Sunday, August 28, 2011

.....संघे शक्ति कलयुगे ।


देश में चल रही वर्तमान गहमा-गहमी, भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठी बहस, ,जन-आंदोलन, धरना , अनसन-हडताल और परिणामस्वरूप संसद द्वारा जन-लोकपाल बिल के मुद्दे पर बहस और प्रस्ताव का पास होना निश्चय ही देश के लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक घटना  है , किंतु इस तथ्य  को , जो कि सरकार, व कुछ सांसदों व राजनीतिक दलों द्वारा उठाया जा रहा है और इन आंदोलनों व जनाग्रहों से देश की लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्था को हो सकने वाले दूरगामी खतरों के ध्यान में रखते हुये चिंता व्यक्त की जा रही है , कि यह मुद्दा इतना सरल व सीधा नहीँ है जितना आंदोलनकारियों व इसके अगुआ लोगों द्वारा बताने की कोशिश हो रही है , को भी नकारा नहीं जा सकता । पर इस अति आवेश पूर्ण वातावरण व सरकारी असमंजस की परिस्थितियों  में एक तथ्य स्पष्ट दिखता है कि आज देश की राजनीतिक व्यवस्था, सरकार, सरकारीतंत्र और इसकी नौकरशाही एक दोराहे पर अनिर्णय व अनिश्चय की स्थिति- किंकर्तव्यम् किं- न कर्तव्यम् में खडी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्ष 1991 में किये गये उल्लेखनीय सुधारों व उदारीकरण के पूर्व भारतीय सरकार और नौकरशाही की मुख्य भूमिका निषेधात्मक थी - परमिट और लाइसेंस राज में नौकरशाह, सरकारी अधिकारी और मंत्री मुख्यतया निषेधाज्ञा जारी करने के अभ्यस्त थे।उस अवधि में प्राइवेट क्षेत्र की भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिका न्यून थी, सब कुछ सरकारी क्षेत्र के नियंत्रण में होने, आपूर्ति के सीमित संसाधनों व स्तर के कारण स्वाभाविक रूप से जन आकांक्षायें व माँग का दबाव भी कम था।चाहे राशनकार्ड लेना हो, पासपोर्ट बनवाना हो,गैस का कनेक्सन लैना हो,सरकारी कोटे में मकान या प्लाट आबंटित कराना हो, कार या स्कूटर खरीदना हो या उनका लाइसेस बनवाना हो, रेल या हवाई जहाज यात्रा का आरक्षण कराना हो,दूरसंचार पर लम्बी दूरी की काँल करनी हो, लोग लम्बी प्रतीक्षा सूची व लम्बी लाइन लगाने के अभ्यस्त थे।

किन्तु अर्थव्यस्था के उदारीकरण, वैश्वीकरण व खुली बाजार व्यवस्था के आने से लोगों की आकांक्षाएँ, जन-सेवाओं के प्रति अपेक्षायें , उपभोग की वस्तुओं व सेवाओं की माँग में भारी वृद्धि हुई है , जिनको पूरा करने में सरकार व सरकारी तंत्र असफल व ळाचार दिखता है।

1991 के बाद देश का आर्थिक व सामाजिक ढाँचा तो बदल गया किन्तु सरकारी तंत्र व उसका प्रशासनिक ढाँचा जस का तस रहा,सिवाय आंशिक व छिटपुट सुधारों के ।हमारा सरकारी तंत्र अभी भी अपने निषेधात्मक मनोवृत्ति से नहीं बाहर निकल पाया है।विभिन्न जनसेवाओं को प्रदान करने में होनेवाली हीला-हवाली, नाकारापन व असफलता से जनता का सरकार व सरकारी तंत्र के प्रति आक्रोश बढता जा रहा है ।और यह जनआंदोलन आमजनता की सरकारी तंत्र के प्रति उपजी इन्हीं निराशाओं  के विरुद्ध  प्रतिक्रिया कह सकते हैं।

तो सरकार के सामने आज सबसे बडी चुनौती है- सरकारी तंत्र व जनसेवा निकाय़ों का ढाँचागत व आमूल-चूल परिवर्तन,इनकी प्रदर्शन क्षमता को जनसाधारण की माँग व अपेक्षा के अनुकूल स्थापित करना ।यह है तो एक कठिन चुनौती, क्योंकि कोई नयी व्यवस्था तो फिर भी सुगमता से स्थापित हो जाती है, किंतु किसी वर्तमान व्यवस्था का ढाँचागत परिवर्तन बड़ा ही दुष्कर कार्य होता है , क्योंकि यह प्रक्रिया स्वयं के अनेक अंतर्विरोधों का सामना करने को बाध्य होती है ।फिर भी इसे करना असंभव भी नहीं ।

आशा की किरण हैं देश में वर्तमान कुछ महत्वपूर्ण जनसेवाओं से संबंधित क्षेत्र व विभाग, जिनमें पिछले एक-डेढ दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुये हैं- जैसे- टेलीफोन व मोबाइल सेवाएँ, बैंकिंग सेवाएँ, संसदीय व विधान सभा के आम चुनाव, समाचार व मीडिया ।इन क्षेत्रों में आधुनिक सूचना तकनीकि के उपयोग, व ढाँचागत सुधारों के द्वारा सेवाओं की दक्षता व गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, और हमारे ये क्षेत्र ग्राहक-सेवा में निश्चय ही आज विश्वस्तरीय सेवा प्रदान कर रहे हैं।

इंटरनेट से रेल टिकट आरक्षण, पासपोर्ट के लिये आवेदन, बिजली बिल,टेलीफोन बिल, प्राँपर्टी टैक्स का आँन-लाइन भुगतान, लैंड व प्रापर्टी का आनलाइन रिकार्ड व संबंधित आवश्यक कागजादों को आँन-लाइन डाउनलोड करने की सुविधा, जैसे महत्वपूर्ण व सकारात्मक कदम हैं, जो कि जनसेवाओं के गुणवत्ता व दक्षतापूर्ण प्रदायगी में निश्चय ही मील के पत्थर साबित हो रहे हैं। भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया सर्वभारत यूआईडी प्रोजेक्ट आधार इस दिशा में महत्वपूर्ण ढाँचागत आधार सिद्ध हो सकता है।  

समस्या के वृहत् स्तर को देखते हुये मात्र सरकारी प्रयास नाकाफी होगा। समस्याओं के समाधान में नवाचार ( Innovative Solutions) , उचित तकनीकी साधनों का उपयोग व कार्यकुशल मानवसंसाधन का सफल प्रबंधन सरकारी व निजी क्षेत्र, दोनों, के साझा प्रयास, सहयोग व  आपसी भागीदारी से ही संभव है। इस दिशा में सटीक तरीके से डिजाइंड पीपीपी परियोजनायें  आने वाले समय में जनसेवाओं    की सक्षम व संतोषजनक प्रदायगी में अपरिहार्य व महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कल के सुरक्षित, सुनहरे व उन्नत भारत व भविष्य के लिये यह संगठित व साझा प्रयास विकल्प-रहित है।

...निरस ,विषद, गुनमय फल जासू।


तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में संत की परिभाषा बडे ही सटीक ढंग से की है -


संत हृदय नवनीत समाना ,
कहा कबिन पर कहइ न जाना ।
निज परिताप द्रवहिं नवनीता,
पर दु:ख दु:खी संत सुपुनीता ।
संत सुभाव जु सहज कपासू,
                  निरस,विषद,गुनमय फल जासू ।

तात्पर्य यह है कि अनेक कवियों ने संत हृदय की कोमलता की तुलना नवनीत ( मक्खन ) से की है , किंतु यह तुलना अपूर्ण है क्योंकि नवनीत तो अपने ही ताप ( गरमी) से पिघल जाता है , जबकि संत का हृदय तो दूसरे के दु:ख से ही द्रवित होता है ।   संत का स्वभाव तो कपास के वृक्ष जैसा होता है , जो किसी रस (भोग-विलास की लालसा) से रहित, विस्तारपूर्ण (वसुधैवकुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत) , व उसका फल अनेक गुणों (ऐसी योग्यतायें जो परमार्थ के काम आती हैं ) से युक्त होता है ।

एक चौहत्तर वर्ष का बुजुर्ग व्यक्ति जब आम देशवासियों के कल्याण हेतु नि:स्वार्थ भाव से अपने प्राण व शरीर की कदापि चिंता न करते हुये यदि इतना शारीरिक तप कर रहा है और हम सबकी ही भलाई हेतु कष्ट उठा रहा है , यही तो संत-स्वभाव कहलाता है ।

महात्मा गाँधी ने अनेकों बार देश व समाज के कल्याण हेतु शारीरिक तप व त्याग का कठिन उदारण प्रस्तुत किया ।उनके जीवन का अध्ययन करें तो यह स्पष्ट दिखता है कि उनके कर्म व विचार में प्रथम स्थान  साधारण जन व समाज की वेदना का उन्मूलन था,और वे इसके लिये किसी भी हद तक के त्याग,तपस्या, बलिदान व अहिंसक संघर्ष करने को सदैव तत्पर रहते थे ।इसीलिये तो वे हम सबके- हर देशवासी के बापू थे और हम उन्हें अपना राष्ट्रपिता मानते हैं।

प्रसन्नता की बात यह है कि महात्मा गाँधी आज भी हमारे जनमानस, नई पीढी, के विचार व व्यवहार में उतने ही प्रासंगिक व प्रेरणाश्रोत बने हुये हैं , जितना वे स्वयं अपने जीवन काल में व अपने समकालीन पीढी के लिये थे ।वे इसी तरह हमारे देश व समाज के लिये निरंतर आदर्श व प्रेरणाश्रोत बनें रहें, हम सबको यह मंगल-कामना निरंतर करते रहना चाहिये।

यह लेख मेरे ब्लाग का पचासवाँ लेख है, और मुझे हार्दिक प्रसन्नता यह हो रही है कि मैं इस लेख में यह विशेष व सामयिक चर्चा कर पा रहा हूँ ।

Friday, August 26, 2011

संवाद और विश्वसनीयता


हम सब शब्दों व बातों से कहते तो बहुत कुछ हैं,कभी-कभी तो हम शोर की हद तक अपनी बात कहने की कोशिश करते हैं, समझाना भी बहुत कुछ चाहते हैं,पर जटिल प्रश्न तो यही है कि कहे जाने या कहें तो सुनने वाले ने कितना सुना,गुना और समझा ? यह कहने और समझने के बीच का घाटा एक तरह से संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न कर देता है

पति-पत्नी तो कई वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं,एक दूसरे से कहने सुनने में कोई कोर-कसर भी नहीं छोडते, पत्नियाँ वैसे भी शादी के कुछ वर्षों के अनंतर पति के प्रति काफी मुखर हो जाती हैं,फिर भी यदि आप सूक्ष्मता से दृष्टि डालें तो यही निष्कर्ष निकालेंगे कि दोनों के बीच भयंकर संवादहीनता की स्थिति है ।यह संवादहीनता अंततः उनके बीच या तो कलह का कारण बनती है या तो किसी एक के अवसादग्रस्त होने का कारण ।

आफिसों,कार्यालयों में भी इसी संवादहीनता के कारण जहाँ एक ओर अनेक कार्यघंटे जाया चले जाते हैं, वहीं दूसरी ओर कार्यदक्षता भी बुरी तरह प्रभावित होती है । जनसेवाओ की खराब गुणवत्ता और देरी के मुख्य कारणों में एक संबंधित विभागों व संस्थानों में व्याप्त संवादहीनता ही है -संवादहीनता व्यक्तिगतस्तर पर है या विभागीय स्तर पर।

समाज के स्तर पर भी संवादहीनता की जडे बडी ही गहरी हैं।धार्मिक,साम्प्रदायिक,जातीय व अन्य सामाजिक झगडो व मतभेदों की जड मे भी व्याप्त आपसी संवादहीनता ही है ।

कहीं मैने पढा था - ' जो हम व्यक्त करते हैं , वह प्राय: अव्यक्त रह जाता है , और जो हम सीधे तौर पर नही व्यक्त करते या व्यक्त नहीं करना चाहते, वही व्यक्त हो जाता है ।' तात्पर्य यह हो सकता है कि हमारी अभिव्यक्ति व कथ्य का प्रत्यक्ष व चेतन भाग अति न्यून व आंशिक ही होता है , जबकि उसका अधिकाँश भाग अप्रत्यक्ष , अचेतन होता है ।

हमारे कथ्य का प्रत्यक्ष व चेतन भाग किस तल तक श्रोता तक संवाद स्थापित कर पाता है , यह कहने वाले की सुनने वाले के मन में उसकी विश्वसनीयता पर निर्धारित होता है । यदि दोनों के बीच विश्वसनीयता का अभाव है , तो कही हुई बात संवादहीन व बेमानी ही होती है, बजाय जो कुछ भी संवाद हो रहा है , वह कथ्य के अप्रत्यक्ष व अचेतन भाग से हो रहा है ।

तो कह सकते हैं कि हमारे चारों ओर व्याप्त संवादहीनता का प्राय: कारण हमारी आपसी विश्वसनीयता की कमी है । विश्वसनीयता की जटिलता यह है कि इसे जटिलता से परहेज है । जो भी सरल व स्पष्ट है , चाहे कही गयी बात , या व्यक्ति का व्यवहार, आचरण या कर्म, वही प्राय: विश्वसनीय होता है । आचार, विचार, कर्म, व्यवहार व वाणी की जटिलता प्राय: अविश्वसनीयता में निरूपित होती है ।

इस तरह कह सकते है कि सुगम व प्रभावी संवाद शीलता हेतु, एवं आपसी संवादहीनता को न्यूनतम रखने हेतु आपसी विश्वास परमाश्यक है , और विश्वसनीयता हेतु आवश्यक है कि आपसी क्रियाकलाप- आचार, विचार, व्यवहार, कर्म, कथन सरल, सहज, स्पष्ट व पारदर्शिता पूर्ण हो ।

वैसे एक सावधानी की भी बात है, वह है उपरोक्त सिद्दांत की कोरोलरी- यानि विश्वसनीयता के आक्षेप में अकसर गलत संवाद भी स्थापित हो जाता है, यानि विश्वास करने में ही कभी धोखा भी हो जाता है।फिर भी कहते हैं  कि विश्वास न करने के बजाय विश्वास करके धोखा खाना बेहतर होता है ।

Wednesday, August 24, 2011

तोता और गधा


एक तोता और एक गधा साथ-साथ हवाई-जहाज से यात्रा कर रहे थे । तोता बहुत नटखट व शैतान स्वभाव का था। जब भी विमान-परिचायिका उसके पास आती या पास से गुजरती, वह उसे छेडता, भद्दे कमेंट्स पास करता,विमान-परिचायिका करती भी क्या! वह ड्यूटी पर थी, तोते के व्यवहार को नजर अंदाज करते हुये यात्रियों की सर्विस में व्यस्त थी । 


यह देख गधे को मजा आने लगा था, और तोते की देखा देखी अब वह भी विमान-परिचायिका को छेडने, फब्तियाँ कसने में  तोते के संग शामिल हो गया। जब विमान-परिचायिका को यह सब  बर्दास्त के बाहर हो गया तो इसकी शिकायत विमान के पाँयलट से की । पाँयलट को तोते व गधे के इस अशोभनीय व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया और उसने विमान-परिचायिकाओं और स्टीवार्ड्स को हिदायत दिया कि तोते और गधे दोनों को विमान से धक्के मारकर बाहर फेंक दें ।

वही हुआ, आखिर दोनों को उडती हवाई जहाज से धक्के मारकर बाहर फेंक दिया गया। विमान से बाहर गिरते ही गधा तो चकरघिन्नी की तरह चक्कर खाते नीचे की ओर गिरने लगा, और डर और भय के मारे चीखने चिल्लाने और भगवान से जान बचाने की दुहाई करने लगा। उधर तोता विमान  से बाहर फेके जाने पर भी निश्चिंत और  अब भी मजे ले रहा था। उसने बदहवास गधे से पूछा, 'अबे तुझे उडना आता है ? ' गधे ने जबाब दिया 'नहीं' , तो तोता उसकी बेवकूफी का मजाक उडाते बोला , ' अबे जब तुझे उडना नहीं आता तो एयर होस्टेस को क्यों छेडा, तूने क्यों पंगा लिया? देख! मुझे तो उडना आता है। '
 
प्रबंधन की भाषा में कहें तो तोता का अपनी हरकतों के लिये प्लान-बी था , यानि विमान से बाहर धक्का देकर फेंके जाने पर भी उसको कोई खतरा नहीं था, क्योंकि उसे उडना आता था, जबकि गधे के पास कोई  प्लान-बी नहीं था , उसने पंगा तो ले लिया, परंतु उससे होने वाले खतरों का उसे न तो आभाष था और न ही उससे निपटने का उपाय।
 
हर मैनेजर को अपने डी.एन.ए. की सही जानकारी होना कि वह तोता श्रेणी में आता है अथवा गधा श्रेणी में आता है , प्रबंधन ज्ञान व कौशल का प्रथम सोपान है । गधा श्रेणी का मैनेजर जब भी तोता श्रेणी के मैनेजर की देखा-देखी कोई एडवेंचरस हरकत करता है, तो वह भारी मुसीबत को न्योता देता है ।
 
अपने अनुभव से अपनी सही श्रेणी जानते हुये मैं तो हमेशा किसी ऐसे एडवेंचर से दूर रहता हूँ जो कि सँभालना मेरे कूबत से बाहर है । आप भी अपनी श्रेणी को ठीक-ठीक जान लें, और उसी के मुताबिक जीवन में कोई चाँस लें, बेमतलब के बखेडों से हमेशा बचे रहेगे ।

Tuesday, August 23, 2011

तुमको जो हो पसंद वही बात करेंगे



अपनी छोटी क्लास में संस्कृत की एक कहानी पढी थीकहानी का शीर्षक तो याद नहीं किन्तु भाव इस प्रकार था –

एक राजा था । उसके पास एक बूढा व बीमार हाथी था । राजा के मंत्रियों ने राय दी कि हाथी की देखभाल की जिम्मेदारी गाँववालों को दे देते हैं ।राजा ने अपनी मंत्रियों की राय पर हाथी गांववालों को इस कडी हिदायत के साथ के सौंप दिया कि हाथी की देखभाल अच्छे से होनी चाहिये , यदि हाथी के बारे में कोई अशुभ समाचार किसी गांव वाले ने राजा को दिया तो उसे फाँसी की सजा होगी।

बेचारे गाँव वाले, अपना पेट तो भर नहीं पाते ठीक से, और अब ऊपर से हाथी जैसे विशाल पेट वाले जानवर की देखभाल व भरण-पोषण की जिम्मेदारी, अलग से राजा का भयंकर फरमान कि हाथी की अकुशलता की खबर लाने वाले को सीधे फाँसी, उनकी तो जान ही सांसत में थी ।

वे अपनी और अपने बाल-बच्चों की फिक्र कम, बल्कि हाथी की देखभाल और सेवा-सुश्रुषा में ज्यादा लगे रहते । फिर भी बूढा और बीमार हाथी गाँव वालों की सारी तीमारदारी व देखभाल के बावजूद अपनी अंतिम सांस गिनते गिनते एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो गया । अब पूरे गाँव पर एक भारी संकट आन पडा था । आखिर राजा को कौन जाकर हाथी की मृत्यु की खबर सुनायेगा और अपनी मौत की दावत देगा । फिर भी खबर तो पहुँचानी ही थी , तो गांव के एक समझदार बुजुर्ग को यह जिम्मेदारी दी गयी ।

बुजुर्ग राजदरबार में हाजिर हुआ , हाथी का हाल राजा को इस तरह सुनाया - महाराज ! हाथी न उठता है , न बैठता है , न खाता है, न पीता है, न साँस लेता है, न साँस छोडता है , न सोता है, न जगता है । राजा ने झुँझलाकर बोला- यह क्या बकवास है, क्या हाथी मर गया । बुजुर्ग ने सहज भाव से उत्तर दिया- महाराज आप हमारे मालिक हैं, यह तो आप ही कहने का अधिकार रखते हैं, मैं तो बस हाथी का हाल बयान कर रहा था ।

हमारे लोकशाही में अच्छे व सफल मैनेजर उसी समझदार बुजुर्ग की तरह हमेशा ही बडी चतुराई से अपने ऊपर वाले शासक को किसी हाथी के मरने की खबर ऐसी ही समझदारी से देते हैं । आखिर सच को सच कहकर कौन फाँसी पर चढना चाहता है ?

Monday, August 22, 2011

सत्ता-शासन व दृष्टि दोष की बीमारी


मैने कभी एक हिन्दी कहानी में एक रोचक प्रकरण पढा था। कहानी का नायक एक जुझारू, संवेदनशील व निरंतर संघर्षशील आंदोलनकारी छात्रनेता व तदन्तर जननेता होता है । जन समस्याओं , वेदनाओं व मुद्दों के प्रति उसकी संवेदना इतनी गहरी व सच्ची होती है कि जैसे ही वह किसी जन समसमस्या को देखता व अनुभव करता है, उसके शरीर में एक अतिरिक्त आँख उभर आती है । परिणामत: उसकी जनसेवा व जननायक की कुछ वर्ष की अवधि में ही उसके शरीर में अनेकोनेक आँखें उभर आयी थी और उसका आँखो से भरा शरीर विकृत , विभत्स व डरावना सा लगता था ।

किंतु वह जनसमर्पित , लोगों की समस्याओं, दु:ख-दर्द के प्रति संवेदनशील व उन्हे दूर करने हेतु सदैव संघर्षरत रहता था , अत: वह अति लोकप्रिय था। इसी लोकप्रियता व उपजे जनसमर्थन से व जनप्रतिनिधि चुनकर सत्ता का स्वयं अधिकारी बना। अभी तक वह जिस सरकार के विरुद्ध बगावत,आंदोलन की बात करता था , नारे लगाता था , आज वह उसी सरकार का स्वयं ही मुखिया बन गया था। आज तक जिन जनकार्यों को अति शीघ्र शुरू करने व पूरा करने की सरकार से आग्रह , हठ व अनसन किया करता था, अब उन्हीं जनकार्यों व योजनाओं को सम्पन्न करने की जिम्मेदारी स्वयं उसके ऊपर थी ।

वह सरकार का मुखिया बनकर भी जनता की माँगों,शिकायतों को सुनने के लिये ज्यादा से ज्यादा समय देने का प्रयाश करता, जनता दर्शन में उपस्थित होता, जनता के शिकायती आवेदनों को स्वयं प्राप्त कर उनपर उचित कार्यवाही के लिये निर्देश जारी करता। सरकारी तंत्र तो सरकारी तंत्र है, उस जननेता व शासक के अथक प्रयाश बावजूद नतीजे संतोषजनक न आते। उसके मातहत व सरकारी अधिकारी काम न हो पाने और समस्या को दूर न कर पाने के कई तथ्य आधारित कारण बताते - जैसे समुचित धनकोष का अभाव, संसाधनों का अभाव, कर्मचारियों का अभाव, मसीनों का अभाव , ये अभाव, वो अभाव।

वह जननेता करता भी क्या, आखिर वह अब सरकार का स्वयं मुखिया था, यदि सरकार काम नहीं करती तो इसकी जिम्मेदारी उसके स्वयं के ऊपर भी आती थी, इसलिये उसे अपने अधिकारियों द्वारा काम न होने में विभिन्न अभावों के तथ्यपूर्ण कारण उचित व तर्कसंगत लगने लगे और वह धीरे घीरे उन जन समस्याओं जिनको लेकर वह अति अधीर व संवेदनशील था, उनके प्रति तटस्थ भाव अपनाने लगा।

पर उसकी समस्याओं के प्रति तटस्थता अपनाने से अद्भुत चमत्कार हुआ- उस जननायक का शरीर जो जनसमस्याओं के प्रति अतिरेक संवेदनशीलता से अनेकों आँखों के जगह जगह उभरने से कुरूप व विभत्स हो गया था , अचानक अब रोगमुक्त होना शुरू हो गया, वे कुरूपता की कारण शरीर में उभरी जगह-जगह आँखे धीरे धीरे उसके शरीर से विलुप्त होने लगीं । वह जननेता वापस एक सुदर्शन व विकार रहित शरीर का स्वामी बन गया।

लगभग बाईस वर्ष पूर्व हमारे देश में एक ऐसे ही जननायक उभरे थे , जो सरकार में मंत्री रहकर, अपने ही नेता और प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा खडाकर जनांदोलन शुरू किया। इसी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन, और बडे-बडे वादों और नारों  का सहारा लेकर वे स्वयं देश के प्रधानमंत्री भी बन गये । वे स्वयं तो भ्रष्टाचार का कितना उन्मूलन किये इसका तो देश ही साक्षी है, किन्तु अपनी सत्ता और गद्दी की खातिर उन्होने  देश के सामाजिक व धार्मिक ताने-बाने व समरसता को जिस बुरी तरह से ध्वस्त व क्षत-विक्षत किया कि देश आज भी उस आघात की पीडा व कडवाहट को ढो रहा है ।

तो इस तरह के हमें अनेकों उदाहरण मिल जायेंगे कि सरकार में न होने,विरोध की राजनीति करते समय तो जनता के दुःख दर्द, इन जन सेवकों को जनता की समस्यायें खूब नजर आती हैं, जनता के प्रति खूब सम्वेदना जगती है, इसी सहानुभूतिक आधार पर और राजनीतिक चतुराई का सहारा लेकर अपने समर्थन में ये लोग जनांदोलन भी खड़ा कर लेते हैं, और स्वयं को जननायक घोषित कर लेते हैं। फिर इसी जन समर्थन के सहारे जब स्वयं जनप्रतिनिधि चयनित होकर सत्ता की बागडोर सँभालते हैं, तो उनका स्वयं का भी प्रशासनिक व्यवहार, आचरण व कार्य प्रदर्शन कमोवेश अपने पूर्ववर्ती सरकार जैसा ही होता है, जिसका बढ-चढ कर स्वयं विरोध किये थे, और जिन मुद्दों को लेकर बडे-बडे भाषण व नारे दिये थे, किन्तु स्वयं सत्ता पाने पर खुद भी उसी घिसी-पिटी लीक पर ही चलते हैं ।

कह सकते हैं इसका एक कारण यह हो सकता है कि राजा कोई हो, हमारे देश की राजनगरी की पटरानी मंदोदरी ही रहती है । 

क्या हमें परनिंदा का नैतिक अधिकार है ?


परनिंदा मनुष्य के मूल विकारों में से एक है ।इसकी मौलिकता को ही महत्व देते हुये साहित्यकारों ने नवरसों के साथ साथ निंदारस को भी स्थान दिया है । किसी से कुछ त्रुटि हो जाये, प्राय: हम उसकी निंदा करने से चूकते नहीं हैं। किसी के अच्छे कार्य की सराहना करने से हम भले ही प्राय: चूक जाते हैं, किन्तु निंदा का अवसर लाभ उठाने से भला क्या मजाल कि हम चूक जायें ।

वैसे कबीर दास जी की मानें तो हमें खुद की निंदा का स्वागत करना चाहिये। उन्होने कहा है - निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय । शायद उनके इतने साहस व उदारतापूर्ण कथन का कारण यह हो सकता है कि हमारी निंदा करने वाला हमारी उन कमियों व कमजोरियों को इतने सीधे-सीधे व स्पष्ट तरीके से बता देता है जो कि हमारे मित्र व प्रियजन प्राय: छुपा देते हैं या सीधे तौर से कभी नहीं कह पाते या कहने में संकोच करते हैं ।

निंदा प्राय: तीन तरह की होती है - कारण वश , ईर्ष्या वश और स्वभाव वश । कारण वश निंदा का आधार किसी किये गये कार्य के नैतिकता या नियम के प्रतिकूल होने या कार्य के अपेक्षानुकूल परिणाम न आने या किसी के द्वारा अनुचित व्यवहार या आचरण करने के विरुद्ध होती है। यह निंदा स्वाभाविक व तथ्यपरक होती है । दूसरी कोटि की निंदा ईर्ष्या वश होती है। यदि हम किसी के प्रति ईर्ष्यालु हैं, किसी के प्रति हमारे मन व हृदय में डाह,जलन या ईर्ष्या है तो हम उस व्यक्ति के कुछ भी अच्छे-बुरे कार्य या व्यवहार की निंदा करते हैं ।यह निँदा कभी कभी तथ्यपरक हो सकती है, पर प्राय: यह विद्वेषपूर्ण व लक्षित व्यक्ति को हानि पहुँचाने की नियति से होती है।तीसरी कोटि की निंदा स्वभाव वश होती है । कुछ व्यक्तियों का स्वभाव ही होता है कि वे किसी भी काम की या व्यक्ति की- चाहे अच्छा हो या बुरा निंदा ही करते है। ऐसे लोग सिवाय अपने किसी दूसरे के काम या व्यवहार की निंदा किये बिना रह ही नहीं सकते।उन्हे यह रंचमात्र अहसास भी नहीं होता कि उनके इस क्षणिक निंदारस का आनंद किसी को कितनी हानि,आघात या दु:ख पहुँचा सकता है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि निंदा का कोई भी कारण हो, क्या हम नैतिक आधार पर किसी भी दूसरे की निंदा करने के अधिकारी हैं। मैने इस प्रश्न पर बहुत मंथन किया पर अपने अंत:करण से यही उत्तर मिलता है कि नहीं, हमें किसी दूसरे की निंदा करने का कोई अधिकार नहीं।हम प्रत्येक से गाहे-बगाहे, जाने-अनजाने कोई न कोई गलती होती ही रहती है, किंतु हम स्वयं की तो कोई निंदा नहीं करते, बजाय हम अपने गलत से गलत, बुरे से बुरे , अनुचित से अनुचित कार्य ,कार्य के परिणाम,आचरण या व्यवहार को उचित,तर्कसंगत व न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं।हम अपने द्वारा किये गये किसी गलती या गलत कार्य अथवा कार्य के खराब या असफल होने का कोई न कोई तथ्यपूर्ण कारण, परिस्थिति, मजबूरी या विवशता या अपरिहार्यता बताकर उसे उचित ठहराने की कोशिश करते हैं।

इस तरह जब हम सबसे कोई न कोई गलती होती है, और हम अपनी खुद की गलतियों के लिये स्वयं को माफ कर लेते हैं और स्वयं के कृत्य की निंदा कदापि नहीं करते तो हमें किसी दूसरे की निंदा करने का भला क्या नैतिक आधार बनता है।तो अगर हम अपने अंतरात्मा की आवाज सुनें तो हमें परनिंदा का कोई नैतिक अधिकार नहीं।पर असली मसला तो यह है कि हम अपने अंतरात्मा की आवाज कितनी सुनते हैं और उसपर कितनी गंभीरता से अमल करते हैं ?