| पथिक अंतगति राह समाहित |
पथिक मिलेगा पथ पर अपने
और भला क्या उसका ठौर ?
चलना ही उसका जीवन है ,
दिवस, रात्रि, संध्या क्या भोर।1।
और भला क्या उसका ठौर ?
चलना ही उसका जीवन है ,
दिवस, रात्रि, संध्या क्या भोर।1।
पथिक नियति है बँधी राह से
साझा पदचापों का जोर ।
साक्षी बन पथ स्थिर रहता ,
पथिक पग बढ़े मंजिल ओर ।2।
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जीवन बहता नदी सदृश है
धारा मध्य किनारे छोर ।
कर्म गति बन बहे निरंतर,
बंधन बाँधे रिश्तों की डोर । 3।
जीवन प्राण,हृदय स्पंदित
रंध्र नासिका श्वास की डोर ।
दोनों की गति में स्थिर है,
परमतत्व परमात्म विहोर।4।
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पथ से क्या मैं आँख चुराता
पथिक अंतगति धूल राह की।
पथ व पथिक एकनिष्ठ जब
पूर्ण ध्येय जीवन यात्रा की ।5।
जीवन लक्ष्य बदलते रहते,
अपनी राह बदलता कब तक।
ध्येय सिद्ध यात्रा क्या संभव
जब तक पथ , यात्रा है तबतक।6।