Friday, December 7, 2012

कागज की कुछ नाव बनाकर उनको रोज बहा देता हूँ........


14 comments:


  1. सुंदर रचना,मोहक मन के उदगार ....

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  2. सुन्दर एहसास.....
    भाव बहुत ही सुन्दर है.

    सादर
    अनु

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  3. आपका भी एक अंतर्लोक है जो कितना अप्रतिम और मनोहर है !

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  4. बहुत सुंदर,सकारात्मक भाव पिरोये हैं कविता मे ....शुभकामनायें ।

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    1. हार्दिक आभार अनुपमा जी।

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  5. गर्मजोशी में फैलना और सर्द वातावरण में सिकुड़ जाना, प्रकृति भी यही सिखा जाती है।

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  6. जीवन पुष्तक को पढते पढते ही उम्र गुजर जाती है और हर रोज कुछ नए अनुभव होते है.

    बहुत सुंदर कविता.

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    1. रचनाजी,आपका हार्दिक आभार।

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  7. बहुत उम्दा...शुभकामनाएँ..

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