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Sunday, December 16, 2018

मन के अंदर चल रहा निरंतर संघर्ष कठिन यह मानव के ...

इच्छाओं के चक्रवात से निरंतर जूझ रहा यह मानव मन
उड़ जाता है अशक्त आत्मबलरहित तिनके के माफिक।
इधर उधर बेचैन कहीं भी, बिना छोर और बिना ठिकाना
दरबदर भटकता व्यग्र बावला भटका राह हो राही एक।

मगर बंधा यह संस्कारों से, अंतर्चेतन के कुछ धागों से,
जुड़ा हुआ यह इनसे जितना जाने या अनजाने में ही,
चेताते यह इसको जब भी यह उड़ता, मनमानी करता
समझाते हैं बतलाते हैं इसे सही क्या और गलत क्या।

राह कौन सी इसकी जाती सुख को और खुशहाली को,
शांति और उन्नति का जो पथ सहज सुरक्षित हो सकता है
और कौन सी राह इसे खड्डे में अवनति में ले जाएगी,
कल बन सकती काल, विनाश और अनहोनी का कारण।

मन की मनमानी और अंतर्चेतन के बीच यह संघर्ष निरंतर जारी रहता है मानव मन के अंदर प्रतिपल प्रतिक्षण
मानव का अंतर्चेतन है जब तक विजयी,है लगाम हाथ
तब तक जीवन में सब शुभ होता सुख फलदायी होता है।

वरना मन जो है प्रचंड और चलती उसकी ही मनमानी
अपने अंतर्चेतन ध्वनि की करते हुए अवहेलना उपेक्षा
संतापों का होआमंत्रण अवसादों का होना अपरिहार्य
फिर है विनाश का आमंत्रण, निश्चित अनिष्ट संभावित है।
#देवेंद्र

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Wednesday, October 23, 2013

सिर्फ अपनी पसंद की ही नहीं, बल्कि वह करें जो सही व आवश्यक है !


व्यक्ति के जीवन में नितांत आवश्यक है उसके द्वारा  यह  समझना कि उसके लिए क्या होना सही  है, बजाय कि उसके द्वारा  सिर्फ वही करना अथवा होना जो कि उसे भावनात्मक स्तर पर स्वयं को अच्छा व रुचिकर लगता है ।

प्रायः एक व्यक्ति को जीवन के  शुरुआती दौर में  इसकी ठीक ठीक समझ ही नहीं होती कि उसके लिये क्या होना सही है, हितकर  है , यदि किसी प्रकार से उसे इसका संकेत अथवा साक्षात्कार भी होता है, तो प्रायः उचित व सही चीजें स्वाद रहित व ऊपरी तौर पर कम आकर्षक होने के कारण या तो व्यक्ति द्वारा उपेक्षित  हो जाती है, अथवा उनका  व्यक्ति के रुचि व पसंद के मुताबिक न होने के कारण, वह उनको जानबूझकर नजरंदाज कर देता है ।

कहते हैं कि व्यक्ति को सही या गलत की सही परख व अनुभूति उसके अपने जीवन में स्वयं द्वारा की गयी गलतियों व  असफलताओं से सबक के रूप में ही  मिलती हैं, परंतु मसला यह है कि आजीवन बस गलतियां पर गलतियां करते रहने, व मात्र असफलताओं से जूझते रहने हेतु व्यक्ति की जीवन अवधि  व उसकी क्षमता बहुत थोड़ी व सीमित है ।अतः सहज व सफल जीवन जीने हेतु यह भी कतई आवश्यक है कि व्यक्ति लगातार न  सिर्फ निजी गलतियों व असफलताओं से सबक ले बल्कि साथ ही साथ दूसरों की गलतियों व असफलताओं से भी आवश्यक शिक्षा ग्रहण करता रहे व इन नसीहतों के मद्देनजर अपने जीवन पथ में जरूरी तब्दीली व सामंजस्य करते आगे बढ़े।

हालांकि दूसरों के अनुभवों व विचारों को यथास्वरूप अपनाने में व्यक्ति के भेड़चाल स्वभाव होने  व हर बात में बस दूसरों की ही नकल की  प्रवृत्ति का खतरा बनता है, साथ ही साथ इससे व्यक्ति की स्वतंत्र व मौलिक रूप से सोचने व करने की क्षमता प्रभावित होती है। अतः दूसरे के अनुभवों को स्वयं के जीवन में  बहुत सावधानी, विवेचनापूर्ण व संज्ञानपूर्वक ही अपनाना उचित होगा ।

एक प्रकार से कहें तो दूसरों के सही गलत,सफलता-असफलता  के अनुभव व उदाहरण से स्वयं के लिए  शिक्षा व नसीहत लेना किसी दुधारी तलवार की धार पर चलने से कतई कम नहीं, यह कार्य बहुत सावधानी, कुशलता व दक्षता के साथ ही करना होता   है अन्यथा यह व्यक्ति की मदद करने के विपरीत उसे हानिकारक  व उसके जीवन के प्रगति की राह   में गंभीर  बाधा बन सकता है  ।

इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में  व्यक्ति के  जीवन में एक सही मेंटर या मार्ग दर्शक का होना नितांत  मायने  व महत्वपूर्ण हो जाता है ।एक व्यक्ति के जीवन में मार्गदर्शक  विभिन्न रूप में हो सकते हैं जैसे मातापिता, अध्यापक, मित्र, बॉस, सहकर्मी, पत्नी, आध्यात्मिक गुरु या अन्य ।परंतु इसके साथ  यह तथ्य भी ध्यान में रखना उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता  है कि हर मार्गदर्शक  के स्वयं के  अनुभव, विवेक, व दक्षता के रूप में उसकी निहित  सीमायें होती हैं, अतः व्यक्ति को  अपने मार्गदर्शक  के अनुभव,  सलाह व शिक्षा से एक सीमा तक ही सहायता मिल सकती है, अन्यथा व अंततः तो व्यक्ति को स्वयं के विवेक, आत्मनिर्णय का ही मुख्य अवलंबन होता है व इन्हीं  के ही आधार पर उसे अपने जीवन के फैसले,सही या गलत,  लेने होते हैं ।

इन तथ्यों  के अतिरिक्त, व्यक्ति के जीवन में अंतिम व निर्णायक बात है उसका  जीवन  परिस्थितियों व मिलने वाले नतीजों के प्रति स्वयं का दृष्टिकोण, व्यक्ति का  अपनी सफलताओं अथवा  असफलताओं, विशेषकर असफलताओं , के  प्रति पूरी जिम्मेदारी व जबाबदेही होना , यानी व्यक्ति के साथ जीवन में जो भी भला या बुरा हुआ, जीत मिली या हार, सफलता मिली अथवा असफलता, सबको सहजता से स्वीकार कर लेना व अपने हर कार्य व निर्णय के लिए पूरी तरह से जबाबदेही रखना ।इस दृष्टिकोण के साथ व्यक्ति  स्वाभाविक रूप से अपने  जीवन  में आत्मनिर्भर, स्वावलंबी व सामने आने वाली किन्हीं भी  परिस्थितियों हेतु निर्भीक व तैयार रहता है ।

कह सकते हैं व्यक्ति की सही करने की समझ उसके जीवन की सर्वोपरि सीख व उपलब्धि है ।सिर्फ अपनी  पसंद की ही नहीं, बल्कि वह करना जो सही और आवश्यक है ।

Wednesday, November 30, 2011

......यह पिस रहा वर्तमान क्यों है ?


जूझता संघर्ष से यह,
नियति के प्रतिकर्ष से भी,
हो रहा अपकर्ष जग का,
क्या यहीं उत्कर्ष मेरा ?1?

साक्षी बने सब कृत्य के तुम,
किंतु रहते मौन साधे।
कह न सकते सच-असच क्या,
पर मानते अच्छी नियति है?2?

नींद मे तुम स्वप्न देखे,
जग रहे जो होश कब थी?
भूत-भव के सिल तले,
यह पिस रहा वर्तमान क्यों है?3?

उच्च तल पर सूर्य जलता,
भूतल सुलगती यह धरा।
सूरज-धरा के बीच विस्त्रित,
नीलमय यह शून्य क्या है?4?

जो दिख गया वह पाप होता,
है छिपा तो धर्म कहते।
पाप-धर्म के मध्य में यह,
करता मनुज अपकृत्य क्या है?5?

कर रहे निर्माण जो तुम
गर्भ में पलती प्रलय है।
सृष्टि-प्रलय अंतराल में यह
हो रहा उत्थान क्या है?6?

युद्ध में तलवार खिंचतीं,
संधि में प्रतिघात होते ।
युद्ध-संधि के बीच पलती,
स्याहमय यह शांति क्या है?7?