Wednesday, March 18, 2015

पांचाली के खुले केश या वह कालअग्नि की शिखा थी बिखरी!

जग समझता हो भले ही
कि पांचाली थी वहाँ लाचार कितनी
और कातर उस सभा में, राजपुरुषों से सुशोभित,
जब कौरव खींच लाये थे बलात् उसको भरी सभी में
और दुष्ट दुर्योधन ने घसीटा था उसे उसके केश पकड़े
निर्लज्जता की सभी सीम , मर्यादा लाँघते,
उसे अपनी खुली जंघा पर बिठाया,अपमानित किया था ।
और जब दुःशासन बना राक्षस खींचता था चीर उसका ,
वहाँ आसीन पितामह सहित विश्व के श्रेष्ठतम् वीर सारे
मूक बैठे रहे सब , लज्जाहीन और कायर की तरह,
नत किये सिर सभी और बाँधे हाथ अपने,
सहित उसके पाँच अतुलित वीर और योद्धा पति भी ,
देखते रहे सभी यह दुष्कर्म,पाप,अनर्थ होते, क्लीव बनकर ।

मगर जग का अनुमान यह बिल्कुल गलत था।
पांचाली स्वयं तब भी अबला नहीं थी,
और लाचार भी बिल्कुल नहीं थी ।
ध्वनि में थी भले ही उसके करुण याचना की चित्कार
और उसकी आँख में आँसू भरे थे ,
मगर थी अपमान की ज्वाला धधकती
और दहकती उन लालअग्नि से दृगों में ।

और उसके वह खुले काले केश लंबे,
मानों हों प्रलय की बिखरी काली शिखायें विस्तृत काल जैसी
देती इस धरा के उन कथित शूरवीरों को चुनौती
कि धिक्कार है तुम सबकी शक्ति पर,
पुरुषार्थ पर, लज्जाहीनता पर, क्लीवता पर
और हे कायरों , सुन लो ध्यान से मेरी चेतावनी यह
कि आज जो निज भुजाओं को बाँधकर बैठे हुये हो सब
सुनलो मेरी चित्कार में युगसंहार का आहावन मंत्र यह !
कि मैं तुम्हारे ही भुजाओं में कल कर पदार्पण काल बनकर,
संहार कर दूँगी मैं इन दुर्धष राक्षसों का,
स्पर्श जिनके अपवित्र हाथों ने  किया है तन का मेरे ।

हे का-वीर पुरुषों ! तुम मत यह समझना
कि पांचाली है बेचारी और कातर यहाँ,असहाय है वह,
तुम्हारे मर्यादाहीन इस कायर सभा में ।
आँख से मेरे जो बहते आँसुओं के धार हैं यह,
नीर मत समझों उन्हें, है यह अनल की धार बहती,
जो रणचंडिका के ज्वालादृगों में जल उठी हैं ।
सुन लो इस सभा में उपस्थित तुम सभी का-वीर पुरुषों ,
साक्षी बनाकर सूर्य को, देवी धरा को,
साक्षी है मेरी पुण्यमाता अग्नि और मेरी कृष्णभक्ति,
शपथ लेती है द्रुपदपुत्री तुम्हारे सामने यह कि
नाश कर दूँगी मैं तुम्हारे पुरुषार्थ से पोषित इन राक्षसों का
जिन्होंने मुझे अबला समझते बलात् किया है स्पर्श मेरा।

शांत होगी अनलधारा मेरे दृगों में यह ज्वलित जो
तुम शूरवीरों के लहू का केवल अर्घ्य देकर ।
यह खुले जो केश मेरे, हैं प्रलय की यह दुर्धर शिखायें ,
यह बिखरती काल बनकर इस पाप से बोझिल धरा पर,
इस अंधे धृतराष्ट्र के राक्षस पुत्रों का निर्मम वध करेंगी ,
और दुबारा फिर इन्हें तब तक समेटूँगी मैं नहीं
धो न लूँ जबतक इन्हें मैं पापी दुःशासन के वक्षस्थलरक्त से ।
© देवेंद्र दत्त मिश्र

1 comment:

  1. सुन्दर प्रस्तुति ...

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