Wednesday, November 23, 2011

मैं और मेरी परछाईं।


उनको जो एतराज कि मैं
यारों की महफिल जाता हूँ।
मैंने भी सब तोड़ दिये बुत
दिल के इस बुतखाने से।1

वे कहते मैं क्यों लिखता हूँ
वे कहते मैं क्यों हूँ गाता ।
तो गजलों से मैं रिश्ता तोड़ा
और जोड़ लिया मयखाने से।2

अरमान जितने भी मेरे थे
सब शोलों में तब्दील हुये।
दिल की आग बड़ी गहरी है
क्या खाक बुझे पैमाने से।3

मैं क्या उड़ता आसमान में
जब खुद के पंख हुये बेजार ।
लहरें तो मनमाफिक ही थीं
पर नाव डूबी पतवारों से।4

मेरे गीत नहीं तुम सुनते
मैं अचरज क्योंकर करता।
भाव रहे यूँ मौन साधते
बस चीख मचायी शब्दो से।5

मैं घायल था घायल मन था
मैंने चोट हजारों खायी।
घावों की तो पीर सहज थी
पीड़ा असह बनी तानों से।6।

कहते तुम तो खुद मर जाता
ख्वामखाह इल्जाम लिया।
खाली वार गये थे सारे
मौत हुई दिल सदमें से।7

मैं क्यों तुमसे शिकवा करता
कि गुजरे राह अजनबी जैसे
खुद ही अपना नाम मिटाया
मैं राह मील के पत्थर से।8

क्या लेना क्या देना मुझको
रोशन सुबह दुपहरी संझा
मैं तो कब का दहन हो चुका
हूँ दिखता खुद की परछाईं से।9

2 comments:

  1. मन की भँवरें तो डुबा देती हैं, मन को ही समझाना पड़ता है अन्ततः।

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