Friday, December 14, 2012

कुछ खोया और कुछ पाया मैं।




शाश्वत नियम जगत का ऐसा,
बनना और बिगड़ते रहना।
जो सोना था अब वह मिट्टी,
कुछ खोया और कुछ पाया मैं।1

कहीं जमीं और कहीं फलक थी,
कभी धूप और कभी छाँव थी
जीवन के दुख सुख सहते रह,
कुछ रोया कुछ हँस पाया मैं।2

कभी नज्म और कभी छंद में
मुक्तगीत कुछ लय-स्वर-बद्धित।
उर के दर्द गीत बन ढलते
मौन रहा कुछ कह पाया मैं।3

चंचल नदी बहे जीवन भर,
पर समाधि सागर दे देता ।
स्थिर ध्येय गतिमय राहें,
कुछ स्थिर कुछ बह पाया मैं।4

फैले रिश्तों की चादर पर,
कुछ सिलवटें उभर आती हैं।
जीवन सूत वक्त की किरची, 
कुछ उलझा कुछ सुलझाया मैं ।5

देता समय निरंतर उत्तर,
मगर शेष हैं प्रश्न अनेकों ।
जीवन रोज पहेली पूछे ,
कुछ बूझा कुछ बिसराया मैं।6

प्रात: उदित निरंतर यात्रा ,
अस्तकाल विश्राम  समाहित।
जीवन दीप निरंतर जलता,
कुछ जागा कुछ सो पाया मैं।7

11 comments:

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    1. प्रिय प्रवीण जी हार्दिक आभार। आपके सुझाव के अनुरूप निम्न पंक्तियों में संशोधन कर अति संतोष का अनुभव हो रहा है। पुनः आभार।

      कुछ उलझा कुछ सुलझाया मैं ।5।


      कुछ बूझा कुछ बिसराया मैं।6।

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  2. बहुत सुन्दर...
    फैले रिश्तों की चादर पर,
    कुछ सिलवटें उभर आती हैं।
    जीवन सूत वक्त की किरची,
    कुछ उलझा कुछ सुलझ रहा मैं...

    खूबसूरत पंक्तियाँ...
    सादर
    अनु

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  3. इस सार्थक प्रस्तुति उम्दा सृजन के लिए ,,,, बधाई।,,,देवेंद्र जी,,

    recent post हमको रखवालो ने लूटा

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    1. धीरेंद्र जी, हार्दिक आभार।

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  4. देता समय निरंतर उत्तर,
    मगर शेष हैं प्रश्न अनेकों ।
    जीवन रोज पहेली पूछे ,
    कुछ बूझा कुछ बिसराया मैं।
    बहुत सुन्दर भाव, जीवन इन्ही प्रश्न - उत्तरों का खेल है...

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    1. आपका हार्दिक आभार।

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    1. आपका हार्दिक आभार।

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  6. शाश्वत नियम जगत का ऐसा,
    बनना और बिगड़ते रहना।
    जो सोना था अब वह मिट्टी,
    कुछ खोया और कुछ पाया मैं.

    सच से विमुख होने से उसको समझ कर मुकाबला करना है.

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