Sunday, September 18, 2011

लेखन और तनावमुक्ति

कुछ दिनों पूर्व मेरे कालेज के एक वरिष्ठ व वर्तमान में रेलवे में एक वरिष्ठ अधिकारी,और जो एक अच्छे लेखक व कवि भी हैं,बंगलौर पधारे व लम्बे अंतराल के उपरांत उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।लेखन की चर्चा चली और उन्होने एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही-खासतौर से उनके लिये लेखन जिनका शगल है।महोदय ने कहा -किसी विषय पर लिख दो तो मन को यह आश्वासन मिल जाता है कि मैंने अपनी बात तो कह दी।

उनकी कही बात मुझे बहुत सटीक व तथ्यपूर्ण लगी।

वैसे तो तनाव के कारण व उसका निदान स्वयं चिकित्सा विज्ञान व मनोविज्ञान का विशेष विषय है,और इस विषय पर कोई विशेष सलाह देने या लिखने का मैं तो कतई अधिकार या योग्यता नहीं रखता,किंतु अपने जीवन अनुभव व अनुभूतियों के आधार पर यह अवश्य कह सकता हूँ कि मनुष्य के तनाव का प्रमुख कारण प्राय: होता है कि व्यक्ति के बात,विचार व भावना को किसी से कहने व अथवा किसी दूसरे के द्वारा सुन लेने का भी न तो अवसर है अथवा न आजादी। कह सकते हैं कि मनुष्य के अपनी अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का तात्पर्य है उसकी भावनात्मक स्तर पर अपने बात,विचार व भावनाओं को कहने,सुनने व उनके प्रति संवेदना प्राप्त करने की स्वंत्रता व मिले अवसर से है।

मनुष्य की अपनी इस भावनात्मक अभिव्यक्ति की स्वंत्रता व अवसर का अभाव उसको मानसिक व भावनात्मक स्तर पर एकाकीपन का आभाष कराता है, और नतीजतन मनुष्य तनावग्रस्त व कुंठित अनुभव करने लगता है। लम्बी अवधि का लगातार तनाव ही प्राय: अवसाद जैसी गंभीर बीमारी में भी बदल सकता है।

आज हमारे वरिष्ठ आयु की पीढ़ी,हमारे बड़े बुजुर्गों में प्राय: कई लोग दु:खी,तनावग्रस्त या अवसादग्रस्त नजर आते हैं, उसके मुख्य कारणों में उनका एकाकीपन और उनको अपनी भावनाओं को अपने प्रियजनों,नजदीकियों, जो इस नवयुगीय सामाजिक संरचना में उनसे अलग व दूर रहते हैं, से व्यक्त न कर पाना है।

अपनी बात को न कह पाने की पीड़ा मनुष्य को अंदर तक सालती है और मन में स्थाई घाव बन कर पीड़ा देती हैं और मनुष्य के मन में तनाव बन कर उभरती है।एक मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार प्राय: गृहिणियाँ के दु:ख व बीमारी कारण मूलत: उनके पति व बच्चों का उनको समय न दे पाना ,उनके विचारों , शिकवा-शिकायतों के लिये उनके परिवार के सदस्यों के पास समय न होना है।कहते हैं कि ब्रिटेन में प्राय: बीमार गृहिणियाँ जब डाक्टर के पास जाती हैं, तो उनकी मुख्य तकलीफ व शिकायत होती है कि उनके पति और बच्चों के पास उनसे बात करने का समय नहीं है, वे डाक्टर से घंटे-आध घंटे अपने मन की बात कर लेती हैं और डॉक्टर जब उनकी बात पूरी संवेदना से सुन लेता है, तो वे बहुत राहत अनुभव करती हैं,और बिना किसी इलाज अथवा औषधि के ही उनकी बीमारी आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो जाती है।

औसधीय, डॉक्टरी व मनोवैज्ञानिक उपचार के अलावा योग-साधना,श्वास-व्यायाम की विभिन्न विधियाँ भी कहते हैं तनाव-मुक्ति व अवसाद की बीमारी के उपचार में अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होती हैं। किंतु जहाँ तक अपने भावनाओं व विचारों की अभिव्यक्ति की अनुपस्थिति में उपजी कुंठा व उससे उपजे तनाव से मुक्ति के निदान का प्रश्न है तो कह सकते हैं कि लेखन इस तनाव के उपचार में अति प्रभावकारी सिद्ध हो सकता है क्योंकि लेखन मनुष्य के अपनी बात,विचार और भावनाओं को व्यक्त करने का बड़ा ही सहज व प्रभावी माध्यम है।

जब हम कुछ कहना चाहते हैं तो अपेक्षित है कि कोई हमारी बात और विचार को सहानुभूतिपूर्वक सुन रहा है,अन्यथा बड़ी निराशा उत्पन्न हो सकती है।लेखन तो ऐसी भावना-अभिव्यक्ति है कि इसमें सामने किसी सुनने वाले की अनुपस्थिति भी कोई निराशा नहीं उत्पन्न करती।कलम उठायी और सफेद कागज पर अपनी भावनाओं को ' ब्लैक और व्हाइट' में उकेर दिया, दिल और दिमाग का बोझ हल्का सा हो जाता है, मन को यह आश्वासन मिल जाता है कि मैंने अपनी बात तो कह दी।

लोगों द्वारा नियमित डायरी लेखन भी कह सकते हैं कि उनके लिये तनावमुक्ति का प्रभावकारी उपाय होता है, और जीवन के ऊंच-नीच, संघर्षों व कठिनाइयों के दौर से सहजता पूर्वक गुजरने में महत्वपूर्ण सम्बल व सहयोगी सिद्ध होते हैं।

स्वयं के सीमित अनुभव को आपसे साझा करते हुये कहना चाहूँगा कि ब्लॉग पर  यह नियमित लेखन मन को बड़ा शुकून देता है,किसी भी तरह मन का वैचारिक अंतर्द्वंद्व या तनाव इस लेखन की प्रक्रिया व अवधि में प्रायः काफूर हो जाता है।

वैसे सीधे तौर पर कोई सलाह या उपदेश देने में अपने विज्ञ मित्रों व पाठकों से मैं सदैव संकोच करता हूँ , फिर भी इसी निवेदन के साथ यहाँ अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा कि लेखन का शगल अपनायें व सदा तनाव-मुक्त रहें।

9 comments:

  1. सही बात है।
    *
    शुक्रिया कि आपने फांट संबंधी मेरे आग्रह पर ध्‍यान दिया।

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  2. राजेश जी, पुनः आपका हार्दिक आभार।

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  3. सच कहा आपने, हम तो कब से यह थेरेपी अपना रहे हैं।

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  4. ...और आपने मुझे भी यह थिरेपी अपनाने की प्रेरणा दे दी।

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  5. हमने तो पहले ही अपना लिया है.

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  6. धन्यवाद रचना जी।

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  7. मेरे लिए भी यह मन को शांति प्रदान करने का ज़रिया है।

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. अच्‍छी, मनपसंद पोस्‍ट पढ़ना भी तनाव मुक्ति में सहायक होता है.

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