तो कभी आत्मा को छलनी कर रहा है ।
-देवेंद्र
Tuesday, December 16, 2014
क्या बाकी विश्व का संकट अमरीका के निज-अस्तित्व हेतु कोई संकट और मायने नहीं रखता है ?
मेरे एक कॉलेज मित्र हैं जो विगत पंद्रह वर्षों से अमरीका में रहते हैं । बड़े विद्वान व्यक्ति हैं , अपनी आईआईटी से इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में पीएचडी के पश्चात कुछ वर्ष अमरीकी युनिवरसीटी में प्रोफेसर रहते अध्यापन कार्य किया और विगत कुछ वर्षों से एक मुख्य इंडस्ट्री कंपनी मे आर एँड डी के मुखिया हैं । विद्युत संचालित मशीन, मोटरगाड़ियों व उपकरणों के अत्याधुनिक पावर ड्राइव अनुसंधानों व तकनीकी विकासों में उनकी महारत व विशेष अभिरुचि है ।
इसके अलावा ग्लोबल परिपेक्ष्य में उर्जा श्रोतों , विशेषकर वैकल्पिक उर्जा श्रोतों , के बदलते स्वरूप व इनके विकास के प्रति उनकी गहरी समझ व जानकारी है । सोसल मीडिया के माध्यम से उनसे लगातार बने रहते संपर्क व सानिध्य से समय समय पर उर्जा क्षेत्र में हो रहे नये अनुसंधानों व विकास की संभावनाओं और इनके आर्थिक वित्तीय पक्षों व परिणामों पर उनकी परिचर्चा द्वारा प्रायः बड़ा उपयोगी ज्ञानलाभ मिलता रहता है ।
अभी कुछ सप्ताह पूर्व से पेट्रोलियम ऑयल की कीमतों में लगातार जारी भारी गिरावट के कारणों पर उन्होंने बड़ी रोचक जानकारी दी । उनके अनुसार पेट्रोलियम ऑयल के कीमतों में भारी गिरावट के मूल कारण सप्लाई-डिमांड के सामान्य आर्थिक व मुक्त बाजार के मूल समीकरण के बजाय मूलतः जियोपॉलिटिकल हैं । उनके विचार से यह आईएसआईएस , रूस, ईरान व कुछ अन्य देश , जो तेल के चढ़ते अंतर्राष्ट्रीय मूल्य के कारण तेल के निर्यात द्वारा भारी मुनाफा कमा कर अपनी आर्थिक व सामरिक क्षमता को वृहत स्तर पर बढ़ाते विश्व के ऊपर अपना दबदबा व आतंक फैलाने का प्रयास कर रहे थे , उनके ऊपर आर्थिक अंकुश लगाने की यह अमरीका व अमरीकी कंपनियों की सोची समझी रणनीति है ।
मेरे मित्र के अनुसार गैसोलीन के दाम में भारी गिरावट से अमरीकी नागरिकों व उपभोक्ताओं में बहुत खुशी का वातावरण है क्योंकि गैसोलिन के मूल्यों में भारी गिरावट को बेतहासा रूप से मोटर वेहिकिल का उपयोग करने वाले अमरीकी लोगों को अपनी आमदनी में एक प्रकार से महत्वपूर्ण बढ़त व बचत दिखती है। साथ ही साथ अमरीकी मोटर निर्माता कंपनियाँ भी पेट्रोल के गिरते कीमत को अपने व्यवसाय हेतु बड़ी अपार्च्युनिटी की तरह देखती हैं अतः अमरीका के इस रणनीति को महत्वपूर्ण व अति प्रभावशाली मोटरनिर्माता कंपनियों का भी भारी समर्थन मिलता है ।
वैसे तो यह बड़ी चौंकाने वाली व अजीबोगरीब बात लगती है कि जब उर्जा विशेषज्ञ यह घोषणा व चेतावनी करते नही थक रहे हैं कि हमारे फॉजिल फ्यूल व पेट्रोलियम ईंधन श्रोत इनके बेतहासा दोहन के फलस्वरूप लगभग चुकने के कगार पर हैं , उनकी बची मियाद बमुश्किल अगले चार पाँच दसक है ऐसे में इनके मूल्यों में भारी गिरावट और उनके बेतहासा उपयोग को अमरीका अथवा विश्व के किसी अन्य प्रभुत्वसंपन्न देशों द्वारा और गति देना कहाँ की समझदारी है ? साथ ही साथ पेट्रोलियम उत्पादों के बेतहासा उपयोग से पर्यावरण को पहुँच रहे गंभीर व अपूरणीय क्षति का अलग से संकट बढ़ रहा है और यह स्वयं ही विश्व मानवता क्या हमारी संपूर्ण सृष्टि हेतु गंभीर चिंता की बात दिखती है।
परंतु विश्व के अस्तित्व पर भारी संकट की आशंका की इन बातों व गंभीर तथ्यों के प्रति अमरीका द्वारा विश्व को धता बताने व गैसोलीन के बेतहासा उपयोग को लगातार बढ़ावा के अमरीकी रणनीति को स्पष्ट करते हुये मेरे मित्र यह रोचक व निश्चय ही बाकी विश्व हेतु अति चिंताजनक यह जानकारी देेते हैं कि अमरीका सिर्फ अपने देश व अपने नागरिकों के हित के बारे में ही सोचता है , उसको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अमरीकी हितसाधन के बदले बाकी विश्व को क्या और कैसी कीमत चुकानी पड़ रही है , बाकी विश्व रहे या भाड़ मे जाये बस अमरीका और अमरीकावासी मजे व सुविधा से रहें , यही अमरीका व अमरीकी अर्थव्यवस्था का सदा से मंत्र व सिद्धांत रहा है।
वैसे देखें तो किसी भी प्रभुत्व व साधनसंपन्न व्यक्ति , समाज या देश के लिये ऐसी स्वार्थ व अहंकारपरक सोच व मानसिकता कोई नयी व आश्चर्यजनक बात नहीं , उन्हें अपनी प्रभुता व सुविधा के आगे बाकी अन्य किसी की भी मौलिक से मौलिक आवश्यकता व जरूरत भी गौड़ लगती है , लोग उनकी सुविधाआपूर्ति के लिये मरे या जियें उन्हें इससे अपना कोई भी लेनादेना नहीं दिखता ।
परंतु गंभीर प्रश्न यह है कि अपने अंधे स्वार्थ व अहंकार हेतु समष्टि के बाकी हिस्से के अस्तित्व व हित व रक्षा की घोर अवलेहना व उसको दाँव पर लगाना क्या अमानवीय व घोर असहिष्णुता नहीं है ? क्या समष्टि के बाकी के विनाश में स्वयं का भी विनाश निहित नहीं होता? क्या शरीर के किसी इतर अंग की पीड़ा से मस्तिष्क या हृदय जैसे महत्वपूर्ण शरीर के भाग अप्रभावित हुये बिना रह सकते हैं ? इसका सीधा व सपाट उत्तर तो यही मिलता है कि नहीं । हमारे भारतीय शास्त्रों में विश्वबंधुत्व व विश्वसुखशांति के निम्न स्वस्ति पाठ का विधान शायद इसी गहन चिंतन व अनुभूति के मद्देनजर किया गया होगा -
सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत् ।