Sunday, April 8, 2012

Innovative Minds and Entrepreneurship (नवाचार व उद्यमशीलता) - पार्ट-2



विज्ञान का चमत्कार ( टाइम्स ऑफ इंडिया के सौजन्य से )

दो-तीन पूर्व दिन इस विषय पर जब मैं लिखना आरम्भ किया, तो मन में नवाचार के विषय में मुख्य विचार यही चल रहा था कि इसके लिये किस तरह की  नेतृत्वशैली और प्रबंधन व व्यावसायिक रणनीति आवश्यक है और  इस हेतु सम्यक आचरण कैसा होना चाहिये, और इसी परिपेक्ष्य में इस पोस्ट के प्रथम भाग में मैंने महाभारत में वर्णित विदुर नीतोपदेश से एक श्लोक भी उद्धृत किया था , जो बुद्धिमत्तापूर्ण व विवेकशील नेतृत्वशैली की सटीक व्याख्या करता है ।

संयोगवश कल (07.04.12) टाइम्स ऑफ इंडिया समाचारपत्र में इसी विषय से संबंधित एक लेख Shifting The Innovation Track , जिसे श्री Sunil Khilnani , निदेशक, India Institute, King's College, London, ने लिखा है, भी पढ़ने को मिला । इस लेख में लेखक ने नवाचार (Innovation ) के संबंध में अति महत्वपूर्ण यह बात स्पष्ट यह की है कि प्रायः हम नवाचार (Innovation ) का तात्पर्य किसी काम को येन-केन प्रकारेण ( by hooks or crooks) और झटपट कर लेने से समझने लगते हैं, और लेखक ने हमारी नवाचार के प्रति इस प्रवृत्ति व सतही सोच के प्रति हमें नितांत सावधान किया है ।

लेखक ने यह  स्पष्ट किया है कि भारत के निजी  अनुभव, और अन्य विकसित हुये देशों के भी अनुभव को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि किसी भी क्षेत्र में नवाचार कुछ जादू जैसा, झटपट,चमत्कारी या यूरेका जैसी प्रतिक्रियाओं सा मात्र एक आसान सा परिणाम नहीं होता है बल्कि  यह एक  दीर्घकालिक दृष्टि और योजनाबद्ध निवेश का क्रमिक व संचयी उत्पाद होता है ( long term vision and investment, and thereof the gradual, cumulative gains ) ।

लेखक ने बंगलौर व यहाँ पर सूचना तकनीकि कंपनियों की ऐतिहासिक सफलता का  भी  उदाहरण देते हुये यह स्पष्ट करने का प्रयाश किया है कि प्रायः हम इस सफलता का कारण केवल ,  आमतौर पर, 1980 के दशक में अचानक तकनीकी व व्यावसायिक रूप से कुशल कुछ निजी नव-उद्यमियों, के कुशल नेतृत्व,रणनीति व नवाचारपूर्ण तकनीकि व व्यावसायिक कार्यशैली को मान लेते हैं , किंतु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिये कि इस शहर के एक नवाचार इंजन व मुख्य केंद्र बनने व सूचना तकनीकि उद्योग में मिली उल्लेखनीय सफलता के पीछे यहाँ पर व देश के अन्य भाग में पहले से उपलब्ध उपयुक्त उनन्त तकनीकि वातावरण – भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे उन्नत तकनीकि व विज्ञान अनुसंधान केंद्र के साथ-साथ हमारे देश में भारतीय तकनीकी संस्थानों(IITs) द्वारा अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की तकनीकी में दक्ष व कुशल प्रशिक्षित इंजिनियरों की उपलब्धता , था , जिसकी पृष्ठभूमि देश में काफी पहले , 1950 के दशक में ही, स्थापित हो गयी थी । 

इस तरह तकनीकि व व्यवसायिक वातावरण की उपलब्धता बुद्धिमान व उद्यमशील व्यक्तियों को नवीन कार्य करने की प्रेरणा व सही अवसर प्रदान किया , जिससे वे अपने नवाचारपूर्ण कार्यशैली में सफल रहे ।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट है कि यह ऐतिहासिक नवाचार की घटना मात्र कुछ बुद्धिमान व अति-प्रतिभाशील व्यक्तियों की चमत्कारिक व्यावसायिक उपलब्धता के परे, तकनीकि,विज्ञान व व्यवसायिक संस्थानों के निर्माण व विकास में देश द्वारा एक लम्बी अवधि तक किये गये सही व समुचित निवेश का सुपरिणाम था ।

इस तरह नवाचार के वृक्ष को विकसित व हराभरा होने हेतु आवश्यक है कि उसकी जड़े काफी गहरी हो व उसकी अनेकों टहनियाँ व शाखायें विकसित हो सके ।

यदि हम अंतर्राष्ट्रीय व विकसित देशों – यूरोप व अमरीका का उदाहरण देखें तो हमें स्पष्ट हो जाता है कि इन देशों ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध व बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अपने विश्वविद्यालयों, तकनीकि,व्यवसायिक प्रशिक्षण व अनुसंधान संस्थाओं के विकास में लम्बी अवधि तक लगातार निवेश किया ,जिसके फलस्वरूप ये संस्थान ऐतिहासिक रूप से समृद्ध होकर उभरे , और वहाँ पर अनेकों बुद्धिजीवियों, कुशल वैज्ञानिकों, अभियंताओं,व उद्यमशील प्रबंधकों का निर्माण व विकास हुआ जो अपने नवाचार पूर्ण तकनीकि व व्यवसायिक कौशल व प्रतिभा से इन देशों में ही नहीं अपितु अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सहायता से संपूर्ण विश्व में तकनीकी व औद्योगिक क्रांति लाने व अपने देश की तकनीकि व व्यवसायिक योग्यता व श्रेष्ठता का  विश्वभर में परचम लहराने में सफल रहे ।

इन अनुभवों से सबक लेते हुये हमें भी शुद्ध विज्ञान,उच्च तकनीकि व व्यवसायिक प्रबंधन के प्रशिक्षण व अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वस्तरीय संस्थानों का निर्माण करने व उन्हे उन्नतशील करने  हेतु गंभीरता पूर्वक व लगातार निवेश करते रहने की अतीव आवश्यकता है , ताकि आने वाले भविष्य में उच्चकोटि की उद्यमशीलता के विकास हेतु उचित वैज्ञानिक व तकनीकि दक्षतापूर्ण वातावरण का निर्माण हो सके । 

इस उचित वातावरण की उपलब्धता में ही हम अपने देश में उपलब्ध प्रतिभाशील मानवसंसाधन की योग्यता में निखार लाने व उनके  नवाचारपूर्ण विचारों व उद्यमशीलता को सदुपयोग में लाते हुये एक औद्योगिक रुप से सफल व सक्षम हो सकते हैं , और इसतरह निकट भविष्य में एक विकसित उन्नत भारत का निर्माण करने में सफल हो सकते हैं। 

7 comments:

  1. आवश्यकता है , ताकि आने वाले भविष्य में उच्चकोटि की उद्यमशीलता के विकास हेतु उचित वैज्ञानिक व तकनीकि दक्षतापूर्ण वातावरण का निर्माण हो सके ।

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    1. जी धीरेंद्र जी ।

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  2. उच्चकोटि की उद्यमशीलता को स्थापित करने का सही मार्ग दिखाया है आपने इन दोनों आलेखों में.

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    1. टिप्पड़ी हेतु आभार रचना जी ।

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  3. Comment from Expression( अनु ) through email:

    इस तरह नवाचार के वृक्ष को विकसित व हराभरा होने हेतु आवश्यक है कि उसकी जड़े काफी गहरी हो व उसकी अनेकों टहनियाँ व शाखायें विकसित हो सके ।

    बहुत बढ़िया उच्चकोटि का लेखन

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  4. उत्तरभारत की यात्रा पर हूँ, मूलभूत सुविधाओं का प्रबन्धन अपनी गर्तों में पड़ा अपने उद्धार को तरस रहा है।

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